मंगलवार, 15 मई 2018

'स्वस्थ सोच संपदा बनाती, परंतु संपदा स्वस्थ सोच नहीं बनाती'

यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जो किसी 'धरोहर' से कम नहीं। 70 की उम्र भी ये छात्र जीवन जीते हैं। आठ घंटे के अध्ययन के बाद ही कोई काम। खाना-नाश्ता बाद में...अध्ययन की सामग्री पहले चाहिए। भगवान बुद्ध से इनकी विशेष आत्मीयता है। चाहे कोई कितनी पुस्तकें क्यों न पढ़ ले, बुद्ध के बारे में इनसे अधिक बताने वाले अपवाद स्वरूप कुछ लोग ही मिलेंगे। ये बुद्ध के हर उपदेश की 'विशेष व्याख्या' ऐसे करते हैं, जैसे आप बुद्ध से साक्षात्कार कर रहे हों। हम बात कर रहे सीतामढ़ी निवासी रामशरण अग्रवाल के बारे में। रामशरण को गुरु-शिष्य परंपरा में भी अटूट आस्था है और गौतम बुद्ध को मानव इतिहास का महानतम शिक्षक मानते हैं, जो गुरु भी हैं और गोविन्द भी। अपने बड़े भाई व सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश बीएन अग्रवाल से रामशरण ने बहुत कुछ सीखा है। 1983 में सीतामढ़ी यात्रा के दौरान सच्चिदानंद हिरानंद (अज्ञेय जी), जैनेन्द्र कुमार जैसे साहित्य के विद्वान रामशरण से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके थे।

मिलिए...सरस्वती के उपासक रामशरण अग्रवाल से
सीतामढ़ी जिले के कोट बाजार स्थित एक मकान, जिसमें खिड़की से हल्की रोशनी आती रहती है। कमरे में एक साइड टेबल, जिसपर बहुत-सी किताबें बिखरी पड़ी रहती हैं और इसमें खोये रहते रामशरण। सरस्वती के उपासक होने की वजह से इनके इर्द-गिर्द ज्ञान की 'गंगा' बहती है। इन्होंने कभी शिक्षा से समझौता नहीं किया। आप चाहे जिस विषय पर इनसे बात करें, प्रतीत होगा कि ये उसी विषय के ज्ञाता हैं। हिंदी और अंग्रेजी पर समान पकड़। कई साल पहले मैं इनके साथ एक आइएएस अधिकारी से मिला। सौहार्दपूर्ण वार्ता हुई। चार दिनों बाद संयोग से मेरी बात पुन: उसी आइएएस अधिकारी से हुई, उन्होंने कहा कि जो सर आपके साथ आए थे, वे कैसे हैं? वे किस बैच के आइएएस हैं और कब सेवानिवृत्त हुए। मैंने कहा कि वे व्यवसाय से जुड़े हैं। दरअसल वार्ता में हर दृष्टि से वे आइएएस पर भारी पड़ रहे थे। राम और शरण दोनों नाम इनके व्यक्तित्व का दर्पण है। राम की तरह विशाल हृदय भी रखते हैं। विपत्ति में फंसे लोगों की मदद में भी पीछे नहीं रहते। कोई चाहे किसी पद पर क्यों न विराजमान हो, एक बार इनसे बात करने पर यह अहसास जरूर होगा कि मुलाकात पहले क्यों न हुई...।

