सोमवार, 28 दिसंबर 2009

बच्चों के यौवन पर दाग लगने से रोकिए!


समय के साथ तेजी से बदल रहा लोगों का मन-मिजाज। परंतु पृथ्वी व चांद, सूरज वहीं है, ठीक इसी तरह स्त्री-पुरुष में आज भी भेदभाव कायम है। स्त्री चाहे जिस मुकाम पर पहुंच जाए, उसे पुरुष के सामने झुकना ही पड़ता है। अभी के दौर में आधुनिकता के नाम पर लड़कियां जींस-शर्ट अधिक पसंद कर रही हैं। इसी तरह हाईस्कूल तक पहुंचते ही अधिकतर लड़कियों का झुकाव युवा लड़कों की ओर हो जा रहा है। कॉलेज में पढऩे वाली लड़की का यदि ब्यॉय फ्रेंड नहीं है तो इसे अपमान समझा जा रहा है। वहीं, लड़के तो लड़कियों से दोस्ती करने के लिए बेचैन दिखते हैं। किशोर से युवा की तरफ बढऩे के साथ ही विपरीत सेक्स की ओर रुझान आम बात है। परंतु दिक्कत वहां से शुरू होती है, जब कोई अठारह वर्ष का युवक व युवती एक-दूसरे के करीब आने की कोशिश करते हैं। करीब ये दोस्ती में नहीं बल्कि पति-पत्नी की तरह संबंध बनाने के लिए आते हैं। इस वक्त इन्हें मां-बाप, भाई-बहन या फिर समाज का कोई ख्याल नहीं आता। इनका कैरियर बर्बाद हो जाएगा, ये कहीं के नहीं रहेंगे, इस बात का होश भी कच्ची उम्र के चलते इन्हें नहीं रहता। संबंध बनाने के दो-तीन महीने के बाद बिजली तब गिरती है, जब लड़की को पता चलता है कि वह मां बननेवाली है। मारे शर्म के या तो वह खुदकुशी की कोशिश करती है या फिर गर्भ गिराने की बदनामी झेलती है। इसके साथ ही कलंकित होता है उसका पूरा परिवार। वहीं, लड़की का साथी या तो गायब हो जाता है, या फिर लड़की के परिवार द्वारा किए गए यौन उत्पीडऩ के केस में फंस हवालात की सजा काटता है। ऐसे कम ही खुशनसीब लड़की होती है, जिसे गर्भ ठहरने के बाद ही लड़का कबूल कर लेता है। परंतु यह उम्र शादी की नहीं होती, सो परिवार वाले इसके लिए राजी नहीं होते और अन्तत: लड़की के पास गर्भ गिराने के अलावा कोई रास्ता नहीं रहता। इसमें कसूर किसका है लड़की या लड़का या फिर अभिभावक, जिन्होंने बच्चों को इतनी आजादी दे रखी थी? बच्चियां बड़ी होने के साथ मां-बाप की जिम्मेवारी बढ़ जाती है। सौ में साठ फीसदी अभिभावक यह नहीं देखते कि बच्ची यदि कॉलेज गई है तो उसने कितने क्लास किए। उसके मित्रों की सूची में कौन-कौन लड़के हैं। कॉलेज कैसे जाती है, आने में विलंब क्यों हुआ, जिस विषय का वह कोचिंग करना चाहती है, क्या वास्तव में उसे जरूरत है या फिर टाइम पास? ऐसी छोटी-छोटी चीजों पर नजर रखकर बच्चों को दिग्भ्रमित होने से बचाया जा सकता है। बेटों के पिता की जिम्मेवारी भी बेटी के पिता से कम नहीं है? यदि उनका बेटा किस लड़की के साथ गलत हरकत करता है। ऐसे में बदनामी उनकी भी होती है, समाज में उनका सिर भी झुकता है। ऐसे में थोड़ी से चौकसी इस भीषण समस्या से बचा सकती है। अत: चेतिए और बच्चों को दोस्त बनाइए ताकि ये आपको अपने दिल की बात बेहिचक बता सकें। इससे आप गंभीर संकट में फंसने से बच जाएंगे। बिहार के छोटे-छोटे गांव से भी नाबालिग लड़के-लड़कियां शादी की नीयत से भागने लगे हैं। वहीं, अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि गर्भ गिरानेवालों की संख्या भी बढ़ी है। क्रमश...

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

सीतामढ़ी में शुंगकालीन तीन मूर्तियां


सरस्वती के उपासक रामशरण के पास हैं प्रतिमाएं :  यह जानकर हैरत होगी कि बिहार के सीतामढ़ी में भी शुंगकालीन तीन मूर्तियां हैं, पर है सौ फीसदी सच। वर्ष 1977 में भारत सरकार के अभिलेखों में इन मूर्तियों के नाम दर्ज किए गए। पेशे से व्यवसायी पर सरस्वती के सच्चे उपासक रामशरण अग्रवाल विगत चार दशकों से इन मूर्तियों को संभालकर एक बैंक के लॉकर में रखे हुए हैं। सीतामढ़ी शहर के कोट बाजार निवासी रामशरण उम्र के 64वें वर्ष में भी विद्यार्थी की तरह आठ घंटे पुस्तकों और अखबारों में उलझे रहते हैं। श्री अग्रवाल से जब इन मूर्तियों सहित कुछ सवाल पूछे गए तो वे कुछ मिनटों के लिए खामोश हो गए। शीघ्र ही तंद्रा तोड़ते हुए कहा कि 'स्वस्थ सोच संपदा बनाती है परंतु संपदा स्वस्थ सोच नहीं बनाती है।' इसे आत्मसात करने की जरूरत है। शुंग कालीन मूर्तियों के बारे में कहा कि 1966-1970 के बीच उन्होंने दरभंगा से पूर्वी चंपारण के छौड़ादानों प्रखंड की जुआफर पंचायत तक पैदल यात्रा की थी। इसी क्रम में जुआफर गांव में रुके। यहां के दो-तीन किसानों के पास पुरानी मूर्तियां देखीं। पहचानते देर न लगी कि ये मूर्तियां शुंग काल की हैं। मूर्तियों के प्रति इनकी रुचि देख वैद्यजी के नाम से प्रसिद्ध एक किसान ने इन्हें तीन मूर्तियां भेंट कीं। वैद्यजी ने श्री अग्रवाल को बताया कि पुरानी मूर्तियां उन्हें खेत की खुदाई में मिली थीं। यहां के कई पुराने घरों में भी ऐतिहासिक ईंट का इस्तेमाल किया गया था। 1972 में मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में ऑल इंडिया हिस्ट्री कांग्रेस का अधिवेशन हुआ,जिसमें बतौर डेलीगेट श्री अग्रवाल ने शिरकत की और मूर्तियों की चर्चा अधिवेशन में आए काशी प्रसाद जायसवाल इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. बीपी सिन्हा (अब स्वर्गीय), जैन एवं प्राकृत रिसर्च इंस्टीट्यूट वैशाली के निदेशक डॉ. रामेश्वर तांतिया (अब स्वर्गीय) और डॉ. देसाई नागपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष समेत दर्जनों विद्वानों के समक्ष की। सभी चौंक गए और कहा कि इसे देखने से उत्तर बिहार के पुरातत्व के प्रति धारणा ही बदल गई। 1977 में डॉ. माधवी अग्रवाल, भूतपूर्व निदेशक, पटना संग्रहालय के नेतृत्व में एक टीम आई और मूर्तियों का निरीक्षण कर भारत सरकार को अभिलेखों में दर्ज करने के लिए लिखा, जिसे मंजूर कर लिया गया। 1981 में सीतामढ़ी से नेपाल-तिब्बत सीमा तक स्कूटर से यात्रा करनेवाले और शेयर विशेषज्ञ श्री अग्रवाल को मंदी के बारे में तीन साल पूर्व ही आभास हो गया था। उन्होंने बताया कि कुषाण काल में भारत की विश्व जीडीपी में 22 फीसदी, ईस्ट इंडिया कंपनी के शुरू में 6 फीसदी और फिलहाल 1 फीसदी से भी कम हिस्सेदारी रह गई है। पिछले 12 वर्षों में पश्चिम की अर्थव्यवस्था वित्तीय सेवाओं पर केन्द्रित होती गई और उत्पादन की धुरी चीन व भारत की तरफ आ गई। ऐसे में झटका लगना तय था, जो मंदी के रूप में सामने आई। भारत में निवेश के लिए जल प्रबंधन एवं पर्यटन को वे सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। 1983 में सीतामढ़ी यात्रा के दौरान सच्चिदानंद हीरानंद (अज्ञेय जी), जैनेन्द्र कुमार जैसे साहित्य के विद्वान भी इनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके थे। इन विद्वानों से रामशरण को आशीर्वाद मिला। रामशरण को गुरु-शिष्य परंपरा में अटूट आस्था है और गौतम बुद्ध को मानव इतिहास का महानतम शिक्षक मानते हैं, जो गुरु भी हैं और गोविन्द भी। रामशरण बताते हैं कि उन्होंने अपने बड़े भाई व सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश बीएन अग्रवाल से बहुत कुछ सीखा है।

अध्ययनशील व कुशल वक्ता भी : आशा
इंग्लैंड में शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित और बिहार की निवासी आशा खेमका (यूके में न्यू कॉलेज नॉटिंघम में प्रिंसिपल और चीफ एक्जीक्यूटिव हैं) ने टेलीफोन पर बताया कि रामशरण एक अध्ययनशील व्यक्ति के साथ कुशल वक्ता भी हैं, जिनके हर शब्द नपे-तुले रहते हैं। कहा कि नेशनल ज्योग्राफिक एवं एकॉनामिस्ट, इंडिया टुडे, टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक जागरण समेत दर्जनभर से अधिक पत्र-पत्रिकाओं के रेगुलर पाठक हैं। आशा को अपने नाम के साथ ओबीई (ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश इम्पायर) लिखने का अधिकार भी प्राप्त है।

चेंजेज को पहले ही भांप लेते हैं : अरुण
बंगलूरू में भारत के एकमात्र फाइनेंसियल एक्टिविस्ट अरुण कुमार अग्रवाल ने दूरभाष पर बताया कि वे मोबाइल पर रामशरण अग्रवाल से आर्थिक मुद्दों पर प्राय: विचार-विमर्श करते रहते हैं। श्री अग्रवाल ने दावे के साथ कहा कि उत्तर बिहार में शेयर के बारे में रामशरण जैसा जानकार शायद ही कोई हो। यह भी कहा कि भविष्य में होने वाले चेंजेज को वे पहले ही भांप लेते हैं। मंदी के पहले ही उन्होंने इसकी परिकल्पना कर ली थी। महंगाई के संबंध में पूछने पर अरुण ने बताया कि फिलहाल घटने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

शिबू ही बनेंगे झारखंड के मुख्यमंत्री!


झारखंड विधानसभा में खंडित जनादेश के बाद भी सत्ता की 'कुंजी' झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के सुप्रीमो शिबू सोरेन (गुरुजी) के हाथ में ही है। शिबू को किसी पार्टी के नेता के साथ सरकार बनाने में कोई परहेज नहीं है। यानी हर हाल में शिबू को चाहिए मुख्यमंत्री की कुर्सी? 23 को हुए झारखंड विस चुनाव की मतगणना में कांग्रेस गठबंधन को 25, भाजपा को 18, जदयू को 02, राजद को 05, झामुमो को 18 और अन्य को 13 सीटें मिली हैं। कांग्रेस यदि गुरुजी को मुख्यमंत्री मान ले तो झामुमो और कांग्रेस गठबंधन की कुल 43 सीटें हो जा रही हैं, जो सरकार बनाने से दो अधिक है। सरकार बनाने के लिए यहां 41 सीटें चाहिए। मगर कांग्रेस शिबू को मुख्यमंत्री नहीं बनाना चाहती। झारखंड की अंदरुनी हालत काफी खराब है, इस बात को कांग्रेसी नेता बखूबी समझते हैं। कुछ कांग्रेसी नेता दबी जुबां में आलाकमान के सामने विरोध भी दर्ज करा चुके हैं। 25 दिसंबर 09 को झामुमो विधायक दल के नेता के रूप में शिबू सोरेन चुन लिए गए हैं। इसके साथ ही सरकार बनाने की सियासत और तेज हो गई है। सूत्र बताते हैं कि भाजपा ने गुरुजी की तरफ पांसे फेंक दिए हैं, इसी के भरोसे शिबू मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज होना चाहते हैं। हालांकि अबतक किसी दल के नेता की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। लेकिन कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकने के लिए भाजपा सांसद व पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा शिबू को समर्थन देने के लिए तैयार हैं। मुंडा शिबू खेमे के पल-पल की सूचना ले रहे हैं। कांग्रेस खेमा भी गहन विचार-विमर्श में डूबा है। अब देखना यह है कि गुरुजी किसकी मदद से मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते हैं? शिबू पहले ही बयान दे चुके हैं कि वे किसी दल को 'अछूत' नहीं मानते हैं। राज्य की 81 सदस्यीय विधानसभा सीटों में अकेले झामुमो के पास 18 सीटें हैं। ऐसे में सब पार्टियों की नजर शिबू की ओर ही है। इधर, केन्द्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुबोध कांत सहाय का कहना है कि शिबू को सरकार बनाने में कांग्रेस दो बार मदद कर चुकी है। कांग्रेस ने शिबू को 2005 में बाहर से सरकार बनाने में समर्थन दिया था, यह अलग बात है कि सरकार सिर्फ नौ दिन ही चल पाई थी। पुन: 27 अगस्त 2008 से 12 जनवरी 2009 तक शिबू सोरेन को कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था। मालूम हो कि झारखंड चुनाव में अबकी कांग्रेस-झाविमो को 25 सीटें मिलीं। कांग्रेस की सीटें नौ से बढकर इसबार 14 हो गई। वहीं, भाजपा-जदयू को भारी नुकसान उठाना पड़ा। झामुमो को एक सीट का फायदा हुआ। राजद को दो सीटों का नुकसान हुआ। लोजपा का तो खाता ही नहीं खुला।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

पांच मौत के जिम्मेवार कौन?

बिहार के मोतिहारी में सुगौली-रक्सौल रेलखंड में एक मानवरहित ढाला है, जिसे शीतलपुर ढाला के नाम से पुकारा जाता है। 22 दिसंबर को इसी गुमटी से एक मार्शल जीप गुजर रही थी, जो इंजन से जा टकराई। टक्कर इतनी भीषण थी कि मार्शल को घसीटते हुए इंजन आधा किलोमीटर दूर तक निकल गया। इस बीच मार्शल पर बैठे पांच लोगों की चीखें इंजन की आवाज पर भारी पड़ी, हालांकि ये चीखें चंद सेकेण्ड में ही शांत हो गईं, क्योंकि तबतक ये पांचों मर चुके थे। दो ऐसे मासूम थे, जिसे मौत का अर्थ तक मालूम नहीं था। एक थी-चार वर्षीय दिलजान खातुन तो दूसरा महज अठारह माह का नन्हा। इनके साथ ही मौत की नींद सो गए-इसकी मां फरीदा खातुन और नाना हबीबुल्लाह। यानी एक ही परिवार के चार। चालक को भी भागने का मौका नहीं मिला। समस्तीपुर के डीआरएम ने इस हादसे के लिए मार्शल के चालक को दोषी ठहराया है, जो अक्षरश: सही है। हालांकि वह बेचारा भी हमेशा के लिए सो चुका है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राहत कोष से पीडि़त परिवार के आश्रितों को पचास-पचास हजार देने की बात कही। इस घटना से आसपास के लोग आक्रोशित हो उठे और इंजन में ही आग लगा दी। उग्र लोगों ने रेलवे ट्रैक को जगह-जगह काट दिया। यानी पांच जान के साथ एक अरब रुपए का भी नुकसान। खैरियत यही थी कि इंजन से बोगिया नहीं जुड़ी हुई थीं। वर्ना आक्रोशित भीड़ शायद उसे भी फूंक देती। एक अरब का नुकसान किसका हुआ, सरकार का या फिर जनता का? यह यक्ष प्रश्न है जिसके बारे में हर व्यक्ति को सोचना होगा? भीड़ के किसी भी व्यक्ति में मरनेवालों के प्रति लगाव नहीं दिखा। पहले दो-चार लोगों ने हो-हल्ला किया, फिर क्या हुजूम ने ही तांडव शुरू कर दिया। इंजन को बुझाने का प्रयास भी लोगों ने विफल कर दिया। कसूर किसका, मार्शल चालक का या फिर इंजन चालक का या फिर रेलवे प्रशासन की व्यवस्था की? यह तो तय है कि सभी गांवों से गुजरनेवाले ढाले का मानवयुक्त नहीं बनाया जा सकता है, क्योंकि भारत के पास उतना संसाधन ही नहीं है? ऐसे में थोड़ी सी चौकसी से इस तरह की बड़ी घटना को टाली जा सकती है। यह घटना भी टाली जा सकती थी, यदि चालक ने ढाला को पार करते वक्त यह देखा होता कि इंजन आ रहा है तो पांच जिंदगियां बच जातीं। इस तरह के हादसे अलग-अलग राज्यों में प्राय: सुनने को मिलते हैं। चालक की छोटी गलती से कई जानें चली जाती हैं। इसके पीछे कम कसूरवार प्रशासन नहीं है? ऐसे लोगों को भी ड्राइविंग लाइसेंस आराम से मिल जाते हैं, जो हर वक्त नशे में धुत रहते हैं या फिर जिनकी समझ बहुत छोटी होती है। बिहार में तो पन्द्रह साल के किशोर भी ऑटो चालक बन गए हैं। आश्चर्य तब और लगता है जब इस ऑटो पर हर वर्ग के लोग बैठ जाते हैं। हां, दुर्घटना होने पर अवश्य पछताते हैं कि उनसे गलती हो गई। थोड़ी-सी चौकसी वाहन पर बैठनेवालों को भी बरतनी चाहिए। यदि चालक गाड़ी तेज चला रहा है तो उसे समझाया जा सकता है।

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

मंदी के नाम पर और कितना शोषण?

