सोमवार, 27 अप्रैल 2009

फिर बिके मतदाता


पांच साल तक सरकार को बुरा-भला कहनेवाली जनता खुद से यह वादा करती है कि अगली दफा वह सोच-समझकर ऎसी पार्टी को वोट देगी जो गरीबों के हित में काम करे। हर नुक्कड़ पर स्थित चाय की दुकान पर मजदूर हो या प्राइवेट स्कूल के टीचर या अन्य इस संबंध में अपने-अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं। यह सिलसिला सरकार बनने के कुछ ही दिन बाद शुरू हो जाती है। जनता सरकार के गठन के चंद माह बाद ही अपने ही फैसले पर पछताना शुरू कर देती है कि अमुक पार्टी के राज में महंगाई से जीना मुहाल हो गया है। एक वर्ग बढ़ते अपराध पर सरकार को कोसता है तो दूसरा फलां-फलां मामले में...। वास्तव में वोट पर निर्णय जनता कैसे लेती है। इस बात की जानकारी रखनेवाले की फीसदी काफी कम है। वजह है शहर के एसी फ्लैट में रहनेवाले किसी अफसर वर्ग या फिर बिजनेस मैन को इस बात की फुर्सत नहीं कि वे गांवों की धूल भरे व तपती धूप में सही स्थिति का जायजा ले सकें। कुछ पत्रकार गांवों की यात्रा भी करते हैं, हकीकत की जानकारी उन्हें मिलती है परंतु इस बात को वे खुलकर उजागर नहीं कर सकते। शहरी इलाके में पढ़े-लिखे मतदाता अपने विवेक से मतदान करते हैं। आंकड़े बताते हैं कि आज भी देश के तिहाई लोग गांवों में रहते हैं। ऎसे में उनका वोट काफी महत्वपूर्ण होता है। पर ये ग्रामीण किसे अपना वोट देंगे यह तय करता है वहां का मुखिया। मुखिया टोला स्तर पर किसी दबंग को कुछ नोट व दारू की बोतल देकर पटा लेता है। मुखिया का सौदा लाख रुपये से अधिक में तय होता है। किसी गांव में राजद तो किसी में कांग्रेस तो किसी में जदयू तो किसी में भाजपा के स्थानीय स्तर के नेता इस काम को अंजाम देते हैं। इसमें दस से पन्द्रह फीसदी वोट इस कारण कट जाता है कि ऎन मौके पर दूसरी पार्टी से भी टोला स्तर का दबंग रुपये इस शर्त पर ले लेता है कि वह वोट कम डालेगा। शहर में पढ़े-लिखे मतदाताऒं के सामने यह समस्या होती है कि वे आखिर किसे वोट दें? क्योंकि उनके इलाके में खड़े किसी उम्मीदवार को वे पसंद नहीं करते हैं। इसके बावजूद वे वोट डालने चले जाते हैं। वे यह बखूबी जानते हैं कि जीतने के बाद नेताजी दर्शन देनेवाले नहीं है। इतना ही नहीं किसी काम के लिए नेताजी के पास जाते-जाते चप्पलें घिस जायेंगी पर उनसे मुलाकात नहीं होगी। यदि मुलाकात हो भी गयी तो वे कोई मदद नहीं करेंगे। गांवों में 'वोट मैनेज' करने की बात सभी जानते हैं। चुनाव बाद जब दारू और रुपये खर्च हो जाते है। ऎसे में ग्रामीणों को अहसास होता है कि उन्होंने अपना वोट बेच दिया। परंतु तबतक सरकार बन चुकी होती है और अगले मौके के लिए उन्हें पांच साल इंतजार इंतजार करना पड़ता है। दूसरे चरण के मतदान के ठीक दो दिन पहले प्रसिद्ध फिल्म निर्माता और लोजपा से बेतिया के प्रत्याशी प्रकाश झा के यहां छापेमारी में पुलिस ने दस लाख से अधिक रुपये बरामद किये। हालांकि श्री झा ने अपने बयान में कहा कि ये रुपये चीनी मिल स्टाफ के लिए थे। इसी तरह वैशाली में एक केन्द्रीय मंत्री के पीए ने चुनावी सभा में खुलेआम पत्रकारों को रुपये देने शुरू कर दिये। इससे आक्रोशित एक पत्रकार उसे मारने दौड़ा। बाद में बीच-बचाव से मामला ठंडा हुआ। इसी तरह साधु यादव के यहां से भी छापेमारी में ढाई लाख से अधिक रुपये बरामद किये गये। सांसद का चुनाव लड़ने के लिए प्रत्याशी डेढ़ से लेकर पन्द्रह करोड़ तक खर्च करते हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये रुपये कहां जाते हैं और किन-किन मद में खर्च होते हैं। इस बार के चुनाव के लिए केन्द्र सरकार ने अपने बजट में 1120 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। पूरे देश में प्रत्याशियों ‍द्वारा जितने रुपये खर्च किये जाते हैं, इससे भारत की मंदी का डटकर मुकाबला किया जा सकता है।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

मुकदमों के 'गाड फादर' बने सुधीर ऒझा

मुजफ्फरपुर के सुधीर ऒझा (पेशे से वकील) आज किसी परिचय के मोहताज नहीं है। ये हर पल दूसरे पर हो रहे जुल्म के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार रहते हैं। इसके लिये बड़े-बड़े हस्तियों से धमकियां भी मिलती रह्ती हैं। हालांकि इस बात का जिक्र ये नहीं करते। परंतु जिन हस्तियों से इनकी लड़ाई चल रही है। ये कोई छोटे लोग नहीं हैं। सुनकर घोर आश्चर्य होगा कि विभिन्न मामलों में सोनिया गांधी, रेलमंत्री लालू प्रसाद, मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे, लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान, बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, फिल्म अभिनेत्री ऎश्वर्या राय के खिलाफ सुधीर ऒझा मुकदमा दर्ज कर चुके हैं। कुल मिलाकर वे अब तक 181 से अधिक मुकदमा दर्ज कर चुके र्है। कुछ पर सुनवाई चल रही है तो कुछ को अदालत ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। सुधीर का मानना है कि जागरूक वकील होने के नाते वे भ्रष्ट्राचार जैसे मुद्दे को उठाते हैं। सुधीर ने सबसे पहले 2005 में हाजीपुर रेलवे जोनल आफिस के स्थानांतरण पर रोक लगवाने के लिए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। मुजफ्फरपुर को-आपरेटिव बैंक में फसल बीमा के 1600 करोड़ रुपये के घोटाले के खिलाफ भी उन्होंने याचिका दर्ज की। इस मामले में कार्रवाई हुई जिसका फायदा किसानों को मिला। कोर्ट फीस में बेतहाशा वृद्धि के खिलाफ भी वे आगे आये। बाद में सरकार ने इसपर अमल किया, जिससे कि बिहार की जनता को काफी राहत मिली। हालांकि इस मामले में पूरे बिहार के वकील भी एकजुट थे। इसके बावजूद सुधीर के प्रयास को नकारा नहीं जा सकता है। रेल मंत्री लालू प्रसाद व ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने वर्ष 2007 में बिना अनुमति एनएच-28 पर हेलीकाप्टर उतार दिया था। इस मामले में श्री ऒझा ने याचिका दायर की। कई सुनवाई के बाद अदालत ने एसपी को इस संबंध में रिपोर्ट देने के लिए कहा है। बिहारियों को अपमानित करने व धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने को लेकर उन्होंने मनसे प्रमुख राज ठाकरे के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। मुजफ्फरपुर की अदालत राज ठाकरे के खिलाफ वारंट भी जारी कर चुकी है। रामविलास पासवान के खिलाफ वे धोखाधड़ी का मामला दर्ज करा चुके हैं। धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने के लिए वे सोनिया गांधी के खिलाफ मामला दर्ज करा चुके हैं। इस मामले में कोर्ट से नोटिस भी जारी की जा चुकी है। इसी तरह फिल्म अभिनेता ऋतिक रौशन व अभिनेत्री ऎश्वर्या राय के खिलाफ फिल्म धूम-2 में अश्लील सीन देने के लिए मुकदमा दायर कर चुके हैं। सुधीर राजेश खन्ना, जरा खान, करीना कपूर, अजय देवगन, अरशद वारसी पर भी मामला दर्ज करा चुके हैं। हाल ही में पद्मश्री सम्मान, महामहिम राष्ट्रपति व देश का अपमान करने के लिए वे भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धौनी व हरभजन सिंह के खिलाफ जनहित याचिका दायर कर चुके हैं। इसी तरह मुजफ्फपुर नगर निगम में घोटाला, राशि रहने के बाद भी नाला व पार्क निर्माण में देरी, सदर अस्पताल में पांच करोड़ की बंदरबांट के खिलाफ मामला दर्ज करा चुके हैं। इसी तरह बिहार में जर्जर रेलवे पुल के निर्माण के लिए उन्होंने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। मुजफ्फरपुर व्यवहार न्यायालय परिसर में जलजमाव के खिलाफ मेयर समेत कई अधिकारियों पर मामला दर्ज करा चुके हैं। मुजफ्फरपुर रेलवे ऒवरब्रिज पुल गिरने से कई लोगों की मौत हो गयी थी। इस मामले में भी सुधीर ने रेल मंत्री लालू प्रसाद और इरकान के कई अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। मुजफ्फरपुर नगर निगम के महापौर चुनाव में करोडों रुपये के खरीद-फरोख्त मामले में नगर विधायक विजेन्द्र चौधरी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा चुके हैं। दवा खरीद में लाखों के घोटाले मामले में वे पूर्व मुख्य सचिव एके चौधरी, निदेशक डा. गीता प्रसाद समेत कई पर मामला दर्ज करा चुके हैं। प्राइवेट स्कूलों में बेतहाशा फीस वृद्धि के खिलाफ सुधीर ने हाल ही में जनहित याचिका दर्ज करायी है। इस तरह दर्जनों और मामलों में सुधीर मुकदमा दर्ज कर चुके हैं। कई की सुनवाई लगभग पूरी हो चुकी है। सुधीर की याचिका ने बड़े-बड़े नेताऒं के होश उड़ा दिये हैं। एक सवाल के जवाब में सुधीर ने बताया कि भष्ट्राचार, घोटाला के खिलाफ उनकी लड़ाई हमेशा जारी रहेगी।

शनिवार, 18 अप्रैल 2009

बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए कांग्रेस भी जिम्मेदार: लालू

रेलमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद कब क्या बयान देंगे कहना मुश्किल है। ये अपना हर बयान देश हित में बाद में व अपने हित में पहले देते हैं। इनका एक बयान उस समय आया था जब झारखंड राज्य नहीं बना था। उस समय लालू प्रसाद ने कहा था कि उनकी लाश पर ही झारखंड राज्य बनेगा। बाद में झारखंड राज्य बना और राजद सुप्रीमो ने उसमें भरपूर सहयोग भी किया। सत्ता के लिए वे किसी हद तक जा सकते हैं। किसी से भी समझौता कर सकते हैं। इस बात की चर्चा सभी करते हैं। बिहार में जब वे मुख्यमंत्री थे और चारे घोटाले में उन्हें जेल जाना था। तब उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की कुर्सी थमा दी। इस बात की दबी जबां से सभी विधायकों ने विरोध किया। परंतु लालू के आगे विरोध जताने की हिम्मत किसी ने नहीं की। इसी तरह बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव जिसमें राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं। उन्हें स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान उन्हें समर्थन देने के लिए तैयार थे। परंतु पासवान ने एक शर्त रखी कि राबड़ी देवी मुख्यमंत्री नहीं बनेंगी। लालू इस बात से सहमत नहीं हुए। वे किसी भी विधायक को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाने के लिए तैयार नहीं थे। अंत में दुबारा चुनाव हुआ और नीतीश कुमार ने बिहार की सत्ता का बागडोर संभाला। यदि लालू उस वक्त किसी दूसरे को मुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार हो जाते तो सरकार के लाखों रुपये चुनाव कराने पर खर्च नहीं होते। इसे सत्ता की लोलुपता नहीं तो और क्या कहा जाएगा? इस लोकसभा चुनाव में राजद-लोजपा ने एक-दूसरे से हाथ मिला लिया और कांग्रेस को लताड़ मार दी। जिस कांग्रेस के साथ लालू ने पांच साल तक सत्ता का सुख भोगा, अब मुस्लिम वोट पाने के लिए शनिवार को दरभंगा के मनीगाछी में बयान दिया कि बाबरी मस्जिद गिराने में भाजपा के साथ कांग्रेस भी जिम्मेदार है। उनके इस बयान से पूरे देश में उबाल आ गया है। लालू के इस बयान को कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने आधारहीन बताया। मालूम हो कि लोकसभा के पहले चरण का चुनाव समाप्त हो चुका है। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद बिहार में दो जगहों से चुनाव लड़ रहे हैं। पहली सीट सारण जहां 16 अप्रैल को ही चुनाव हो गया। पाटलिपुत्र से भी लालू चुनाव लड़ेंगे। पहले चरण के मतदान के बाद राजद सुप्रीमो को लग रहा है कि कहीं उनकी लुटिया न डूब जाए। इससे घबराकर उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साध दिया है। बाबरी मस्जिद का मामला उठाकर वे मुसलमानों का वोट पाना चाहते हैं। हालांकि इस बयान का भी लालू खंडन करेंगे और कहेंगे कि मीडिया ने उनके भाषण को अपने ढंग से पेश किया है। इधर हाल ही में उन्होंने एक भाषण में कहा था कि यदि वे गृहमंत्री होते तो वरुण गांधी के सीने पर बुल्डोजर चढ़वा देते। इसके अगले दिन ही उन्होंने अपना बयान पलट दिया और सफाई दी कि उन्होंने कानून के बुल्डोजर चढ़वाने की बात कही थी।

पंथपाकड़ : सिर्फ एक जड़ से पचास पेड़

सुनने में कुछ अजीब लगेगा परंतु सच है। पंथपाकड़ में सिर्फ एक जड़ से पचास से अधिक पेड़ हैं। ये पेड़ ढाई एकड़ में फैले हुए हैं। इनमें से कुछ पेड़ सुख गये हैं तो कुछ नये का भी जन्म हो रहा है। ये पेड़ कितने हजार साल से हैं कहना मुशि्कल है। बिहार के सीतामढ़ी जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर दूर स्थित यह वही जगह है जहां जनकपुरधाम से अयोध्या जाने के क्रम में मां जानकी की डोली कुछ समय के लिए रुकी थी। इस जगह का नाम दो कारणों से पंथपाकड़ पड़ा। पहली किंवंदती के रूप भगवान शिव ने लाखों साल पहले इसी पंथपाकड़ पेड़ के नीचे साठ हजार साल तक तपस्या की थी। दूसरी किंवंदती के रूप में और वाल्मिकी रामायण के अनुसार, शिव के धनुष टूटने के पश्चात शिव भक्त परशुराम जी का क्रोध धधकने लगा था और वे प्रणाम करने इस पवित्र स्थल पर पहुंचे। इसी बीच जनकपुरधाम से चली मां जानकी की डोली इसी स्थल पर रुकी थी। तब, भगवान राम व परशुराम के बीच आमना-सामना हुआ। परशुराम फौरन ही भगवान राम के नतमस्तक हो गये। दोनों के मिलने की जगह होने के कारण इस जगह का नाम पंथपाकड़ पड़ा। भारत में मां जानकी की हजारों प्रतिमाएं स्थापित है। परंतु पंथपाकड़ में मां जानकी की प्रतिमा की जगह मिट्टी के पिंड स्थापित हैं। ऎसा नजारा कहीं और देखने को नहीं मिलता। यहां के पाकड़ के पेड़ में मनुष्य के शरीर में रक्तसंचार के लिए बने नस की तरह ही छोटी-बड़ी लताएं हैं। लता के सहारे ही अलग-अलग पेड़ का जन्म होते रहता है। एक पेड़ सुखने के पहले ही दूसरा पेड़ उग जाता है। इस पेड़ को जीवित रखने के लिए पानी-खाद की जरूरत नहीं पड़ती है। इस स्थल पर पहुंचकर बड़े-बड़े भी सांइटिस्ट भी आश्चर्यचकित रह जाते हैं। वैशाख के महीना में प्रत्येक साल हजारों की संख्या में संत विभिन्न राज्यों व पड़ोसी देश नेपाल से यहां आते हैं। वे सात से पन्द्रह दिनों तक यहां रुकते हैं। वे पेड़ की छांव के नीचे घंटों बैठकर मिट्टी के लेप को मस्तिष्क पर लगाते हैं। प्रतिदिन सौ से अधिक श्रद्धालुऒं का आना-जाना रहता है। सीतामढ़ी जिले में शादी होने के बाद लड़के-लड़कियों की जोड़ियां यहां मां जानकी के पिंड पर सिंदूर लगाकर आशीर्वाद लेती हैं। मंदिर के पुजारी रत्नेश्वर झा यहां की देखभाल करते हैं। इससे पूर्व उनके पिता, उनके दादा व अन्य इस स्थल की देखभाल किया करते थे। सारे पूर्वज अपने बच्चों को पंथपाकड़ के महत्व को कहानी के रूप में सुनाते रहे हैं। इस पवित्र जगह से तीन किलोमीटर मिट्टी के पथ पार करने के बाद ही पक्की सड़क आती है। ऎतिहासिक धरोहर होने के बावजूद पंथपाकड़ की ऒर किसी नेता का ध्यान नहीं है। किसी भी चुनाव में इस स्थल को बचाने की दिशा में कोई चर्चा नहीं हुई। चुनाव में जीत हो इसका आशीर्वाद मां जानकी से प्रत्याशी अवश्य लेते हैं।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

लाश...श्मशान...डोम...रुपये

आदमी खाली हाथ आया है और खाली हाथ ही चला जाएगा। इस सच को सभी जानते हैं। इसके बावजूद भौतिक सुख के पीछे मनुष्य जीवन भर भागता फिरता है। किसी भी घर में जब पैसे के लेनदेन पर विवाद होता है तो बुजुर्ग यह कहने से नहीं चूकते कि उनके मरने के बाद सारी संपत्ति यहीं रह जाएगी। बात भी सच है कि मनुष्य मरने के बाद कुछ भी लेकर नहीं जाता है। पर यह भी सच है कि यदि किसी की मौत हो जाए और उसके परिजनों के पास पैसे नहीं हैं तो शव जलाना असंभव होगा। शास्त्रों के अनुसार, यदि मरने के बाद किसी का दाह-संस्कार ठीक से नहीं किया जाता है तो उसकी आत्मा भटकती रहती है। मनुष्य जीवन भर किसी व्यकि्त को चाहे कितना कष्ट क्यों न पहुंचाये परंतु उसके मरने के बाद धूमधाम से दाह संस्कार जरूर करता है। उसे डर रहता है कि कहीं उसकी आत्मा उसे तंग करना न शुरू कर दे। इस भ्रम में लगभग सभी मनुष्य रहते हैं। पटना के कदमकुआं इलाके में एक साधारण परिवार के अभिभावक की मौत तीन माह पूर्व हो गयी थी। सारे परिजन गम में डूबे थे। यहां कोई बुजुर्ग नहीं था। पड़ोसियों ने बताया कि मृतक को ले जाने के लिए आवश्यक सामान मंगवाना होगा। इस बीच झोले के साथ पंडित जी पधारे। उनसे पूछा गया कि क्या-क्या मंगवाना है। इसपर, उन्होंने लंबी-चौड़ी सूची परिजनों को थमा दी। साथ ही यह भी कहा कि ऎसा न करने पर मृतक की आत्मा भटकती रहेगी। पंडित जी के बताये सारे सामान मंगवा लिये गये। मृतक को जलाने के लिए गुलबी घाट पर ले जाया गया। पता चला कि पहले रजिस्ट्रेशन होता है। इसकी व्यवस्था सरकार की तरफ से की गयी है। इसके लिये राशि भी कम लगती है। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी करने के बाद परिजनों ने जलाने के लिए लकड़ी खरीदे। इसके बाद लकड़ी सजाने वालों से शुरू हुआ मोल-तोल। इस परिवार के सदस्य एक-दूसरे से फुसफुसाते हैं कि इसके लिये पैसे कहां से आयेंगे। खैर घाट पर आये एक पड़ोसी से उधार लेकर इसकी भी व्यवस्था हो गयी। तबतक घाट का 'डोम' लंबे-लंबे पग भरता पहुंचा। पंडित जी फुसफुसाये आग देने के लिए 'डोम' ही दियासलाई जलाता है। 'डोम' से कहा गया कि 'भैया मेरे' जरा दियासलाई जला दें। 'डोम' भड़का और कहा-पहले बीस हजार रुपये निकालें। परिजन भौंचक-उन्हें लगा कि बीस रुपये मांग रहा है। मृतक के एक बेटे ने दस-दस के दो नोट निकालकर 'डोम' को दिये। 'डोम' ने दोनों रुपये जमीन पर फेंक दिये और गरजा भीख दे रहो हो क्या? वह आप से अब तुम पर उतर गया। इसी बीच एक अन्य मृतक की लाश पहुंची। 'डोम' की आंखें चमकने लगी। वह भागता हुआ वहां पहुंचा। इस लाश के साथ आनेवाले परिजन कुछ मालदार दिख रहे थे। इधर चिता सजाये परिजन सोचने लगे कि अब लाश कैसे जलायें। विचार-विमर्श शुरू हो गया। पंडित जी फिर फुसफुसाये, दो हजार में पट जाएगा। परिजन बोले कहां से लाये इतने रुपये, खुद दियासलाई जला लेंगे। पंडित जी बोले, ऎसा अनर्थ न कीजिएगा। आत्मा भटकती रहेगी, आपलोग चैन से जी नहीं पाइएगा। इसके पश्चात यहां आये सभी पड़ोसियों से उधार लेने का सिलसिला शुरू हुआ। जीवन में कभी उधार न देनेवाले भी दो सौ उधार दे दिये। इस तरह दो हजार जमा किये गये। हजार विनती और हाथ-पैर जोड़ने के बाद 'डोम' ने दियासलाई जलायी। सभी परिजन जाड़े में भी पसीने-पसीने हो गये। यह सोचकर कि क्या लाश को जलाने के लिए भी इतनी मिन्नतें करनी पड़ती है। खैर लाश तो जल गयी, पंडित जी भी साथ ही लौटे। पुन: अगले दिन कई पन्ने की लिस्ट थमा दी। इसे पूरा करने में परिजनों को हजारों रुपये खर्च करने पड़े। किसी ने जेवर बेच डाले तो किसी ने उधार लिये। परंतु पंडित जी के बताये सारे पूजा-पाठ करवाये। यह सोचकर कि कहीं उनके अभिभावक की आत्मा न भटके। हर श्मशान घाट पर 'डोम' का ही राज चलता है। सरकार के किसी नियम-कानून को वे नहीं मानते हैं। यूं कह सकते हैं कि लाश को पंचतत्व में विलीन होने के लिए भी रुपये चाहिए। भारत सरकार को यह कानून तो बनाना ही चाहिए कि शव जलाने में इस तरह के सौदेबाजी का सामना किसी परिजन को न करना पड़े। घाटों पर चल रहे 'डोम' के रंगदारी को खत्म करने की दिशा में भी कठोर कदम उठाने की जरूरत है।