रामशरण के पास शुंगकालीन तीन ऐतिहासिक मूर्तियां
इनके पास शुंगकालीन तीन ऐतिहासिक मूर्तियां भी हैं, जिसे इन्होंने दशकों से संभालकर रखा है। भारत सरकार के अभिलेखों में 1977 में इन मूर्तियों के नाम दर्ज किए गए। मूर्तियों के बारे में कहा कि 1966-1970 के बीच उन्होंने दरभंगा से पूर्वी चंपारण के छौड़ादानो प्रखंड के जुआफर पंचायत तक पैदल यात्रा की थी। इसी क्रम में जुआफर गांव में रुके, यहां के दो-तीन किसानों के पास पुरानी मूर्तियां देखीं। पहचानते देर न लगी कि ये मूर्तियां शुंगकालीन हैं। मूर्तियों के प्रति इनकी रुचि देख वैद्यजी के नाम से प्रसिद्ध एक किसान ने इन्हें तीन मूर्तियां भेंट कीं। वैद्यजी ने श्री अग्रवाल को बताया था कि पुरानी मूर्तियां उन्हें खेत की खुदाई में मिली थीं। यहां के कई पुराने घरों में भी ऐतिहासिक ईंट का इस्तेमाल किया गया था। 1972 में मुजफ्फपुर के लंगट सिंह कॉलेज में ऑल इंडिया हिस्ट्री कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जिसमें बतौर डेलीगेट रामशरण ने शिरकत की और मूर्तियों की चर्चा अधिवेशन में आए काशी प्रसाद जायसवाल इंस्टीच्यूट के निदेशक डॉ. बीपी सिन्हा (अब स्वर्गीय), जैन एवं प्राकृत रिसर्च इंस्टीच्यूट वैशाली के निदेशक डॉ. रामेश्वर तांतिया (अब स्वर्गीय) और डॉ. देशाई नागपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष समेत दर्जनों विद्वानों के समक्ष की। सभी चौंक गए और कहा कि इसे देखने से उत्तर बिहार के पुरातत्व के प्रति धारणा ही बदल गई। 1977 में डॉ. माधवी अग्रवाल, भूतपूर्व निदेशक, पटना संग्रहालय के नेतृत्व में एक टीम आई और मूर्तियों का निरीक्षण कर भारत सरकार को अभिलेखों में दर्ज करने के लिए लिखा, जिसे मंजूर कर लिया गया।
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रविवार, 19 मार्च 2017

सावधान! हाइजैक हो रही आपकी गोपनीयता

सावधान! आपकी गोपनीयता खतरे में है, लेकिन आप चाहकर भी कुछ नहीं कर सकेंगे। मोबाइल का सिम खरीदने, आधार कार्ड बनवाने के लिए गोपनीय जानकारी शेयर करना हर किसी की मजबूरी है। इसी का फायदा कुछ डाटा ब्रोकर्स उठा रहे हैं। भारत में कई ब्रोकर्स विभिन्न माध्यम से गोपनीय डाटा एकत्रित करते हैं, पुन: ये किसी कंपनी के हाथों बेच देते हैं। बदले में मोटी रकम की वसूली करते हैं। कई बीमा कंपनियां, ऑनलाइन कंपनियां इस डाटा का उपयोग कर रही हैं। कभी-कभी आपके फोन पर अकस्मात दिल्ली-मुंबई से फोन आता है कि अमूक कंपनी से बीमा कराएं, इसके ये-ये लाभ हैं। कई बार अनजाने खत भी आते हैं, जिसमें लुभावने स्कीम की चर्चा होती है। आप चौंक जाते हैं कि आपका नाम व नंबर कैसे मिला? जानकर हैरानी होगी कि डाटा ब्रोकिंग का यह 'खेल' वैश्विक स्तर पर 200 अरब डालर का है, हालांकि भारत में यह प्रारंभिक चरण में ही है। मगर, इसकी गति तेज है। केंद्र व राज्य सरकारों की नजर अब तक डाटा ब्रोकरों पर नहीं गई है। उनके व्यवसाय से पुलिस-प्रशासन भी अनजान हैं। कैशलेस व्यवस्था के बाद इंटरनेट यूजर की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। लोग ऑनलाइन खरीदारी कर रहे हैं। टैक्सी बुकिंग व अन्य कामों के लिए भी विभिन्न तरह के एप का उपयोग किया जा रहा है। डाटा ब्रोकर्स इसका भी लाभ उठा रहे हैं। भारत सरकार ने अब तक ऐसे तंत्र विकसित नहीं किए, जो इस काम में संलिप्त लोगों पर लगाम कस सके। साइबर अपराध ने रफ्तार पकड़ ली है, इस तुलना में रोकने की कवायद सिफर है। पुलिस के पास आधुनिक यंत्रों का घोर अभाव है। कुल मिलाकर डाटा ब्रोकर्स से निपटने के लिए सरकार के पास फिलहाल कोई योजना नहीं दिख रही है। सख्ती के नाम छूट और सिर्फ छूट। ऐसे में ब्रोकरों को भय कैसे होगा? ऐसे तत्वों को रोकने के लिए सरकार को सख्त कानून बनाना ही होगा, क्योंकि डाटा से प्राप्त जानकारी के आधार पर हैकर बैंक के पासवर्ड भी हासिल कर सकते हैं। ऐसे में आम आदमी की गाढ़ी कमाई एक झटके में उनके हाथ से निकल सकती है। साइबर अपराध से निपटने के लिए अलग विभाग बनाने की जरूरत है, जो आधुनिक यंत्रों से लैस हो। इसमें पुलिस के तेज तर्रार अधिकारी व आइआइटियन हों। सरकार अब तक साइबर क्राइम व उससे जुड़ी हरकतों को हल्के में ले रही है। यही वजह है कि प्रतिदिन कई लोग इसके शिकार हो रहे हैं। 99 फीसद मामले में पुलिस को कामयाबी नहीं मिलती है। सो, सरकार को चाहिए कि समय रहते न सिर्फ चेते, बल्कि लोगों को जागरूक भी करे।
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बुधवार, 1 मार्च 2017