विश्व के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मंदी के बादल लगभग छंट चुके हैं। भारत के वित्त मंत्री भी घोषणा कर चुके हैं कि फिर से रोजगार के नए अवसर खुलने लगे हैं। परंतु भारत के मध्यम निजी कंपनियों और कुछ उच्च कंपनियों में अभी मंदी का दौर खत्म नहीं हुआ है? मंदी के बहाने अबतक सैकड़ों कंपनियां हजारों लोगों को बाहर का रास्ता दिखा चुकी है। उनलोगों पर गाज अधिक गिरी, जिनके वेतन अधिक थे। कम वेतन वाले तो कुछ सुरक्षित बच गए परंतु अधिक वेतन वाले बेकाम हो गए। मंदी के बहाने फायदे में चली रही कंपनियों ने भी छंटनी के नाम पर कर्मचारियों का जमकर दोहन किया। काम के घंटे बढ़ा दिए जबकि तनख्वाह में फूटी कौड़ी भी बढ़ोतरी नहीं की। गोपनीय आंकड़ों पर गौर किया जाए तो सैकड़ों कंपनियों ने दो वर्षों से मंदी के नाम पर अपने किसी कर्मचारी को 'इन्क्रीमेंट' तक नहीं दिया है। यदि किसी कर्मचारी ने हिम्मत करके अपनी बात रखने की कोशिश की तो नौकरी से निकाल देने की धमकी मिलती है। ऐसे में ये कर्मचारी किससे शिकायत करें, कहां जाएं, अंधी सरकार तो पहले से ही कंबल ओढ़कर सोई हुई है? महंगाई पहले से घरों में समा चुकी है। भारत की एक बड़ी कंपनी की शाखा बिहार में भी है। यहां के कई ऐसे कर्मचारियों से जबरन इस्तीफा ले लिया गया, जो बीस साल से अधिक समय से उस कंपनी में बने हुए थे। इनका कार्य भी बेहतर माना जाता रहा है। इनके बॉस ने कहा कि या तो इस्तीफा दें, वर्ना कोई इल्जाम लगाकर निकाल दिया जाएगा। मजबूर होकर कर्मचारियों को इस्तीफा देना पड़ा। एक दशक पहले तक बड़ी कंपनियों में नौकरी 'पर्मानेंट' होती थी। किसी कर्मचारी को हटाना आसान भी नहीं था। अब सभी कंपनियों में नौकरी 'कांट्रेक्ट' पर दी जा रही है, जिसे कंपनी जब चाहे हटा दे रही है। इसका कहीं विरोध नहीं हो रहा क्योंकि सरकार ही पक्ष में खड़ी है। इधर, हजारों कर्मचारी डर के साये में नौकरी कर रहे हैं। मंदी की दस्तक के साथ ही कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को न सिर्फ डराया बल्कि जमकर शोषण भी किया और कर रहे हैं। आसमान छूती महंगाई ने कम वेतन पाने वालों के घर से दाल की कटोरी गायब कर दी है। गृहणियां अपने पतियों से उलझ रही हैं कि खर्च कैसे चलाएं? इसका जवाब निजी कंपनी के कर्मचारियों के पास नहीं है। हालांकि कर्मचारियों के मस्तिष्क में एक बात अवश्य तैर रही है कि मंदी के नाम पर उनका और कितना शोषण किया जाएगा? कांट्रेक्ट पर बहाली करते वक्त ही कंपनियां कर्मचारियों से लिखता लेती है कि यदि उनका कार्य ठीक-ठाक नहीं रहा तो उन्हें 'कांट्रेक्ट' की अवधि के पूर्व भी हटाया जा सकता है। ऐसे में खामोश रहना इनकी मजबूरी है, लेकिन कब तक?

रविवार, 20 दिसंबर 2009

चेतिए! बच्चे ' पॉर्न साइट' देख रहे...

इंटरनेट मानव के लिए एक जरूरत बन चुकी है, जिसे नकारना समाज को वर्षों पीछे ले जाना होगा। भारत में इंटरनेट की जरूरत हर तरह के लोग महसूस करने लगे हैं। यही कारण है कि उच्च वर्ग के लोगों के अलावा अब मध्यम वर्ग के लोग भी इंटरनेट इस्तेमाल करने लगे हैं। ऐसे लोग जिनके पास इंटरनेट की सुविधा नहीं है वे साइबर कैफे की ओर रुख करने लगे हैं। बिहार में मध्यम वर्ग की लड़कियां भी अब बेहिचक साइबर कैफे पहुंचने लगी हैं। इंटरनेट में जानकारियों का खजाना भरा-पड़ा है, आपको कोई जानकारी चाहिए, बस क्लिक कीजिए-जानकारी ही जानकारी। अब चलते हैं, इसके निगेटिव पहलू की ओर। इसमें हजारों साइट ऐसे हैं, जो किशोरों पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं। लाखों अभिभावक ऐसे हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने की खुली छूट दे रखी है। ऐसे में बारह साल का किशोर भी ' पॉर्न साइट' खोलना सीख गया है, इतना ही नहीं वह 'पॉर्न वीडियो' भी देखता है। ऐसे में अभिभावकों की जिम्मेदारी बनती है कि वह खुद के सामने ही बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने की इजाजत दे। यहां तक कि आफिस जाते वक्त कंप्यूटर में 'पासवर्ड' अवश्य डाल दे। बच्चे देश के भविष्य हैं, ऐसे में यह निगरानी अत्यंत जरूरी है। बच्चे हर चीज को जानना चाहते हैं, ऐसे में ज्ञान के अभाव में गलत चीजें देख वे उल्टी-सीधी हरकते करने लगते हैं। इससे कई बार अभिभावकों का सिर समाज में झुक जाता है। थाने में दर्ज मामले बताते हैं कि छेड़खानी मामले में चौदह साल के किशोर भी आरोपित किए जाते हैं और उन्हें हिरासत में ले रिमांड होम भी भेजा जाता है। अब जरा युवाओं पर इंटरनेट के असर की पड़ताल पर भी गौर फरमाना जरूरी है। संस्कारी युवाओं को सबसे अधिक चिंता भविष्य को लेकर होती है, क्योंकि इनमें कुछ बनने का जज्बा रहता है। यदि किसी युवा को 'पॉर्न साइट' देखने की लत पड़ गई तो उसकी पढाई-लिखाई चौपट तो होती है, साथ ही स्वास्थ्य भी खराब कर बैठता है। इधर, अभिभावक समझ नहीं पाते कि उनके बेटे को क्या रोग लग गया? वर्तमान में कॉर्ल गर्लस भी ईमेल और मोबाइल से ग्राहक पटाने लगी हैं। ऐसे में इनके शिकार नौजवान अधिक होते हैं। गलत हरकतों के चलते कई नौजवानों को जेल की हवा भी खानी पड़ती है। इनके अभिभावकों को भी बात तब समझ में आती है, जब काफी देर हो चुकी होती है। इसलिए, चेतिए कि आपके बच्चे क्या कर रहे हैं, कहीं ये पॉर्न साइट तो नहीं देख रहे हैं। पुलिस डायरी कहती है कि छेड़खानी व बलात्कार मामलों में जबरदस्त इजाफा हुआ है। कई वरीय पुलिस अधिकारी तो यह भी मानते हैं कि युवाओं को बिगाड़ रहा है इंटरनेट। बिहार के अखबारों में प्रतिदिन प्रेमी संग प्रेमिका फरार की खबरें छपती है। पुलिस तक इस घटना से तंग आ चुकी है।

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

इन्हें लाश की राजनीति में भी शर्म नहीं आती!

प्रसंग-एक : निठारी कांड का एक पात्र सुरेन्द्र कोली, जो छोटे-छोटे बच्चों को टुकड़ों में काटकर उसका गोश्त खाता था। फिलहाल जेल में हैं, कोली की चर्चा छिड़ते ही लोगों के चेहरे पर घृणा के भाव उभर आते हैं जबकि वह अपने जुर्म की सजा भुगत रहा है। कोली जैसे हत्यारे ने अपने जघन्य अपराध को माना।
प्रसंग-दो : दिल्ली में गए वर्ष हुए एक बम विस्फोट की जानकारी जब तत्कालीन गृह मंत्री को मिली तो उन्होंने पहले सूट बदला, पाउडर चपोड़े फिर देखने गए कि कितने लोग मारे गए हैं? गृह मंत्री ने मरे लोगों के शवों पर कत्थक करने से पहले खुद को सजा-संवार लिया था। इस घटना के कुछ ही माह बाद ये पद से हट गए, परंतु इन्हें कभी पछतावा नहीं हुआ।
प्रसंग-तीन : झारखंड राज्य बनने के पहले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री थे, इन्होंने एक भाषण में कहा था कि उनके शव पर ही राज्य का बंटवारा होगा। यानी जीते जी वे बंटवारे की बात को स्वीकार नहीं करेंगे। कुछ दिनों बाद झारखंड स्वतंत्र राज्य बना। लालू प्रसाद अब भी राजनीति कर रहे हैं। इन्हें कोई पछतावा नहीं कि झारखंड बनने से बिहार कमजोर हो गया।
सतीश श्रीवास्तव जी आपके लेख जलियांवाला बाग के खानदान ही खत्म! मैंने पढ़ा, आपको बधाई कि आपने एक ऐसे विषय को छुआ जिसे लाशों पर राजनीति करने वाले इतिहास का मरा पात्र भी मानने को तैयार नहीं हैं। आपके लेख से मस्तिष्क में 'आइला' उठा, उसे शांत करने के लिए उक्त प्रसंगों का सहारा लेना पड़ा। जिस देश के नेता को जलियांवाला बाग के शहीद को शहीद मानने में परेशानी हो रही है, इनके लिए कौन-सा शब्द इस्तेमाल किया जाए। इसपर पर गंभीरता से विचार करना होगा? हाल ही में मनसे नेताओं ने सपा विधायक अबू आजमी को हिन्दी में शपथ लेने के लिए प्रताडि़त किया था। मनसे नेताओं को शायद मां को मां कहने में भी शर्म आती है। ऐसे विचारधारा के नेता भला शहीद को शहीद आसानी से कैसे कहेंगे, कैसे मान लेंगे। जलियांवाला बाग की घटना तो भारतीय के मुंह पर अंग्रेजों का एक ऐसा तमाचा था जिससे भारतीय टूट जाए, झूक जाए। परंतु इसी घटना ने भारत में आजादी की ऐसी मशाल जलाई जिसमें अंग्रेज धू-धूकर जल गए। केन्द्र व राज्य सरकारों ने स्वतंत्रता सेनानियों को तो कई सुविधाएं दीं, क्योंकि ये जिंदा हैं, वोट दे सकते हैं, इन्हें गद्दी पर बिठा सकते हैं। परंतु 1919 में घटी जलियांवाला बाग की घटना के शहीदों को अबतक शहीद का दर्जा न मिलना वास्तव में चिंतनीय है। इसमें मारे गए शहीदों की गिनती भी नेताओं को सही से याद नहीं है। जहां अंग्रेजी हुकू मत की पंजाब सरक ार की रिपोर्ट में बाग में 379 लोगों के मारे जाने की बात स्वीकारी गई थी, वहीं अमृतसर सेवा सोसायटी ने उसी समय 530 शहीदों की सूची तैयार की थी। जबकि आजाद भारत सरकार का कोई अधिकारिक दस्तावेज अब तक जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों को शहीद ही नहीं मानता। शहीद हरिराम बल के पौत्र भूषण बहल 1980 से जलियांवाला बाग के शहीदों को स्वतंत्रता सेनानी घोषित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब वह 60 के हो चुके हैं। इनके संघर्ष का ही नतीजा है कि सोलह लोगों के वारिसों का पता लग गया है।

सोमवार, 7 दिसंबर 2009

ये सही हैं, क्योंकि ये संपादक हैं?

बुद्धिजीवियों के सामने जैसे ही संपादक शब्द आता है, चंद ही सेकेण्ड में उनके चेहरे के भाव चढऩे-उतरने लगते हैं। सहसा शांत हो जाता है क्योंकि तब उनके सम्मुख एक ऐसे व्यक्ति का चेहरा उभरकर सामने आता है, जो विद्वानों का विद्वान होता है। सबका दर्द हरण करने वाला होता है। हर वर्ग के लोगों की समस्याओं को अपनी समस्या मानकर सही जगह पर उठानेवाला होता है। परंतु संपादक के चेहरे के पीछे का चेहरा किसी को नजर नहीं आता है। इस चेहरे को देखने के लिए जाना होगा किसी बड़े अखबार के दफ्तर में। यहां कई चेहरे बुझे नजर आएंगे, यानी काम के साथ सभी अपने-अपने गम में डूबे। नौकरी करनी है, सो काम तो करना ही है। इत्तफाक से यदि उसी वक्त संपादक जी पहुंच गए तो फिर क्या कहना, कुछ पल के लिए कर्फ्यू। वजह क्या है इसकी चर्चा भी जरूरी है। अखबार के दफ्तरों में तीन तरह के लोग अधिक होते हैं-पैरवीपुत्र, चाटुकार और काम करनेवाले। पैरवी पुत्र काम करें या न करें, उन्हें समय पर वेतन और तरक्की मिलनी तय है। गप्पबाजी में ये माहिर होते हैं। पर इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है, क्योंकि इनकी पहुंच संपादक के संपादक तक रहती है। दूसरे नंबर पर हैं चाटुकार-बोलने में तेज तर्रार और संपादक के सामने भी धौंस दिखाने वाले, सो इनकी चलती सबसे अधिक होती है। क्योंकि, ये संपादक के इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं। इनका जाल इतना मजबूत होता है कि हर संपादक इनके झांसे में आ जाते हैं। तीसरे नंबर पर वे हैं जो भटकते-भटकते और काफी संघर्ष से आए हैं। इन्हें ही सबसे ज्यादा काम करना पड़ता है। इनका वेतन भी कम बढ़ता है। तरक्की तो शायद कभी न मिले या फिर कभी संपादक की नजर इनपर चली जाए तो कुछ हो जाए। परंतु ऐसा कम ही देखने को मिलता है। ऐसे में ये हमेशा असंतोष की भावना लिए काम करते हैं। ये सबसे ज्यादा काम भी करते हैं परंतु फायदा मिलने के वक्त सबसे पहले पैरवीपुत्रों का नाम आता है। फिर चाटुकार या फिर एक-दो ऐसे, जो संपादक के खास होते हैं। यानी जिसके बारे में जमाना पाजिटिव सोचता है, उसका निगेटिव रूप? कुछ पचनेवाली बात तो नहीं है परंतु सत्य है। बिहार के एक बड़े अखबार के संपादक ने दो-तीन ऐसे लोगों को तरक्की इस वजह से नहीं दी, क्योंकि इनलोगों ने कभी चाटुकारिता नहीं की? कई बार संपादक स्तर के लोग बेगुनाह कर्मचारियों को दंडित भी कर देते हैं। बेगुनाह इस दर्द को लिए घूमते रहते हैं। परंतु ये किसी से कुछ कह भी नहीं सकते, क्योंकि संपादक स्तर के व्यक्ति का संबंध भी उसी लेवल के लोगों से होता है। ऐसे में नौकरी छोडऩे के बाद भी नौकरी न मिलने के डर से लोग दर्द को पीकर जीते हैं और काम करते हैं। ऐसा नहीं है कि देश के सभी संपादक ऐसे ही होते हैं। परंतु नब्बे फीसदी की स्थिति इसी तरह की है। ये संपादक हैं, सो सही हैं। इनका हर फैसला सही है। संपादक बनने के बाद ये इस बात को भूल जाते हैं कि इन्होंने भी अपने कैरियर की शुरुआत जमीन से ही की है।

रविवार, 6 दिसंबर 2009

भाजपा के आंगन में जानकी पराई क्यों?

जिस हिन्दुत्व की रक्षा की लड़ाई का दावा भाजपा करती रही है, उसके आंगन में भगवान राम तो दिखते हैं परंतु माता जानकी पराई? अयोध्या में राम मंदिर बने इसके नाम पर अरबों रुपए रातोंरात चंदा देने के लिए देश के कई अमीर और गरीब से धनवान बने कुछ नेता तैयार हैं। भाजपा इसी हिन्दुत्व का ढिढ़ोरा पिटकर सत्ता का सुख भी हासिल कर चुकी है। परंतु वास्तव में हिन्दुत्व के प्रति वह कितनी ईमानदार है, यह देखना है तो एक बार सीतामढ़ी अवश्व जाएं। सीतामढ़ी माता जानकी की जन्मस्थली है। ऐसे में यहां भी हिन्दुत्व दिखना चाहिए। परंतु यहां एकबार आने के बाद कोई पर्यटक दुबारा आने के लिए नहीं सोचेगा। वजह जिला बनने के बाद भी विकास मामले में यह अत्यंत पिछड़ा हुआ है। यहां तक कि इस जिले को अब तक पर्यटन स्थल का दर्जा तक नहीं दिया जा सका है। जब राम के नाम पर मारामारी होती रही है और हो रही है तो फिर जानकी की जन्मस्थली के विकास के लिए भी कुछ तो होना ही चाहिए। इत्तफाक से बिहार में अभी जदयू-भाजपा की ही सरकार है। भाजपा के कई मंत्री और सांसद भी हैं। ऐसे में कम से कम उन्हें हिन्दुत्व का जलवा तो दिखाना ही चाहिए? इसी बहाने कम से कम सीतामढ़ी की जनता का कुछ तो भला हो जाता। परंतु किसी चुनाव में किसी नेता ने जानकी स्थल का भी विकास हो, इस बात को मजबूती से नहीं उठाया। यह अलग बात है कि जनता सबकुछ जानते हुए भी खामोश रहती है। उसकी चुप्पी कमजोरी नहीं, वह सोचती है कि राजनीति के पचड़े में वह क्यों पड़े? इस बार हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को झटका चुप्पी साधकर ही जनता ने देना उचित समझा। जनता के जवाब से भाजपा कम से कम चार साल तक तो और जरूर कराहेगी। देश चलाने वाले ही यदि पक्षपात करने लगेंगे तो कहां जाएगी जनता। ऐसे भी भारत में भांति-भांति के लोग रहते हैं। यहां मुसलमान, सिख, ईसाई सहित कई अन्य धर्मों को भी मानने वाले लोग रहते हैं। सभी की निगाहें सत्ता पर विराजमान बड़े नेताओं पर रहती है कि वह उनकी हित में कुछ करेगा। ऐसे में जात-पात धर्म के नाम पर लड़ानेवाले नेताओं से जनता को सावधान रहने की जरूरत है। २009 के चुनावी झटके से हांफ रही भाजपा ने तो अब नेतृत्व परिवर्तन का भी निर्णय ले लिया है। उसे लगने लगा है कि सिर्फ हिन्दुत्व और राम मंदिर के नाम पर जनता अब वोट देनेवाली नहीं है। यदि उसे सत्ता में बने रहना है तो कुछ और भी काम करना पड़ेगा। सीतामढ़ी की जनता की बार-बार मांग के बावजूद आज यह जिला पिछड़ा हुआ है। यहां के कई बुद्धिजीवियों ने व्यंग्यात्मक अंदाज में टिप्पणी भी कि भाजपा के आंगन में जानकी इतनी पड़ाई क्यों हैं? इस क्यों का जवाब तो भाजपा नेता ही दे सकते हैं।

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

आग लगे पर अपना घर न जले?