निराश जिंदगी को दान-अंतिम


आठ बजे मैं पूरी तरह से होश में आ चुका था। मैंने वहां मौजूद घर के लोगों से पूछा-दीदी कैसी है? सभी अजीब निगाहों से मुझे देख रहे थे। पता चला कि वह बिल्कुल ठीक है। इसके पश्चात मैंने अपने बेटे से बात की। आठ दिन पीजीआई में रहने के बाद मैं लाज में लौट गया। ग्यारहवें दिन टांका कट गया। उचित देखभाल न होने से नाराज होकर मैं डाक्टर के मना करने पर भी चौदहवें दिन मुजफ्फरपुर लौट आया। सबका काम मुझसे निकल चुका था। मेरी जरूरत अब उनलोगों को नहीं थी। महीनों आराम के बाद मैं इस लायक हुआ कि आफिस जा सकूं। झूठ बोलते हैं कुछ चिकित्सक-पीजीआई के डाक्टरों ने कहा था कि आपरेशन के दस दिन बाद ही आप ड्यूटी पर जा सकते हैं जबकि मुझे कई माह लगे। यहां कि एक लेडी डाक्टर जो ब्लड क्रास मैच की जांच करती थीं, ने गलत रिपोर्ट दे दिया नतीजन मार्च में होनेवाला आपरेशन जून में हुआ। इतना ही नहीं एक ही जांच कई बार की गयी। एक बार जांच के लिए चिकित्सक पचास एमएल ब्लड लेते थे। एक छोटी सी गलती के चलते रोगी को कितनी परेशानी होती है। इसे मैंने काफी नजदीक से महसूस किया। बकौल चिकित्सक आपरेशन के बाद रोगी पहले की तरह ही हर काम कर सकता है। परंतु न तो मैं तेज चल सकता हूं, न दौड़ सकता हूं, न ज्यादा भारी वजन ही उठा सकता हूं। ऎसा करने पर मेरी हालत ऎसी हो जाती है कि मैं आफिस जाने लायक नहीं रहता। सहानुभूति की छोटी अवधि-किडनी डोनर को चिकित्सक और घरवाले पहले भगवान का दर्जा देते हैं क्योंकि यदि वे ऎसा नहीं करेंगे, तो शायद कोई अपनी जिंदगी दांव पर नहीं लगायेगा। परंतु उसके बाद हर कोई अपने रास्ते पर होता है। एक चिकित्सक ने कहा कि यदि डोनर को ऎसा आश्वाशन नहीं दिया जाए तो यह रिसर्च कामयाब ही नहीं हुआ होता। आज मेरे किसी परेशानी में कम से कम वे लोग तो खड़े नहीं होते जिनके के लिए मैंने अपनी जिंदगी दांव पर लगाई। परंतु बाहरी आशीर्वाद और सहयोग मुझे हर वक्त मिलता है।
...आपरेशन की शुरुआत से अंतिम तक एक सच्चे दोस्त की भूमिका में डा राजीव आनंद की भूमिका काफी सराहनीय रही। ये हैं तो हड्डी के डाक्टर, परंतु हर एक रोग के बारे में इन्हें अच्छी जानकारी है। मेरे एक अन्य मित्र ने पूछा कि आपरेशन के वक्त क्या तुम्हें अपने छोटे-छोटे बच्चों की याद नहीं आयी? मैंने कहा-यदि मैं ज्यादा सोचता तो मेरे पैर डगमगा जाते और ऎसा निर्णय नहीं कर पाता। ब्लाग में इस बात की चर्चा करने का सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि जल्दबाजी और भावना में बहकर कोई बड़ा निर्णय नहीं लेना चाहिए। वर्ना पूरी जिंदगी पछताना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को तो कतई ऎसा कदम नहीं उठाना चाहिए। समय-समय पर जांच का खर्च उठाना सब के वश की बात नहीं है। मुझे सबसे ज्यादा सहयोग दोस्तों और अनजान लोगों से मिलता है। एक उदाहरण-पहली बार जब मैं दैनिक जागरण के मुजफ्फरपुर के संपादकीय प्रभारी धीरेन्द श्रीवास्तव जी से मिला और इस बात की चर्चा की तो उन्होंने मुझे दिल से आशीर्वाद दिया। इसी तरह के आशीर्वाद से मुझे बल मिलता है। मेरे आफिस के अधिकतर साथी भी सहयोग करते हैं। चिकित्सक कहते हैं कि आदमी को जीने के लिए एक ही किडनी की जरूरत है। परंतु आपरेशन के बाद वही चिकित्सक कहता है कि परहेज से तो रहना ही पड़ेगा। सरकार की तरफ से गरीब वेवश डोनरों को भी मदद मिलनी चाहिए। ताकि डोनर की हिम्मत बढ़े और वह किडनी दान करने के लिए सोचे। समाप्त

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

निराश जिंदगी को दान - भाग दो

देखते-देखते दिसम्बर आ गया। बाहरी 'डोनर' भी नहीं मिला। दीदी की हालत खराब होती जा रही थी। घर में निराशा फैलती जा रही थी। मैं भी कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था। परंतु राखी और इंसानियत का कर्ज तो चुकाना ही था। आखिरकार मैंने किडनी देने का फैसला कर ही लिया। अपनी पत्नी से इस बात की चर्चा की तो वह नाराज हो गयी। कहने लगी हमारे बच्चे अभी बहुत छोटे हैं। उसने अपनी माँ से इस सम्बन्ध में बात की। उन्होंने हँसते हुए कहा-जो आदमी इंजेक्शन देख पसीने-पसीने हो जाता है। वह आपरेशन नहीं करवा सकता है। मैनें ऑफिस के दोस्तों से बात की। सभी ने 'ना' में जवाब दिया। इसी बीच मैंने एक माह की छुट्टी के लिए आवेदन दे दिया। अठारह दिसम्बर को लखनऊ जाना था। तबतक मैंने छोटे या दीदी से नहीं कहा था कि मैनें छुट्टी ले ली है। सोलह दिसम्बर को छोटे का फोन आया-कहा कि आप लखनऊ चल रहे हैं या नहीं, मैंने 'ना' में जवाब दिया। कहा-कि तुमलोग चलो मैं पीछे से आऊंगा । उसने कहा-जब किडनी देने की लिए जांच शुरू हो ही जायेगी तो आप जाकर क्या करेंगे। मैं यह बात सुनकर अवाक रह गया। मैंने कहा-तुम चिंता मत करो मैं चलूंगा। लखनऊ पहुंचकर मैंने डॉक्टर से मुलाकात की और आपरेशन के लिए हामी भर दी। जांच शुरू हो गयी। एक ही जांच मेरा और दीदी का होता था। एक दिन दीदी का एक्सरे होना था। मैं बाहर मेज पर बैठा था। जीजा काफी पीने गये थे। तभी छोटा मेरी किडनी की जांच रिपोर्ट लेकर हांफता हुआ आया। वह काफी घबराया हुआ था। मैंने उसे बैठने के लिए कहा। तभी जीजा भी आ गये। छोटे ने कहा कि आप किडनी नहीं दे सकते हैं। डॉक्टर ने कहा है कि आपकी दोनों किडनी काफी कमजोर है। जीने के लिए आपको दोनों किडनी चाहिए। कुछ देर के लिए सन्नाटा.... मैंने कहा कि तुम घबराओ मत मैं खुद डॉक्टर से बात करता हूं। मैं डॉक्टर के पास पहुंचा। वे बोले-यदि आप किडनी देते हैं तो आपको आजीवन परहेज से रहना होगा। उधर, दीदी हर पल मौत की तरफ जा रही थी। मुझे हर पल उसका मुर्झाया चेहरा दिखता था। मुझे अपनी जिंदगी से ज्यादा उसकी चिंता थी। ये जानते हुए भी कि आपरेशन के बाद मैं हमेशा के लिए रोगी बन जाऊंगा । मैंने 'हा' में हामी भर दी। मेरी पत्नी इस बात से अनजान थी। बीस जून, 06 की सुबह छह बजे मैं आपरेशन थिएटर में पहुंचा। चार बजे मुझे होश आया। आपरेशन हो चुका था। दीदी को नई जिन्दगी मिल गयी थी । क्रमश...

निराश जिंदगी को दान...भाग एक

नवम्बर का महीना था। रात के दस बजे थे, मैं ऑफिस में था। मीटिंग चल रही थी, इसी क्रम में मोबाइल की घंटी बजी, देखा तो बड़े भैया का फ़ोन था। ऑफिस के बॉस ने पूछा-क्या हुआ ? मैंने कहा-घर से फ़ोन है। बॉस ने कहा-बात कर लो। बड़े भैया घबराए हुए थे, वे बोले दीदी से बात हुई-मैंने ना कहा। बोले उसकी दोनों किडनी ख़राब हो गयी है। लखनऊ के डॉक्टर ने ट्रांसप्लांट के लिए कहा है। मैंने कहा-चिंता न करें, कल सुबह बात करता हूँ । ऑफिस का वर्क समाप्त होने पर चार बजे सुबह घर पहुँचा। भूख और नींद गायब हो चुकी थी। कुछ भी निर्णय नहीं ले पा रहा था कि क्या करना चहिये, दीदी को फ़ोन किया, वह घबरायी हुई थी। उसने कहा-अब कुछ नहीं हो सकता है। डॉक्टर ने अगले माह 'डोनर' लेकर आने के लिए कहा है। 'डोनर' कहाँ से आयगा? मैंने कहा- चिंता मत करो तुम्हारा ट्रांसप्लांट होगा। मैंने बड़े भैया को फ़ोन लगाया-उन्होंने कहा कि किडनी देने से आदमी कमजोर हो जाता है। बाहर से इंतजाम करना होगा। देखते-देखते दो सप्ताह बीत गए, चर्चा होती रही पर कोई आगे नहीं आया। किसी ने कहा- माँ-पापा क्यों नहीं दे सकते हैं। मैंने इस बात पर आपत्ति जताई, दोनों कि उम्र सत्तर से अधिक थी। वे हमेशा बीमार रहते थे। डॉक्टर के अनुसार- 'डोनर' कि उम्र दस साल कम या अधिक होने से ऑपरेशन अच्छा होता है। घर में किसी ने कहा-भाभी का ब्लड ग्रुप दीदी से मैच करता है। बड़े भैया नाराज हो गये- कहा मेरी सेवा कौन करेगा? छोटे ने कहा-मैं दूंगा। छोटी बहू ने मैके फ़ोन किया-अपनी माँ से कहा इन्हें समझाओ। किडनी देना चाहते हैं, मौत को गले लगाना चाहते हैं। मेरी जिदगी बर्बाद हो जायेगी। माँ ने कहा-ऐसा नहीं होगा। छोटा किडनी न दे इसके लिए पूजा-पाठ होने लगी। जीजा का ब्लड ग्रुप मैच नहीं कर रहा था, सो बात ख़त्म। किसी ने कहा-दीदी के बेटे क्यों नहीं दे सकते। दीदी नाराज हो गयी-कहा बड़े के हार्ट में एक बल्ब कम है, छोटा हमेशा बीमार रहता है। सो, चारों ओर निराशा थी। ट्रांसप्लांट कि आस क्षीण होती जा रही थी। दीदी की हालत ख़राब होती जा रही थी। क्रमश...

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

कड़वी हो गयी चीनी

यदि आप किसी ऎसे मित्र के यहां बैठे हैं जो बेरोजगार है या आर्थिक रूप से कमजोर है। तो, प्लीज चाय का इंतजार मत कीजिए क्योंकि हो सकता है कि वह आपको चाय न पिला सके। आप चाय के इंतजार में बैठे रहेंगे, वह दो मिनट; बस दो मिनट कहता रहेगा। परंतु चाय नहीं आयेगी। ऎसा नहीं है कि वह आपको चाय नहीं पिलाना चाहता है। बलि्क उसे अपनी मजबूरी के कारण ऎसा बयान देना पड़ रहा है। आर्थिक रूप से कमजोर आपके दूसरे मित्र के यहां भी कुछ इसी तरह की कहानी दुहरायी जायेगी। शायद आपने ध्यान से उस समाचार को नहीं पढ़ा है जिसमें चीनी के दाम में उछाल की बात कही गयी है। जी हां, अब हर घर की चाय कड़वी हो गयी है। बिहार में चीनी के दाम में एकाएक चार रुपये का उछाल आ गया है। जाहिर है कि देश के दूसरे प्रांतों में भी दाम बढ़ गये हैं। एक चाय ही तो है, जिसे गरीब शराब की तरह चुस्की लेकर पीत है। कोई कितना गरीब क्यों न हो, उसके यहां चाय की व्यवस्था जरूर रहती है। गरीब चाय पिलाकर ही अपने दोस्तों का स्वागत करते हैं। चाय दुकानदार यह समाचार सुनकर औधे मुंह गिरे हैं क्योंकि चीनी की कीमत बढ़ने के बाद भी उसे चाय की अधिक दर देने के लिए कोई तैयार नहीं है। हरेक ग्राहक से चायवाले की अनबन हो जा रही है। दुकानदार अब चौबीस के बदले अठाईस रुपये चीनी बेच रहे हैं। चीनी थोड़ा साफ है तो तीस रुपये बेचने में हिचक नहीं है। ऎसे में कमजोर तबके के घरों का बजट पूरी तरह गड़बड़ा गया है। आमदनी वही है, खर्च बढ़ता जा रहा है। यह तकलीफ कोई किससे कहे? मंदी की मार से पहले ही कई कंपनियों ने इंक्रिमेंट देना बंद कर दिया है। हालांकि महंगी हो रही चीनी का असर कहीं चुनाव पर न पड़ जाये और मतदाता कहीं वोट देने में कंजूसी न कर दें। सरकार इस मुद्दे पर चौकस है। सितंबर तक 30 लाख टन कच्ची चीनी का आयात होने की संभावना है।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

बास सावधान! चमचों से बचिए

बास सावधान! चमचागीरी करनेवालों को पहचानिये और उनसे बचिए, ये चमचे आपकी कब्र खोदने की तैयारी कर रहे हैं। जी हां, यह सच है पर आप इस बात पर यकीन नहीं करेंगे। आपके दफ्तर से जाते ही ये चमचे आपको भी गाली पढ़ने लगते हैं। इस बात को कोई आपसे कहेगा भी नहीं क्योंकि सभी इस चमचे से डरते हैं। आजकल कमोवेश लगभग सभी दफ्तरों में बास को चमचागीरी करने वाले लोग अधिक पसंद हैं। इनके काम में भी बास को कोई त्रुटि नजर नहीं आती है। आप यकीन करें या न करें परंतु चमचागीरी से फायदा ही फायदा है। एक तो आपको बास के करीब होने का अवसर प्राप्त होता है। वहीं अन्य कर्मचारियों से काम भी कम करना पड़ना है। दफ्तर के सभी कर्मचारी इस चमचे से डरते हैं कि कहीं वह बास से शिकायत न कर दे। यह सोचकर कोई उलझने का प्रयास भी नहीं करेगा। चमचों को प्रोमोशन भी समय पर मिलता है। बास की चमचागीरी जो उसने की है, कुछ तो फल मिलना ही चाहिए। चमचा बनने के लिए विद्वान होने की जरूरत नहीं है। बस भांप लीजिए कि बास की पसंद क्या है, वह क्या सुनना चाहते हैं? यदि उन्हें दबंग आदमी पसंद है तो किसी साथी को थोड़ा अपमानित कर दें, इसके पश्चात उसका गाली से स्वागत कर दें। यह भी उसे धमकी दे दें कि आपको नौकरी की परवाह नहीं है। यदि आप संबंधित संस्थान में नौकरी कर रहे हैं तो मेहरबानी कर रहे है। वर्ना आपके इर्द-गिर्द तो नौकरियों का भंडार है। इस मंदी में नौकरी गयी तो बिजनेस करेंगे। किसी न किसी तरह बास के पास यह बात तो पहुंच ही जायेगी क्योंकि कई और चमचे लाइन में जो हैं। बास सोचेंगे कि आपके जैसे दबंग आदमी के बिना दफ्तर का काम कैसे चलेगा? फिर तो आप अपने मकसद में कामयाब हो गये। बास के जाते ही जी भर कर गाली पढि़ये। अगले दिन दफ्तर आते ही किसी साथी के खिलाफ बास का कान फूंकना शुरू कर दीजिए। हर दफ्तर में बास के करीब ऎसे ही लोगों की जमघट लगी रहती है। ऎसे में ये चमचे चमचागीरी के साथ बास का कब्र भी खोदने लगते हैं क्योंकि बास ने उसे एक प्रोमोशन तो दे दिया, दूसरा देने के मूड में नहीं हैं। ऎसे में ये चमचे क्रब खोदते-खोदते बास को खोखला कर देते हैं। नतीजन, या तो बास का तबादला हो जाता है या फिर बास इस कदर गिर जाते हैं कि उन्हें संभलने में काफी वक्त लग जाता है। ऎसे चमचों की देखादेखी कई अन्य कर्मचारी भी सोचते हैं कि काश! उन्हें भी यह सौभाग्य प्राप्त होता। परंतु इससे बचने की जरूरत है क्योंकि इस तरह के चमचों की तलवार का स्वाद चख चुके कोई दूसरे बास से यदि सामना हुआ तो वह तुरंत बाहर का रास्ता दिखा देगा। वहीं आपकी प्रतिभा आपके साथ हर वक्त रहेगी। उसे प्रतिभा को जगाए रहिए। यही हमेशा आपका साथ देगा। बास को भी चाहिए कि काम के साथ हर कर्मचारी को बुलाकर उससे बात करे ताकि उसे सही हालात के बारे में जानकारी मिले।

रविवार, 12 अप्रैल 2009

...तो कैसे होगा नारी का विकास

हम चांद पर पहुंच गये हैं। दुनिया के कई देशों के साइंटिस्ट दूसरे ग्रह पर जीवन का पता लगाने में जुटे हुए हैं। परंतु नारी के प्रति पुरुष के विचार आज भी नहीं बदले हैं। नारी सशक्तीकरण की बात हर जगह होती है। नौकरी समेत हर जगहों पर उचित स्थान देने की चर्चा भी होती है। शायद ही कोई ऎसी गोष्ठी होगी, जहां नारी सम्मान की बात नहीं की जाती हो। परंतु हकीकत में पुरुष के विचार ठीक इसके विपरीत है। पुरुष कभी भी नारी को बराबर का दर्जा नहीं देता। एक घर में यदि पुरुष और स्त्री दोनों नौकरी करते हैं तो घर आने पर बच्चे को संभालने से लेकर पति के लिए खाना बनाने तक उसकी ड्यूटी होती है। इतना ही नहीं पति की सेवा और अंत में बिस्तर पर भी वह पति का साथ निभाती है। बचपन से उसे पति भगवान होता है, का पाठ पढ़ाया जाता है। इसी का फायदा पुरुष उठाता है। बचपन से युवा अवस्था की ऒर बढ़ते कदम के साथ ही शुरू हो जाता है-नारी का शोषण। हर जगह उसे पुरुष निहारता रहता है। कोई उसका आंख से बलात्कार करता है तो कोई दिमाग से। कहीं कोई भाई बनकर उसे गंदी नजरों से देखता है तो कहीं कोई मित्र बनकर। घर के आंगन से निकलकर जब वह ससुराल की दहलीज पर पांव रखती है तो यहां के सभी को खुश रखना उसकी जिम्मेदारी होती है। यहां तक कि पति के मां-बाप को वह अपना मां-बाप मान लेती है। परंतु उसका पति कभी भी उसके पिता-माता को अपना नहीं मानता। कुछ साल पहले पटना में बीएन कालेज के प्रोफेसर मटुकनाथ ने तो अपनी शिष्या जुली को कुछ इस तरह के पाठ पढ़ाये कि बिना शादी ही जुली उनके साथ रहने लगी। जुली की उम्र प्रोफेसर की आधी है। दोनों देखने में बाप-बेटी लगते हैं। प्रोफेसर का एक बेटा भी है जो नौकरी करता है। यदि उसकी शादी प्रोफेसर ने की होती तो जुली की उम्र की बहू घर में होती। भोली-भाली जुली अपनी इज्जत प्रोफेसर के चरणों में समर्पित कर चुकी है। जुली का भविष्य क्या होगा? इसकी चिंता न समाज को है न ही प्रोफेसर को। प्रोफेसर और जुली की कहानी समाज के मुंह पर एक तमाचा है। पुरुष की विकृत मानसिकता का ज्वलंत उदाहरण है। पत्नी के परिवार को पुरुष किस तरह नजरअंदाज करता है। इसके लिये एक दूसरा उदाहरण-देश के रेलमंत्री और राजद के सुप्रीमो लालू प्रसाद बिहार के रहने वाले हैं। इनकी पत्नी राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। इसके बावजूद लालू प्रसाद के गांव फुलवरिया और उनका ससुराल सलारकलां में काफी फर्क है। दोनों के बीच सिर्फ कुछ किलोमीटर का ही फासला है। परंतु विकास में कई दशक का। लालू के गांव में रेफरल अस्पताल, रेलवे स्टेशन, बड़े-बड़े पक्के मकान, रजिस्ट्री आफिस, हैलीपैड, बैंक, विद्युत आफिस; इस गांव को यदि अमेरिका के राष्ट्रपति ऒबामा देख लें तो उन्हें अपना देश भारत से पीछे नजर आयेगा। वहीं राबड़ी देवी का मैके और लालू प्रसाद का ससुराल आज भी अन्य गांवों की तरह पिछड़ा हुआ है। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुरुष के विचार नारी के प्रति कैसा है? इस तरह के उदाहरण हर घर में देखने को मिलते हैं। वास्तव में इस सोच को बदले बिना नारी का विकास नहीं हो सकता।

