बुधवार, 1 अप्रैल 2009

सत्ता के लिए बिहार में भरत मिलाप

कई साल पहले हर मंच पर एक-दूसरे को नीचा-दिखाने की कोशिश सिर्फ सत्ता के लिए। अब हर मंच पर एक-दूसरे की तारीफ भी सत्ता के लिए। वाह नेताजी-अब तो इसपर विराम लगाइये? मगर काहे के नेताजी मनीहन...ऽऽऽऽ. मैं यहां उस मुद्दे पर चर्चा करने जा रहा हूं, जो आपके जेहन में अभी भी ताजा होगा। मैं चर्चा कर रहा हूं, लोकसभा चुनाव के मद्देनजर लोजपा और राजद में हुए समझौते का। जिसके लिये उस कांग्रेस को दरकिनार कर दिया गया जिसमें इन दोनों पार्टियों के नेताऒं ने सत्ता का सुख भोगा। बिहार के विभिन्न जिलों में आयोजित चुनावी सभा में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद और लोजपा सुप्रीमो रामिवलास पासवान एक-दूसरे की बड़ाई करते नहीं थक रहे हैं। उनके इस मिलाप की तुलना रामायण काल के भरत मिलाप से कम नहीं है। यह भरत मिलाप सिर्फ इसीलिए ताकि लोकसभा चुनाव में अधिक से अधिक सीटें इन्हें मिल सके और अगले पांच साल तक ये सत्ता से विमुख न हों। हालांकि, दोनों पार्टियों के बीच हुए समझौते से नाराज कांग्रेस ने पहले 37, बाद में सभी सीटों पर लड़ने के फैसले के साथ मैदान में उतर चुकी है। सिर्फ साढ़े तीन साल पहले लोजपा और राजद के बीच विधानसभा चुनाव के बाद समझौता हो गया होता, तो फिर से विधानसभा चुनाव न होता और बिहार में नीतीश कुमार की सरकार भी नहीं बनती। इस चुनाव में भी सरकार के लाखों रुपये खर्च हुए। क्या इनसे इस विषय पर सवाल नहीं करना चाहिए? क्या इनपर इसीलिए कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए कि ये बड़े नेता हैं? लेकिन भारत एक प्रजातांत्रिक देश है, इस पर फैसला तो जनता को ही करना होगा? दो माह बाद केन्द्र में नयी सरकार बन जायेगी। यदि कांग्रेस की सरकार बनती है तो फिर दोनों पार्टियां गठबंधन में शामिल होंगी। चंद माह बाद ही भरत मिलाप करने वाले दूर-दूर दिखने लगेंगे, क्योंकि विधानसभा चुनाव पर भी इनकी नजर है। ऎसे में क्या आम जनता को इस बारे में नहीं सोचना चाहिए? यह समस्या सिर्फ बिहार की नहीं, बल्कि पूरे भारत की है। हर राज्य में चुनाव के वक्त कुछ इसी तरह के नजारे देखने को मिलते हैं।

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