कहानी एक इंजीनियरिंग कॉलेज की

यह कहानी बिहार के एक ऐसे इंजीनियरिंग कॉलेज की है, जहां पढ़ाई कम और विवाद व हंगामा ज्यादा होता है। साल में कम से कम आधा दर्जन बार बड़ा बवाल होना तय है, जिसमें छात्र कक्षा छोड़ सड़क पर उतरते हैं/प्रदर्शन करते हैं। वजह एक नहीं अनेक हैं। क्या होने वाले भावी इंजीनियरों की ऐसी हरकत शोभनीय है? जाहिर है कि इसका उत्तर हर कोई ना में ही देगा। शिक्षक भी ना कहेंगे, अभिभावक व यहां तक कि छात्र भी गलत कहेंगे। फिर ऐसा हो क्यों रहा है? देश के अन्य  इंजीनियरिंग कॉलेजों में तो ऐसा नहीं होता, फिर यहां हंगामा व विवाद क्यों? मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआइटी) में हॉस्टल के अंदर छात्रों के अलग-अलग ग्रुप बने हुए हैं, जहां जाति-धर्म व गरीबी-अमीरी का फर्क साफ नजर आता है। कई सालों से विद्या के मंदिर में यह 'खेल' चल रहा है, लेकिन रोकने-टोकने वाला कोई नहीं। जिस उम्र में बच्चे  इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लेते हैं, उन्हें अच्छे-बुरे की समझ नहीं होती। ये कॉलेज में जो देखते हैं, उसे ही सीखते हैं। इनका आचार-व्यवहार भी वैसा ही हो जाता है। मगर, इन्हें भटकाव से रोकने, सही शिक्षा देने की जिम्मेवारी शिक्षकों की होती है, क्योंकि बच्चों के माता-पिता उनसे दूर हैं, वे नहीं देख रहे कि लाडले क्या कर रहे हैं। वे तो बच्चों को ऊंचाई पर देखना चाहते हैं। यह माना जा सकता है कि कुछ बच्चे भटक जाते हैं, मगर सभी तो ऐसे नहीं हैं। शिक्षकों को चाहिए कि समय-समय पर बच्चों की काउंसिलिंग करें। उनकी गतिविधियों पर नजर रखें, उनकी सही मांगों को मानें। बच्चों की मानसिकता को भी समझें, तदोपरांत उन्हें सही दिशा दें। बच्चों को एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि उनके माता-पिता ने इस उम्मीद से भेजा है कि वे बेहतर करें। ऐसे में उनका भी कर्तव्य है कि वे अभिभावकों के सपनों को साकार करें। छोटी-छोटी बातों पर उलझाव क्यों, विवाद क्यों? बातचीत के जरिए भी हर समस्या का निदान निकाला जा सकता है। एमआइटी में बार-बार विवाद से छात्रों की छवि खराब होती है। शिक्षकों पर भी सवाल उठता है? इलाके के लोग अभिभावकों पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं। विवाद की बात जब खबर बनती है तो दूसरे राज्यों के लोग तरह-तरह की टिप्पणियां करते हैं। यह कहने में भी परहेज नहीं करते कि बिहार में ऐसा ही होता है। हम यह मौका क्यों दें? विवाद की जगह शांति व्यवस्था क्यों नहीं? भेदभाव की जगह एक भाव क्यों नहीं? ऐसा करना कोई मुश्किल नहीं, लेकिन इसके लिए आत्ममंथन की जरूरत है। शिक्षकों को भी, छात्रों को भी...। तभी, नई सुबह आएगी, सुहानी सुबह आएगी...।
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रविवार, 5 फ़रवरी 2017

