शनिवार, 18 अप्रैल 2009

पंथपाकड़ : सिर्फ एक जड़ से पचास पेड़

सुनने में कुछ अजीब लगेगा परंतु सच है। पंथपाकड़ में सिर्फ एक जड़ से पचास से अधिक पेड़ हैं। ये पेड़ ढाई एकड़ में फैले हुए हैं। इनमें से कुछ पेड़ सुख गये हैं तो कुछ नये का भी जन्म हो रहा है। ये पेड़ कितने हजार साल से हैं कहना मुशि्कल है। बिहार के सीतामढ़ी जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर दूर स्थित यह वही जगह है जहां जनकपुरधाम से अयोध्या जाने के क्रम में मां जानकी की डोली कुछ समय के लिए रुकी थी। इस जगह का नाम दो कारणों से पंथपाकड़ पड़ा। पहली किंवंदती के रूप भगवान शिव ने लाखों साल पहले इसी पंथपाकड़ पेड़ के नीचे साठ हजार साल तक तपस्या की थी। दूसरी किंवंदती के रूप में और वाल्मिकी रामायण के अनुसार, शिव के धनुष टूटने के पश्चात शिव भक्त परशुराम जी का क्रोध धधकने लगा था और वे प्रणाम करने इस पवित्र स्थल पर पहुंचे। इसी बीच जनकपुरधाम से चली मां जानकी की डोली इसी स्थल पर रुकी थी। तब, भगवान राम व परशुराम के बीच आमना-सामना हुआ। परशुराम फौरन ही भगवान राम के नतमस्तक हो गये। दोनों के मिलने की जगह होने के कारण इस जगह का नाम पंथपाकड़ पड़ा। भारत में मां जानकी की हजारों प्रतिमाएं स्थापित है। परंतु पंथपाकड़ में मां जानकी की प्रतिमा की जगह मिट्टी के पिंड स्थापित हैं। ऎसा नजारा कहीं और देखने को नहीं मिलता। यहां के पाकड़ के पेड़ में मनुष्य के शरीर में रक्तसंचार के लिए बने नस की तरह ही छोटी-बड़ी लताएं हैं। लता के सहारे ही अलग-अलग पेड़ का जन्म होते रहता है। एक पेड़ सुखने के पहले ही दूसरा पेड़ उग जाता है। इस पेड़ को जीवित रखने के लिए पानी-खाद की जरूरत नहीं पड़ती है। इस स्थल पर पहुंचकर बड़े-बड़े भी सांइटिस्ट भी आश्चर्यचकित रह जाते हैं। वैशाख के महीना में प्रत्येक साल हजारों की संख्या में संत विभिन्न राज्यों व पड़ोसी देश नेपाल से यहां आते हैं। वे सात से पन्द्रह दिनों तक यहां रुकते हैं। वे पेड़ की छांव के नीचे घंटों बैठकर मिट्टी के लेप को मस्तिष्क पर लगाते हैं। प्रतिदिन सौ से अधिक श्रद्धालुऒं का आना-जाना रहता है। सीतामढ़ी जिले में शादी होने के बाद लड़के-लड़कियों की जोड़ियां यहां मां जानकी के पिंड पर सिंदूर लगाकर आशीर्वाद लेती हैं। मंदिर के पुजारी रत्नेश्वर झा यहां की देखभाल करते हैं। इससे पूर्व उनके पिता, उनके दादा व अन्य इस स्थल की देखभाल किया करते थे। सारे पूर्वज अपने बच्चों को पंथपाकड़ के महत्व को कहानी के रूप में सुनाते रहे हैं। इस पवित्र जगह से तीन किलोमीटर मिट्टी के पथ पार करने के बाद ही पक्की सड़क आती है। ऎतिहासिक धरोहर होने के बावजूद पंथपाकड़ की ऒर किसी नेता का ध्यान नहीं है। किसी भी चुनाव में इस स्थल को बचाने की दिशा में कोई चर्चा नहीं हुई। चुनाव में जीत हो इसका आशीर्वाद मां जानकी से प्रत्याशी अवश्य लेते हैं।

2 टिप्‍पणियां:

  1. जानकारी के लिए शुक्रिया.
    एक फोटो भी लगा देते तो जान आ जाती. शब्द स्वयं रूप ले लेते.

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  2. बहुत सुंदर जानकारी दी है आपने ... अजब गजब चीजों से भरी पडी है दुनिया हमारी।

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