आग लगे पर अपना घर न जले, सड़क से अतिक्रमण हटे पर अपनों को बख्श दिया जाए, मंदी में छंटनी हो पर अपने बचे रहे, सड़क वनवे हो पर अपने घर के रास्ते में नहीं, बाल मजदूरी खत्म हो पर घर में मौजूद बाल मजदूर को न हटाए जाए, जनसंख्या नियंत्रण को सरकार कड़ाई से लागू करे पर चंद घरों में यह लागू न हो-जी हां हम बात कर रहे हैं कुछ नेताओं और अफसरों की मानसिकता की। आखिर क्या वजह है कि देश की आजादी के दशकों बाद भी बाल मजदूरों से काम लिया जा रहा है, लाखों बच्चे अब भी स्कूल से बाहर हैं। आप इसके पीछे जाएंगे तो पता चलेगा कि सबसे ज्यादा बाल मजदूर उन्हीं अफसरों व नेताओं के घरों में कार्य कर रहे हैं, जो चीख-चीखकर इसे लागू करने के लिए कहते हैं। ऐसा न करने पर ये अपने अधीनस्थों को कार्रवाई की धमकी भी देते हैं, यहां तक की समय-समय पर कुछ अधीनस्थों को निलंबित भी कर देते हैं। ऐसे में क्या यह संभव है कि आनेवाले सौ सालों में भी देश में बाल मजदूरों की संख्या शून्य हो जाए? मंदी ने जब विश्वव्यापी हमला किया तो भारत भी महीनों कांपता रहा। कई कंपनियों ने इसका बहाना बनाकर सैकड़ों लोगों को नौकरी से निकाल दिया। परंतु क्या किसी कंपनी ने एक भी अपने को नौकरी से निकाला। जवाब होगा कि नहीं...नहीं। बल्कि मंदी में भी ऐसे लोगों को तरक्की मिली। वहीं ऐसे काबिल युवा-अधेड़ यहां तक कि सेवानिवृत्ति के कगार पर पहुंचे लोग भी सड़कों पर आ गए। ऐसे समय में भारत सरकार ने अपने सारे कर्मचारियों के वेतन में अप्रत्याशित वृद्धि कर दी। वजह थी-लोकसभा चुनाव। सरकार को उस वक्त यह ध्यान नहीं आया कि घर से सड़क पर आने वाले लोगों के लिए भी कुछ करे। केन्द्र की तर्ज पर राज्यों ने भी वेतन वृद्धि कर दी। इस बात की सूचना मिलते ही मकान मालिकों ने किराये में अप्रत्याशित वृद्धि कर दी। इसका परिणाम उन लोगों को ज्यादा भुगतना पड़ा, जो नौकरी तो पहले ही गंवा चुके थे, इन्हें अब गांव के पुस्तैनी मकान में शरण लेनी पड़ी। क्या यही है इंसाफ है, क्या यही सोच से भारत की गिनती विकसित देशों में होगी? इसका भी जवाब होगा-नहीं...नहीं और नहीं। सैकड़ों योजनाओं पर हर साल करोड़ों खर्च करने के बाद भी आखिर क्या वजह है कि विकास की गति इतनी धीमी है? गांव की सड़कें आज भी टूटी-फूटी स्थिति में है। विकास के लिए दिल्ली से चली राशि का दस फीसदी भी संबंधित योजना पर खर्च नहीं हो पाती है। यदि वास्तव में सौ फीसदी राशि विकास पर खर्च हुई होती तो आज भारत विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आ चुका होता। हाल ही झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा द्वारा किए गए करोड़ों के घपले पर पूरा देश अचंभित है। आए दिन घूसखोर अफसर दबोचे जा रहे हैं। पांच साल पहले किसी दुकान में किरानी का काम करनेवाला व वर्तमान में एमपी के पास करोड़ों रुपए आखिर कहां से आ गए? यही नेता माइक पर गला फाड़-फाड़कर चीखता है कि अमूक सरकार घूसखोरी पर रोक नहीं लगा पा रही है जबकि सबसे बड़ा रिश्वतखोर यही है। जनसंख्या नियंत्रण के लिए नारे दिए गए कि सुखी परिवार मतलब-हम दो हमारे दो। क्या इसका पालन वो लोग कर रहे हैं जिन्होंने इस नारे को मजबूती से बुलंद किया। देश के दर्जनों मंत्री स्तर के ऐसे नेता हैं जो न तो ये खुद इसका पालन कर रहे हैं और न ही उनके बेटे या फिर बेटियां? यानी नियम बनाने वाले ही असली कानून के तोड़क हैं, यह कहना कहीं से गलत न होगा। इतना तय है कि इस कछुआ चाल और पिछड़ी मानसिकता से देश को विकसित राष्ट्र बनने में सैकड़ों साल अभी और लगेंगे।

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

कब तक अमेरिका से भीख मांगेगा भारत

दुनिया जानती है-मानती है कि पाकिस्तान ने ही आतंकियों को जन्म दिया। समय-समय पर पाकिस्तान इन आतंकियों को भारत विरोधी कार्यों के लिए इस्तेमाल करता रहा और कर रहा है। भारत ने कभी इसका मुंहतोड़ जवाब नहीं दिया। यदि दिया होता तो पाकिस्तान भारत की ओर कभी बुरी नजरों से देखने का दुस्साहस नहीं करता। भारत के कुछ स्वार्थी नेताओं और यहां के संविधान के लचीलापन का नतीजा ही है कि पाकिस्तान से मुकाबले के पहले वह अमेरिका के सामने दहाड़े मारकर बच्चों की तरह रोता है। अमेरिका किसी अभिभावक की भांति भारत को पुचकार देता है। वह यह भी आश्वासन देता है कि आतंकी हमलों से निपटने में मदद करेगा। यह कहने में भी नहीं चूकता है कि पाकिस्तान गलत कर रहा है। इस आश्वासन को लेकर जब भारत के नेता अमेरिका से लौटते हैं तो ऐसा लगता है कि वे जंग जीतकर आ रहे हैं। ठीक उसी समय पाकिस्तान का कोई बड़ा नेता जब अमेरिका के पास जाता है तो उसे भी वही आश्वासन मिलता है। यहां पर भारत को दोषी ठहराने से भी अमेरिका पीछे नहीं रहता है। अमेरिका की इस दोहरी नीति से भारत को सावधान हो जाना चाहिए। उसे अमेरिका के सामने रोना और भीख मांगना बंद कर देना चाहिए। भारत के कुछ नेता ऐसे हैं, जो कुर्सीं के लिए देश को बेच सकते हैं? चंद भर नक्सलियों से लडऩे में राज्य व केन्द्र सरकार की योजना बार-बार फेल हो जा रही है। बाबरी मस्जिद के दोषियों को सरकार आज तक सजा नहीं दिला पाई। इससे यहां के कानून व्यवस्था का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है? जब भी भारत के नेता अमेरिका के सामने नाक रगडऩे जाते हैं, यहां के युवाओं के खून में उबाल आ जाता है। यह अलग बात है कि ये उतने सक्षम नहीं हैं कि अपनी बात को मजबूत ढंग से रखें या फिर विरोध करें? यहां के लोगों में कूट-कूटकर प्रतिभा भरी-पड़ी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि विदेश जाने वाला अधिकतर भारतीय आज काफी मजबूत स्थिति में हैं। भारत एक मजबूत और विशाल देश है। आज पूरी दुनिया में अमेरिका की तानाशाही चल रही है। हर देश कुछ भी करने के पहले उसे सलाम करना नहीं भूलता है। परंतु दुनिया के दर्जनों देश खासकर एशियाई देश अमेरिका की तानाशाही को महसूस करने लगे हैं। भारत के पड़ोसी देश चीन अमेरिका की नीतियों को बहुत पहले ही समझ चुका है और वह उसकी परवाह भी नहीं करता। अमेरिका आज के समय में चीन को अपने ऊपर मंडराता खतरा के रूप में देख रहा है। अमेरिका भारत के इतिहास से परिचित है, इसलिए वह इसे खतरा के रूप में नहीं देखता है। भारतीयों नेताओं को चाहिए कि कम से कम देश हित में अमेरिका से दो टूक बात करने का साहस जुटाएं और खुद को कमजोर न दर्शाए। तभी अमेरिका अपनी दोहरी नीति को छाड़ेगा। इसके लिए देश के विपक्षी नेताओं को भी साथ देने की जरूरत है। खिचड़ी पार्टियों से बनी केन्द्र सरकार को हर वक्त यही भय सताता है कि कहीं कोई पार्टी उसकी टांग न खींच दे। पिछली बार परमाणु मामले में केन्द्र की सरकार गिरते-गिरते बची थी। इस भय से भी निर्णय लेना कठिन होता है। परंतु अपनी कुर्सी बचाने के लिए अमेरिका के समक्ष बच्चों की तरह रोना-धोना भी ठीक नहीं है। इससे पूरा देश कमजोर हो रहा है।

शनिवार, 21 नवंबर 2009

हाय महंगाई : तुझे कब आएगी मौत

भारत के नब्बे फीसदी से अधिक लोग महंगाई की मौत का इंतजार बेसब्री से कर रहे हैं। वे अपने देवता से इसके लिए मिन्नतें कर रहे हैं। परंतु महंगाई की मौत किसी भी कीमत पर संभव नहीं है? हर चौक-चौराहे पर सबसे अधिक चर्चा आज इसी की हो रही है। हर चैनल, हर अखबार प्रतिदिन इसपर कवरेज देना नहीं भूलता है। महंगाई से गरीबों की थाली में खाने का वजन लगातार घट रहा है। लाखों गरीबों ने अपने बच्चों के दूध का वजन तक घटा दिया है। उनके गाल व पेट धंसते ही जा रहे हैं। मध्यम वर्ग के लोगों की थाली से भी दाल व सब्जी की मात्रा निरंतर घट रही है। कौन है इसके लिए जिम्मेदार? सरकार की नीति, उत्पादन कम होना या फिर जमाखोरी? वास्तव में तीनों ही इसके जिम्मेदार तत्व हैं। मंदी क्या आई कि हजारों हाथ बेरोजगार हो गए। वहीं लोकसभा चुनाव को लेकर भारत सरकार ने कर्मचारियों के वेतन में अप्रत्याशित वृद्धि कर दी। देखादेखी राज्य सरकारों ने भी अपने कर्मचारियों के वेतन बढ़ा दिए। वहीं प्राइवेट सेक्टर में काम करनेवाले वेतन मामले में सालों पीछे चले गए। सभी कंपनियों के पास एक ही बहाना रहा मंदी...मंदी...मंदी। इसी साल मानसून के पूर्व बंगाल में आइला क्या आया कि देश के अधिकतर हिस्सों में मानसून कमजोर पड़ गया, नतीजा चहुंओर सुखाड़ की गूंज। इससे उत्पादन कम होना स्वाभाविक है। इस बात का अंदाजा करते हुए बड़े व्यवसायियों ने जमकर जमाखोरी की और हैसियत के मुताबिक लाखों-करोड़ों कमाए और कमा रहे हैं। देश के वित्त मंत्री ने हाल में ही अपने एक बयान में कहा कि महंगाई पर लगाम कसना फिलहाल संभव नहीं है। अर्थात देश की जनता को और महंगाई झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। वित्त मंत्री ने यह बयान तब दे रहे हैं जब लोकसभा का चुनाव हो चुका है और केन्द्र में पांच सालों के लिए कांग्रेस की सरकार सुरक्षित हो चुकी है। ऐसे कांग्रेस का इतिहास रहा है कि इसके शासनकाल में महंगाई हमेशा बढ़ी है। कभी प्याज ने लोगों को रुलाया है तो कभी किसी और चीज ने। यह कांग्रेस का शासन ही है कि लोग चालीस रुपए किलो चीनी खा रहे हैं। गरीबों के घर में किसी मेहमान का स्वागत चाय पिलाकर ही करने की प्रथा इधर के दशकों में रही है। अब चाय की घूंट भी कड़वी हो गई है। यूं कहा जाए कि हर सामान के दाम में आग लगी है तो गलत नहीं होगा। शहर के छोटे-छोटे दुकानदार भी जमाखोरी कर मुनाफा कमाने में जुटे हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में इस साल आलू चौबीस रुपए किलो बिका जबकि पिछले साल नया आलू भी इस भाव नहीं बिका था। गरीब पहले कहा करते थे कि वे दाल-भात-चोखा खाने भर ही कमाते हैं। अब यह मिसाल बन गई है, क्योंकि दाल-भात-चोखा अब मध्यम वर्ग के लोगों की थाली में ही देखने को मिल रही है। गरीबों की थाली से उक्त सामग्री गायब हो चुकी है। बहरहाल सरकार को इन बातों से कोई मतलब नहीं है। उसे गरीब जनता अब चुनाव के समय याद आएगी।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

नेताओं ने बढ़ाया नक्सलियों का मन!

यह सुनकर चौंकने वाली बात होगी कि नक्सलियों का मन कुछ नेताओं ने ही बढ़ाया है। आज नक्सली खून से जमीं को लाल कर रहे हैं। मुट्ठी भर नक्सली के सामने सरकार की ताकत कम पर जा रही है। इसके पीछे झांकने की ताकत मीडिया के अंदर या फिर बड़े-बड़े नेताओं में नहीं है। ऐसा नहीं है कि ये इन बातों से अनजान हैं। मीडिया के सामने इतनी बंदिशें हैं कि वह चाहकर भी कई बातों को उजागर नहीं कर सकता। देश के कई राज्यों में एक झारखंड भी नक्सली समस्याओं से गंभीर रूप से जूझ रहा है। बिहार के एक दर्जन से अधिक जिले भी नक्सलियों की चपेट में हैं। कहां ये किसे उड़ा देंगे, कहना मुश्किल है? हर घटना के बाद संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री दावा जरूर करते हैं कि जल्द ही इस संकट पर लगाम कसी जाएगी। परंतु वह दिन दूर-दूर तक आते नहीं दिख रहा है। बिहार से झारखंड जाने वाले रेलमार्ग में कई ऐसी जगहें हैं, जहां नक्सली विस्फोट कर चुके हैं। गुरुवार की रात यानी 19 नवंबर 2009 को उस समय हद हो गई जब मनोहरपुर के नजदीक मुंबई-हावड़ा रूट पर घाघरा और पोसेता स्टेशन के बीच टाटा-बिलासपुर ट्रेन को नक्सलियों ने बम से उड़ाने की कोशिश की। यह अलग बात है कि पूरी ट्रेन को ये नहीं उड़ा सकें। परंतु दो बोगियों के चिथड़े उड़ गए, वहीं आठ बागियां बेपटरी हो गईं। पांच से अधिक यात्रियों की मौत हो गई जबकि सौ से अधिक लोग घायल हो गए। कई की हालत अब-तब वाली थी। मदद पहुंचाने के लिए सुरक्षा दल काफी विलंब से पहुंचा, तबतक यात्रियों की चीखें हवा में गूंजती रहीं। कुछ ही सप्ताह पहले राजधानी एक्सप्रेस को भी नक्सलियों ने बंधक बना लिया था। तब कुछ नेताओं ने इस समस्या पर चिंता जताई थी। वहीं, पूरे मामले में पुलिस-प्रशासन निरीह बना रहा। बीते तारीख गवाह हैं कि अब तक किसी मामले में किसी नक्सली को फांसी की सजा नहीं दी गई है। पर्दे के पीछे की वजह यह है कि देश के जाने-माने नेता चुनाव के वक्त इन नक्सलियों से चोरी-छिपे मदद लेते हैं। पुन: जीतने के बाद संबंधित नेताओं से देश की बड़ी-बड़ी पार्टियां मदद लेती हैं। ऐसे में नक्सलियों पर बड़ी कार्रवाई की बात ही बेमानी होगी। ये नक्सली समय-समय पर अलग-अलग बातों को लेकर मासूम लोगों की जानें लेते रहते हैं। देश के रक्षा मंत्री ने पिछले दिनों कहा था कि नक्सलियों से सख्ती से निपटा जाएगा। आखिर कब? यह बड़ा प्रश्न है, इसका जवाब रक्षा मंत्री के पास नहीं है। आखिर क्या वजह है कि चंद नक्सली शासन को चुनौती दे रहे हैं और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। सिर्फ झारखंड में ही एसपी से लेकर दर्जनों पुलिस अफसरों का कत्ल नक्सली कर चुके हैं। हाल ही में बिहार के सीतामढ़ी जिले के बेलसंड अनुमंडल में नक्सलियों ने हमले किए थे, पुलिस घंटों बाद घटनास्थल पर पहुंची थी। इसी तरह इसी जिले के रून्नीसैदपुर प्रखंड में सैकड़ों की संख्या में नक्सलियों ने कई शराब दुकानों को नष्ट कर दिया था। यहां भी पुलिस नहीं पहुंची थी। पुलिस का साफ कहना था कि वे अपनी सुरक्षा को देखकर ही कोई कदम उठाएंगे। उनका सोचना कहीं से भी गलत नहीं है। वजह साफ है कि यदि कोई पुलिसकर्मी दिवंगत भी हो जाएगा तो सरकार अफसोस जताकर फिर पुलिसकर्मियों को पुराने हाल पर छोड़ देगी। देश की कानून व्यवस्था भी इतनी लचर है कि यहां पैसे के बल पर अपराधी आराम से छूट जाते हैं।

शनिवार, 14 नवंबर 2009

दया के पात्र हैं ये 'काहिल'

बचपन में आपने काहिलों की कहानी सुनी होगी। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आज हर सरकारी दफ्तर में काहिलों की कहानी भरी-पड़ी है। आप किसी भी सरकारी दफ्तर चाहे बैंक हो या परिवहन विभाग या फिर बिजली विभाग में जाएं और देखें-यदि किसी विभाग की कार्यक्षमता तीस की है तो पांच गप्पे हांकते नजर आएंगे। वहीं, पांच का साप्ताहिक अवकाश रहेगा या फिर छुट्टी पर। यानी बीस कर्मचारियों के भरोसे पूरा दफ्तर चलता है। बैंक में लिखा रहता है कि यहां बेहतरीन सुविधा उपलब्ध है-यहां दो मिनट में सेविंग्स से राशि निकालें। लेकिन क्या किसी भी बैंक में ऐसा संभव है? बैंक में यदि एक भी ग्राहक नहीं है, तो भी दो मिनट में निकासी संभव नहीं है। वजह कोई चपर-चपर पान चबा रहा है तो कोई अमेरिका की राजनीति पर बात कर रहा है। आप उनकी बातों को सुनकर दंग रह जाएंगे, आप सोच में पड़ जाएंगे कि उनसे कैसे कहें कि आपको जल्दबाजी है। यदि कहीं उनकी तंद्रा भंग हुई और जनाब को महसूस हुआ कि आपका काम कर देना चाहिए तो आप मान लीजिए कि आपका दिन शुभ है। बिहार के मुजफ्फरपुर में सेन्ट्रल बैंक ऑफ इंडिया के एक मैनेजर स्तर के पदाधिकारी ने बातचीत में बताया कि उनके यहां कर्मचारियों की अत्यंत कमी है, इसीलिए पेंडिंग कार्यों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। मैं चौंका तो वे मेरा चेहरा निहारने लगे फिर हंस दिए। कहा-उनके यहां कार्यरत एक दर्जन काहिल कर्मचारी हैं। वे एक-दो काम में ही घंटों बीता देते हैं, क्योंकि उन्हें ग्राहक से ज्यादा प्रिय उनका भाषण है। ऐसे में इनसे वही काम लिया जाता है, जो तुरंत करना जरूरी न हो। इसी तरह आप रेलवे का रिजर्वेशन कराने जाते हैं तो देखेंगे कि टिकट काट रहा व्यक्ति के पास हर दस मिनट में या तो किसी का फोन आ जाएगा या फिर वह स्वयं उठकर किसी से गप्पे मारना प्रारंभ कर देगा। अपनी बारी का इंतजार कर रहे लोग मन ही मन उसे सैकड़ों गालियां देते हैं। कुछ लोग ऐसे काहिल पर आक्रोश उतार देते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि ये दया के पात्र हैं। आंकड़ें गवाह हैं कि हर सरकारी दफ्तरों में काहिलों की संख्या अधिक होती है। हालांकि निजी दफ्तर भी इस मामले में बहुत पीछे नहीं हैं। सरकारी दफ्तरों में काहिलों की संख्या अधिक होने की वजह है कि यहां एक बार किसी ने नौकरी पा ली तो तीस साल के लिए निश्चिंत हो जाता है। हालांकि निजी दफ्तरों में भी एक से बढ़कर एक काहिल भरे-पड़े हैं। परंतु इनमें अधिकतर 'पैरवीपुत्र' ही नजर आते हैं। इन्हें लगता है कि ये काम न भी करेंगे तो इनका नुकसान कोई नहीं कर सकता है। ऐसा नहीं है कि ये सौ फीसदी निकम्मे होते हैं, क्योंकि यदि ऐसा होता तो इनकी भर्ती ही नहीं हुई होती। ये काहिल इसलिए बनकर रहते हैं ताकि इनसे कोई अधिक काम न लें। बचे समय में ये बयानबाजी कर दूसरों को परेशान करने का काम जरूर करते हैं। इन काहिलों से सबसे ज्यादा परेशानी काम करने वाले लोगों को होती है। मेरे समझ से ऐसे काहिलों से कोई समझौता नहीं करना चाहिए। अपने दोस्त की इजाजत से एक निजी अनुभव भी शेयर करना चाहूंगा-मेरा एक मित्र है। उनके यहां मेरा हमेशा आना-जाना रहता है। मैं जब भी उनके यहां जाता हूं वे अपनी पत्नी से उलझते नजर आते हैं। मैंने मित्र को समझाया-यार क्यों उलझते हो? उसने कहा उदाहरण देकर बताता हूं-उसने अपनी पत्नी को आवाज दी और कहा कि जरा दो प्याली चाय भेजना। तब दिन के बारह बज रहे थे। एक बजे मैंने अपने मित्र को कहा कि मुझे आफिस जाना है फिर कभी आऊंगा। उसने कहा-चाय तो पी लो। मैंने कहा-फिर कभी। क्योंकि तबतक चाय नहीं आई थी। बात मेरी समझ में आ चुकी थी कि वह पत्नी से क्यों उलझता है? मेरा दोस्त काम करने में अत्यंत फास्ट है। वहीं उसकी पत्नी इसके विपरीत। ऐसे में बात-बात पर तू-तू-मैं-मैं होना स्वाभाविक है। मेरे दोस्त की शादी के पन्द्रह साल होने जा रहे हैं, इसके बावजूद वह अपनी पत्नी को नहीं बदल सका। एक मनोचिकित्सक ने बताया कि देश में काहिलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, यह अत्यंत चिंता की बात है। यह अलग बात है कि इसपर कोई ध्यान नहीं दे रहा है।

