शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

निराश जिंदगी को दान-अंतिम


आठ बजे मैं पूरी तरह से होश में आ चुका था। मैंने वहां मौजूद घर के लोगों से पूछा-दीदी कैसी है? सभी अजीब निगाहों से मुझे देख रहे थे। पता चला कि वह बिल्कुल ठीक है। इसके पश्चात मैंने अपने बेटे से बात की। आठ दिन पीजीआई में रहने के बाद मैं लाज में लौट गया। ग्यारहवें दिन टांका कट गया। उचित देखभाल न होने से नाराज होकर मैं डाक्टर के मना करने पर भी चौदहवें दिन मुजफ्फरपुर लौट आया। सबका काम मुझसे निकल चुका था। मेरी जरूरत अब उनलोगों को नहीं थी। महीनों आराम के बाद मैं इस लायक हुआ कि आफिस जा सकूं। झूठ बोलते हैं कुछ चिकित्सक-पीजीआई के डाक्टरों ने कहा था कि आपरेशन के दस दिन बाद ही आप ड्यूटी पर जा सकते हैं जबकि मुझे कई माह लगे। यहां कि एक लेडी डाक्टर जो ब्लड क्रास मैच की जांच करती थीं, ने गलत रिपोर्ट दे दिया नतीजन मार्च में होनेवाला आपरेशन जून में हुआ। इतना ही नहीं एक ही जांच कई बार की गयी। एक बार जांच के लिए चिकित्सक पचास एमएल ब्लड लेते थे। एक छोटी सी गलती के चलते रोगी को कितनी परेशानी होती है। इसे मैंने काफी नजदीक से महसूस किया। बकौल चिकित्सक आपरेशन के बाद रोगी पहले की तरह ही हर काम कर सकता है। परंतु न तो मैं तेज चल सकता हूं, न दौड़ सकता हूं, न ज्यादा भारी वजन ही उठा सकता हूं। ऎसा करने पर मेरी हालत ऎसी हो जाती है कि मैं आफिस जाने लायक नहीं रहता। सहानुभूति की छोटी अवधि-किडनी डोनर को चिकित्सक और घरवाले पहले भगवान का दर्जा देते हैं क्योंकि यदि वे ऎसा नहीं करेंगे, तो शायद कोई अपनी जिंदगी दांव पर नहीं लगायेगा। परंतु उसके बाद हर कोई अपने रास्ते पर होता है। एक चिकित्सक ने कहा कि यदि डोनर को ऎसा आश्वाशन नहीं दिया जाए तो यह रिसर्च कामयाब ही नहीं हुआ होता। आज मेरे किसी परेशानी में कम से कम वे लोग तो खड़े नहीं होते जिनके के लिए मैंने अपनी जिंदगी दांव पर लगाई। परंतु बाहरी आशीर्वाद और सहयोग मुझे हर वक्त मिलता है।
...आपरेशन की शुरुआत से अंतिम तक एक सच्चे दोस्त की भूमिका में डा राजीव आनंद की भूमिका काफी सराहनीय रही। ये हैं तो हड्डी के डाक्टर, परंतु हर एक रोग के बारे में इन्हें अच्छी जानकारी है। मेरे एक अन्य मित्र ने पूछा कि आपरेशन के वक्त क्या तुम्हें अपने छोटे-छोटे बच्चों की याद नहीं आयी? मैंने कहा-यदि मैं ज्यादा सोचता तो मेरे पैर डगमगा जाते और ऎसा निर्णय नहीं कर पाता। ब्लाग में इस बात की चर्चा करने का सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि जल्दबाजी और भावना में बहकर कोई बड़ा निर्णय नहीं लेना चाहिए। वर्ना पूरी जिंदगी पछताना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को तो कतई ऎसा कदम नहीं उठाना चाहिए। समय-समय पर जांच का खर्च उठाना सब के वश की बात नहीं है। मुझे सबसे ज्यादा सहयोग दोस्तों और अनजान लोगों से मिलता है। एक उदाहरण-पहली बार जब मैं दैनिक जागरण के मुजफ्फरपुर के संपादकीय प्रभारी धीरेन्द श्रीवास्तव जी से मिला और इस बात की चर्चा की तो उन्होंने मुझे दिल से आशीर्वाद दिया। इसी तरह के आशीर्वाद से मुझे बल मिलता है। मेरे आफिस के अधिकतर साथी भी सहयोग करते हैं। चिकित्सक कहते हैं कि आदमी को जीने के लिए एक ही किडनी की जरूरत है। परंतु आपरेशन के बाद वही चिकित्सक कहता है कि परहेज से तो रहना ही पड़ेगा। सरकार की तरफ से गरीब वेवश डोनरों को भी मदद मिलनी चाहिए। ताकि डोनर की हिम्मत बढ़े और वह किडनी दान करने के लिए सोचे। समाप्त

1 टिप्पणी:

  1. मेरे मित्र जो खुद इ एन टी सर्जन है ,देल्ही में है उन्होंने अपनी माँ को किडनी दी है ओर इश्वर की क्रपा से पिछले ४ साल से स्वस्थ है ओर सभी कार्य अच्छी तरह से कर रहे है कई बार कोई ओपेराशन घंटो खड़े रहकर करते है ,शरीर का कोई भी अंग अपने आप में महत्वपूर्ण होता है परन्तु मनुष्य की जिजीविषा का कोई तोड़ नहीं..अपनी लडाई आपको स्वंय लड़नी होती है ..मजबूत बने रहिये ...ओर जीवन का आनंद लीजिये ,मनुष्य योनी इश्वर जाने कब दे ?

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