गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

निराश जिंदगी को दान - भाग दो

देखते-देखते दिसम्बर आ गया। बाहरी 'डोनर' भी नहीं मिला। दीदी की हालत खराब होती जा रही थी। घर में निराशा फैलती जा रही थी। मैं भी कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था। परंतु राखी और इंसानियत का कर्ज तो चुकाना ही था। आखिरकार मैंने किडनी देने का फैसला कर ही लिया। अपनी पत्नी से इस बात की चर्चा की तो वह नाराज हो गयी। कहने लगी हमारे बच्चे अभी बहुत छोटे हैं। उसने अपनी माँ से इस सम्बन्ध में बात की। उन्होंने हँसते हुए कहा-जो आदमी इंजेक्शन देख पसीने-पसीने हो जाता है। वह आपरेशन नहीं करवा सकता है। मैनें ऑफिस के दोस्तों से बात की। सभी ने 'ना' में जवाब दिया। इसी बीच मैंने एक माह की छुट्टी के लिए आवेदन दे दिया। अठारह दिसम्बर को लखनऊ जाना था। तबतक मैंने छोटे या दीदी से नहीं कहा था कि मैनें छुट्टी ले ली है। सोलह दिसम्बर को छोटे का फोन आया-कहा कि आप लखनऊ चल रहे हैं या नहीं, मैंने 'ना' में जवाब दिया। कहा-कि तुमलोग चलो मैं पीछे से आऊंगा । उसने कहा-जब किडनी देने की लिए जांच शुरू हो ही जायेगी तो आप जाकर क्या करेंगे। मैं यह बात सुनकर अवाक रह गया। मैंने कहा-तुम चिंता मत करो मैं चलूंगा। लखनऊ पहुंचकर मैंने डॉक्टर से मुलाकात की और आपरेशन के लिए हामी भर दी। जांच शुरू हो गयी। एक ही जांच मेरा और दीदी का होता था। एक दिन दीदी का एक्सरे होना था। मैं बाहर मेज पर बैठा था। जीजा काफी पीने गये थे। तभी छोटा मेरी किडनी की जांच रिपोर्ट लेकर हांफता हुआ आया। वह काफी घबराया हुआ था। मैंने उसे बैठने के लिए कहा। तभी जीजा भी आ गये। छोटे ने कहा कि आप किडनी नहीं दे सकते हैं। डॉक्टर ने कहा है कि आपकी दोनों किडनी काफी कमजोर है। जीने के लिए आपको दोनों किडनी चाहिए। कुछ देर के लिए सन्नाटा.... मैंने कहा कि तुम घबराओ मत मैं खुद डॉक्टर से बात करता हूं। मैं डॉक्टर के पास पहुंचा। वे बोले-यदि आप किडनी देते हैं तो आपको आजीवन परहेज से रहना होगा। उधर, दीदी हर पल मौत की तरफ जा रही थी। मुझे हर पल उसका मुर्झाया चेहरा दिखता था। मुझे अपनी जिंदगी से ज्यादा उसकी चिंता थी। ये जानते हुए भी कि आपरेशन के बाद मैं हमेशा के लिए रोगी बन जाऊंगा । मैंने 'हा' में हामी भर दी। मेरी पत्नी इस बात से अनजान थी। बीस जून, 06 की सुबह छह बजे मैं आपरेशन थिएटर में पहुंचा। चार बजे मुझे होश आया। आपरेशन हो चुका था। दीदी को नई जिन्दगी मिल गयी थी । क्रमश...

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें