रविवार, 5 अप्रैल 2009

रिसर्च ने ली वृद्ध की जान

एक चिकित्सक ने चंद रुपये की खातिर एक कैंसर मरीज को जीते जी मार डाला। रोगी को सही में मौत तो आपरेशन के सात माह बाद हुई। मगर आपरेशन के बाद माउथ कैंसर से ग्रसित 75 वर्षीय वृद्ध न तो कभी बोल सके, न खा सके, न चल सके, न बैठ सके। पाइप के जरिए उन्हें दूध, दाल/चावल का पानी दिया जाता था। आपरेशन के एक घंटे पहले तक चिकित्सक ने अपना बयान दिया कि मरीज पांच साल तक स्वस्थ जीवन बीता सकेंगे। उन्हें कोई तकलीफ नहीं होगी। आपरेशन के तुरंत बाद चिकित्सक ने बयान बदलते हुए कहा कि इस उम्र में आपरेशन झेलना काफी मुशि्कल है। मामला कुछ यूं है-पटना में रहने वाले पचहत्तर वर्षीय एक वृद्ध हरेन्द्र प्रसाद को मई 2008 में पता चला कि उन्हें माउथ कैंसर है। ये पटना के ही एक चिकित्सक वी.पी. सिंह के पास पहुंचे। वृद्ध की जांच के पश्चात डाक्टर ने कहा कि ' कैंसर सेकेंड स्टेज में पहुंच चुका है, इसका एकमात्र इलाज आपरेशन ही है।' वृद्ध ने कहा-' मैंने अपनी जिंदगी जी ली है। मेरा इलाज ऎसा होना चाहिए, जो मैं बर्दाश्त कर सकूं।' चिकित्सक ने कहा-आपको आपरेशन में कोई कष्ट नहीं होगा। पूरी जिंदगी साधु की तरह गुजारने वाले श्री प्रसाद के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे इलाज पर अधिक खर्च कर पाते। इसके बावजूद परिवार वाले की सलाह पर कुछ पैसे इक्ट्ठे कर वे मुंबई के टाटा कैंसर हास्पीटल गये। वहां की जांच यहां से थोड़ा भिन्न थी। वहां भी चिकित्सक ने आपरेशन के लिए ही कहा। उनलोगों ने आपरेशन का डेट तीन माह बाद का दिया। साथ ही सलाह दी कि आप दूसरी जगह आपरेशन करवा लें। मरीज के मसूड़े से ब्लड आने लगा था। सो, जल्द से जल्द आपरेशन कराना जरूरी था। श्री प्रसाद पुनः पटना लौट गये और आनन-फानन में परिजनों की सलाह पर वी.पी. सिंह के पास पहुंचे। चिकित्सक ने फिर आश्वाशन दिया कि पन्द्रह दिनों में वे बिल्कुल ठीक हो जाएंगे। वी.पी. सिंह ने दो जुलाई 2008 को पटना के ही मगध हास्पीटल में सुबह छह बजे आपरेशन का समय दिया। उन्होंने मरीज के परिजनों से दो बोतल खून की व्यवस्था करने के लिए कहा। सुबह से दो बज गये तब तक चिकित्सक का कोई अता-पता नहीं था। तीन बजे पता चला कि चिकित्सक आ गये हैं। श्री प्रसाद को आपरेशन थिएटर में बुलाया गया। उन्होंने जाते वक्त अपने बेटों से कहा कि इस उम्र में मेरा आपरेशन मत कराऒ, उनकी आंखों में आंसू थे। उनके बेटों ने समझाते हुए कहा कि आपरेशन के बाद आप अच्छे हो जाएंगे। उनके मुंह से ये अंतिम बोल थे। तीन घंटे का आपरेशन पांच घंटे तक चला। आपरेशन थिएटर से बाहर परिजन परेशान थे। इसी क्रम में हजारों रुपये कि अतिरिक्त दवाइयां चिकित्सक ने मंगवाये। साढ़े पांच घंटे के बाद प्लासि्टक सर्जन बाहर निकले और अधिक से अधिक खून की व्यवस्था करने को कहा। चिकित्सक ने पूछने पर बताया कि मरीज का नस कटने से तीन लीटर खून नष्ट हो गया है। परिजनों के होश उड़ गये। सात घंटे के बाद वी.पी. सिंह आपरेशन थिएटर से बाहर निकले। वे एसी में भी पसीने-पसीने हो रहे थे। यह पूछने पर कि मरीज की हालत कैसी है, होश कब आयेगा? चिकित्सक ने कहा-मरीज को वेंटिलेटर पर रखा गया है। इन्हें सुबह में होश में लाने का प्रयास होगा। चिकित्सक ने रात भर में दस खून की बोतलें और बीस हजार की दवा मरीज को दिये। अगले दिन एक बजे दिन में मरीज को होश में लाया गया। परंतु उनकी आवाज जा चुकी थी। चिकित्सक ने कहा-दस दिन में ये बोलने लगेंगे। पन्द्रह दिनों में मरीज घर तो आ गये। परंतु उनकी जिंदगी में अंधेरा हो चुका था। मुंह से खाना खाने योग्य वे नहीं थे। इसके पश्चात रेडिएशन शुरू हुआ। उनकी हालत और बिगड़ती चली गयी। इस दौरान वी.पी. सिंह ने कहा-इस उम्र में रोगी कष्ट झेल नहीं पा रहे हैं। श्री प्रसाद की हालत इतनी खराब हो गयी कि वे बिस्तर पर खुद पांव भी नहीं पसार पाते थे। 19 जनवरी, 2009 की सुबह नौ बजे वे हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गये। सैकड़ों लोगों ने उन्हें सच्चे दिल से श्रद्धांजलि दी। बाद में पता चला कि चिकित्सक वी.पी. सिंह की गलती से मरीज के कई ऎसे नस कट गये जिससे श्री प्रसाद कभी स्वस्थ नहीं हो सके। इतना ही नहीं यह भी बात सामने आयी कि उक्त चिकित्सक यह रिसर्च करना चाहते थे कि इस उम्र में यह आपरेशन कितना सफल होता है। आज हर शहर में कई ऎसे चिकित्सक हैं जो चंद रुपये की खातिर रोगी की जान ले रहे हैं। इस पर सरकार की या अदालत की कभी नजर नहीं जाती। यह प्रश्न आपके लिए है कि ऎसे चिकित्सकों को क्या सजा मिलनी चाहिए?

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