फिल्म स्टार संजय दत्त की सभा में लाठीचार्ज

अभिनेता से नेता बनने की कोशिश में जुटे संजय दत्त की सभा में पहुंचने वाले लोग उनके भाषण से ज्यादा उन्हें देखना चाहते हैं। यही कारण है कि संजय की चुनावी सभा में उनके चाहनेवालों को लाठी का स्वाद चखना पड़ रहा है। वे जहां भी चुनावी सभा में पहुंच रहे हैं। भीड़ उनकी झलक पाने के लिए सुरक्षI घेरा तोड़ उन तक पहुंचना चाहती है। नतीजन पु्लिस को कई जगहों पर लाठीचार्ज करनी पड़ी, इसमें दर्जनों लोग घायल भी हो गये। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, लोजपा के सुप्रीमो रामविलास पासवान और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव की चुनावी तालमेल के बाद अमर सिंह के साथ संजय दत्त भी बिहार दौरे पर आये। सुप्रीम कोर्ट ने जब संजय दत्त को चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं दी तो सपा के मुलायम सिंह ने उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया। संजय दत्त लगातार पार्टी की ऒर से चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं। इसी क्रम में वे दो दिनों से बिहार के दौरे पर हैं, उनके साथ अमर सिंह भी पहुंचे। संजय की चुनावी सभा बगहा, मोतिहारी सहित कई अन्य जिले, इसके पश्चात 12 अप्रैल को औरंगाबाद में हुआ। सभी जगहों पर भीड़ उन्हें करीब से देखना चाहती थी। उनकी सुरक्षI के लिए पुलिस को हल्की लाठियां भांजनी पड़ीं। यहां दिये गये भाषण में संजय ने कहा कि यहां के मुख्यमंत्री गांधीगीरी से डरते हैं। उन्होंने कहा कि जो प्यार और सम्मान उन्हें बिहार में मिला, वह कहीं नहीं मिला। यहां की जनता को सिर्फ यही चिंता सता रही थी कि वह अपने हीरो से कैसे मिले। इधर के कुछ सालों से चुनाव में फिल्मी हीरो से प्रचार कराने के लिए नेता कुछ विशेष इच्छुक रहते हैं । इसकी वजह है कि हीरो को देखने काफी संख्या में लोग इक्ट्ठे हो जाते हैं। इसका फायदा भी संबंधित पार्टी को होता है। पार्टी के लोग यह प्रचार करते हैं कि उनके समर्थन में हवा बह रही है। कुछ भी हो हर तरह से उल्लू जनता ही बनती है। जनता हर चुनाव में यह फैसला करती है कि वह सोच-समझकर मतदान करेगी। परंतु हर चुनाव बाद वह यही कहती है कि इस बार फिर गलती हो गयी।

जार्ज फर्नांडीस की जीत दांव पर

लोकसभा का चुनाव भारत में किसी महापर्व से कम नहीं है। हर घर में, हर चौक-चौराहे पर बस चुनाव की ही चर्चा है कि कौन जीतेगा या कौन हारेगा? मुजफ्फरपुर सीट पर 23 अप्रैल को चुनाव होना है। यहां की सीट पर पूरे देश की नजर है। यहां से जार्ज फर्नांडीस निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। जदयू पार्टी ने जार्ज को यह कहकर टिकट नहीं दिया कि वे बीमार चल रहे हैं। ये मतदाताऒ से जनसंपर्क नहीं कर पायेंगे। इस बात से नाराज जार्ज ने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। इस बार के चुनाव में माना जा रहा है कि काफी कम वोटों से जीत-हार का फैसला होगा। मुजफ्फरपुर में इस बार 1338000 मतदाता वोट डालेंगे। इसमें 58000 के करीब ऎसे मतदाता हैं जो पहली बार वोट डालेंगे। पाला बदलकर जदयू में शामिल कैप्टन जय नारायण निषाद मुजफ्फरपुर से भाग्य आजमा रहे हैं। भगवान लाल सहनी लोजपा उम्मीदवार हैं। इन्हें अपनी जीत का पूरा भरोसा है। बसपा प्रत्याशी के रूप में समीर कुमार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। मुजफ्फरपुर के विधायक विजेन्द्र चौधरी भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मुकाबले को तैयार हैं। कांग्रेस ने विनीता विजय को टिकट दिया है। ये भी सभी से मुकाबले के लिए मैदान में उतर गयी हैं। सब अपनी-अपनी जीत का दावा करते हैं परंतु यह सर्वविदित है कि जीतेगा कोई एक ही। हां, लड़ाई में पहलवान एक-दूसरे का वोट जरूर काटेंगे। माना जा रहा है कि निषाद और सहनी एक-दूसरे का वोट काटेंगे। ऎसे में फायदा किसी तीसरे को होगा। विजेन्द्र चौधरी के समर्थन में भी भारी संख्या में वैश्य हैं। वहीं जार्ज को सहानुभूति वोट मिलना तय है। यहां की जनता इस बात से नाराज है कि बूढ़े जार्ज को टिकट क्यों नहीं मिला? उन्हें टिकट न देने की चाल कहीं जदयू को भारी न पड़ जाए। हालांकि अभी तक यह नहीं कहा जा सकता है कि यहां से कौन जीतेगा क्योंकि मतदाताऒं ने पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। सहानुभूति वोट के बावजूद जार्ज को जीतना आसान नहीं होगा। जार्ज भी यह समझ रहे हैं कि उनकी जीत स्पष्ट नहीं है। फिलहाल सभी प्रत्याशी युद्ध के लिए चुनावी मैदान में अपने-अपने मुद्दे के साथ जमे हुए हैं।

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

न्याय की आस में नम आंखें

पेशा से नेतागिरी, दिल से साधु, विचार से संत; दूसरे के दु:ख से द्रवित होनेवाला सीतामढ़ी के मनोज कुमार को एक दशक बाद भी इंसाफ नहीं मिल सका है। उनकी आंखें इंसाफ के इंतजार में आज भी नम हैं। यह मामला 11 अगस्त 1998 का है। बिहार के पूर्व मंत्री रामनाथ ठाकुर, सीतामढ़ी के पूर्व विधायक नवल किशोर राय के साथ जदयू के नेता मनोज कुमार यहां के समाहरणालय में शांतिपूर्वक जुलूस इसके पश्चात सभा करने के लिए इक्ट्ठे हुए थे। वे बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत की मांग कर रहे थे। मालूम हो कि सीतामढ़ी एक बाढ़ग्रस्त इलाका है। यहां के अधिकतर भू-भाग बाढ़ में डूब जाते हैं। जुलूस में काफी संख्या में बाढ़ पीड़ित भी इक्ट्ठे हुए थे। इसी क्रम में तत्कालीन एसपी परेश सक्सेना ने भीड़ में अपनी गाड़ी घुसा दी। भीड़ में से गाड़ी निकालने के लिए पुलिसकर्मियों ने लाठियां भी भांजीं। इससे प्रदर्शनकारी आक्रोशित हो गये। मनोज कुमार ने समझाया कि एसपी के खिलाफ वे शिकायत करेंगे। इसी बीच एक महिला को चोट लग गयी। उसके सिर से निरंतर खून बह रहा था। उसने चिल्लाते हुए कहा कि उसे पुलिसकर्मियों ने मारा है। हजारों की संख्या में मौजूद प्रदर्शनकारी आक्रोशित हो गये। मनोज कुमार ने फिर समझाया। उनकी बात का असर यह हुआ कि हो-हल्ला कुछ कम हो गया। इसी बीच किसी शरारती तत्व ने समाहरणालय पर रोड़े फेंक दिये जिससे एक-दो पुलिसकर्मी को हल्की चोटें आयीं। समाहरणालय में मौजूद एक तथाकथित पत्रकार सत्येन्द्र सिंह ने कहा कि एसपी साहेब भीड़ समाहरणालय में प्रवेश कर गयी तो उससे निबटना कठिन होगा। इसपर वहां मौजूद डीएम ने उसे डांट दिया। तभी एक-दो और रोड़ा आकर गिरा। एसपी परेश सक्सेना भी आपे से बाहर हो गये थे। उन्होंने पुलिसकर्मियों को गोली चलाने का हुक्म दे दिया। देखते-देखते पुलिसकर्मियों ने गोली चलानी शुरू कर दी। इसमें पूर्व विधायक रामचरित्र राय, एक महिला सहित पांच लोग मारे गये। सैकड़ों घायल हो गये। एसपी ने मनोज कुमार पर यह आरोप मढ़ा कि मनोज कुमार ने भीड़ को उकसाया है। विधायक नवल किशोर राय सहित कई नेता हालात को देखते हुए भांपते हुए भाग खड़े हुए। मनोज चूंकि निर्दोष थे, अत: इन्होंने भागना मुनासिब नहीं समझा। मनोज कुमार को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और थाने में न सिर्फ उनकी पिटाई की बलि्क उनकी दाढ़ी भी जबरन काट दी गयी। इस सदमे को उनके पिता बर्दाश्त नहीं कर सके और असमय काल के गाल में समा गये। पिता को मुखागि्न दिलाने की बात सुनकर पुलिस के होश उड़ गये क्योंकि श्री कुमार के चेहरे के घाव हरे थे, जिसे देख दंगा भड़क सकता था। पुलिस ने भीड़ से छिपाकर मनोज को पिता को अगि्न देने के लिए पेश किया। बाद में मनोज जमानत पर रिहा हो गये। इसके पश्चात मनोज कुमार ने तत्कालीन डीएम रामनंदन प्रसाद, एसपी परेश सक्सेना सहित कई पुलिसकर्मियों पर अदालत में मामला दर्ज कराया। यह मामला आज भी अदालत में लटका हुआ है। तारीख पर तारीख मिलती रही। परंतु न्याय नहीं मिला। तत्कालीन डीएम तो सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वहीं परेश सक्सेना डीआईजी की कुर्सी पर तैनात हो चुके हैं। नवल किशोर राय बाद में विधायक से सांसद बन गये। परंतु उन्होंने मनोज कुमार की मदद नहीं की। इसके ठीक विपरीत उन्होंने श्री सक्सेना से कई बार बात की परंतु इस मुद्दे को गौण रखा। जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार नागेन्द सिंह मानते हैं कि परेश सक्सेना की हठधर्मिता ने बेगुनाह लोगों की जान ली। पुलिस ने सीतामढ़ी में दूसरा जलियांवाला कांड को जन्म दिया, यहां की जनता यही कहती है।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

