रविवार, 12 अप्रैल 2009

...तो कैसे होगा नारी का विकास

हम चांद पर पहुंच गये हैं। दुनिया के कई देशों के साइंटिस्ट दूसरे ग्रह पर जीवन का पता लगाने में जुटे हुए हैं। परंतु नारी के प्रति पुरुष के विचार आज भी नहीं बदले हैं। नारी सशक्तीकरण की बात हर जगह होती है। नौकरी समेत हर जगहों पर उचित स्थान देने की चर्चा भी होती है। शायद ही कोई ऎसी गोष्ठी होगी, जहां नारी सम्मान की बात नहीं की जाती हो। परंतु हकीकत में पुरुष के विचार ठीक इसके विपरीत है। पुरुष कभी भी नारी को बराबर का दर्जा नहीं देता। एक घर में यदि पुरुष और स्त्री दोनों नौकरी करते हैं तो घर आने पर बच्चे को संभालने से लेकर पति के लिए खाना बनाने तक उसकी ड्यूटी होती है। इतना ही नहीं पति की सेवा और अंत में बिस्तर पर भी वह पति का साथ निभाती है। बचपन से उसे पति भगवान होता है, का पाठ पढ़ाया जाता है। इसी का फायदा पुरुष उठाता है। बचपन से युवा अवस्था की ऒर बढ़ते कदम के साथ ही शुरू हो जाता है-नारी का शोषण। हर जगह उसे पुरुष निहारता रहता है। कोई उसका आंख से बलात्कार करता है तो कोई दिमाग से। कहीं कोई भाई बनकर उसे गंदी नजरों से देखता है तो कहीं कोई मित्र बनकर। घर के आंगन से निकलकर जब वह ससुराल की दहलीज पर पांव रखती है तो यहां के सभी को खुश रखना उसकी जिम्मेदारी होती है। यहां तक कि पति के मां-बाप को वह अपना मां-बाप मान लेती है। परंतु उसका पति कभी भी उसके पिता-माता को अपना नहीं मानता। कुछ साल पहले पटना में बीएन कालेज के प्रोफेसर मटुकनाथ ने तो अपनी शिष्या जुली को कुछ इस तरह के पाठ पढ़ाये कि बिना शादी ही जुली उनके साथ रहने लगी। जुली की उम्र प्रोफेसर की आधी है। दोनों देखने में बाप-बेटी लगते हैं। प्रोफेसर का एक बेटा भी है जो नौकरी करता है। यदि उसकी शादी प्रोफेसर ने की होती तो जुली की उम्र की बहू घर में होती। भोली-भाली जुली अपनी इज्जत प्रोफेसर के चरणों में समर्पित कर चुकी है। जुली का भविष्य क्या होगा? इसकी चिंता न समाज को है न ही प्रोफेसर को। प्रोफेसर और जुली की कहानी समाज के मुंह पर एक तमाचा है। पुरुष की विकृत मानसिकता का ज्वलंत उदाहरण है। पत्नी के परिवार को पुरुष किस तरह नजरअंदाज करता है। इसके लिये एक दूसरा उदाहरण-देश के रेलमंत्री और राजद के सुप्रीमो लालू प्रसाद बिहार के रहने वाले हैं। इनकी पत्नी राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। इसके बावजूद लालू प्रसाद के गांव फुलवरिया और उनका ससुराल सलारकलां में काफी फर्क है। दोनों के बीच सिर्फ कुछ किलोमीटर का ही फासला है। परंतु विकास में कई दशक का। लालू के गांव में रेफरल अस्पताल, रेलवे स्टेशन, बड़े-बड़े पक्के मकान, रजिस्ट्री आफिस, हैलीपैड, बैंक, विद्युत आफिस; इस गांव को यदि अमेरिका के राष्ट्रपति ऒबामा देख लें तो उन्हें अपना देश भारत से पीछे नजर आयेगा। वहीं राबड़ी देवी का मैके और लालू प्रसाद का ससुराल आज भी अन्य गांवों की तरह पिछड़ा हुआ है। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुरुष के विचार नारी के प्रति कैसा है? इस तरह के उदाहरण हर घर में देखने को मिलते हैं। वास्तव में इस सोच को बदले बिना नारी का विकास नहीं हो सकता।

1 टिप्पणी:

  1. आप बात तो सारी पुरुष मानसिकता की कर रहे हैं और अन्‍त में नारी विकास नहीं हो सकता, लिख रहे हैं। नारी तो विकसित ही है, यदि किसी का नजरिया तंग है तो उसके नजरिये को विकसित करने की जरूरत है। यदि कोई पुरुष अपने लिए कुछ करता है तो इससे स्‍पष्‍ट होता है कि उसे जरूरत है और साथी महिला को वह समर्थ मानता है। आज हमें पुरुष की मानसिकता के बदलाव की आवश्‍यकता है। अत: हमें यह लिखना चाहिए कि जब तक पुरुष का विकास नहीं हो सकता तब तक उसकी मानसिकता नहीं बदलती।

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