शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

लाश...श्मशान...डोम...रुपये

आदमी खाली हाथ आया है और खाली हाथ ही चला जाएगा। इस सच को सभी जानते हैं। इसके बावजूद भौतिक सुख के पीछे मनुष्य जीवन भर भागता फिरता है। किसी भी घर में जब पैसे के लेनदेन पर विवाद होता है तो बुजुर्ग यह कहने से नहीं चूकते कि उनके मरने के बाद सारी संपत्ति यहीं रह जाएगी। बात भी सच है कि मनुष्य मरने के बाद कुछ भी लेकर नहीं जाता है। पर यह भी सच है कि यदि किसी की मौत हो जाए और उसके परिजनों के पास पैसे नहीं हैं तो शव जलाना असंभव होगा। शास्त्रों के अनुसार, यदि मरने के बाद किसी का दाह-संस्कार ठीक से नहीं किया जाता है तो उसकी आत्मा भटकती रहती है। मनुष्य जीवन भर किसी व्यकि्त को चाहे कितना कष्ट क्यों न पहुंचाये परंतु उसके मरने के बाद धूमधाम से दाह संस्कार जरूर करता है। उसे डर रहता है कि कहीं उसकी आत्मा उसे तंग करना न शुरू कर दे। इस भ्रम में लगभग सभी मनुष्य रहते हैं। पटना के कदमकुआं इलाके में एक साधारण परिवार के अभिभावक की मौत तीन माह पूर्व हो गयी थी। सारे परिजन गम में डूबे थे। यहां कोई बुजुर्ग नहीं था। पड़ोसियों ने बताया कि मृतक को ले जाने के लिए आवश्यक सामान मंगवाना होगा। इस बीच झोले के साथ पंडित जी पधारे। उनसे पूछा गया कि क्या-क्या मंगवाना है। इसपर, उन्होंने लंबी-चौड़ी सूची परिजनों को थमा दी। साथ ही यह भी कहा कि ऎसा न करने पर मृतक की आत्मा भटकती रहेगी। पंडित जी के बताये सारे सामान मंगवा लिये गये। मृतक को जलाने के लिए गुलबी घाट पर ले जाया गया। पता चला कि पहले रजिस्ट्रेशन होता है। इसकी व्यवस्था सरकार की तरफ से की गयी है। इसके लिये राशि भी कम लगती है। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी करने के बाद परिजनों ने जलाने के लिए लकड़ी खरीदे। इसके बाद लकड़ी सजाने वालों से शुरू हुआ मोल-तोल। इस परिवार के सदस्य एक-दूसरे से फुसफुसाते हैं कि इसके लिये पैसे कहां से आयेंगे। खैर घाट पर आये एक पड़ोसी से उधार लेकर इसकी भी व्यवस्था हो गयी। तबतक घाट का 'डोम' लंबे-लंबे पग भरता पहुंचा। पंडित जी फुसफुसाये आग देने के लिए 'डोम' ही दियासलाई जलाता है। 'डोम' से कहा गया कि 'भैया मेरे' जरा दियासलाई जला दें। 'डोम' भड़का और कहा-पहले बीस हजार रुपये निकालें। परिजन भौंचक-उन्हें लगा कि बीस रुपये मांग रहा है। मृतक के एक बेटे ने दस-दस के दो नोट निकालकर 'डोम' को दिये। 'डोम' ने दोनों रुपये जमीन पर फेंक दिये और गरजा भीख दे रहो हो क्या? वह आप से अब तुम पर उतर गया। इसी बीच एक अन्य मृतक की लाश पहुंची। 'डोम' की आंखें चमकने लगी। वह भागता हुआ वहां पहुंचा। इस लाश के साथ आनेवाले परिजन कुछ मालदार दिख रहे थे। इधर चिता सजाये परिजन सोचने लगे कि अब लाश कैसे जलायें। विचार-विमर्श शुरू हो गया। पंडित जी फिर फुसफुसाये, दो हजार में पट जाएगा। परिजन बोले कहां से लाये इतने रुपये, खुद दियासलाई जला लेंगे। पंडित जी बोले, ऎसा अनर्थ न कीजिएगा। आत्मा भटकती रहेगी, आपलोग चैन से जी नहीं पाइएगा। इसके पश्चात यहां आये सभी पड़ोसियों से उधार लेने का सिलसिला शुरू हुआ। जीवन में कभी उधार न देनेवाले भी दो सौ उधार दे दिये। इस तरह दो हजार जमा किये गये। हजार विनती और हाथ-पैर जोड़ने के बाद 'डोम' ने दियासलाई जलायी। सभी परिजन जाड़े में भी पसीने-पसीने हो गये। यह सोचकर कि क्या लाश को जलाने के लिए भी इतनी मिन्नतें करनी पड़ती है। खैर लाश तो जल गयी, पंडित जी भी साथ ही लौटे। पुन: अगले दिन कई पन्ने की लिस्ट थमा दी। इसे पूरा करने में परिजनों को हजारों रुपये खर्च करने पड़े। किसी ने जेवर बेच डाले तो किसी ने उधार लिये। परंतु पंडित जी के बताये सारे पूजा-पाठ करवाये। यह सोचकर कि कहीं उनके अभिभावक की आत्मा न भटके। हर श्मशान घाट पर 'डोम' का ही राज चलता है। सरकार के किसी नियम-कानून को वे नहीं मानते हैं। यूं कह सकते हैं कि लाश को पंचतत्व में विलीन होने के लिए भी रुपये चाहिए। भारत सरकार को यह कानून तो बनाना ही चाहिए कि शव जलाने में इस तरह के सौदेबाजी का सामना किसी परिजन को न करना पड़े। घाटों पर चल रहे 'डोम' के रंगदारी को खत्म करने की दिशा में भी कठोर कदम उठाने की जरूरत है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बशीर बद्र साहब का एक शेर है कि-

    जिन्दगी तू ने मुझे कब्र से कम दी है जमीं।
    पाँव फैलाऊँ तो दीवार पे सर लगता है।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  2. shrmnaak hai kisi ki mout par vyapar..log parmparaon ke naam par lut rahen hain. galati dom ya pandit ki nhi hai galti hm dhrmbhiru logon ki hai.

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