बिहार की बेटी पर लखनऊ में जुल्म

बिहार के मुजफ्फरपुर की बेटी अनामिका पर उत्तरप्रदेश के लखनऊ में पिछले बारह साल से जुल्म हो रहा है। जुल्म की वजह है एक मां। मां का प्यार कभी-कभी इतना अंधा हो जाता है कि वह सही-गलत में निर्णय नहीं कर पाती है। यह सच्ची कहानी बादशाह नगर का रहनेवाला एक ऎसे परिवार की है, जहां मां ने ही अपनी बेटी का घर नहीं बसने दिया। शादी के बाद बेटी घर से विदा हुई, ससुराल में उसने चाहा कि उसका पति उसके वश में रहे। मां ने यही सिखला जो रखा था। शादी के बाद उसने जैसे-तैसे कुछ माह काटे। फिर मां ने उसे ससुराल नहीं रहने दिया। इस दौरान उसने एक बेटे को जन्म दिया। इसके पश्चात बेटी अपनी मां के साथ रहने लगी। उसके पति ने उसे मनाने की बहुत कोशिश की, मगर मां के वश में रह रही बेटी ने नहीं माना। इस घर के इकलौते बेटे मनीष की शादी 1996 में बिहार के मुजफ्फरपुर में हुई। यह शादी उसकी पसंद से हुई, देखते-देखते मनीष की पत्नी अनामिका ने दो बच्चियों को जन्म दिया। मनीष का ससुराल धनाढ़य नहीं था। मनीष से ज्यादा उसकी मां को यह चिंता सता रही थी कि बहू अपने मैके से मोटी रकम लेकर क्यों नहीं आयी ? इधर ससुराल छोड़ मैके में रह रही उसकी अपनी बेटी ने मां का कान फूंकना शुरू कर दिया। उसे दो साल बाद बहू खराब दिखने लगी। बहू की शिकायत वह हमेशा बेटे से करती थी। आजिज बेटे ने बहू को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू किया। बहू के परिवार वाले हाथ-पैर जोड़कर अपनी उन गलतियों के लिए माफी मांगते थे, जो उन्होंने नहीं किया था। इसी क्रम में बेटी के कहने पर सास ने बहू को अलग खाना बनाकर खाने को कहा। उसे अपने पति और बच्चों का खाना बनाने की इजाजत नहीं थी। इस जुल्म से अनामिका खोखली होती चली गयी। अनामिका के घर वालों को जब इस बात का पता चला तो वे उसे वर्ष 2001 में घर ले आये। वह मैके आकर रहने लगी। दो माह बाद ही उसे पता चला कि उसकी सास की तबीयत बिगड़ गयी है तो वह भागते हुए ससुराल चली गयी। दो-चार माह ठीक गुजरा। फिर जुल्म शुरू हो गया। जुल्म की हद तब और बढ़ गयी जब सास ने अनामिका को दोनों बेटियों से अलग कर मैके भिजवा दिया। हर साल तो कभी छह माह पर अनामिका को मैके भेज दिया जाता था। सारी परेशानी की वजह सिर्फ वह बेटी, बहन थी जो अपने पति से लड़कर मैके रह रही थी। 2009 में भी अनामिका मुजफ्फरपुर में अपने मैके में रह रही है। उसके पास न उसकी बेटियां हैं न ही पति। अनामिका अपने ससुराल वालों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई भी नहीं चाहती है। वह आज भी इस इंतजार में है कि उसका पति उसे लेने आये । देर से ही सही उसका पति लेने भी आयेगा। फिर कितना दिन बाद उसपर जुल्म होना शुरू होगा, यह कहना मुशि्कल है। हर तीस में एक घर अनामिका के ससुराल की तरह ही है। सास यह भूल जाती है कि कभी वह भी बहू थी। बेटी जब ससुराल छोड़ मैके में बस जाये तो उस घर की हालत नारकीय हो जाती है। अनामिका की जिंदगी कैसे कटेगी ? कब तक अनामिका प्रताड़ित होती रहेगी। यह सवाल समाज के हर व्यकि्त के लिए है जो इस तरह की हरकतों में शामिल है ?

गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

राजनीति में सबकुछ जायज

कहते हैं कि राजनीति में सबकुछ जायज है। इतिहास के पन्ने भी इस बात के सबूत हैं। सत्ता सुख के लिए पिता ने पुत्र को तो बेटे ने पिता तक को नहीं छोड़ा। ऎसे समय जब लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है, हर पार्टी अपने-अपने मुद्दे लेकर चुनावी मैदान में उतर चुकी है। कुछ ही दिन पहले उत्तरप्रदेश के पीलीभीत में भाजपा के वरुण गांधी ने उग्र भाषण दिये। यह किसी को खुश तो किसी को नाराज करने वाला भाषण था। एक नेता के तौर पर उनका भाषण पूरी तरह आपत्तिजनक था। हालांकि अगले दिन ही वरुण ने इस बात पर अपनी सफाई देते हुए कहा कि सीडी से छेड़छाड़ कर भाषण के शब्द को उग्र बनाया गया है। तबतक यह आग पूरे भारत में फैल चुकी थी। शुरू में जब चुनाव आयोग ने इस बात पर वरुण को नोटिस जारी की तो भाजपा ने हाथ खींचते हुए कहा कि यह वरुण का अपना विचार है। इससे पार्टी को कोई लेना-देना नहीं है। देखते-देखते वरुण के खिलाफ इस मामले में मामला दर्ज कर दिया गया। बाद में वरुण पर रासुका भी लगा दिया गया जिससे उन्हें जेल जाना पड़ा। अब तक वरुण को इस मामले में जमानत नहीं मिल सकी है। बाद में भाजपा को यह अहसास हुआ कि यह तो बड़ा मुद्दा बन सकता है। तब भाजपा ने यह बयान जारी किया कि वह वरुण गांधी के साथ है। इसके पश्चात भाजपा के हर बड़े नेता ने अपने हरेक भाषण में वरुण गांधी की चर्चा अवश्य की। यूपीए सरकार में शामिल राजद के सुप्रीमो लालू प्रसाद ने तो वरुण के बारे में अपने भाषण में यहां तक कह दिया कि यदि वे गृह मंत्री होते तो वरुण के छाती पर बुल्डोजर चढ़वा देते। मीडिया में जब यह खबर आयी तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने कानून का बुल्डोजर चढ़वाने की बात कही थी। आज राजनीति के खेल में हर नेता वरुण गांधी पर कुछ न कुछ अवश्य बयान दे रहा है। भाजपा के पास इस चुनाव में कोई बड़ा मुद्दा नहीं था क्योंकि राम मंदिर का मामला सुनते-सुनते लोग उब चुके थे। ऎसे में वरुण का भाषण उनके लिए एक मुद्दा से कम नहीं है। हालांकि वह इस बात को भाजपा खुलकर नहीं मान रही है। भाजपा के नेता अरुण जेटली का कहना है कि विपक्ष इसे मुद्दा बना रहा है। वरुण गांधी से मिलने उनकी चचेरी बहन प्रियंका गांधी जेल में गयी थीं। मीडिया में जब यह बात सामने आयी तो उन्होंने सफाई दी कि वे अपने भाई से मिलने गयी थीं। हालांकि उन्होंने वरुण को ठीक से गीता पढ़ने की सलाह भी दे डाली थी। यह तो तय है कि वरुण का मामला इतना से ही खत्म होनेवाला नहीं है। यदि वरुण को जमानत मिल भी जाती है तो भी भाजपा के लिए यह एक संजीवनी से कम नहीं है।

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

एमपी नहीं बन सकेंगे कई दिग्गज

पन्द्रहवीं लोकसभा चुनाव में कई ऎसे दिग्गज सांसद नहीं बन सकेंगे जो पिछली दफा लोस के सदस्य थे। सिवान के सांसद मो. शहाबुद्दीन, मधेपूरा के सांसद पप्पू यादव, विधायक देवनाथ यादव के चुनाव लड़ने की याचिका को अदालत पहले ही खारिज कर चुकी है। इसी क्रम में पटना के हाईकोर्ट ने बुधवार को सांसद सूरजभान सिंह की याचिका को खारिज कर दिया। नतीजन अब ये भी चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। अभिनेता संजय दत्त के लखनऊ से चुनाव लड़ने की अपील को सुप्रीम कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है। शहाबुद्दीन, पप्पू यादव, सूरजभान को पहले से ही इस बात का अंदेशा था कि अदालत उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा सकती है। इसीलिए तीनों ने अपनी पत्नी को चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी कर ली थी। सिवान के सांसद शहाबुद्दीन पर हत्या समेत कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। वे लंबे समय से सिवान जेल में सजा काट रहे हैं। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद सिवान सीट खोना नहीं चाहते थे। इसीलिए उन्होंने शहाबुद्दीन की पत्नी हिना को यहां से टिकट दे दिया। लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान भी सूरजभान को टिकट से वंचित नहीं कर सकते थे। सूरजभान के कहने पर पासवान ने उनकी पत्नी वीणा देवी को नवादा से टिकट दिया। पप्पू ने भी अपनी पत्नी रंजीता रंजन को चुनाव मैदान में उतार दिया है। सत्ता में एक बार आने के बाद कोई नेता इससे वंचित नहीं रहना चाहता है, चाहे इसके लिये उसे कोई भी हथकंडा क्यों न अपनाना पड़े? तीनों सांसदों को इस बात का डर है कि यदि वे पूरी तरह से सत्ता से विमुख हो जायेंगे तो इन्हें सलाखों के पीछे से निकालने में कौन मदद करेगा? क्योंकि समय-समय पर इन्हें अदालत से बुलावा आता है। ऎसे में यदि पत्नी के हाथ में 'पावर' है तो फिर जय-जय है। कई साल पहले लालू प्रसाद जब चारा घोटाले में फंसे थे और उन्हें सरेंडर करना था तो उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया था। कुर्सी पर तो राबड़ी देवी थी मगर असली शासक खुद लालू प्रसाद ही थे।