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

अमेरिका ने माना-प्रतिभावान हैं भारतीय

हर भारतीय युवक ऊंची शिक्षा के लिए विदेश जाना चाहता है, उसे लगता है कि वहां की पढ़ाई भारत से अधिक उच्चस्तरीय है। युवाओं के मन में यह भी शंका रहती है कि अमेरिका, इंग्लैंड के लोग भारतीय से अधिक प्रतिभावान होते हैं। परंतु यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह इंडियन व एशियाई देशों की कल्पना के सिवा कुछ नहीं है। अब यह सवाल उठता है कि यदि यह कल्पना है तो फिर आज दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका कैसे है? मान लीजिए-यदि कोई गरीब तपती गर्मी में ढिबरी की रोशनी में पढ़ाई कर रहा है। ऐसे में उसका आधा ध्यान शरीर से निकलने वाले पसीने और आधा ध्यान मच्छरों से लड़ते हुए निकल जाता है। वहीं, एयरकंडीशन में बैठकर पढऩे वाले छात्र बिना किसी परेशानी के पढ़ाई पूरी कर लेता है। अब जरा इसपर विचार कीजिए कि ढिबरी में पढऩे वाले छात्र ने अधिक मेहनत की, परंतु परीक्षा में उसे कम माक्र्स मिले। वहीं, एयरकंडीशन में पढ़ाई करनेवाले छात्र को अधिक। इतना ही नहीं दूसरे वर्ग वाले छात्र के पास कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा भी है। अब चलते हैं अमेरिका में-यहां भारतीय छात्र को पढ़ाई के लिए आधुनिक सुविधा मिल जाती है और वह जी-तोड़कर शिक्षा हासिल करने लगता है, उसे कुछ कर जो दिखाना है? यही कारण है कि भारतीय छात्र अमेरिका, इंग्लैण्ड, जापान में जाकर पताका फहरा रहे हैं। भारतीय छात्र की मेहनत के आगे अमेरिकी छात्र टिक नहीं पा रहे हैं। एक सर्वेक्षण में जब यह बात सामने आई तो अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा पिछले दिनों चिन्तित हो उठे और यहां के छात्रों को पढ़ाई के प्रति ध्यान देने की नसीहत दे डाली। ओबामा की इस चिंता से भारतीय छात्रों को और उत्साहित होना चाहिए। यह भी जानकार आश्चर्य होगा कि इंग्लैंड व कई अन्य देशों की सरकार भी भारतीय छात्रों की प्रतिभा का उदाहरण देने लगे हैं। इन देशों में स्कूल-कॉलेज की तरफ से कई अनुसंधान भी चल रहा है। कई बड़े स्तर के प्रोफेसर इस अभियान में जुटे हैं कि उनके देश के छात्र कमजोर न हों। ये बातें भारतीय छात्रों के इरादे को और मजबूत करती हैं। भारत के कई ऐसे मां-बाप भी अपने बच्चे को विदेशों में भेजते हैं, जिनकी हैसियत अत्यंत कमजोर होती है। ऐसे में यदि यह बेटा अपनी प्रतिभा का पताका नहीं फहराएगा तो इनका दिल तो टूटेगा ही साथ ही अन्य अभिभावक भी निराश होंगे। यह अलग बात है कि भारतीय प्रतिभा को दबाने की कोशिश कुछ देश करते हैं। अभी हाल ही में आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हमले किए गए। इतिहास गवाह है कि भारतीय शुरू से ही मजबूत कलेजा रखते हैं। इनका हौसला तोडऩा किसी देश के लिए आसान नहीं है। इस बात को दूरदर्शी बराक ओबामा ने थोड़ा ही सही महसूस तो किया ही है, तभी वे अपने देश के नौजवानों की चिंता में डूब गए हैं। आज दुनिया के अधिकतर देशों में भारतीय छाए हुए हैं। उनकी प्रतिभा बोल रही है।

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

एक गलती सौ अच्छाई पर भारी

आप किसी के लिए हमेशा अच्छा सोच रहे हैं, उसके हित में सबकुछ न्योछावर करने को तैयार हैं। वह व्यक्ति मित्र हो सकता है, रिश्तेदार हो सकता है। लेकिन, आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि आपका एक 'निगेटिव जवाब' सारे अच्छाई को धो देता है। वही व्यक्ति आपके बारे में विपरीत सोचने लगता है, उसकी नजरों से आप गिर जाते हैं, फिर वही आपको दुश्मन समझने लगता है। ऐसा क्यों होता है, इस बात पर सबको गौर फरमाना चाहिए। फिर 'ना' सुनने की आदत को जीवन में उतारने की आदत भी डालनी चाहिए। हमेशा लाभ लेने वाले व्यक्ति को सोचना चाहिए कि साल के 99 दिन उसे मदद मिली है। उसका नजदीकी आज क्यों इनकार कर रहा है। वह किसी संकट में तो नहीं है। कहीं आज उसे ही मदद की दरकार तो नहीं है। परंतु, ये दुनिया है-यहां एक गलती सौ अच्छाई पर भारी पड़ जाती है। आप आफिस जाते हैं-कभी कम तो कभी अधिक काम करते हैं। बॉस के नजर में आप काम करने वाले व्यक्ति हैं। आप पर विश्वास भी किया जाता है। किसी कारण वश यदि आपसे एक गलती हो गई- बोलने में, लिखने में या फिर समय पर पूरा न करने में। फिर क्या, बॉस का मूड ठीक रहा तो ठीक है वर्ना कहा जाएगा कि आप एक समस्या हैं। यदि भूलवश आपने यह कह दिया कि इससे पहले आपसे कहीं भी चूक नहीं हुई है तो बॉस और भड़क जाएंगे। संभव हो कि आपका टेबल ही बदल जाएं, आपके हवाले कोई पेंडिंग काम कर दिया जाए। अब जरा इसपर भी विचार कीजिए कि इसी बॉस के कहने पर आपने प्रतिदिन ड्यूटी से घंटा-दो घंटा अधिक काम किया। एक गलती क्या हुई कि सारा किया धरा मिट्टी में मिल गई। आप इससे कितने मर्माहत होंगे, कितने दु:खी होंगे। इसका अंदाजा उस बॉस को नहीं होता, क्योंकि फिलवक्त वह बॉस की कुर्सी पर है। कहने का अर्थ यह है कि एक गलती कई अच्छाइयों को दबा देती है। ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। मदद करने के पहले यह आकलन भी जरूरी है कि वास्तव में अमुक व्यक्ति को मदद की आवश्यक्ता हैं या नहीं। कलयुगी दौर में व्यक्ति फल कि चिंता पहले करता है, कर्म बाद में। ऐसे में अच्छा करने पर भी यदि कोई बुरा सोचता है तो मेरी नजर में वह किसी गुनहगार से कम नहीं है। बार-बार अच्छा करनेवाले व्यक्ति से यदि कभी भूल हो जाए तो उसे माफ कर देना चाहिए। साथ ही यह भी पता लगाना चाहिए कि उससे यह चूक कैसे हुई? न कि उससे नफरत भरी नजरों से देखना चाहिए। माह में उनतीस दिन यदि कोई व्यक्ति सही निर्णय लेता है तो एक दिन उससे भी भूल हो सकती है। इस बात को सदैव याद रखनी चाहिए। ऐसा न करनेवालों के आसपास कभी भी हितैषी खड़े नजर नहीं आएंगे। इनके इर्द-गिर्द सिर्फ चाटुकार ही मंडराते दिखेंगे।

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

इन्हें 'मां' को 'मां' कहने में भी शर्म आनी चाहिए

हिन्दी के नाम पर देश के मनसे नेताओं को हीनता क्यों? राष्ट्रभाषा के नाम पर भी ये राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं। महाराष्ट्र में नौ नवंबर को हिन्दी में शपथ ले रहे सपा विधायक अबू आजमी के खिलाफ मनसे विधायकों के तेवर और फिर मारपीट की घटना ने देश के गरूर को शर्मसार किया है। इससे देश के हर जिले में उबाल आ गया है। विदेशी मीडिया भी इस खबर को छापकर चटकारे लेने में पीछे नहीं रहा। देशवासी स्तब्ध हैं कि संविधान में वर्णित नियम को भी मनसे के नेता नहीं मान रहे हैं। पूरे देश के लोगों की इस संबंध में तीखी प्रतिक्रिया है। इनका मानना है कि जब ये हिन्दी को अपनी भाषा नहीं समझते तो फिर इन नेताओं को अपनी 'मां' को 'मां'कहने में भी शर्म आनी चाहिए। तारीख गवाह है कि दूसरे देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति जब भारत आते हैं तो वे अपनी मातृभाषा में भाषण देते हैं। वे ऐसा करते वक्त खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। यह अलग बात है कि यहां के बड़े नेता इस मामले में अब भी हीन भावना के शिकार हैं। इन्हें अब भी लगता है कि यदि हिन्दी में वे भाषण देंगे तो दूसरा देश इन्हें 'जाहिल' कहेगा। यहां से दूसरे देश जाने वाले नेता भी अंग्रेजी में भाषण देकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। क्षेत्रीय भाषाओं से किसी को कोई परहेज नहीं है, इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपने मातृभाषा को भूल जाएं या फिर उसका अपमान करें। मनसे नेताओं की दादागिरी तो दिनोंदिन बढती ही जा रही है। समय रहते भारत सरकार को चेत जाना चाहिए और इसपर रोक लगा देनी चाहिए। वर्ना,वह समय दूर नहीं जब हर राज्य में इस तरह की वारदात दुहराईं जाएंगी। मनसे प्रमुख राज ठाकरे कभी बिहार-उत्तरप्रदेश के लोगों पर निशाना साधते हैं कभी किसी अन्य राज्य पर। परंतु मनसे प्रमुख यह नहीं जानते कि यदि सभी राज्य के लोग मुंबई को छोड़ लौट जाएं तो वहां कुछ नहीं बचेगा और तब शायद राज ठाकरे व उनके चंद लोग अकेले ही सड़कों पर नजर आएंगे। देश का व्यावसायिक राजधानी होने के चलते मुंबई में देश के हर हिस्से के लोग रहते हैं। यह अलग बात है कि बिहार-उत्तरप्रदेश के लोगों की संख्या यहां अधिक है। इस घटना को देश के सभी राज्यों ने गंभीरता से लिया है। सभी के प्रमुखों ने इसकी निंदा की है। हालांकि देशवासियों के आक्रोश को देखते हुए मनसे के चार विधायकों को निलंबित कर दिया गया है। परंतु, देशवासी राज ठाकरे पर भी कार्रवाई चाहते हैं। मंगलवार को इसी मामले में बिहार के हाजीपुर में मनसे प्रमुख और उनके कई विधायकों के खिलाफ अदालत में मुकदमा दर्ज किया गया है। बिहार के लगभग हर जिले में लोगों ने बैठकें कर और राज ठाकरे का पुतला दहन कर इस घटना पर आक्रोश जताया है।

सोमवार, 9 नवंबर 2009

कैंसर है, टीएमसीएच भागिए

कैंसर आज भी लाइलाज बीमारी है। यूं तो इस रोग के विशेषज्ञों का मानना है कि पहले स्टेज में पता चलने पर इसका इलाज संभव है। परंतु हकीकत ठीक इसके उलट है। प्रारंभिक स्थिति में इसकी जानकारी वैसे ही लोगों को मिल पाती है, जो या तो खुद इस रोग के डाक्टर हैं या फिर ऐसे संपन्न लोग जो सर्दी होने पर भी चिकित्सकों की लंबी लाइन लगा देते हैं। अब चलते हैं उत्तर बिहार-जहां कैंसर का एक भी डाक्टर नहीं है। इस इलाके के लोगों को जब यह पता चलता है कि उसे कैंसर है। हांफता-भागता वह पटना या दिल्ली पहुंचता है। जांच में पता चलता है कि वह अब चंद दिनों का ही मेहमान है। यह जानकर भी ताज्जुब होगा कि उत्तर बिहार में अन्य रोगों के चिकित्सकों की कोई कमी नहीं है। सरकारी अस्पतालों में भी कैंसर का कोई चिकित्सक नहीं है। मुजफ्फरपुर को बिहार का व्यावसायिक राजधानी माना जाता है यहां का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल एसकेएमसीएच में भी इस रोग के इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में यहां के रोगी, कैंसर का शक होते ही पटना भागते हैं। अब चलते हैं बिहार की राजधानी पटना। यहां महावीर कैंसर संस्थान के अलावा आधा दर्जन से अधिक चिकित्सक नहीं हैं, जो यह पता लगा सकें कि मरीज को कैंसर है या नहीं। सेकेंड स्टेज वाले कैंसर रोगी का आपरेशन भी यहां सफल नहीं हो पाता है। कई रोगी का आपरेशन तो चिकित्सक पैसे की खातिर कर देते हैं, परंतु ये छह माह से भी अधिक जीवित नहीं रह पाते। वे भी आपरेशन के बाद बेड पर आश्रित की जिंदगी जीते हैं, खुद कुछ भी करने में असमर्थ रहते हैं। कैंसर के इलाज मामले में आज भी बिहार अन्य राज्यों से काफी पीछे है। ऐसे में यदि कैंसर है तो रोगी को सीधे मुंबई टीएमसीएच जाना चाहिए या फिर दिल्ली का एम्स। हालांकि दूसरे स्टेज में पहुंचने पर रोगी यहां भी नहीं बच पाते परंतु शारीरिक चीडफ़ाड़ का सामना कम करना पड़ता है। वैसे इस बीमारी की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जेड गुडी को इंग्लैंड जैसा विकसित राष्ट्र भी इलाज नहीं कर सका। जेड गुडी आपरेशन के कुछ ही माह बाद ईश्वर के पास आराम करने चली गईं। भारत सरकार व राज्य सरकारों को कैंसर जैसी बीमारी के बारे में गंभीरता से विचार-विमर्श करना चाहिए। बिहार में तो सरकार ने कभी कैंसर की भयावहता के बारे में गंभीरता से विचार ही नहीं किया। यदि ऐसा हुआ रहता तो संभवत: उत्तर बिहार में भी कई कैंसर के अच्छे डाक्टर होते। कैंसर के उन डाक्टरों पर तो कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, जो जानते हुए भी कि कैंसर का मरीज छह माह भी नहीं जीवित रहेगा, जीवन का प्रलोभन देकर आपरेशन कर देते हैं। पटना के ही एक चिकित्सक वीपी सिंह ने पचहतर वर्षीय स्व. हरेन्द्र प्रसाद का माउथ कैंसर का आपरेशन यह कह कर किया कि आपरेशन के बाद वे पांच साल तक जीवित रहेंगे। परंतु श्री प्रसाद आपरेशन के बाद न तो बोल सके, न खा सके और न ही चल सके। आपरेशन के बाद इन्हें पाइप से खाना दिया जाता रहा। वे बिस्तर से कभी नहीं उठ सके और छह माह में ही इनकी मौत हो गई। आपरेशन में चिकित्सक ने एक लाख से अधिक रुपए किसी न किसी तरह से ऐठें। हालांकि इस चिकित्सक पर परिजन अदालत में केस दर्ज करने की तैयारी में जुटे हैं। कुल मिलाकर इसी तरह के चिकित्सकों की भरमार पटना में भी है। अत: कैंसर है तो टीएमसीएच या एम्स या ऐसे जगह भागिए जहां आपको सही चिकित्सा मिले। सीतामढी के एक चिकित्सक डॉ रामाकांत सिंह उत्तर बिहार के मशहूर सर्जन थे। एकाएक इन्हें बुखार हुआ, एंटिबायोटिक से भी जब बुखार नहीं उतरा तो वे एम्स गए, जहां चिकित्सकों ने बताया कि इन्हें बल्ड कैंसर है वो भी अंतिम स्टेज में। वे माह भर के अंदर ही गुजर गए।

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

'नेताजी' की नजर...ये इंसान नहीं हैं...