बिक रही शराब, पी रहे लोग

राज्य सरकार ने गए साल शराब बेचने व पीने पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी। इसके लिए कड़े कानून भी बना दिए, लेकिन सच यही है कि शराब बिक रही है और लोग पी रहे हैं। हां, अब खुलेआम कोई नहीं पीता है, बल्कि घरों में...! पार्टियां भी घरों में ही दी जाती हैं। शराब विक्रेताओं ने अब बिक्री का पैटर्न बदल दिया है। बिक्री के लिए अब 'विशेष कोड' का इस्तेमाल किया जाता है, फिर झोले में रखकर बोतल ग्राहक के घर तक पहुंचाई जाती है। कस्टमर देखकर दाम दोगुने व चौगुने वसूले जाते हैं। रिस्क अधिक होने की बात कहकर दाम अधिक वसूले जा रहे हैं। कानून के भय से खुलेआम पीने का साहस इक्के-दुक्के ही कर रहे हैं। सरकार ने नियम तो कड़े कर दिए, लेकिन यह तंत्र विकसित नहीं किया गया कि घरों में पीने वालों की पहचान कैसे होगी? उनपर कार्रवाई कैसे होगी? जिस मुहल्ले में पांच-छह घर के लोग पीने वाले हैं, वे एक 'जासूस' भी रखते हैं। वह नजर रखता है कि कहीं पुलिस की गाड़ी तो नहीं आ रही है। शराबबंदी रोकने की जिम्मेवारी पुलिस और उत्पाद विभाग की है। पुलिस शराबबंदी के नाम पर रोज चांदी काट रही है। यदि वह 50 कार्टन शराब जब्त करती है तो उत्पाद विभाग को सिर्फ 40 कार्टन ही शराब हाथ लगती है। दस कार्टन कहां गए, किसी को पता नहीं। सवाल कौन करेगा? पावर तो उसी के पास है? दस कार्टन शराब में से कुछ पुलिस वाले गटक जाते हैं और कुछ उन व्यवसायियों के हाथों दोगुने दाम पर बेच देते हैं, जो पुन: चौगुने दाम पर ग्राहकों को सप्लाई करते हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शराबबंदी का निर्णय वास्तव में सराहनीय है, लेकिन कानून के रक्षक ही इसका दुरुपयोग कर रहे हैं। यदि वास्तव में शराबबंदी पर पूरी तरह से रोक लगानी है तो छापामार दस्ते बनाने होंगे, जो समय-समय पर विभिन्न जगहों पर छापेमारी करें। इसी तरह कुछ ऐसे नंबर जारी करने होंगे, जिसपर लोग बेखौफ सूचना दे सकें। दो-तीन वाट्सएप नंबर भी जारी करने चाहिए। इस सूचना पर त्वरित कार्रवाई भी हो और सूचना देने वाले का नाम गोपनीय रखा जाए, तभी लोग आगे आएंगे। हेल्थ के विशेषज्ञ शराबबंदी को राज्य हित में लिया गया फैसला मानते हैं। मगर, यह भी मानते हैं कि लोगों ने डर से शराब छोड़ी है, इच्छा से नहीं। इसलिए सरकार की ओर से नियमित रूप से जागरूकता अभियान चलाना चाहिए, ताकि लोग शराब की बुराई को जान सकें और मन से इसका त्याग करें। कई धनाढय़ लोग अभी भी दूसरे राज्यों व नेपाल में जाकर शराब का सेवन कर रहे हैं। वहीं, गरीब नशा के लिए कप सीरप समेत कई नशे की दवाइयों का उपयोग कर रहे हैं। ये स्वास्थ्य के लिए नुकसान हैं। 

बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

मौसम विभाग की भविष्यवाणी ‘फेल’

मौसम विभाग हर साल बारिश की भविष्‍यवाणी करता है कि लेकिन गए चार सालों से उसकी भविष्‍यवाणी पूरी तरह फेल हो रही है। इस साल जब बेहतर मौसम की भविष्‍यवाणी की गई तो न सिर्फ किसानों के चेहरे खिल उठे, बल्‍कि कई कंपनियों ने मुनाफे की गणना भी शुरू कर दी। कयास की खबरें छपने लगी कि किसे कितना फायदा होगा। देश की अर्थव्‍यवस्‍था पर इसका कितना असर पड़ेगा। लेकिन कई विशेषज्ञ ऐसे भी थे, जो मौसम विभाग की भविष्‍यवाणी को पूरी तरह से खारिज करते हुए अपने काम में मशगूल रहे। ये वो हस्‍ती थे, जो मौसम विभाग में काम करते हुए उच्‍च पदों से रिटायर हुए थे। मीडियाकर्मियों ने जब उनसे यह जानना चाहा कि उन्‍हें अपने ही विभाग की भविष्‍यवाणी पर कितना यकीन है, वे बिफर पड़े-कहां कि मौसम विभाग की अस्‍सी फीसद भविष्‍यवाणी सही नहीं होती। मौसम विभाग से जुड़ी मशीनें पुरानी पड़ चुकी हैं। यह विभाग पूरी तरह से बीमार है। विदेशों में मशीनें अपडेट हैं, यही वजह है कि वहां की भविष्‍यवाणी बिल्‍कुल सटीक होती है। भारत में इसपर कभी ध्‍यान ही नहीं दिया गया। यदि वास्‍तव में इस विभाग को ठीक करना है तो अत्‍याधुनिक मशीनें लाई जाएं। यहां के वैज्ञानिकों को प्रोत्‍साहन दिया जाए, उन्‍हें विकसित देशों में भेजा जाए, जहां वे जाकर देखें कि वहां मौसम विभाग कैसे काम करता है? यदि विभाग की एक भविष्‍यवाणी गलत होती है तो इसपर मंथन किया जाए, ताकि दुबारा समस्‍या न झेलनी पड़ी। विशेषज्ञ का बयान वास्‍तव में चौंकाने वाला और चिंतित करने वाला है। सच भी है। वास्‍तव में मौसम विभाग की भविष्‍यवाणी पर आम आदमी को भी भरोसा नहीं है। बिहार के किसान तो यहां तक कहते हैं कि मौसम विभाग यदि आज बारिश की घोषणा करे तो मान लीजिए आज तेज धूप होगी। मौसम विभाग की ओर से सटीक भविष्‍यवाणी न होने से हर साल लाखों किसानों को खामियाजा उठाना पड़ता है। क्‍योंकि, आज भी अधिकतर किसान खेती के लिए मानसून पर निर्भर हैं। विदेशों में ऐसा नहीं है, वहां के किसान वैसी फसल उगाने पर ध्‍यान दे रहे हैं जिसमें कम पानी की आवश्‍यकता हो। इसके विपरीत हम अब भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं, इसमें सुधार की कोई उम्‍मीद नहीं दिख रही है। विश्‍व के कई देश आज भारत से दोस्‍ती चाहते हैं। ऐसे में सरकार को चाहिए कि बुनियादी चीजों को जल्‍द से जल्‍द दुरुस्‍त करे। सुलझे नेताओं को देशहित में ही काम का बीड़ा उठाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है, तभी तो मौसम विभाग आज भी दो दशक पीछे चल रहा है। केंद्र में मोदी सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्‍त है, ऐसे में बुनियादी समस्‍याओं को जल्‍द से जल्‍द निपटाना चाहिए। किसानों का कर्ज माफ करने से ज्‍यादा जरूरी है कि उन्‍हें आत्‍मनिर्भर बना दिया जाए। 