जांच घर ने स्वस्थ को बनाया रोगी

मुजफ्फरपुर के दो जांच घरों ने एक स्वस्थ बालक को अस्वस्थ बना दिया। रिपोर्ट के आधार पर चिकित्सक ने कहा कि बालक के खून में इंफेक्शन है, उसका एएसऒ (टीटर) 200 के बदले 600 हो गया है। उन्होंने बालक को ताजिंदगी हर माह में पेनीडोर इंफेक्शन लेने की सलाह दी। इतना ही नहीं उसे नमक, चीनी, ठंडा चीजें न खाने की सलाह दी। परिजनों को विश्वास नहीं हुआ, उनलोगों ने क्रास चेक कराया। दूसरी रिपोर्ट भी चिंताजनक थी। परिजन बालक को आनन-फानन में लेकर पटना भागे, वहां की जांच रिपोर्ट और चिकित्सक के अनुसार बालक पूरी तरह से स्वस्थ है, गैस के चलते उसके चेस्ट में दर्द हुआ था। मामला कुछ यूं है-मुजफ्फरपुर के रसूलपुर जिलानी का रहनेवाला एक परिवार के आठ वर्षीय बालक ईशान श्रीवास्तव के चेस्ट में हल्का दर्द हुआ। परिजन उसे स्थानीय चिकित्सक डा। सुमन कुमार के यहां ले गये। चिकित्सक ने ब्लड टेस्ट कराने के लिए लिखा। जांच रिपोर्ट के अनुसार ब्लड में जबरदस्त इंफेक्शन था। रिपोर्ट देखकर परिजनों के होश उड़ गये। उन्होंने अपने संतोष के लिए दुबारा ब्लड टेस्ट कराया, इसके पश्चात चिकित्सक के पास पहुंचे। उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि दोबारा जांच की कोई जरूरत नहीं थी। चिकित्सक ने बालक को ताजिंदगी 21-21 दिनों पर पेनीडोर इंजेक्शन दिलवाने के लिए कहा। साथ ही गंभीर रोगी वाला भोजन देने की सलाह दी। चिकित्सक ने कहा कि इंजेक्शन न दिलवाने पर हार्ट का वल्ब व किडनी भी डैमेज हो सकता है। उनकी बात सुनकर परिजन नर्वस हो गये और पहला इंजेक्शन दिलवा दिये। इसी क्रम में सीतामढ़ी के डा. एम. ठाकुर से परिजनों ने बात की। उन्होंने रिपोर्ट के आधार पर इलाज को सही बताया। डा. राजीव आनंद से जब इस संबंध में बात हुई तो उन्होंने पटना में जाकर जांच की सलाह दी। परिजनों ने पटना में डा. एके. पांडेय से बालक को दिखाया। उन्होंने चेक करते ही कह दिया कि बालक को कोई बीमारी नहीं है। चेस्ट में दर्द गैस के चलते हो रहा है। परिजनों ने जब यह कहा कि मुजफ्फरपुर के दो पैथोलाजिकल लेबोरेटरी में ब्लड टेस्ट में इंफेक्शन निकला है तो चिकित्सक ने कहा कि वहां की जांच विधि काफी पुरानी है। उन्होंने कहा कि पूरे उत्तर बिहार से प्रतिदिन दर्जनों मरीज ऎसे आते हैं जो गलत जांच के चलते खुद को असाध्य रोग से ग्रसित मान लेते हैं। चिकित्सक ने परिजनों की मनोदशा को देखते हुए छाती का एक्सरे और कुछ ब्लड टेस्ट करवाने के लिए लिख दिया। बाद में सेन लैब में डिजिटल विधि से ब्लड टेस्ट हुआ, जिसमें सबकुछ नार्मल निकला। चौधरी डिजिटल इमेजिंग एंड रिसर्च सेन्टर में एक्सरे कराया गया। चिकित्सक ने जांच रिपोर्ट देखने के बाद कहा कि बालक को कोई बीमारी नहीं है। उन्होंने बालक को कोई दवा नहीं लिखी। उनसे पूछने पर कि आखिर जांच रिपोर्ट में इतना अंतर कैसे? उन्होंने कहा कि आप भी वहां अपनी जांच करवा कर देखें, इसी रोग से ग्रसित हो जायेंगे।
जांच में भिन्नता इस प्रकार है-मुजफ्फरपुर : पोपुलर पैथोलाजिकल लेबोरेटरी एंड एक्सरे की जांच रिपोर्ट डब्लूबीसी काउंट : 11800
एएसऒ टीटर : 600
मुजफ्फरपुर : नवीन डाइग्नोसि्टक एंड रिसर्च लेबोरेटरीडब्लूबीसी काउंट : 10450 एएसऒ
टीटर : 400
पटना :
सेन लैब डाइग्नोसिस डब्लूबीसी काउंट : नार्मलएएसऒ टीटर : 147

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

जरनैल के जूते से गृह मंत्री सन्न

कुछ ही माह पूर्व इराक के पत्रकार मुंतदार अल जैदी ने अमेरिका के पूर्व प्रेसिडेंट जार्ज बुश पर जूते फेंककर विरोध जताया था। इस बात की चर्चा दुनिया भर के देशों में हुई। अधिकतर जगहों पर इस बात की आलोचना की गयी। यह बात अभी स्मरण से निकली भी नहीं थी कि नई दिल्ली में एक पत्रकार ने भारत के गृह मंत्री पी. चिदम्बरम पर जूते फेंक अपना विरोध जताया। श्री चिदम्बरम इसके लिए कतई तैयार नहीं थे। वे चंद मिनट के लिए सन्न रह गये। मामला कुछ यूं हुआ-7 अप्रैल को आतंकवाद से देश को बचाने के लिए नई दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इसमें समाचार पत्र सहित कई टेलीविजन चैनलों के पत्रकार मौजूद थे। दैनिक जागरण अखबार के विशेष संवाददाता जरनैल सिंह भी मौजूद थे। वे सिख विरोधी दंगों में कांग्रेसी नेता जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट देने से आक्रोशित थे। मालूम हो कि 1984 के सिख दंगों में सैकड़ों सिख मारे गये थे। जरनैल सिंह इस संबंध में कई सवाल दागे, परंतु उन्हें चिदम्बरम से संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। इससे नाराज होकर उन्होंने भी मुंतदार अल जैदी वाला हथकंडा अपनाया। इस घटना के बाद थोड़ी देर के लिए भगदड़ मच गयी। जरनैल सिंह को हिरासत में ले लिया गया। पूरे देश में यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गयी। भारत के भाजपा, सपा सहित अन्य पार्टियां अपनी-अपनी राजनीति शुरू कर दी। हालत बिगड़ते देख वित्तमंत्री ने पार्टी की संक्षिप्त बैठक कर तुरंत बयान जारी किया कि उन्होंने जरनैल सिंह को माफ कर दिया। उनपर कोई कार्रवाई नहीं होगी। जरनैल सिंह को आनन-फानन में छो़ड़ दिया गया। बाद में श्री सिंह ने भी अफसोस जताते हुए कहा कि उनका इरादा हीरो बनना नहीं बलि्क इस समस्या की तरफ सरकार का ध्यान खींचना था। हालांकि इस बात की अधिकतर पत्रकारों ने निंदा की है। सभी का कहना है कि पत्रकार के पास तो सबसे बड़ा हथियार कलम होता है। ऎसे में उन्हें इस तरह की ऒछी हरकत नहीं करनी चाहिए। इधर, दैनिक जागरण संस्थान ने न सिर्फ इस बात की आलोचना कि बलि्क जरनैल सिंह पर अनुशासनात्मक कार्रवाई भी कर रहा है।

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

पूर्व मुख्यमंत्री के भाषण पर हो-हल्ला

राजद सुप्रीमो व रेलमंत्री लालू प्रसाद की परिपक्वता की तारीफ उनके दुश्मन भी करते हैं। बड़े-बड़े दिग्गज नेता मानते हैं कि जिस चतुराई से लालू ने रेलवे को घाटे से उबारा, वह कोई दूसरा नहीं कर सकता था। लालू ने हर साल रेलवे बजट को फायदे में ही दिखाया। इसके ठीक विपरीत उनकी पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी एक सीधी-साधी और घरेलू महिला हैं। पहली बार जब उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली तो वे पत्रकारों के सामने ठीक से बोल भी नहीं पाती थीं। लालू संग रहने के बावजूद राबड़ी देवी में बहुत बदलाव नहीं आया, वे परिपक्व लीडर की तरह कभी पेश नहीं आयीं। उनके बयान से विपक्ष क्या मतलब निकालेगा? इससे भी उन्हें कोई मतलब नहीं। पूरे भारत में जब चुनावी उत्सव अपने रंग में आ चुका है। राबड़ी देवी भी प्रचार के लिए निकल पड़ी हैं। इसी क्रम में उन्होंने छपरा के अमनौर प्रखंड के रायपुरा हाईस्कूल की चुनावी सभा में कहा कि ' जदयू प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह नीतीश कुमार का साला है, हम खुले आम बोलेंगे! और नीतीश कुमार ललन सिंह का साला है। दोनों में गोलावट है-गोलावट' इन लोगों ने कोर्ट व मीडिया को भी अपनी मुट्ठी में कर लिया है। इस भाषण के अंश को राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गंभीरता से लिया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि वे हताशा में ऎसा बोल रही हैं। इसके पश्चात छपरा के भेल्दी थाने में राबड़ी देवी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा दी गयी। छह अप्रैल को राबड़ी देवी के खिलाफ हाईकोर्ट में भी याचिका दर्ज करायी गयी। जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने तो राबड़ी देवी को 'ताराबाई' की उपाधि दे डाली। इसे चुनाव आयोग ने भी गंभीरता से लिया और भाषण की सीडी देखने के तत्पश्चात कार्रवाई की बात कही। इस मुद्दे पर लालू फिलहाल चुप्प हैं। यह सही है कि राबड़ी देवी जब चुनाव क्षेत्र में प्रचार के लिए जा रही हैं तो उन्हें भाषा पर संयम रखना चाहिए था। बिहार का सत्ता पक्ष भी इस मुद्दे पर काफी टीका-टिप्पणी कर चुका है, कर रहा है। यह भी उचित नहीं है। यहां के मुख्यमंत्री ने तो काफी संयम बरता है, परंतु चीनी के घोल में चुपके से कुछ मिर्ची के पाउडर में डाले हैं। गए तीन दिनों से बिहार में राबड़ी के उक्त बयान की चर्चा चहुंऒर है। हर कोई अपने-अपने तरीके से इसे हवा दे रहा है।

