सोमवार, 27 अप्रैल 2009

फिर बिके मतदाता


पांच साल तक सरकार को बुरा-भला कहनेवाली जनता खुद से यह वादा करती है कि अगली दफा वह सोच-समझकर ऎसी पार्टी को वोट देगी जो गरीबों के हित में काम करे। हर नुक्कड़ पर स्थित चाय की दुकान पर मजदूर हो या प्राइवेट स्कूल के टीचर या अन्य इस संबंध में अपने-अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं। यह सिलसिला सरकार बनने के कुछ ही दिन बाद शुरू हो जाती है। जनता सरकार के गठन के चंद माह बाद ही अपने ही फैसले पर पछताना शुरू कर देती है कि अमुक पार्टी के राज में महंगाई से जीना मुहाल हो गया है। एक वर्ग बढ़ते अपराध पर सरकार को कोसता है तो दूसरा फलां-फलां मामले में...। वास्तव में वोट पर निर्णय जनता कैसे लेती है। इस बात की जानकारी रखनेवाले की फीसदी काफी कम है। वजह है शहर के एसी फ्लैट में रहनेवाले किसी अफसर वर्ग या फिर बिजनेस मैन को इस बात की फुर्सत नहीं कि वे गांवों की धूल भरे व तपती धूप में सही स्थिति का जायजा ले सकें। कुछ पत्रकार गांवों की यात्रा भी करते हैं, हकीकत की जानकारी उन्हें मिलती है परंतु इस बात को वे खुलकर उजागर नहीं कर सकते। शहरी इलाके में पढ़े-लिखे मतदाता अपने विवेक से मतदान करते हैं। आंकड़े बताते हैं कि आज भी देश के तिहाई लोग गांवों में रहते हैं। ऎसे में उनका वोट काफी महत्वपूर्ण होता है। पर ये ग्रामीण किसे अपना वोट देंगे यह तय करता है वहां का मुखिया। मुखिया टोला स्तर पर किसी दबंग को कुछ नोट व दारू की बोतल देकर पटा लेता है। मुखिया का सौदा लाख रुपये से अधिक में तय होता है। किसी गांव में राजद तो किसी में कांग्रेस तो किसी में जदयू तो किसी में भाजपा के स्थानीय स्तर के नेता इस काम को अंजाम देते हैं। इसमें दस से पन्द्रह फीसदी वोट इस कारण कट जाता है कि ऎन मौके पर दूसरी पार्टी से भी टोला स्तर का दबंग रुपये इस शर्त पर ले लेता है कि वह वोट कम डालेगा। शहर में पढ़े-लिखे मतदाताऒं के सामने यह समस्या होती है कि वे आखिर किसे वोट दें? क्योंकि उनके इलाके में खड़े किसी उम्मीदवार को वे पसंद नहीं करते हैं। इसके बावजूद वे वोट डालने चले जाते हैं। वे यह बखूबी जानते हैं कि जीतने के बाद नेताजी दर्शन देनेवाले नहीं है। इतना ही नहीं किसी काम के लिए नेताजी के पास जाते-जाते चप्पलें घिस जायेंगी पर उनसे मुलाकात नहीं होगी। यदि मुलाकात हो भी गयी तो वे कोई मदद नहीं करेंगे। गांवों में 'वोट मैनेज' करने की बात सभी जानते हैं। चुनाव बाद जब दारू और रुपये खर्च हो जाते है। ऎसे में ग्रामीणों को अहसास होता है कि उन्होंने अपना वोट बेच दिया। परंतु तबतक सरकार बन चुकी होती है और अगले मौके के लिए उन्हें पांच साल इंतजार इंतजार करना पड़ता है। दूसरे चरण के मतदान के ठीक दो दिन पहले प्रसिद्ध फिल्म निर्माता और लोजपा से बेतिया के प्रत्याशी प्रकाश झा के यहां छापेमारी में पुलिस ने दस लाख से अधिक रुपये बरामद किये। हालांकि श्री झा ने अपने बयान में कहा कि ये रुपये चीनी मिल स्टाफ के लिए थे। इसी तरह वैशाली में एक केन्द्रीय मंत्री के पीए ने चुनावी सभा में खुलेआम पत्रकारों को रुपये देने शुरू कर दिये। इससे आक्रोशित एक पत्रकार उसे मारने दौड़ा। बाद में बीच-बचाव से मामला ठंडा हुआ। इसी तरह साधु यादव के यहां से भी छापेमारी में ढाई लाख से अधिक रुपये बरामद किये गये। सांसद का चुनाव लड़ने के लिए प्रत्याशी डेढ़ से लेकर पन्द्रह करोड़ तक खर्च करते हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये रुपये कहां जाते हैं और किन-किन मद में खर्च होते हैं। इस बार के चुनाव के लिए केन्द्र सरकार ने अपने बजट में 1120 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। पूरे देश में प्रत्याशियों ‍द्वारा जितने रुपये खर्च किये जाते हैं, इससे भारत की मंदी का डटकर मुकाबला किया जा सकता है।

1 टिप्पणी:

  1. यही एक कारण है जिस कारण से सोच विचार कर वोट देनें पर भी सही परिणाम देखने को नही मिलते।क्योकि एक बड़ा समूह ऐसे ही मतदाताओ का है जो बिक जाता है।जब गांव के मुखिया के फैसले को मतदाता अपना फैसला बना लेता है। तो सही परिणाम की उम्मीद ही खतम हो जाती है।

    बहुत सही लिखा है।बधाई।

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