शनिवार, 11 अप्रैल 2009

न्याय की आस में नम आंखें

पेशा से नेतागिरी, दिल से साधु, विचार से संत; दूसरे के दु:ख से द्रवित होनेवाला सीतामढ़ी के मनोज कुमार को एक दशक बाद भी इंसाफ नहीं मिल सका है। उनकी आंखें इंसाफ के इंतजार में आज भी नम हैं। यह मामला 11 अगस्त 1998 का है। बिहार के पूर्व मंत्री रामनाथ ठाकुर, सीतामढ़ी के पूर्व विधायक नवल किशोर राय के साथ जदयू के नेता मनोज कुमार यहां के समाहरणालय में शांतिपूर्वक जुलूस इसके पश्चात सभा करने के लिए इक्ट्ठे हुए थे। वे बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत की मांग कर रहे थे। मालूम हो कि सीतामढ़ी एक बाढ़ग्रस्त इलाका है। यहां के अधिकतर भू-भाग बाढ़ में डूब जाते हैं। जुलूस में काफी संख्या में बाढ़ पीड़ित भी इक्ट्ठे हुए थे। इसी क्रम में तत्कालीन एसपी परेश सक्सेना ने भीड़ में अपनी गाड़ी घुसा दी। भीड़ में से गाड़ी निकालने के लिए पुलिसकर्मियों ने लाठियां भी भांजीं। इससे प्रदर्शनकारी आक्रोशित हो गये। मनोज कुमार ने समझाया कि एसपी के खिलाफ वे शिकायत करेंगे। इसी बीच एक महिला को चोट लग गयी। उसके सिर से निरंतर खून बह रहा था। उसने चिल्लाते हुए कहा कि उसे पुलिसकर्मियों ने मारा है। हजारों की संख्या में मौजूद प्रदर्शनकारी आक्रोशित हो गये। मनोज कुमार ने फिर समझाया। उनकी बात का असर यह हुआ कि हो-हल्ला कुछ कम हो गया। इसी बीच किसी शरारती तत्व ने समाहरणालय पर रोड़े फेंक दिये जिससे एक-दो पुलिसकर्मी को हल्की चोटें आयीं। समाहरणालय में मौजूद एक तथाकथित पत्रकार सत्येन्द्र सिंह ने कहा कि एसपी साहेब भीड़ समाहरणालय में प्रवेश कर गयी तो उससे निबटना कठिन होगा। इसपर वहां मौजूद डीएम ने उसे डांट दिया। तभी एक-दो और रोड़ा आकर गिरा। एसपी परेश सक्सेना भी आपे से बाहर हो गये थे। उन्होंने पुलिसकर्मियों को गोली चलाने का हुक्म दे दिया। देखते-देखते पुलिसकर्मियों ने गोली चलानी शुरू कर दी। इसमें पूर्व विधायक रामचरित्र राय, एक महिला सहित पांच लोग मारे गये। सैकड़ों घायल हो गये। एसपी ने मनोज कुमार पर यह आरोप मढ़ा कि मनोज कुमार ने भीड़ को उकसाया है। विधायक नवल किशोर राय सहित कई नेता हालात को देखते हुए भांपते हुए भाग खड़े हुए। मनोज चूंकि निर्दोष थे, अत: इन्होंने भागना मुनासिब नहीं समझा। मनोज कुमार को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और थाने में न सिर्फ उनकी पिटाई की बलि्क उनकी दाढ़ी भी जबरन काट दी गयी। इस सदमे को उनके पिता बर्दाश्त नहीं कर सके और असमय काल के गाल में समा गये। पिता को मुखागि्न दिलाने की बात सुनकर पुलिस के होश उड़ गये क्योंकि श्री कुमार के चेहरे के घाव हरे थे, जिसे देख दंगा भड़क सकता था। पुलिस ने भीड़ से छिपाकर मनोज को पिता को अगि्न देने के लिए पेश किया। बाद में मनोज जमानत पर रिहा हो गये। इसके पश्चात मनोज कुमार ने तत्कालीन डीएम रामनंदन प्रसाद, एसपी परेश सक्सेना सहित कई पुलिसकर्मियों पर अदालत में मामला दर्ज कराया। यह मामला आज भी अदालत में लटका हुआ है। तारीख पर तारीख मिलती रही। परंतु न्याय नहीं मिला। तत्कालीन डीएम तो सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वहीं परेश सक्सेना डीआईजी की कुर्सी पर तैनात हो चुके हैं। नवल किशोर राय बाद में विधायक से सांसद बन गये। परंतु उन्होंने मनोज कुमार की मदद नहीं की। इसके ठीक विपरीत उन्होंने श्री सक्सेना से कई बार बात की परंतु इस मुद्दे को गौण रखा। जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार नागेन्द सिंह मानते हैं कि परेश सक्सेना की हठधर्मिता ने बेगुनाह लोगों की जान ली। पुलिस ने सीतामढ़ी में दूसरा जलियांवाला कांड को जन्म दिया, यहां की जनता यही कहती है।

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