पुराने कांग्रेसी भी बेटिकट

पन्द्रहवीं लोकसभा चुनाव में राजद-लोजपा ने आपसी तालमेल कर बिहार में कांग्रेस के लिए सिर्फ तीन सीटें छोड़ दी। इससे बौखलायी कांग्रेस ने सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। पार्टी के इस फैसले से बिहार से जुड़े पुराने कांग्रेसियों के यहां दीवाली मनायी गयी। पुराने कांग्रेसी चुनाव मैदान में दांव आजमाने आगे आये और टिकट के लिए हाथ-पांव मारने लगे। पुराने कांग्रेसियों में राज्य सभा के पूर्व सांसद रजनी रंजन साहू भी थे। वे मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़ना चाहते थे परंतु अंतिम समय में पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया। मुजफ्फरपुर का समीकरण कुछ इस प्रकार है-यहां जदयू के टिकट पर कैप्टन निषाद मैदान में हैं, वहीं लोजपा के टिकट पर भगवान लाल सहनी उतरे हैं। कांग्रेस का टिकट यहां विनीता विजय को मिला है। यहां के विधायक विजेन्द्र चौधरी ने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की है। श्री चौधरी को वैश्य वोट मिलने का कयास लगाया जा रहा है। भगवान लाल और निषाद एक-दूसरे का वोट काटेंगे। ऎसे में श्री चौधरी को इसका भी फायदा मिलेगा। ऎसे हालात में यदि रजनी रंजन साहू को टिकट मिल जाता तो कांग्रेस के पाले में यह सीट आ सकती थी। परंतु जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत तो हर जगह चरितार्थ होती है। श्री साहू की सेटिंग कमजोर पड़ गयी जिसका फायद विनीता विजय को मिला। फिर भी पुराने और अनुभवी कांग्रेसी रजनी रंजन साहू ने कांग्रेस का दामन नहीं छोड़ा है। सूबे में कांग्रेस ने कई ऎसे नेता को टिकट दिया है, जो लड़ाई में तीसरे-चौथे स्थान पर रहेंगे। ऎसे में इसका नुकसान पार्टी को ही होगी। चुनाव बाद राजद-लोजपा सुप्रीमो फिर मुंह चिढ़ायेंगे। बिहार में कांग्रेस पार्टी की कमजोर हालत को देखते हुए सोनिया गांधी को खुद एक-एक पहलू नजर रखनी चाहिए थी। इसके बाद ही टिकट पर कोई फैसला होना चाहिए था। तब हालात कुछ और होते, कांग्रेस को अधिक सीटें मिलती। बिहार में राजद-लोजपा को भी झटका लगता। वहीं एनडीए की भी परेशानी बढ़ती।

रविवार, 5 अप्रैल 2009

रिसर्च ने ली वृद्ध की जान

एक चिकित्सक ने चंद रुपये की खातिर एक कैंसर मरीज को जीते जी मार डाला। रोगी को सही में मौत तो आपरेशन के सात माह बाद हुई। मगर आपरेशन के बाद माउथ कैंसर से ग्रसित 75 वर्षीय वृद्ध न तो कभी बोल सके, न खा सके, न चल सके, न बैठ सके। पाइप के जरिए उन्हें दूध, दाल/चावल का पानी दिया जाता था। आपरेशन के एक घंटे पहले तक चिकित्सक ने अपना बयान दिया कि मरीज पांच साल तक स्वस्थ जीवन बीता सकेंगे। उन्हें कोई तकलीफ नहीं होगी। आपरेशन के तुरंत बाद चिकित्सक ने बयान बदलते हुए कहा कि इस उम्र में आपरेशन झेलना काफी मुशि्कल है। मामला कुछ यूं है-पटना में रहने वाले पचहत्तर वर्षीय एक वृद्ध हरेन्द्र प्रसाद को मई 2008 में पता चला कि उन्हें माउथ कैंसर है। ये पटना के ही एक चिकित्सक वी.पी. सिंह के पास पहुंचे। वृद्ध की जांच के पश्चात डाक्टर ने कहा कि ' कैंसर सेकेंड स्टेज में पहुंच चुका है, इसका एकमात्र इलाज आपरेशन ही है।' वृद्ध ने कहा-' मैंने अपनी जिंदगी जी ली है। मेरा इलाज ऎसा होना चाहिए, जो मैं बर्दाश्त कर सकूं।' चिकित्सक ने कहा-आपको आपरेशन में कोई कष्ट नहीं होगा। पूरी जिंदगी साधु की तरह गुजारने वाले श्री प्रसाद के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे इलाज पर अधिक खर्च कर पाते। इसके बावजूद परिवार वाले की सलाह पर कुछ पैसे इक्ट्ठे कर वे मुंबई के टाटा कैंसर हास्पीटल गये। वहां की जांच यहां से थोड़ा भिन्न थी। वहां भी चिकित्सक ने आपरेशन के लिए ही कहा। उनलोगों ने आपरेशन का डेट तीन माह बाद का दिया। साथ ही सलाह दी कि आप दूसरी जगह आपरेशन करवा लें। मरीज के मसूड़े से ब्लड आने लगा था। सो, जल्द से जल्द आपरेशन कराना जरूरी था। श्री प्रसाद पुनः पटना लौट गये और आनन-फानन में परिजनों की सलाह पर वी.पी. सिंह के पास पहुंचे। चिकित्सक ने फिर आश्वाशन दिया कि पन्द्रह दिनों में वे बिल्कुल ठीक हो जाएंगे। वी.पी. सिंह ने दो जुलाई 2008 को पटना के ही मगध हास्पीटल में सुबह छह बजे आपरेशन का समय दिया। उन्होंने मरीज के परिजनों से दो बोतल खून की व्यवस्था करने के लिए कहा। सुबह से दो बज गये तब तक चिकित्सक का कोई अता-पता नहीं था। तीन बजे पता चला कि चिकित्सक आ गये हैं। श्री प्रसाद को आपरेशन थिएटर में बुलाया गया। उन्होंने जाते वक्त अपने बेटों से कहा कि इस उम्र में मेरा आपरेशन मत कराऒ, उनकी आंखों में आंसू थे। उनके बेटों ने समझाते हुए कहा कि आपरेशन के बाद आप अच्छे हो जाएंगे। उनके मुंह से ये अंतिम बोल थे। तीन घंटे का आपरेशन पांच घंटे तक चला। आपरेशन थिएटर से बाहर परिजन परेशान थे। इसी क्रम में हजारों रुपये कि अतिरिक्त दवाइयां चिकित्सक ने मंगवाये। साढ़े पांच घंटे के बाद प्लासि्टक सर्जन बाहर निकले और अधिक से अधिक खून की व्यवस्था करने को कहा। चिकित्सक ने पूछने पर बताया कि मरीज का नस कटने से तीन लीटर खून नष्ट हो गया है। परिजनों के होश उड़ गये। सात घंटे के बाद वी.पी. सिंह आपरेशन थिएटर से बाहर निकले। वे एसी में भी पसीने-पसीने हो रहे थे। यह पूछने पर कि मरीज की हालत कैसी है, होश कब आयेगा? चिकित्सक ने कहा-मरीज को वेंटिलेटर पर रखा गया है। इन्हें सुबह में होश में लाने का प्रयास होगा। चिकित्सक ने रात भर में दस खून की बोतलें और बीस हजार की दवा मरीज को दिये। अगले दिन एक बजे दिन में मरीज को होश में लाया गया। परंतु उनकी आवाज जा चुकी थी। चिकित्सक ने कहा-दस दिन में ये बोलने लगेंगे। पन्द्रह दिनों में मरीज घर तो आ गये। परंतु उनकी जिंदगी में अंधेरा हो चुका था। मुंह से खाना खाने योग्य वे नहीं थे। इसके पश्चात रेडिएशन शुरू हुआ। उनकी हालत और बिगड़ती चली गयी। इस दौरान वी.पी. सिंह ने कहा-इस उम्र में रोगी कष्ट झेल नहीं पा रहे हैं। श्री प्रसाद की हालत इतनी खराब हो गयी कि वे बिस्तर पर खुद पांव भी नहीं पसार पाते थे। 19 जनवरी, 2009 की सुबह नौ बजे वे हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गये। सैकड़ों लोगों ने उन्हें सच्चे दिल से श्रद्धांजलि दी। बाद में पता चला कि चिकित्सक वी.पी. सिंह की गलती से मरीज के कई ऎसे नस कट गये जिससे श्री प्रसाद कभी स्वस्थ नहीं हो सके। इतना ही नहीं यह भी बात सामने आयी कि उक्त चिकित्सक यह रिसर्च करना चाहते थे कि इस उम्र में यह आपरेशन कितना सफल होता है। आज हर शहर में कई ऎसे चिकित्सक हैं जो चंद रुपये की खातिर रोगी की जान ले रहे हैं। इस पर सरकार की या अदालत की कभी नजर नहीं जाती। यह प्रश्न आपके लिए है कि ऎसे चिकित्सकों को क्या सजा मिलनी चाहिए?

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

सत्ता के लिए बिहार में भरत मिलाप

कई साल पहले हर मंच पर एक-दूसरे को नीचा-दिखाने की कोशिश सिर्फ सत्ता के लिए। अब हर मंच पर एक-दूसरे की तारीफ भी सत्ता के लिए। वाह नेताजी-अब तो इसपर विराम लगाइये? मगर काहे के नेताजी मनीहन...ऽऽऽऽ. मैं यहां उस मुद्दे पर चर्चा करने जा रहा हूं, जो आपके जेहन में अभी भी ताजा होगा। मैं चर्चा कर रहा हूं, लोकसभा चुनाव के मद्देनजर लोजपा और राजद में हुए समझौते का। जिसके लिये उस कांग्रेस को दरकिनार कर दिया गया जिसमें इन दोनों पार्टियों के नेताऒं ने सत्ता का सुख भोगा। बिहार के विभिन्न जिलों में आयोजित चुनावी सभा में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद और लोजपा सुप्रीमो रामिवलास पासवान एक-दूसरे की बड़ाई करते नहीं थक रहे हैं। उनके इस मिलाप की तुलना रामायण काल के भरत मिलाप से कम नहीं है। यह भरत मिलाप सिर्फ इसीलिए ताकि लोकसभा चुनाव में अधिक से अधिक सीटें इन्हें मिल सके और अगले पांच साल तक ये सत्ता से विमुख न हों। हालांकि, दोनों पार्टियों के बीच हुए समझौते से नाराज कांग्रेस ने पहले 37, बाद में सभी सीटों पर लड़ने के फैसले के साथ मैदान में उतर चुकी है। सिर्फ साढ़े तीन साल पहले लोजपा और राजद के बीच विधानसभा चुनाव के बाद समझौता हो गया होता, तो फिर से विधानसभा चुनाव न होता और बिहार में नीतीश कुमार की सरकार भी नहीं बनती। इस चुनाव में भी सरकार के लाखों रुपये खर्च हुए। क्या इनसे इस विषय पर सवाल नहीं करना चाहिए? क्या इनपर इसीलिए कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए कि ये बड़े नेता हैं? लेकिन भारत एक प्रजातांत्रिक देश है, इस पर फैसला तो जनता को ही करना होगा? दो माह बाद केन्द्र में नयी सरकार बन जायेगी। यदि कांग्रेस की सरकार बनती है तो फिर दोनों पार्टियां गठबंधन में शामिल होंगी। चंद माह बाद ही भरत मिलाप करने वाले दूर-दूर दिखने लगेंगे, क्योंकि विधानसभा चुनाव पर भी इनकी नजर है। ऎसे में क्या आम जनता को इस बारे में नहीं सोचना चाहिए? यह समस्या सिर्फ बिहार की नहीं, बल्कि पूरे भारत की है। हर राज्य में चुनाव के वक्त कुछ इसी तरह के नजारे देखने को मिलते हैं।