सोमवार, 12 सितंबर 2016

इन नेताओं को चाहिए मुद्दा

इन नेताओं को चाहिए मुद्दा, विषय चाहे पॉजिटिव हो या निगेटिव। कहीं कोई बड़ी घटना घट जाए तो बयान देने व आलोचना करने में ये पीछे नहीं हटते। यदि विपक्ष के नेता हैं तो हर गड़बड़ी के लिए सत्‍ता पक्ष जिम्‍मेवार है। सत्‍ता के हैं तो विपक्ष पर आरोप-प्रत्‍यारोप। विपक्ष के नेताओं को लगता है कि सिर्फ विकास की बात से जनता वोट नहीं देगी। इसलिए कुछ अलग करना है, कुछ अलग सोचना है। कई बार तो ये ऐसा बयान दे देते हैं, जिसकी आलोचना जनता ही शुरू कर देती है। ऐसे में सारा दोष मीडियाकर्मी पर मढ़ देते हैं। यदि गोलीबारी में कोई छात्र नेता घायल हो जाता है और संजोग से नेता जी अस्‍पताल पहुंचते हैं तो इनकी नजरें मीडियाकर्मी को ढूंढने लगती हैं, जबतक ये फोटो जर्नलिस्‍ट को देख न लें, इन्‍हें चैन नहीं। क्‍योंकि, बिना खबर कवरेज के लोग जानेंगे कैसे कि नेताजी आए थे। लोग कहेंगे कैसे कि नेताजी संवेदनशील हैं, हर दुख-सुख में लोगों के साथ खड़े हो जाते हैं। तय मानिए यदि मीडिया दो से तीन बार इनके घायल प्रेम के कवरेज को स्‍थान न दे तो ये अस्‍पताल की ओर ये कभी झांकेंगे ही नहीं। यदि घटना-दुर्घटना न हो तो ये बेरोजगार हो जाते हैं। तब ये अखबार में, टेलीविजन पर विरोधी नेताओं के बयान को गंभीरता से पढ़ते हैं, सुनते हैं। मंथन के बाद प्‍लानिंग, फिर शाम तक प्रेस विज्ञप्‍ति जारी कर एलान, यह फैसला सूबे या देश हित में नहीं है। विपक्ष आलोचना करता है। इनकी राह पर इनसे जुड़े अन्‍य नेता भी चल पड़ते हैं। फिर जिला व प्रखंड स्‍तर के नेता पीछे क्‍यों रहें? नेताजी को लगता है कि जनाधार मिलने लगा, मीडिया में कवरेज भी ठीक से होने लगा, फिर क्‍या धरना-प्रदर्शन का निर्णय ले लिया या फिर सूबे बंद का। कम से कम सात दिन इंगेज रहने के लिए ठीक-ठाक विषय तो मिल ही गया। इसी तरह एक के बाद एक विषय का चयन करते-करते साढ़े चार साल बीत जाता है, फिर चुनाव की घोषणा। तदोपरांत वोट की राजनीति, गिनती गिनाने का समय हमने अमूक घायल को अस्‍पताल में जाकर देखा। बेहतर चिकित्‍सा की व्‍यवस्‍था कराई। जनता के लिए धरना-प्रदर्शन किया। नेताजी जरा बताएं कि क्‍या जनता ने आपको कहा था कि आप विकास के बदले धरने पर बैठें? आपको तो बड़ी उम्‍मीद से जनता ने कुर्सी पर बिठाया था, आपको तो योजना बनानी चाहिए थी कि पिछड़ा क्षेत्र विकसित कैसे होगा? इसके लिए लड़ाई लड़नी चाहिए थी। छात्र यदि बेवजह हंगामा कर रहे हैं तो उन्‍हें समझाना चाहिए था। किसी बात पर नाराज भीड़ यदि हंगामा कर रही तो उसे इंसाफ दिलाना चाहिए था। लेकिन यदि आप ऐसा करेंगे तो मुद्दा ही खत्‍म हो जाएगा। मुद्दा खत्‍म हो जाएगा तो आप बेरोजगार हो जाएंगे।