महज एक वोट से सरकार बनती और गिर जाती है। चुनाव से सरकार बनने तक राज्य हो या केन्द्र दोनों को जनता की याद पल-पल आती है। इस समय तक हर नेता खुद को आम आदमी समझता है। चुनावी दौरे पर कभी वह किसी झोपड़ी में गरीब के साथ चाय की चुस्की लेते देखा जाता है तो कभी धूप में जनता के साथ पैदल चलते। नेताजी के पीछे 'कुत्ते' की तरह भाग रहा मीडिया इस खबर को मोटी-मोटी हेडिंग के साथ प्रकाशित करता है। परंतु चुनाव बाद सरकार बनते ही नेता 'आम' नहीं 'खास' हो जाता है। अब धूप उसे तीखी लगने लगती है, गरीब उसे जानवर दिखने लगते हैं। वह चलता है तो सुरक्षा में पुलिस की कई-कई गाडिय़ां उसके पीछे-पीछे चलती हैं। कहीं वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गया तो फिर क्या कहना-पूरे सूबे की पुलिस उसकी मुट्ठी में। वह जिस मार्ग से चलता है, सड़कें खाली करा दी जाती हैं। वजह बताया जाता है-सीएम को जान का खतरा है। जबतक सीएम गुजर नहीं जाते, तबतक आदमी चाहे वह गंभीर रूप से बीमार ही क्यों न हो। उसे इस रास्ते से गुजरने की इजाजत नहीं मिल सकती है। कई बार तो अस्पताल जा रही महिला रिक्शा पर ही बच्चे को जन्म दे देती है। दूसरे राज्यों से साक्षात्कार को आए कई बेरोजगार भी इसकी चपेट में आ जाते हैं। वक्त पर साक्षात्कार के लिए न पहुंचने के चलते वे चयनित नहीं हो पाते हैं। इस दर्द को ये नेता क्या जानें? इनमें से कुछ की सूचना बाद में जब मीडिया को मिलती है और वह उसे प्रकाशित कर देता है, तो संबंधित नेताजी अफसोस जताने में कोताही नहीं बरतते हैं। देश के किसी राज्य में बड़े नेताजी के आगमन से होने वाली जनता की परेशानी पर कभी चर्चा नहीं होती है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद जब राजधानी की सड़कों पर निकलते थे तो उनके पीछे कम से कम पन्द्रह और आगे दस चार चक्के की गाडिय़ां दौड़ती थीं। इस वजह से घंटों सड़कों पर जाम लगा रहता था। अभी दो दिन पूर्व ही दिल्ली में प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लगे जवानों ने एक ऐसे मरीज के एबुलेंस को रोक दिया, जो किडनी का रोगी था। उसकी मौत रास्ते में ही हो गई। यह सुरक्षा व्यवस्था की कितनी बड़ी चूक है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। देश में प्रतिदिन सुरक्षा के नाम पर हजारों मार्ग सील कर दिए जाते हैं। इससे जाम में फंस कई बच्चे बेहोश तो कई रोगी की मौत तक हो जाती है। ऐसे नेताओं को आम जनता की जान का कोई मतलब नहीं। आजादी के बाद देश के प्रथम राष्ट्रपति जब सड़क मार्ग से निकलते थे, उनके लिए सुरक्षा की उतनी व्यवस्था भी नहीं रहती थी, जितना कि आज एक मुख्यमंत्री के लिए रहती है। राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री की सुरक्षा जरूरी है, इसका मतलब यह नहीं कि आम आदमी की जिंदगी का कोई मोल ही न लगाया जाए। आम आदमी भी इंसान हैं, और इन्होंने ने ही नेताजी को 'आम' से 'खास' बनाया है। 'नेताजी' यदि इस बात को भूल गए हैं तो जनता इन्हें अगले चुनाव में इसका एहसास करा सकती है, उन्हें यह बात कतई नहीं भूलनी चाहिए।

बुधवार, 4 नवंबर 2009

भय में जी रहे पाकिस्तानी

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज पाकिस्तान के सैकड़ों इलाकों में रहनेवाले लोग भय में जी रहे हैं। कोई दिन ऐसा नहीं होता कि यहां बम विस्फोट या फिर तालीबानी आतंकी हमला नहीं करते हैं। इन घटनाओं में कभी पचास तो कभी सौ से अधिक पाकिस्तानियों का मरना अब आम बात हो गई है। सुबह काम पर निकलने के बाद शाम में 'शौहर' घर पर लौटेंगे या नहीं इसका पता 'बेगम' को नहीं होता। पाकिस्तान दुनिया के मंचों पर दावा करता रहा है कि यहां की स्थिति बिल्कुल सामान्य है। परंतु सच्चाई ठीक इसके विपरीत है। ऐसी महिलाएं जिनका सुहाग अब इतिहास बन गया है या फिर वे मासूम जो सबकुछ खोकर अनाथ हो चुके हैं या फिर वो भवन जो अब खंडहर हैं-चीख-चीखकर यहां की स्थिति बता रहे हैं। इनका दर्द न तो पाकिस्तान की सरकार को नजर आती है न ही वहां की सेना को। हरेक दिन ऐसे सैकड़ों दर्द पाकर भी पाकिस्तान दुनिया के सामने उफ तक नहीं करता है। इसकी वजह वह खुद है, आजादी के बाद से पाकिस्तान को संसार में एक ही दुश्मन दिखाई देता है, और वह है-भारत। भारत को पटकनिया देने के लिए वह छह दशक से लगातार कोशिश में जुटा है। यह अलग बात है कि भारत से वह मुकाबला कर कभी नहीं जीत सकेगा। भारत को चोट पहुंचाने और कश्मीर हड़पने की नीयत से ही पाकिस्तान ने तालिबान को जन्म दिया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने पिछले दिनों खुद स्वीकार किया कि तालिबान को उन्हीं के देश की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अमेरिका की सीआईए की मदद से खड़ा किया है। पाकिस्तान का मकसद क्या रहा होगा, इस बात से हर भारतीय बखूबी अवगत है। जरदारी का यह भी आरोप था कि पूर्व राष्ट्रपति मुशरर्फ को तालिबानियों से विशेष लगाव था। यह जगजाहिर है कि तीन दशक पहले अमेरिका-भारत के रिश्ते आज की तरह सौहार्दपूर्ण नहीं थे। अमेरिका का झुकाव भारत की तरफ तब हुआ जब उसे लगने लगा कि भारत तेजी से विश्व पटल पर महाशक्ति के रूप में उभरता जा रहा है। ऐसे अमेरिका भी इस बात को स्वीकार करती है कि पाकिस्तान में आंतकियों का मजबूत गढ़ है। सात जुलाई 2009 को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुई एक बैठक में भी राष्ट्रपति जरदारी ने माना कि पाक ने ही पैदा किये आतंकी। उन्होंने कहा कि अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 को हुए हमले के पहले ये आतंकी हीरो समझे जाते थे। इस हमले के बाद आतंकियों का मन इतना अधिक बढ़ गया कि वे पाकिस्तान को ही निशाना बनाना शुरू कर दिये। जरदारी ने यह भी स्वीकार किया कि छद्म कूटनीतिक हितों के लिए ही आतंकियों को पाला-पोसा गया। यह गलती आज पाकिस्तान पर ही भारी पड़ रहा है। तालिबान ताबड़तोड़ पाकिस्तानी जनता पर हमला कर रहा है। सूत्रों की मानें तो ओसामा बिन लादेन भी तालिबान में ही है। अमेरिका सहित विश्व के कई देश इस बात से घबराने लगे हैं कि यदि तालिबानी आतंकी पाकिस्तान के परमाणु हथियार तक पहुंच गये तो कई देशों में तबाही मचा देंगे। पाकिस्तान के कुछ तानाशाह नेताओं द्वारा शुरू जहर की खेती धीरे-धीरे पाकिस्तानियों को ही लीलती जा रही है।

सोमवार, 13 जुलाई 2009

बिहार : मिड डे मील का सच

कुछ साल पहले बिहार में चारा घोटाले का मामला सामने आया था। इस घोटाले की जब जांच की गयी तो पता चला कि इसमें बड़े-बड़े नेता व अधिकारी शामिल हैं। तब के मुख्यमंत्री व राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद भी इस घोटाले में शामिल थे। पशुओं के चारे के करोड़ों रुपये नेताओं व अफसरों ने पचा लिये। यह मामला अब भी कोर्ट में चल रहा है। इसी तरह बिहार के मिड डे मील में भी घोटाले का मामला परत-दर-परत सामने आ रहा है। यह अलग बात है कि इसमें एक साथ करोड़ों के घोटाले का मामला सामने नहीं आया है। इसकी राशि टुकड़े-टुकड़े में स्कूलों तक पहुंचती है। ऎसे में घोटाले का स्वरूप छोटा-छोटा परंतु आंकड़े बड़े हैं। यदि मिड डे मील के घपले की जांच सीबीआई से करायी जाए तो करोड़ों के घोटाले का भेद खुल जाएगा। प्राथमिक व मध्य विद्यालयों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों को पढ़ाई के प्रति रुचि बनी रहे और वे प्रतिदिन पढ़ने आये, इसी खातिर इस योजना की शुरुआत की गयी थी। इससे पहले लाखों गरीब अभिभावक इसलिए अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते थे कि घर पर रहने पर वे खेतों में काम करते थे। देश में सबसे पहले इस योजना की शुरुआत मद्रास सिटी में की गयी थी। उद्देश्य था कि समाज से वंचित गरीब बच्चों को भी भरपेट भोजन मिले। इससे स्कूल आने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी थी। इसके पश्चात सुप्रीम कोर्ट ने एक ऎतिहासिक फैसले में 28 नवंबर 2001 को इसे पूरे देश में लागू करने का निर्देश दिया। इस योजना के लागू होते ही हजारों लोगों को जैसे रोजगार मिल गया। इस योजना में अधिक से अधिक कमाई कैसे हो, इसपर शिक्षक से लेकर स्कूल के प्रधानाध्यापक फिर जिला शिक्षा अधिकार तक विचार-विमर्श करते हैं। सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, सिवान, शिवहर सहित कई जिले में दर्जनों ऎसे स्कूल हैं, जहां छात्र तो सौ हैं परंतु पच्चीस-तीस ही नियमित आते हैं। ऎसे में हजारों रुपये प्रतिमाह एक स्कूल से सीधे आमदनी हो जाती है। इसके पश्चात चावल की निम्न 'क्वालिटी' का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार द्वारा जारी मेन्यू में खिचड़ी भी बच्चों को दी जाती है। इसमें आए दिन कीड़े मिलने की शिकायतें बिहार में आम बात है। कई बार कीड़ों की संख्या इतनी अधिक रहती है कि बच्चे भोजन करते ही गंभीर रूप से बीमार हो जाते हैं। इनके अभिभावकों के हो-हल्ला के बाद प्रशासन की नींद खुलती है। जांच में घोटाले का मामला सामने आता है। सरकारी मेन्यू के अनुसार बच्चों को सोमवार को चावल व कढ़ी, मंगलवार को चावल-दाल व सब्जी, बुधवार को खिचड़ी, गुरुवार को सब्जी पोलाव, शुक्रवार को चावल व छोला, शनिवार को खिचड़ी व चोखा देना है। परंतु बिहार के दर्जनभर स्कूलों में ही इसका पालन हो पाता है। वह भी चालीस फीसदी ही। अधिकतर स्कूलों में गुरुजी के लिए भी इसी योजना से भोजन बनता है। उनका भोजन उनके घर की तरह ही स्वादिष्ट होता है। इस योजना में अब तक सैकड़ों लोगों को दोषी पाया गया। कार्रवाई के नाम पर अधिकतर मामलों में पैसे लेकर 'फूल' के 'चाबुक' चलाये गये। गरीब बच्चों को स्कूलों में पौष्ठिक भोजन देने की योजना सरकार की फाइलों में ही सिमटकर रह गयी है। पहली जुलाई को बिहार के विधानसभा में भाकपा विधायक ने इस मामले को मजबूती से उठाया। मानव संसाधन मंत्री इसका कोई जवाब नहीं दे सके। नतीजतन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने इस मामले की जांच सदन की कमिटी से कराने की बात कही। बच्चों के भोजन में घपला करने से शिक्षक से लेकर अधिकारी तक बाज नहीं आ रहे हैं। सभी को अपना-अपना हिस्सा चाहिए। परंतु बड़े होने पर जिसके कंधे पर देश की बागडोर आने वाली है। उसकी चिंता किसी को नहीं है। कई स्कूलों में तो अभिभावकों ने अपने बच्चों को स्कूल में खाने से मना कर दिया तो कई ने अपने बच्चों को विद्यालय भेजना ही बंद कर दिया। यही है बिहार के मिड डे मील का सच।

शनिवार, 11 जुलाई 2009

ममता के श्वेत पत्र से लालू भयभीत क्यों!

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है। लालू खुद के ही बुने जाल में फंसते दिख रहे हैं। लोकसभा में करारी हार के बाद रेल मंत्री की कुर्सी तो पहले ही चली गयी। रेलवे की आमदनी पर ममता श्वेत पत्र लाने की घोषणा पहले ही कर चुकी हैं। इस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 11 जुलाई को मुहर भी लगा दी। इससे लालू बिलबिला उठे हैं। उनके चेहरे पर भय का साया मंडराने लगा है। हालांकि लालू इसे बखूबी छिपाने की कोशिश में जुटे हैं। इसके बावजूद उनका चेहरा साथ नहीं दे रहा है। इससे पता चलता है कि दाल में कुछ तो काला है। लालू यूपीए सरकार में पिछले पांच साल तक रेल मंत्री रह चुके हैं। हर बजट में उन्होंने रेलवे को फायदे में दिखाया। ममता बनर्जी ने जब तीन जुलाई को रेल बजट पेश किया तो लालू पर जमकर निशाना साधा। बाद में ममता ने संसद में बताया कि रेलवे के पास मात्र 8,361 करोड़ रुपये अतिरिक्त हैं। जबकि लालू कहते रहे हैं कि यह रकम 90 हजार करोड़ से अधिक हैं। श्वेत पत्र लाने के नाम पर पहले तो लालू ने संसद में ही ममता पर जमकर तीर छोड़े। यहां तक कि जिस यूपीए सरकार को वे बाहर से समर्थन दे रहे हैं। उस पर भी निशाने साधे। इसके बावजूद श्वेत पत्र लाने के फैसले पर सरकार अडिग रही। 11 जुलाई को जदयू के विधान पार्षद संजय सिंह ने संवाददाता सम्मेलन में यह जानकारी दी कि लालू ने बिना एडवरटीजमेंट व किसी अन्य औपचारिकता के 216 लोगों की बहाली ट्रैकमैन व पोर्टर के पद पर की थी। इसमें डेढ़ सौ लोग लालू के ही जाति के हैं। वहीं, 22 लोग लालू के ससुराल के हैं। इससे बिहार की राजनीति में भूचाल आ गया है। लालू इस मामले में भी फंसते नजर आ रहे हैं। इधर, लालू अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में नब्बे हजार करोड़ राशि के 'सरप्लस' की बात पर कायम हैं। वे रेल मंत्री ममता पर निशाना साधने से कोई गुरेज नहीं कर रहे हैं। हालांकि वे खुलकर ममता का नाम लेने से परहेज कर रहे हैं। दरअसल लालू प्रसाद ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि कभी वे मंत्री पद से बेदखल कर दिये जाएंगे। बिहार में करोड़ों रुपये के चारा घोटाले में वे कई बार पहले ही जेल जा चुके हैं। यह केस अभी तक खत्म नहीं हुआ है। अब कहीं रेलवे में भी तो कुछ हेरफेर नहीं किया गया है? इस बात को बिहार के जदयू नेता खूब उछाल रहे हैं। नेताओं का कहना है कि यदि सबकुछ ठीक है तो लालू इतना घबरा क्यों हो रहे हैं? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यहां तक कह दिया कि पूर्व रेलमंत्री व राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद श्वेत पत्र से डरकर पहले ही गुनाह कबूल ले रहे हैं। श्वेत पत्र लाने की प्रधानमंत्री की मंजूरी के बाद लालू का जख्म और हरा हो गया है। लोकसभा चुनाव में बिहार में लालू-पासवान ने सिर्फ तीन सीटें कांग्रेस को दी थीं। इससे नाराज होकर कांग्रेस ने सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े कर दिये थे। इसका फायदा जदयू-भाजपा ने उठाया। लोजपा का सूपड़ा साफ हो गया। वहीं लालू के पाले में सिर्फ चार सीटें आयीं।

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

तब पाकिस्तान का नाम होगा 'तालिस्तान' !

जैसी करनी वैसी भरनी वाली कहावत पाकिस्तान पर एकदम सटीक बैठता है। अमेरिका की मदद के बावजूद तालिबान के बढ़ते कदम को पाकिस्तान रोक नहीं पा रहा है। तालिबान की ताकत के सामने वह विवश नजर आ रहा है। कोई दिन ऎसा नहीं है कि तालिबान बेगुनाहों की जान नहीं लेता है। कभी मस्जिद में तो कभी किसी सार्वजनिक स्थल पर बमबारी करना तालिबान के 'डेली रूटीन' में शामिल है। एक वर्ष में हजारों निर्दोष लोगों की जानें तालिबान बेरहमी से ले लेता है। तालिबान के अस्तित्व को शुरू में पाकिस्तान खारिज करता रहा। फिलहाल तालिबान ने खुद का एक बहुत बड़ा 'नेटवर्क' तैयार कर रखा है। वह पाकिस्तान की लड़कियों तक को दिनदहाड़े उठा ले जाता है। सूत्र बताते हैं कि तालिबान लाहौर पर कब्जा करने के लिए भी बेचैन है। इसके पास अत्याधुनिक हथियार भी है। यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पाकिस्तान पर तालिबान का कब्जा होगा और पाकिस्तान का नाम 'तालिस्तान' होगा। बड़ी बात यह है कि इसके लिये खुद पाकिस्तान ही जिम्मेवार है। भारत को चोट पहुंचाने और कश्मीर हड़पने की नीयत से पाकिस्तान ने ही तालिबान को जन्म दिया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने पिछले दिनों खुद स्वीकार किया कि तालिबान को उन्हीं के देश की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अमेरिका की सीआईए की मदद से खड़ा किया है। पाकिस्तान का मकसद क्या रहा होगा, इस बात से हर भारतीय बखूबी अवगत है। जरदारी का यह भी आरोप था कि पूर्व राष्ट्रपति मुशरर्फ को तालिबानियों से विशेष लगाव था। यह जगजाहिर है कि तीन दशक पहले अमेरिका-भारत के रिश्ते आज की तरह सौहार्दपूर्ण नहीं थे। अमेरिका का झुकाव भारत की तरफ तब हुआ जब उसे लगने लगा कि इंडिया तेजी से विश्व पटल पर महाशक्ति के रूप में उभरता जा रहा है। ऎसे अमेरिका भी इस बात को स्वीकार करती है कि पाकिस्तान में आंतकियों का मजबूत गढ़ है। सात जुलाई 2009 को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुई एक बैठक में भी जरदारी ने माना कि पाक ने ही पैदा किये आतंकी। उन्होंने कहा कि अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 को हुए हमले के पहले ये आतंकी 'हीरो' समझे जाते थे। इस हमले के बाद आतंकियों का मन इतना अधिक बढ़ गया कि वे पाकिस्तान को ही निशाना बनाना शुरू कर दिये। जरदारी ने यह स्वीकार किया कि छद्म कूटनीतिक हितों के लिए ही आतंकियों को पाला-पोसा गया। यह गलती आज पाकिस्तान पर ही भारी पड़ रहा है। तालिबान ताबड़तोड़ पाकिस्तानी जनता पर हमला कर रहा है। सूत्रों की मानें तो ओसामा बिन लादेन भी तालिबान में ही है। अब अमेरिका भी इस बात से घबराने लगा है कि यदि तालिबानी आतंकी पाकिस्तान के परमाणु हथियार तक पहुंच गये तो कई देश में तबाही मचा देंगे। देर से ही सही यदि जरदारी ने मान लिया है कि पाकिस्तान की ही देन है तालिबानी आतंकी । ऎसे में पाकिस्तान को यह भी समझ लेना चाहिए कि भारत उसका दुश्मन नहीं है। उसे भारत समेत अन्य देशों की मदद से तालिबानी आतंकियों को जल्द से जल्द कुचल देना चाहिए। यदि वह ऎसा नहीं करता है तो आने वाले समय में तालिबानी आतंकी ही पाकिस्तान पर राज करेंगे और दर्जनों देश इससे प्रभावित होंगे। तालिबान का खतरा अमेरिका पर भी मंडरा रहा है। तालिबान में अनगिनत 'मोस्ट वांटेड' आतंकी छिपे हैं। इनकी तलाश अमेरिका सालों से कर रहा है। ये आतंकी अमेरिका पर हमले की साजिश भी रच रहे हैं। यह अलग बात है कि ये उसमें सफल नहीं हो पा रहे हैं।

