गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

निराश जिंदगी को दान...भाग एक

नवम्बर का महीना था। रात के दस बजे थे, मैं ऑफिस में था। मीटिंग चल रही थी, इसी क्रम में मोबाइल की घंटी बजी, देखा तो बड़े भैया का फ़ोन था। ऑफिस के बॉस ने पूछा-क्या हुआ ? मैंने कहा-घर से फ़ोन है। बॉस ने कहा-बात कर लो। बड़े भैया घबराए हुए थे, वे बोले दीदी से बात हुई-मैंने ना कहा। बोले उसकी दोनों किडनी ख़राब हो गयी है। लखनऊ के डॉक्टर ने ट्रांसप्लांट के लिए कहा है। मैंने कहा-चिंता न करें, कल सुबह बात करता हूँ । ऑफिस का वर्क समाप्त होने पर चार बजे सुबह घर पहुँचा। भूख और नींद गायब हो चुकी थी। कुछ भी निर्णय नहीं ले पा रहा था कि क्या करना चहिये, दीदी को फ़ोन किया, वह घबरायी हुई थी। उसने कहा-अब कुछ नहीं हो सकता है। डॉक्टर ने अगले माह 'डोनर' लेकर आने के लिए कहा है। 'डोनर' कहाँ से आयगा? मैंने कहा- चिंता मत करो तुम्हारा ट्रांसप्लांट होगा। मैंने बड़े भैया को फ़ोन लगाया-उन्होंने कहा कि किडनी देने से आदमी कमजोर हो जाता है। बाहर से इंतजाम करना होगा। देखते-देखते दो सप्ताह बीत गए, चर्चा होती रही पर कोई आगे नहीं आया। किसी ने कहा- माँ-पापा क्यों नहीं दे सकते हैं। मैंने इस बात पर आपत्ति जताई, दोनों कि उम्र सत्तर से अधिक थी। वे हमेशा बीमार रहते थे। डॉक्टर के अनुसार- 'डोनर' कि उम्र दस साल कम या अधिक होने से ऑपरेशन अच्छा होता है। घर में किसी ने कहा-भाभी का ब्लड ग्रुप दीदी से मैच करता है। बड़े भैया नाराज हो गये- कहा मेरी सेवा कौन करेगा? छोटे ने कहा-मैं दूंगा। छोटी बहू ने मैके फ़ोन किया-अपनी माँ से कहा इन्हें समझाओ। किडनी देना चाहते हैं, मौत को गले लगाना चाहते हैं। मेरी जिदगी बर्बाद हो जायेगी। माँ ने कहा-ऐसा नहीं होगा। छोटा किडनी न दे इसके लिए पूजा-पाठ होने लगी। जीजा का ब्लड ग्रुप मैच नहीं कर रहा था, सो बात ख़त्म। किसी ने कहा-दीदी के बेटे क्यों नहीं दे सकते। दीदी नाराज हो गयी-कहा बड़े के हार्ट में एक बल्ब कम है, छोटा हमेशा बीमार रहता है। सो, चारों ओर निराशा थी। ट्रांसप्लांट कि आस क्षीण होती जा रही थी। दीदी की हालत ख़राब होती जा रही थी। क्रमश...

1 टिप्पणी:

  1. ऐसा ही होता है. हर आदमी चाहता है कि देश में भगत सिंह, आज़ाद, मंगल पांडे पैदा हों. पर अपने घर नहीं, पड़ोसी के यहां.

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