सोमवार, 6 जुलाई 2009

विपक्ष के पाले में सिर्फ तल्ख टिप्पणी

केन्द्र की सत्ता की बागडोर चाहे कांग्रेस के पाले में हो या भाजपा के या फिर मिलीजुली ही क्यों न हो? विपक्ष में बैठने वाला हमेशा सत्ता पक्ष की बुराई ही ढूंढ़ता है। विपक्ष की नजर में सरकार कभी कोई अच्छा काम नहीं करती। या यूं कहें कि कर ही नहीं सकती है। पुनः विपक्ष में बैठने वाला जब सत्ता संभालता है तो उसे खुद के फैसले ही सही लगते हैं। वहीं, सत्ता पक्ष से विपक्ष में आनेवाले दल को वही रोग लग जाता है। विपक्ष हमेशा आलोचना कर जनता के सामने यह साबित करने की कोशिश करता है कि वही उसका सच्चा हमदर्द है। बेचारी भोली-भाली जनता ही इन नेताओं को सबसे बड़े मूर्ख नजर आते हैं। आज गांव की जनता भी नेताओं की तिकड़म को समझ चुकी है। ऎसा नहीं है कि सत्ता पक्ष में बैठनेवाली पार्टी हमेशा सही फैसला लेती है। कई बार तो उसके गलत फैसले से दर्जनों लोगों की जानें भी चली जाती हैं। वास्तव में विपक्ष को सरकार के वैसे ही फैसले का विरोध करना चाहिए जो देश हित में जरूरी है। देश की आजादी के बाद विपक्ष का इतिहास रहा है कि वह सरकार के हर फैसले का विरोध करता है। साल में कुछ फैसले ही ऍसे होते हैं जिसमें विपक्ष चुपचाप हामी भर देता है। ये फैसले अधिकतर देश की रक्षा से संबंधित होते हैं। विपक्ष इस मामले में इसीलिए विवश होता है कि देश हित के फैसले का विरोध करने पर देश की जनता की नजर में वह बेनकाब हो जाएगा। देश के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने 6 जुलाई को आम बजट पेश किया। इसमें अनगिनत बातें समाहित हैं। देश की रक्षा पर 34 प्रतिशत राशि की बढ़ोतरी की गयी है। पाकिस्तान और चीन के बढ़ते सामरिक ताकत के मद्देनजर यह अत्यंत ही जरूरी था। उसी तरह किसानों के लिए पैकेज की घोषणा तारीफ के काबिल है क्योंकि किसान देश की रीढ़ होते हैं। मंदी से निबटने के लिए भी प्रयास किया गया है। हालांकि यह काफी नहीं है। इसी तरह प्रिंट मीडिया को भी राहत दी गयी है। अल्पसंख्यकों, कमजोर तबके के लोगों की तरफ भी वित्त मंत्री ने ध्यान दिया है। हर साल 1.20 करोड़ लोगों को नौकरी मिले, इसके लिये भी कोशिश की गयी है। जीवनरक्षक दवाएं को सस्ती की गयी हैं। इससे गरीबों को भी फायदा होगा। बड़ी कारें, मकान, खेल के सामान, एलसीडी टेलीविजन, मोबाइल, कंम्यूटर, प्रेशर कुकर, ब्रांडेड गहने, सीएफएल बल्ब, चमड़ा उत्पाद को इस बजट में सस्ता किया गया है। इसी तरह सोना-चांदी, कपड़े, किचन के सामान मंहगे कर दिये गये हैं। प्रेशर कुकर, बल्ब सस्ता होने से गरीब भी लाभान्वित होंगे। इसके बावजूद आम जनता सबसे पहले चावल, दाल, सब्जी सस्ती हुई है या नहीं इस बात पर ज्यादा ध्यान देती है। बजट में ये चीजें सस्ती नहीं की गयी हैं । सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम पहले ही बढ़ा चुकी है। ऎसे में मालभाड़ा बढ़ने से चीजों के दाम तो यूं ही बढ़ जाएंगे। इसके अलावा वित्त मंत्री ने रेलवे से आने-जाने वाली कई चीजों पर सेवा कर लगा दिया है। इसका असर भी कहीं न कहीं महंगाई के रूप में सामने आएगा। विपक्ष को वजट के उस फैसले का स्वागत करना चाहिए जिसका फायदा गरीबों और आम जनता को प्रत्यक्ष रूप से होने जा रहा है। मसलन दवाएं सस्ती होने से गरीबों को भी लाभ होगा। किसानों के प्रति सरकार की विशेष रुचि भी प्रशंसनीय है। आम आदमी को दाल-रोट-सब्जी सस्ती दर पर मिले, विपक्ष को इस बात के लिए चिंतित होना चाहिए। लाखों गरीब मजदूर जो सौ रुपये भी प्रतिदिन नहीं कमा पाते, इन्हें दाल-भात-सब्जी इक्ट्ठे नसीब नहीं हो पाती। सत्ता पक्ष तो इस बारे में गंभीरता से कभी नहीं सोचता, क्योंकि बजट बनाने में जो अधिकारी सहयोग देते हैं, ये गरीब नहीं होते। ये एयरकंडीशन में बैठकर बजट को अंतिम रूप देते हैं। ये गरीबी और उसके थपेड़ों से कोसों दूर रहते हैं। ऎसे में इन्हें कीड़े-मकोड़े की तरह रहनेवाले गरीब की जिंदगी के बारे में थोड़ा अहसास भी नहीं हो पाता। ऎसे मुद्दे पर विपक्ष को आवाज उठानी चाहिए। परंतु अफसोस विपक्ष के पास सिर्फ तल्ख टिप्पणी है वोट से अलग कार्य नहीं।

शनिवार, 4 जुलाई 2009

यहां हवा बहते ही जलायी जाती हैं मोमबत्तियां

बिहार में चाहे राजधानी पटना हो या फिर कोई अन्य जिला, यहां हवा बहते ही गृहणियां मोमबत्तियां जलाने में जुट जाती हैं। वहीं, धनाढ़य लोग जनरेटर की ओर लपकते हैं। हम यहां चर्चा करने जा रहे हैं बिहार की कमजोर बिजली व्यवस्था की। देश में मानसून ने दस्तक दे दिया है। ऎसे में हवा के साथ बारिश स्वाभाविक है। तेज हवा चलते ही यहां की बिजली गुल हो जाती है। उमस भरी गर्मी और आकाश में मंडराते काले बादल से दिन में भी 'शाम' का बोध होता है। गृहणियां सामान्य से थोड़ी भी तेज हवा बहने पर मोमबत्तियां/दीये की तलाश में घरों में भागती नजर आती हैं। यदि दिन का समय हो तो हाथ पंखे की खोज पहले रहती हैं। धनाढ़य वर्ग के लोग तो बिजली गुल होने के पहले ही जेनरेटर चलाकर बैठ जाते हैं ताकि अंधेरे में उन्हें एक मिनट भी न रहना पड़े। बिहार में लालू प्रसाद मुख्यमंत्री थे तब भी बिजली की यही स्थिति थी। अब विकास पुरुष माने जाने वाले नीतीश कुमार के शासनकाल में भी पूर्ववत स्थिति बरकरार है। मुख्यमंत्री पद संभालते ही नीतीश कुमार ने भी इसके लिये केन्द्र को जिम्मेवार ठहरा दिया कि केन्द्र बिजली मामले में मदद नहीं कर रहा है। सामान्य तौर पर यदि शहरी गली में कहीं बिजली का तार टूटकर गिर जाए तो उसे ठीक करने में विभाग को चार दिन लग जाते हैं। कभी-कभी तो सप्ताह भर भी। हां, इसके लिये यदि मुहल्लेवासियों ने हंगामा, सड़क जाम कर अपना विरोध जताया हो तो इसका निबटारा उसी दिन संभव है। तेज हवा यदि चली तो लोग मान लेते हैं कि दो दिन बिजली का दर्शन नहीं होगा। पूरे बिहार में हर सड़क पर बिजली के जर्जर लटकते तार दिख जाएंगे। ये जर्जर तार हल्का हिल-डुल भी बर्दाश्त करने लायक नहीं है। सच कहा जाए तो अधिकतर तार मरनासन्न हालत में हैं। ऍसे में तेज हवा की मार ये कैसे झेलेंगे? हर सरकार के पास रटा-रटाया जवाब रहता है कि पिछली सरकार ने हालात बदतर कर दिये। कम बिजली के मसले पर तो सीधा आरोप केन्द्र पर लगाया जाता है। वास्तव में कुछ ही मामलों में केन्द्र जिम्मेवार होता है। बिहार की राजधानी पटना में भी हल्की हवा चलते ही घंटों बिजली गुल हो जाती है। जहां तक बिजली आपूर्ति की बात है प्रदेश के किसी भी जिले में बीस घंटे बिजली नहीं मिलती है। छोटे जिलों में तो पांच घंटे बिजली भी मुश्किल है।

मंगलवार, 23 जून 2009

बेटे के पास कैदी की तरह रहती है एक मां...

श्रवण भी एक बेटा ही था जिसकी कहानी इतिहास के पन्ने में दर्ज है। आज भी हर मां-बाप श्रवण तुल्य बेटा चाहते हैं। परंतु इतिहास तो इतिहास ही है। हां, कभी-कभार ऍसे बेटे की चर्चा सुनने को जरूर मिल जाती है, जो अपने मां-बाप को भगवान का दर्जा देते हैं। उन्हें पलकों पर बिठाकर रखते हैं। वर्ना अधिकतर क्रूर संतान की बात ही सामने आती है। हम यहां एक ऍसे बेटे की चर्चा करने जा रहे हैं जो अपनी पत्नी के कहने पर मां को प्रताड़ित करता है। उसकी मां चुपचाप इस जुल्म को वर्षों से सहती आ रही है। उसे यह जुल्म तबतक सहना होगा जबतक वह जीवित है। पर, धन्य है यह मां जो किसी के सामने यह बयान देने को तैयार नहीं है कि उसकी बहू प्रताड़ित करती है। उसका बेटा बहू के भय से खामोश सबकुछ देखता रहता है। परंतु, शायद ईश्वर से यह सब देखा नहीं गया। मां को मां न समझने वाले इस बेटे को पांच संतान हैं। चार बेटी व एक बेटा। यह बेटा भी शायद भगवान ने इसलिये दे दिया कि चौथी बेटी के जन्म के बाद यह बेटा मां से लिपट फूट-फूटकर बिलखने लगा कि उसका कोई वारिस नहीं रहेगा। मां ने दिल से आशीर्वाद देते हुए यह कहा कि हे भगवान यदि उन्होंने कोई भी अच्छा काम किया है तो इस बेटे की सभी गलतियों को माफ कर एक बेटा इसकी झोली में डाल दो। इसे मां का आशीर्वाद कहें या फिर भगवान का चमत्कार कि पांचवें संतान के रूप से इस बेटे को पुत्र की प्राप्ति हुई। इसके बाद भी बहू का रवैया नहीं बदला। उसकी दुष्टता कम होने की जगह पर बढ़ती गयी। यह सच्ची कहानी कुछ यूं है-बिहार के मुजफ्फरपुर के मझौलिया रोड में कृष्ण कुमार वर्मा का परिवार रहता है। इनका दो कमरों का अपना मकान है। यह जमीन इन्हें पिता की विरासत के रूप में मिली है। पेशे से वह बिजली विभाग में क्लर्क हैं। कद-काठी तो लंबा परंतु नजरें चुराकर बात करनेवाला है। इनकी पत्नी दो औसत महिलाओं को मिलाकर हैं। अधिकतर मुहल्लेवाले से इनकी पटरी नहीं बैठती है। यहां तक की पड़ोसी से बातचीत तक नहीं होती है। एक किरायादार को पता चला कि इनका मकान खाली है। रंजना नामक एक महिला जिसके पति बीमार रहते हैं, ने इस मकान को किराये पर ले लिया। कुछ ही समय बाद रंजना को पता चला कि इस घर में एक बूढ़ी महिला रहती हैं। इससे पहले इन्हें प्राय: किसी महिला के कराहने की आवाज सुनाई देती थी। एक दिन रूबरू होने पर बूढ़ी महिला ने बताया कि उसकी बहू उसे प्रताड़ित करती है। परंतु उन्होंने इस बात को किसी को भी न बताने के लिए कहा। यह भी कहा कि यदि किसी को बता देंगी तो वे मुकर जाएंगी। बूढ़ी महिला ने बताया कि उसके पति दारोगा से सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी मौत के बाद उनकी जिंदगी नरक से भी बदतर हो गयी है। हालांकि उन्हें पेंशन मिलती है। वे प्रतिमाह हजार रुपये से अधिक खाने के पैसे के रूप में बेटे को दे देती हैं। दवा का पैसा अलग से देती हैं। बूढ़ी महिला ठीक से चल नहीं सकती हैं। इनकी उम्र अस्सी के करीब है। इनके कंधे पर कूबड़ निकला हुआ है। पति के बनाये मकान के एक कमरे में ये दिनभर रहती हैं। शाम छह बजे इनकी बहू इन्हें ऊपर आने की इजाजत देती है। इससे पहले यदि वे पहुंची तो फिर गालियों से स्वागत होता है। दूसरी ओर रंजना को बातचीत में वृद्ध महिला की बहू ने बताया कि शादी के बाद वे काफी अनुशासन में रखती थीं। जिसका बदला वह अब ले रही हैं। वर्ष 2007 के कार्तिक छठ में वृद्ध महिला को बेटे-बहू ने एक कमरे में बंद कर दिया। उसी कमरे में खाने के लिए सत्तू-चूड़ा रख दिया। साथ ही एक बाल्टी में पीने का पानी। वृद्ध महिला उसी में रहती थी। इस बात का खुलासा तब हुआ जब शौच जाने के लिए टंकी का पानी खत्म हो गया और वृद्ध महिला ने रूम के अंदर से आवाज देकर दूसरे से मदद मांगी। इत्तफाक से रंजना उसी वक्त अपने ससुराल से लौटी थी जिस वक्त वृद्ध महिला मदद मांग रही थी। बाद में पता चला कि जब भी इनके बेटे-बहू घर से बाहर जाते हैं। इन्हें इसी तरह कमरे में बंद कर देते हैं। इससे इस मां की पीड़ा का अंदाजा सहज ही लगाया सकता है। क्लर्क बेटे-बहू का विचार भी भगवान ने कुछ यूं फेरा है कि इन्होंने अपनी पहली बेटी की शादी एक चपरासी से कर दी। दूसरे की शादी के लिए भी इसी तरह का लड़का ढूंढ रहे हैं। नौकरी के अलावा कई पेशे अपनाने के बाद भी इस घर की आर्थिक स्थिति अत्यंत नाजुक है। इसके बावजूद बहू-बेटे की समझ में यह बात नहीं आयी कि घर में मौजूद मां रूपी भगवान की इज्जत करें। उसे सम्मान दें। बेटे को जन्म देने के बाद मां गौरव से फूले नहीं समाती है कि बूढ़ापे का सहारा आ गया। परंतु अधिकतर बेटों का व्यवहार मां-बाप के हित के खिलाफ होता है। बेटे में बदलाव तब आता है जब घर में बहू आ जाती है। वहीं, बेटियों के दिल में हमेशा मां-बाप के लिए बेटों से अधिक प्यार होता है। इसके बावजूद समाज के लोग बेटे के लिए तरसते हैं। मुझे जब इस बात का पता चला तो मैंने हस्तक्षेप भी किया, परंतु बूढ़ी मां कोई भी बयान अपने बेटे के खिलाफ देने के लिए तैयार नहीं हुईं। देश में मौजूद कानून की विडंबना यह है कि उसे हर कार्रवाई के लिए सबूत चाहिए। ऍसी हजारों माताएं प्रतिदिन अपने बेटे-बहू से प्रताड़ित होती हैं। इसके बावजूद वे उफ तक नहीं करती। मेरा मानना है कि ऍसे बेटों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

रविवार, 21 जून 2009

बिहारः शिक्षकों को चपरासी से भी कम वेतन

सुनने में कुछ अजीब लगेगा, परंतु यह कड़वा सच है कि बिहार में एक लाख से अधिक सरकारी शिक्षकों को चपरासी से भी कम वेतन मिलता है। इन शिक्षकों को चपरासी भी ताने देते हैं, उन्हें आंखें दिखाते हैं। बिहार में सरकारी दफ्तरों में काम करनेवाले चपरासी का वेतन आठ हजार रुपये से कम नहीं हैं। परंतु इन शिक्षकों को चार से सात हजार रुपये ही मिलते हैं। पंचायत, ग्राम पंचायत, नगर पंचायत व प्रखंड के अनट्रेंड शिक्षकों को 4000, ट्रेंड को 5000 एवं हाईस्कूल के शिक्षकों को 6000 रुपये मानदेय के रूप में मिलते हैं। वहीं प्लस टू के शिक्षकों को 7000 रुपये मानदेय मिलते हैं। इन शिक्षकों ने जब मानदेय बढ़ाने के लिए धरना-प्रदर्शन शुरू किया तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दो टूक शब्दों में कहा कि जिन्हें नौकरी करनी है करें, वर्ना दूसरी नौकरी ढूंढ़ लें। उन्होंने यह भी कहा कि चपरासी सरकारी कर्मचारी हैं। शिक्षक सरकारी नहीं हैं। ये शिक्षक पंचायत, नगर निगम, जिला परिषद के अधीन कार्यरत हैं। नीतीश ने कहा कि मानदेय बढ़ाने के पहले शिक्षकों की दक्षता की जांच की जाएगी। एनुअल और सप्लीमेंट्री की तर्ज पर परीक्षा होगी। एनुअल दक्षता जांच परीक्षा में फेल होने पर एक आखिरी मौका देकर सप्लीमेंट्री दक्षता जांच परीक्षा ली जाएगी। इसमें सफल होने वाले शिक्षकों को मानदेय बढ़ाया जाएगा। विफल होने पर बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। इन शिक्षकों की मूल्यांकन परीक्षा 13 सितंबर को होने वाला है। मानव संसाधन विभाग के प्रधान सचिव ने कहा कि शिक्षक नियोजन नियमावली 2006 में स्पष्ट प्रावधान है कि नवनियोजित शिक्षकों का तीन वर्ष बाद मूल्यांकन किया जाएगा। इसी आधार पर शिक्षकों का मानदेय 400 से 500 बढ़ाया जाएगा। शिक्षकों के वेतन मामले को हवा दे रहे हैं राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद चुनाव के लिए उन्हें एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। अगले साल बिहार में विधानसभा का चुनाव होना है। ऍसे में नीतीश सरकार के लिए यह एक बड़ी समस्या बन सकती है? नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के रूप में 2005 में बिहार की सत्ता संभाली। तब उन्हें विरासत में मिली सूबे की टूटी सड़कें, गरीबी, बेरोजगारी। उस समय सूबे के सभी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी थी। दूसरी ओर टीचर ट्रेनिंग किये हजारों युवा बेरोजगार थे। कई ने तो टीचर ट्रेनिंग बीस साल पहले किया था। परंतु अब भी बेरोजगार थे। नीतीश ने चुनाव के पहले इन सभी को रोजगार देने की बात कही थी। सत्ता में आने के बाद इतने शिक्षकों की बहाली उनके लिये एक बड़ी चुनौती थी। इसके बावजूद नीतीश सरकार ने निर्णय लिया कि शिक्षकों की बहाली की जाएगी। आनन-फानन में एक लाख से अधिक शिक्षकों की बहाली कर दी गयी। उस समय बेरोजगारों ने यह नहीं देखा कि वे शिक्षक तो बन रहे हैं परंतु वेतन उन्हें चपरासी से भी कम मिलेगा? इतने पैसे में उनका गुजारा कैसे होगा? दूसरी ओर नीतीश सरकार की सोच थी कि इन शिक्षकों को उन्हीं के शहर या गांव में पोस्टिंग कर दी जाए। बहाल शिक्षकों की कोई परीक्षा नहीं ली गयी बल्कि डिग्री देख उनकी बहाली कर दी गयी। इसमें ऍसे शिक्षक भी शिक्षक बन गये जिन्हें सौ तक गिनती भी ठीक से नहीं आती थी। जब शिक्षकों ने स्कूलों में योगदान दिया तो वहां पहले से मौजूद शिक्षकों को पन्द्रह-बीस हजार मासिक मिल रहे थे। यह देख उन शिक्षकों की आत्मा ने धिक्कारा, जो वास्तव में योग्य थे। इधर, जबसे शिक्षकों को यह पता चला कि उनकी जांच परीक्षा होगी। फेल करने पर उनकी नौकरी जा सकती है। तबसे इन शिक्षकों में हड़कंप मचा हुआ है। यह हड़कंप उन शिक्षकों में अधिक है जो पेंशन के तौर पर वेतन उठा रहे हैं। वहीं योग्य शिक्षकों को इस बात की खुशी है कि जांच परीक्षा बाद उनके मानदेय में वृद्धि हो जाएगी। शिक्षकों का एक वर्ग अदालत जाने की तैयारी कर रहा है। इधर, दूसरे चरण की शिक्षक बहाली की प्रक्रिया भी अंतिम चरण में है। दो माह बाद 80 हजार नये शिक्षक योगदान देने वाले हैं। पहले चरण में शिक्षक बनने के बाद हजारों लड़कियों की शादी बिना दहेज हो गयी। बेटे के मां-बाप ने यह सोच दहेज नहीं लिया कि घर में कमाने वाली बहू आ रही है। उसी तरह हजारों ऍसे युवाओं के सिर पर भी सेहरा बंधा जिनकी शादी नौकरी न रहने की वजह से नहीं हो पा रही थी। इसका श्रेय नीतीश सरकार को ही जाता है। इसके बावजूद नीतीश सरकार को शिक्षकों से यह कहना चाहिए था कि समय-समय पर इनके मानदेय में बढ़ोतरी की जाएगी। बढ़ती महंगाई में मानदेय बढ़ाने की मांग कहीं से गलत नहीं है। परंतु पढ़ाई से कमजोर शिक्षकों को भी चाहिए कि वे बच्चों को पढ़ाने के लिए खुद को उस लायक बनायें।

शनिवार, 20 जून 2009

भगवान ये अमीर हैं, इन्हें पहले आशीर्वाद दीजिए!

बचपन से यही सिखाया-पढ़ाया जाता है कि भगवान की नजर में सभी समान हैं। न कोई अमीर और न ही कोई गरीब। धार्मिक किताबें भी यही कहती हैं। परंतु कुछ पुजारियों ने इसे उलट दिया है। ये पुजारी अमीरों को बिना इंतजार कराये ही भगवान का दर्शन करवा देते हैं जबकि गरीब घंटों इंतजार के बाद ही दर्शन कर पाते हैं। पूरे भारत में जितने मंदिर-मस्जिद हैं। इनमें से इने-गिने को छोड़ सभी में जैसे ही कोई अमीर या वीआईपी भगवान दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लंबी कतार में खड़े गरीब व सामान्य भक्तों को रोक दिया जाता है। ये चिलचिलाती धूप हो या सर्द हवा, अपनी बारी का इंतजार करते हैं। ये वीआईपी या अमीर जबतक भगवान का दर्शन ठीक से नहीं कर लेते तबतक कोई प्रवेश नहीं कर सकता। बिहार में राबड़ी देवी जब मुख्यमंत्री थी तो वे कार्तिक छठ करती थीं। जिस गंगा घाट पर वे अर्घ्य देने जाती थीं। उस घाट पर कोई आम आदमी अर्घ्य नहीं दे सकता था। घाट पर सैकड़ों की संख्या में सुरक्षाकर्मी पहले से ही तैनात रहते थे। यहां तक कि वे जिस मार्ग से जाती थीं। उस मार्ग पर भी आवागमन रोक दिया जाता था। इससे जनता को कितनी परेशानी होती थी। यह तो जनता ही समझती थी। किसी राज्य के मुख्यमंत्री यदि कहीं देवी-देवता के दर्शन के लिए जाते हैं तो उस वक्त आम जनता को रोक दिया जाता है। यानी भगवान के किसी मंदिर में यदि देवी या देवता का दर्शन बिना लाइन लगे करना हो तो इसके लिये अमीर या वीआईपी होना जरूरी है। अभिषेक बच्चन की शादी के पहले अमिताभ बच्चन कई बार वाराणसी गये। वहां के कई ऎसे मंदिरों में वे गये जहां बिना पंक्ति में आये देवी दर्शन कठिन है। इसके बावजूद उनके लिये सारे भक्तों को रोक दिया गया था। इसकी एक बड़ी वजह चढ़ावे की राशि का अधिक होना भी है। बड़ी हस्तियां जब देवी-देवता के दर्शन के लिए जाती हैं तो वे लाखों में चढ़ावा चढ़ाते हैं। ऍसे में पुजारी और मंदिर का भाग्य खुल जाता है। कई पुजारी तो ललचायी नजरों से ऍसे दानकर्ता का इंतजार करते हैं। सीतामढ़ी में मां जानकी मंदिर में मौजूद पुजारी को हरवक्त ऍसे भक्त का इंतजार होता है, जो चढ़ावा ठीक-ठाक दे। यानी दान की राशि अधिक हो। गरीब भक्त को यहां दरकिनार कर दिया जाता है। उन्हें काफी समय तक मां के दर्शन के लिए इंतजार करना पड़ता है। यहीं नहीं कई बार तो पुजारी बेबाक कह देते हैं कि महंगाई बढ़ गयी है। ऍसे में चढ़ावे की राशि भी बढ़नी चाहिए। एक पत्रकार को जब मंदिर के चढ़ावे के बारे में जानकारी मिली तो वे बिना परिचय दिये ही मंदिर में मां के दर्शन के लिए गये। प्रसाद के अलावा उन्होंने पुजारी को चढ़ावे के लिए पांच का सिक्का दिया। पुजारी ने इशारे-इशारे में कहा कि चढ़ावा अधिक होना चाहिए। इससे देवी जल्द प्रसन्न होती हैं। उक्त पत्रकार से पहले वहां कई गरीब भक्त अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। पत्रकार ने 51 रुपये निकालकर पुजारी को दे दिये। इससे पुजारी प्रसन्न हो गया। यह भी कहा कि यहां से कोई खाली हाथ नहीं जाता। यानी इस पुजारी के अनुसार, जो गरीब भक्त चढ़ावा नहीं देते मां जानकी उन्हें खाली वापस लौटा देती हैं?

शुक्रवार, 19 जून 2009

पत्रकारों को भी भाते हैं चाटुकार

आज आम आदमी की कौन कहे पत्रकारों को भी चाटुकार ही अधिक भाते हैं। हर व्यक्ति अपनी तारीफ सुनना चाहता है। गलती से किसी ने सच मुंह पर कह दिया तो लोग भड़क जाते हैं। लाल-पीले हो जाते हैं। देख लेने की धमकी दे देते हैं। सच कहने वाले के खिलाफ मोर्चा तक खोल देते हैं। यह सिलसिला तब तक चलता है जबतक सच कहने वाले व्यक्ति की हालत पतली न हो जाए। इसी तरह यदि किसी पत्रकार की खबर पेज वन पर छपी हो। वह भी बाइलाइन, ऎसे में वह सीना चौड़ा किये किसी दफ्तर में जाता है। मान लीजिए वहां कोई क्लर्क नया आया हो। उसने पत्रकार महोदय से परिचय पूछ लिया। इस पर पत्रकार महोदय भड़क उठते हैं। यह भी कहते हैं कि पेज वन पर उन्हीं की बाइलाइन छपी है। इसी समय चपरासी आकर कहता है कि पत्रकार जी को साहेब बुला रहे हैं। पत्रकार का सीना और फूल जाता है। वे लंबे-लंबे डग भरते हुए अधिकारी के कमरे में प्रवेश करते हैं। फिर शुरू होता है बातचीत का दौर। इस क्रम में पत्रकार महोदय यह जरूर कहते हैं कि आज पेज वन पर उन्हीं की खबर छपी है। इस बीच यदि अधिकारी ने दबी जबां से कह दिया कि खबर में त्रुटि रह गयी है। संयोग से जो खबर छपी है, इसी अधिकारी के बयान से छपी है जिससे पत्रकार महोदय बात कर रहे हैं। ऍसे में पत्रकार महोदय भड़क जाते हैं। यह भी कहते हैं कि उन्होंने तो ठीक लिखा था। परंतु आफिस में बैठे डेस्क के साथियों ने अपने मन से इसमें कुछ जोड़ दिया। यह भी कहने से नहीं चूकते हैं कि वे इसका खंडन छपवा देंगे। यदि पत्रकार महोदय को अपनी गलती सुनने की आदत रहती तो शायद उनसे ऍसी गलती नहीं होती। वे अपनी गलती औरों पर नहीं थोपते, न ही उनमें घमंड दिखता। अपनी प्रशंसा सुनने के घमंड में चूर होकर ये पिछले बीस साल से एक ही गलती दुहरा रहे हैं। इनके आधे से अधिक बाल भी सफेद हो चुके हैं। इसके बावजूद इनमें कोई बदलाव नहीं आया। ये अपनी कापी में बीस साल पहले जो गलती करते थे आज भी कर रहे हैं। परंतु किसी की इतनी जुर्रत नहीं है कि कोई यह कह दे कि आप हर लाइन में गलती लिखते हैं। आफिस में इनकी गिनती 'बकलोल' और पैरवी से नौकरी पाने वाले पत्रकार के रूप में होती है। अब एक दूसरे दर्जे के पत्रकार की चर्चा करते हैं। इनके पास जानकारी है। ये 'पैरवीपुत्र' भी नहीं है। परंतु इन्हें अपनी जानकारी का इतना घमंड है कि ये सभी को अपने से कम जानकार बताते हैं। यदि ये कोई खबर लिख रहे हैं और किसी ने टोक दिया कि इसका 'इंट्रो' दमदार नहीं है या उनकी पढ़ी या लिखी खबर को किसी ने कुछ शब्द इधर-उधर कर दिया। इसके लिये ये जनाब पूर दफ्तर को सिर पर उठा लेंगे। हर हाल में इन्हें ऍसा कोई चाहिए जो हर वक्त यह कहता रहे कि आप महान हैं। आपके जैसा पत्रकार तो देश में इने-गिने ही हैं। ऍसा कहने से ही इनके दिल को खुशी मिलती है। ऍसा नहीं है कि तारीफ सुनने की आदत सिर्फ पत्रकारों में ही है। यह बुराई नब्बे फीसदी लोगों में है। पान वाले दुकानदार तक इस रोग से पीड़ित हैं। यदि किसी ने यह कह दिया कि 'भैया' आपके पान की क्वालिटी में कमी आ रही है। वह दुकानदार तुरंत पलटवार कहते हुए कहेगा कि आपको जहां पसंद है, वहीं खा लिया करें। वह इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं कि उसे क्वालिटी में सुधार करना चाहिए। ऍसे में चाटुकारिता करने वाले की तो हर जगह जय हो, जय हो रहेगा। परंतु इससे परे स्वभाव वाले को हमेशा परेशानी का सामना करना पड़ेगा। पत्रकारों की गिनती बुद्धिजीवी में होती है। जब उन्हें ही चाटुकार अधिक भाते हैं तो आम आदमी की कौन कहे? परंतु इससे बचने का प्रयास करना चाहिए। अपनी गलती सुनने की आदत डालने वालों को फायदा ही फायदा होता है। वे अपनी गलती सुनकर इसे सुधारने का प्रयास करते हैं। वहीं गलती सुनकर भड़क जाने वाले हमेशा इस भ्रम में जीते हैं कि वे ही बेहतर हैं...

बुधवार, 17 जून 2009

इन्हें चाहिए जींस वाली लड़कियां

तब ये कहती हैं मुझे प्यार करो...भाग-अंतिम
आखिर क्यों नहीं रुक रहा जिस्मफरोशी का धंधा? क्यों नहीं सरकार इस पर रोक लगा पा रही है? क्यों नहीं इस मुद्दे पर कोई नेता आवाज उठाता है? क्योंकि इसके पीछे कई नेता भी प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेवार हैं। कई नेताऒं को पत्नी के रहते भी चाहिए जींस वाली लड़की। वो भी कालेज गर्ल की तरह देखने में सुंदर, उनकी उम्र भी कम होनी चाहिए। कई नेता शादी के वक्त नेता नहीं रहते। उनके पास लाखों का धन भी नहीं होता। ये आम आदमी की तरह गरीब रहते हैं। वक्त के साथ चापलूसी कर जब ये नेता बन जाते हैं। फिर विधायक या उससे आगे। इसके बाद इनके पास करोड़ों रुपये एकाएक आ जाते हैं। आलीशान मकान व कई-कई एयरकंडीशन गाड़ियां भी। परंतु पत्नी तो देखने में साधारण और देहाती ही है। ऍसे में इनके लिये जींस वाली लड़की इनके साथ काम करने वाले लोग मुहैया कराते हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव का मतगणना का काम चल रहा था। सीतामढ़ी में राजद प्रत्याशी सीताराम यादव व जदयू प्रत्याशी नवल किशोर राय मतगणना स्थल पर बैठे थे। वहीं, शिवहर के राजद प्रत्याशी सीताराम सिंह और भाजपा प्रत्याशी अनवारूल हक की नजरें भी मतों की गिनती पर थीं। अंतत: सीतामढ़ी से सीताराम यादव और शिवहर से सीताराम सिंह की जीत हो गयी। नवल किशोर राय और अनवारूल हक हार गये। इसी समय एक न्यूज चैनल पर आ रहा एक समाचार ने सभी को चौंका कर रख दिया। न्यूज चैनल यह दिखा रहा था कि नवल किशोर राय और अनवारूल हक किसी होटल के अलग-अलग कमरे में बैठे हैं जहां दो जींस वाली खूबसूरत लड़कियां प्रवेश करती हैं। इसके पश्चात दोनों लड़कियों से आलिंगन करते हैं, फिर आगे...! इस समाचार को पूरे भारत के लोगों ने देखा और सुना। जिस समय का यह सीन दिखाया जा रहा था, उस वक्त दोनों सांसद थे। नवल किशोर राय सीतामढ़ी के एमपी थे। वहीं, अनवारूल हक शिवहर के सांसद थे। यह बात जब सामने आयी तो अनवारूल हक ने यह बयान दिया कि वे मर्द हैं। उन्हें अपने किये पर कोई पछतावा नहीं है। दूसरी ओर नवल किशोर राय ने बयान दिया कि न्यूज चैनल की खबर में वे नहीं थे बल्कि उनका कोई हमशक्ल था। इसके बाद से दोनों नेताओं ने कोई चुनाव नहीं जीता जबकि ये कई बार चुनाव लड़े। यहां तक कि ये विधायक के चुनाव में भी ये बुरी तरह हारे। इस समाचार को जानने के बाद अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब देश के सांसद जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठा कोई व्यक्ति इस तरह की हरकतों में शामिल हैं तो जिस्मफरोशी के धंधे पर कैसे रोक लगायी जा सकती है। समाप्त

मंगलवार, 16 जून 2009

तब ये कहती हैं मुझे प्यार करो...भाग-दो

बिहार का एक जिला सीतामढ़ी भी है। मां जानकी की जन्मस्थली होने की वजह से सीतामढ़ी की धरती अत्यंत पवित्र मानी जाती है। यहां के धूल को सिर पर लगा लेने से कई तीर्थस्थल का पुण्य प्राप्त हो जाता है। ऍसी कहावतें सुनने को मिलती हैं। सीतामढ़ी रेलवे जंक्शन से तकरीबन पांच किलोमीटर की दूरी पर मां जानकी का मंदिर है। यहां दूर-दूर से लोग मां का दर्शन करने आते हैं। मां जानकी के मंदिर से एक सड़क रीगा प्रखंड की ऒर जाती है। इसी के मुहाने के पास एक बस्ती नजर आती है। इसके चारों ऒर लखनदेई नदी का पानी बहते रहता है। बरसात के दिनों में तो एक चचरी के सहारे ही इस बस्ती तक पहुंचा जा सकता है। इसी बस्ती का नाम है 'बोहा टोला' यानी वेश्याऒं का मोहल्ला। एक तरफ मां जानकी को चढ़ावा पर चढ़ावा चढ़ता है। दूसरी तरफ 'बोहा टोला' में हर रोज किसी लड़की की आबरू लूटी जाती है। इन्हें लड़की से औरत बना दिया जाता है। इनकी चीखें इस कलयुग में न तो मां जानकी के पास पहुंचती है न ही सरकार के पास। कुछ नाबालिग तो कुछ बालिग लड़कियों की तकलीफें इस बस्ती की चहारदीवारी तक गूंज कर रह जाती है। धीरे-धीरे ये इस जीवन को जीने की आदि हो जाती हैं। इस बस्ती में ज्यादातर झोपड़ियां ही हैं। परंतु कुछ पक्के मकान भी नजर आते हैं। इस मकान के भीतर दलालों ने तहखाना बना रखा है। लड़कियों को अगवा कर या फिर खरीदने के बाद उन्हें तहखाने में पहुंचा दिया जाता है। जहां रोशनी की सारी व्यवस्था तो रहती है, परंतु टिमटिमाते दीये की रोशनी में ही इन्हें रखा जाता है। ताकि समय-समय पर इन लड़कियों को ये दाग सकें। यहां लोहे की छड़ी, छोटा जंजीर, रूई, मलहम जैसे कई सामान की व्यवस्था रहती है। लड़कियां किसी भी कीमत पर वेश्यावृत्ति के धंधे को अपनाने के लिए तैयार नहीं होती। यहां उपस्थित सभी दलाल इनके साथ बेरहमी से सामूहिक बलात्कार करते हैं। इनपर दलाल तबतक जुल्म ढ़ाते हैं जबतक ये इस पेशे को अपनाने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो जाती। जब ये लड़कियां हामी भर देती हैं। तब दलाल इन्हें मेडिकल चिकित्सा उपलब्ध कराते हैं ताकि इनके जख्म जल्द से जल्द सूख सके। फिर इन्हें सिखाया जाता है ग्राहकों से मोटी रकम वसूलने का तरीका। ग्राहक चाहे इनकी झोली में हजार या पांच हजार क्यों न दे दे। इन्हें मिलते हैं सौ या पचास ही। बाकी रुपये में कई हिस्से लगते हैं। दलाल से लेकर पुलिस और फिर सफेदपोशों तक पहुंचता है हिस्सा। 'बोहा टोला' से भागी एक लड़की ने इस बात का खुलासा कुछ साल पहले किया था। वह जब इस टोले से भागी थी तो कुछ लोगों ने उसे थाने की पुलिस तक पहुंचा दिया था। एक पत्रकार ने बड़ी चालाकी से उस लड़की से बात की, तब 'प्रताड़ना गृह' की बात सामने आयी। बाद में जब पुलिस ने छापेमारी की, तो इस बस्ती में दलालों ने आग लगा दी थी। सारी लड़कियों को ऍसे तहखाने में छिपा दिया गया, जहां पुलिस नहीं पहुंच पायी। इसके कुछ ही दिन बाद 'बोहा टोला' फिर से आबाद हो गया। आज पूरे भारत में हजारों जगहों पर 'बोहा टोला' मौजूद हैं। इसके बावजूद किसी चुनाव में यह मुद्दा नहीं बना। न ही किसी मंत्री, सांसद या विधायक ने इस मुद्दे को कभी उठाया। क्रमश...

सोमवार, 15 जून 2009

तब ये कहती हैं मुझे प्यार करो...भाग-एक

हर चुनाव में सड़क, बेरोजगारी, महंगाई, देश की सुरक्षा, कश्मीर मसला, महिला आरक्षण जैसे मुद्दे तो उठाये जाते हैं। परंतु किसी चुनाव में इस बात की चर्चा नहीं होती कि वेश्यावृत्ति कैसे रोकें। वेश्यावृत्ति से मुक्त महिलाएं समाज में इज्जत से कैसे जिएं, इस बात को जोरदार ढंग से कभी नहीं उठाया गया है। ऍसा नहीं है कि इसके लिये कानून नहीं है या फिर पुलिस छापेमारी नहीं करती है। इसके बावजूद यह देशव्यापी मुद्दा कभी नहीं बना। हमें किसी वेश्या या कार्लगर्ल का वह रूप तो दिखता है, जिसमें वे जिस्म बेचकर मोटी रकम वसूलती हैं। परंतु पर्दे के पीछे उनकी जिंदगी की कड़वाहट को कोई नहीं देखता। कोई नहीं देखता कि वह जिंदा लाश जैसी है, जो ग्राहकों को देख उससे लिपट जाती है। उन्हें अपने जिस्म से खेलने को मजबूर करती है ताकि उसे अधिक से अधिक रुपये मिल सके। वह ग्राहक दुबारा भी उसके पास आये इसके लिये वह नये-नये नुस्खे अपनाती है। इस रूप के लिए कभी कोई महिला स्वेच्छा से तैयार नहीं होती। इसके लिये उसे तहखाने में बंदकर इस कदर प्रताड़ित किया जाता है कि वे मरनासन्न स्थिति में पहुंच जाती हैं। कई तो मर भी जाती हैं। ऍसे में यदि जान बचाने के लिए वे जिस्मफरोशी के धंधे के लिए हामी भरती है तो इसके लिये पूरा समाज दोषी है। देश के हजारों सफेदपोश इस कार्य में लिप्त हैं। ये सफेदपोश लाखों दलाल पाल रखे हैं। ये कम उम्र की लड़कियों को विभिन्न माध्यम से खरीदते हैं। फिर उन्हें विभिन्न शहरों में मौजूद 'जिस्म की मंडी' तक पहुंचा देते हैं। यहां उन्हें ग्राहकों को रिझाने का तरीका सिखाया जाता है। इसी में से कुछ सुंदर लड़कियों को कार्लगर्ल के रूप में होटलों में सप्लाई कर दिया जाता है। इस धंधे में सुंदर और कम उम्र की लड़कियों की मांग अधिक है। इस बात की जानकारी पुलिस प्रशासन को बखूबी होती है। पुलिस को हर माह एक मोटी रकम मिलती है। ऍसे में संबंधित इलाके में पुलिस छापेमारी नहीं करती है। यदि इस मंडी से कोई लड़की भागकर किसी छुटभैये नेता के पास पहुंच जाती है। इस क्रम में वह अपना दर्द उससे बयान करती है। तब, ये नेता जी पच्चीस-पचास लोगों को इक्ट्ठा कर हंगामा शुरू कर देते हैं। ऍसे हालात में पुलिस को छापेमारी करनी पड़ती है। परंतु इसकी सूचना मंडी के बड़े दलालों तक पुलिस पहले ही पहुंचा देती है। नतीजन, छापेमारी में पुलिस को कुछ भी हासिल नहीं होता। पुलिस दिखावे के तौर पर कुछ लोगों को पकड़कर बंद कर देती है जिसे बाद में जमानत पर छोड़ देती है। बाद में पता चलता है कि उक्त नेताजी को भी 'जिस्म की मंडी' से हिस्सा चाहिए। नेताजी ने पहले कई दलालों से इसके लिये संपर्क भी साधा था। कामयाबी नहीं मिलने पर उन्होंने हाथ आयी लड़की के सहारे हो हल्ला कर फिर से उल्लू साधने की कोशिश की। अफसोस उन्हें इस बार भी हिस्सेदारी नहीं मिली। इधर, चंद दिनों बाद फिर मंडी का व्यवसाय फलने-फूलने लगता है। देश के हर राज्य में दर्जनों स्वयंसेवी संस्था वेश्याटोली की महिलाऒं को रोजगार देने की योजना पर काम कर रही है। इसके बावजूद आंकड़े बताते हैं कि जिस्मफरोशी का धंधा बढ़ता ही जा रहा है। क्रमश...

शनिवार, 13 जून 2009

भाजपा-राजद को नया झटका

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा-राजद के कई नेता जमीन तलाशने में जुट गये हैं। भाजपा में मौजूद कई ऍसे नेता हैं, जो मंत्री बनने के लिए व्याकुल हैं। कई को अब लगने लगा है कि भाजपा शायद ही कभी सरकार बना सके। ऍसे में कई सांसदों को शायद मंत्री बनने के लिए बूढ़ा होने तक या इससे आगे तक इंतजार करना पड़े। बिहार में राजद अंतिम सांसें गिन रहा है। इसके नेता पाला बदलने को बेचैन हैं। वे सुरक्षित भविष्य चाहते हैं। फिलहाल इन्हें जदयू के नीतीश कुमार ज्यादा पसंद आ रहे हैं। जदयू को जबरदस्त सफलता मिलने के बाद राजद के विधायकों की नजर नीतीश कुमार की ऒर है। 13 जून को बिहार और झारखंड के दो नेताऒं ने सबको आश्चर्य में डाल दिया। बिहार में राजद सुप्रीमो के करीबी और विश्वासपात्र माने जाने वाले श्याम रजक ने इस्तीफा दे दिया। वहीं, हजारीबाग के सांसद और भाजपा के उपाध्यक्ष यशवंत सिन्हा ने भी त्यागपत्र दे दिया, जिस वक्त यह मामला सामने आया राजनाथ नयी दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे। राजनाथ ने इस दौरान कहा कि पार्टी में अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यशवंत सिन्हा के पहले भाजपा के ही जसवंत सिंह ने पार्टी पर अंगुली उठायी थी। यशवंत ने अपना त्यागपत्र आलाकमान को भेज दिया। इस्तीफे में उन्होंने राजनाथ और अरुण जेटली पर सीधा निशाना साधा है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद एलके आडवाणी ने इस्तीफा देकर मिसाल कायम की। परंतु कुछ नेता पद से चिपके रहे। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। इधर, श्याम रजक का इस्तीफा विधानसभाध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने स्वीकार कर लिया। श्री रजक ने विधानसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया। वे राजद के टिकट पर 1995 से लगातार तीन बार फुलवारीशरीफ (सुरक्षित) क्षेत्र से विधानसभा के सदस्य रहे हैं। वे नौ साल तक राज्यमंत्री भी थे। उन्होंने आरोप लगाया है कि राजद के कुछ नेता जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल कर उन्हें अपमानित कर रहे हैं। राजद सुप्रीमो इस पर मौन हैं। उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। श्याम रजक ने जदयू में जाने के संकेत दिये हैं। उनके इस फैसले से राजद को करारा झटका लगा है। श्याम हमेशा लालू की रक्षा में ढाल बने रहे हैं। इसका प्रभाव निश्चित रूप से राजद पर पड़ेगा। लालू प्रसाद ने फिलहाल इसपर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं दी है। राजद के कई नेता लालू से खफा चल रहे हैं। यह अलग बात है कि ऍसे नेता अभी भी जमे हुए हैं। सूत्रों के अनुसार, कई नेता पाला बदलने की तैयारी में हैं परंतु वे नीतीश कुमार की हरी झंडी का इंतजार कर रहे हैं। राजद वर्तमान में गंभीर संकट काल से गुजर रहा है। राजद के कई विधायकों को लगने लगा है कि लालू अब डूबते सूरज हैं जबकि नीतीश उगते सूरज। यही कारण है कि ऍसे नेता नीतीश से आलिंगन के लिए आतुर हैं। भाजपा संक्रमणकाल से गुजर रही है। पार्टी में वाजपेयी जैसे नेताऒं की घोर कमी है। आडवाणी भी पार्टी में पहले की तरह रुचि नहीं ले रहे हैं। ऍसे में पार्टी का बिखंडन तय माना जा रहा है।

गुरुवार, 4 जून 2009

मीरा की मदद से कांग्रेस को चाहिए बिहार

बिहार की मीरा कुमार लोकसभा की अध्यक्ष बन चुकी हैं। राष्ट्रपति के बाद पहली बार देश के एक और महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर किसी महिला ने अपनी जगह बनायी है। दलित की बेटी को इतना बड़ा सम्मान वास्तव में पूरे देश के लिए गर्व की बात है। कांग्रेस ने मीरा को यह सम्मान देकर एक साथ कई निशाने साधे हैं। कांग्रेस ने पूरे देश को यह संदेश दिया कि उसके शासनकाल में महिलाएं पूरी तरह से सुरक्षित तो हैं ही। साथ ही अति पिछड़े वर्ग की महिलाऒं के लिए भी पार्टी में विशेष स्थान है। मीरा कुमार को पहले जलसंसाधन मंत्री बनाया गया। बाद में उनका नाम लोस अध्यक्ष के लिए आया। इस राजनीति के पीछे कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति है। कांग्रेस को मीरा की मदद से पूरा बिहार चाहिए। इस चुनाव में बिहार में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें ही मिली हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस को तीन सीटें मिली थीं जबकि कांग्रेस और राजद में गठबंधन था। राजद के लालू प्रसाद की लताड़ के बाद इस चुनाव में कांग्रेस ने बिहार में अपने बलबूते प्रत्याशियों को खड़ा किया था। इसके बावजूद उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। कांग्रेस की सोच है कि 2011 में बिहार में विधानसभा का चुनाव होना है। विस चुनाव को कांग्रेस अपने बलबूते लड़ना चाहती है। इसकी तैयारी उसने मीरा को लोकसभा अध्यक्ष बनाकर शुरू कर दी है। तीस साल बाद बिहार से किसी को लोकसभा अध्यक्ष बनाया गया है। मीरा के पहले बिहार के बलिराम भगत को लोकसभा का अध्यक्ष बनाया गया था। बलिराम सिर्फ चौदह माह जनवरी 1976 से मार्च 1977 तक इस कुर्सी पर विराजमान थे। मीरा कुमार पूर्व डिप्टी पीएम जगजीवन राम की पुत्री हैं। मीरा 1985 में भारतीय विदेश सेवा की नौकरी छोड़ राजनीति के मैदान में उतरी थीं। पहली बार 1985 में उत्तरप्रदेश के बिजनौर से ये लोकसभा सदस्य के रूप में चुनी गयीं। 2004 में अपने पिता की परंपरागत संसदीय क्षेत्र सासाराम से लोकसभा सदस्य के रूप में चुनी गयीं और केन्द्र में मंत्री बनीं। मीरा का जन्म 31 मार्च 1945 को पटना में हुआ था। उन्होंने काफी ऊंचे दर्जे की शिक्षा हासिल की। मीरा राजनीति में हर उतार-चढ़ाव से अवगत हैं। यही वजह है कि कांग्रेस ने ठोक-बजाकर इनका चयन लोकसभा अध्यक्ष के रूप में किया। अब कांग्रेस को बिहार में कितनी सफलता मिलती है। यह तो आनेवाला वक्त ही बतायेगा। इस चुनाव में उत्तरप्रदेश में सफलता मिलने के बाद उत्साहित कांग्रेस की नजर अब बिहार पर है। राहुल गांधी बिहार में हर हाल में कांग्रेस का जनाधार बढ़ाना चाहते हैं।

एमपी बनने के लिए फिर दौड़ लगायेंगे पासवान

सत्ता सुख से वंचित लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान फिलहाल सांसद बनने के लिए बेचैन हैं। वे हर हाल में कहीं भी स्थान पा लेना चाहते हैं। पासवान इस बात को बखूबी समझ रहे हैं कि यदि 'जुगाड़ व्यवस्था' में थोड़ी भी लापरवाही हुई तो पांच साल तक उन्हें गुमनामी के दौर से गुजरना होगा। कांग्रेस को इस बार कई दलों ने बिना शर्त समर्थन दिया है। ऍसे में पांच साल के पहले लोकसभा चुनाव होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। लोकसभा चुनाव के पहले राजद-लोजपा व समाजवादी पार्टी ने हाथ मिलाया था। बिहार में लोजपा का सूपड़ा साफ होने के बाद रामविलास को फिलहाल कोई 'ठौर' नहीं है। रामविलास के बारे में बिहार के लोगों का मानना है कि वे बिना सत्ता सुख रह ही नहीं सकते हैं। यह भी मानना है कि इनकी 'जुगाड़ व्यवस्था' काफी मजबूत होती है। सत्ता तक पहुंचने के लिए वे कोई न कोई सीढ़ी बना ही लेते हैं। इधर, यह बात सामने आयी है कि पासवान उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद से उपचुनाव लड़ेंगे। ये यहां से सपा के समर्थित उम्मीदवार होंगे। यह सीट सपा के अखिलेश यादव के त्यागपत्र देने से खाली हुई है। यादव फिरोजाबाद के अलावा कन्नौज से भी जीते थे। उन्होंने फिरोजाबाद से त्यागपत्र दे दिया जिससे यह सीट खाली हो गयी है। पासवान यहां से अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं ताकि वे संसद तक पहुंच सकें। यदि पासवान यहां से जीत जाते हैं और संसद तक पहुंच जाते हैं तो बिहार में राजनीति करना उन्हें काफी भारी पड़ेगा। बिहार से लोजपा पार्टी का निशान ही मिट जाएगा। 2011 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी इनका नामोनिशान मिट जाएगा। इसी लोस चुनाव में रामविलास पासवान ने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद से हाथ मिलाया था। इस हाथ मिलाने के चक्कर में लोजपा का सूपड़ा ही साफ हो गया। चुनाव के दो माह पहले लालू-पासवान पुरानी बात भुलाकर गले मिल चुके थे। गले मिलना कितना घातक हुआ, इस बात को पासवान बखूबी समझ रहे हैं। पासवान सत्ता सुख के लिए वाजपेयी की सरकार में भी शामिल हो चुके हैं। पिछले चुनाव में लोजपा को बिहार में चार सीटें मिली थीं। पासवान ने कांग्रेस को समर्थन दिया था, बदले में इन्हें केन्द्रीय मंत्री की कुर्सी मिली थी। इस चुनाव में वे शून्य पर आउट हो चुके हैं। अब ये कैसे मंत्री बनेंगे? यह एक ज्वलंत सवाल है। सत्ता पासवान के लिए भोजन से कम जरूरी नहीं है। इस चुनाव में एक और आश्चर्यजनक बात सामने आयी कि खुद को दलितों का मसीहा कहने वाले रामविलास को दलितों ने भी पूरी तरह से नकार दिया। अब पासवान कोई भी कुर्बानी देकर संसद तक की दौड़ लगाना चाहते हैं। अब देखना यह है कि इस दौड़ में उनकी हार होती है या जीत?

सोमवार, 1 जून 2009

...तो दिल ही दिल रो रहे लालू-पासवान

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद व लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान को पहली जून को एक और पराजय का सामना करना पड़ा। दोनों को ज्योंहि पता चला कि फतुहा विस उपचुनाव में एनडीए की जीत हुई है। दोनों दिल ही दिल में रो पड़े। फतुहा में 28 मई को वोट डाले गये थे। दोनों नेताऒं ने जमकर प्रचार किया था। राजद-लोजपा गठबंधन की ऒर से पुनित राय चुनाव लड़ रहे थे। पुनीत लोजपा उम्मीदवार थे। पुनित को जदयू के अरुण मांझी ने 10,400 मतों से पराजित कर दिया। लोकसभा चुनाव में बिहार से लोजपा का सूपड़ा साफ हो चुका है। रामविलास खुद हाजीपुर से चुनाव हार चुके हैं। लालू प्रसाद ने जैसे-तैसे अपनी नैया बचा ली। यदि सिर्फ पाटलिपुत्र से चुनाव लड़ते तो संसद में बैठने की जगह तक नहीं मिलती। लोस चुनाव में चार सीट मिलने के बाद वे कांग्रेस से 'बार्गेन' करने की स्थिति में नहीं थे। सो, उन्होंने जबरन बाहर से समर्थन देने की घोषणा की। लालू प्रसाद फिलहाल सिर्फ सांसद बनकर रह गये हैं। यादवों द्वारा नकारे जाने के बाद इनकी हालत काफी पतली हो चली है। चुनाव के पहले गर्जनेवाले लालू प्रसाद की वाणी में कुछ मधुरता दिख रही है। पहली जून को जब वे संसद पहुंचे तो सबका ध्यान खींचने वाले लालू काफी गुमशुम थे। हालांकि संसद में इनकी नजर जब दूसरे से टकरायी तो इन्होंने चेहरे पर हंसी लाने की भरपूर कोशिश की। परंतु बनावटी हंसी ने भी इनका साथ नहीं दिया। राजद-लोजपा के वरिष्ट नेता अपनी करारी हार की समीक्षा में जुट गये हैं। नीतीश के बढ़ते जनाधार से दोनों परेशान हैं। आगे भी यही स्थिति रही तो दोनों को राजनीति से 'वनवास' लेने की नौबत आ जाएगी। आम जनता यह समझ चुकी है कि इनके शासन काल में बिहार का विकास नहीं हो सकता है। पाटलिपुत्र से जदयू के टिकट पर सांसद बने रंजन प्रसाद यादव के अनुसार, लालू ने बिहार को परिवार का जागीर बना दिया था। इसी की सजा उन्हें मिली है। लालू ने सूबे के विकास के बदले परिवार का ज्यादा विकास किया। चारा घोटाले में लालू का आरोपित होना एक छोटा उदाहरण है। चारा घोटाले में जेल जाते वक्त उन्होंने अपनी पत्नी को राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया था जबकि उस समय उनकी पार्टी में कई दिग्गज मौजूद थे। 2005 के विधानसभा चुनाव के बाद भी यदि राजद-लोजपा का गठबंधन हुआ रहता तो बिहार में री-एलेक्शन नहीं होता। लोजपा के पास 29 विधायक थे। रामविलास का कहना था कि राजद को सरकार बनाने में तभी समर्थन देंगे जब लालू अपनी पत्नी के बदले किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बनाने के लिए राजी होंगे। लालू अपने परिवार को छोड़ किसी दूसरे को मुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार नहीं थे। नतीजन, री-एलेक्शन की नौबत आयी जिसमें नीतीश गठबंधन को बहुमत मिला। इस लोकसभा चुनाव में दोनों ने कांग्रेस को दरकिनार कर गठबंधन कर लिया। लालू-पासवान ने अपने हर भाषण में कहा कि दोनों भाई मिलकर सूबे का विकास करेंगे। यह बात जनता को रास नहीं आयी। लोगों ने इस बार इनकी तिकड़मबाजी को समझा और एकजुट होकर बाहर का रास्ता दिखा दिया। दोनों को कांग्रेस की ताकत का भी अंदाजा हो चुका था। आज लालू-पासवान दिल ही दिल रो रहे हैं। इनकी आंखों में आंसू नहीं दिख रहे हैं। परंतु दोनों के दर्द और बेचैनी बढ़ती जा रही है। दोनों की नजरें अब बिहार के उन रिक्त 17 सीटों पर हैं जहां छह माह के अंदर चुनाव होना है। लोकसभा चुनाव के चलते ये सीटें खाली हुई हैं।