रविवार, 31 मई 2009

बिहार में 'अपहरण उद्योग' ने फिर पसारा पांव

बिहार में अपहरणकर्ताऒं ने फिर से पांव पसारना शुरू कर दिया है। 29 मई को पटना के मासूम सत्यम और बेतिया के जितेन्द्र की हत्या अपहरणकर्ताऒं ने कर दी थी। सत्यम की हत्या तो रोंगटे खड़े कर देनेवाले हैं क्योंकि उसकी उम्र महज आठ साल थी। सत्यम का हत्यारा अविनाश की उम्र भी सिर्फ चौदह साल है। इस हत्या में उसने अपने दोस्त खुशीर्द की मदद ली थी। दोनों पकड़े जा चुके हैं और अपना अपराध कबूल चुके हैं। दोनों ने यह भी बताया कि हत्या करने की प्रेरणा उन्हें 'अपहरण' फिल्म देखकर मिली। बेतिया के छात्र जितेन्द्र का अपहरण कुछ ही दिन पहले पेशेवर बदमाशों ने कर लिया था। उसका भी शव गोपालपुर थाने के शिवाघाट पुल के समीप से बरामद किया गया। इस घटना के एक सप्ताह पहले ही पटना के एक ठेकेदार व जदयू नेता सत्येन्द्र सिंह का अपहरण कर लिया गया था। इस मामले में यहां के वरीय पुलिस अधिकारी दबी जबान में स्वीकार कर चुके हैं कि सत्येन्द्र की हत्या कर दी गयी है। परंतु शव न मिलने के चलते पुलिस खुलकर कुछ भी बताने से इनकार कर रही है। इस मामले में पूर्व सांसद विजय कृष्ण के बेटे का नाम आ रहा है। इसी हफ्ते मुजफ्फरपुर के मोतीपुर से चिकित्सक के बेटे का अपहरण किया गया है। पुलिस इस मामले में अब तक सुराग नहीं ढूंढ़ सकी है। इसी क्रम में 31 मई को मुजफ्फरपुर के देवरिया थाने के सोहांसी गांव से तीन वर्षीय ऋतिक का अपहरण कर लिया गया। एक के बाद एक हो रही अपहरण की घटनाऒं ने सूबे की पुलिस की नींद उड़ा कर रख दी है। सत्यम के हत्यारे तो नाबालिग हैं और फिल्म देखकर अपहरण की योजना बनायी थी। हत्यारा अविनाश को सत्यम 'भैया' कहता था। आठ साल का मासूम परंतु चंचल सत्यम को क्या पता कि 'भैया' ही उसकी जान ले लेगा। अविनाश उसे साइकिल पर बैठाकर अपने कमरे में ले गया था। सूत्र बताते हैं कि अपने दोस्त खुशीर्द के साथ मिलकर उसने सत्यम के शरीर से छेड़खानी भी की थी। सत्यम जोर-जोर से चिल्लाने लगा और घर जाने की जिद करने लगा। अविनाश ने घबराकर उसके मुंह को जोर से दबा दिया। बेचारे सत्यम ने कुछ ही पल में तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। तब अपने दोस्त के साथ मिलकर अविनाश ने सत्यम के शव को एक बोरे में बंद कर दिया और कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया। फिर गुलजारबाग के एक बूथ से सत्यम के पिता को टेलीफोन कर पचास लाख की फिरौती मांगी। नहीं देने पर सत्यम को जान से मारने की धमकी दी। तबतक मामला पुलिस के पास पहुंच चुका था। पुलिस ने अविनाश को गिरफ्तार कर लिया। उसने कुछ मिनट में अपना जुर्म स्वीकार कर लिया। अविनाश डीएवी का छात्र था। उसके पिता किराना का दुकान चलाते थे। आक्रोशित लोगों ने दुकान तक फूंक डाली। सत्यम की हत्या में किसी बड़े और शातिर गिरोह का हाथ नहीं था। यह बात सामने आ चुकी है। परंतु बाकी सभी अपहरण में शातिर बदमाशों की संलिप्तता है। इस लोकसभा चुनाव में कई दिग्गजों की करारी हार हुई है। इसके पश्चात एकाएक 'अपहरण उद्योग' का सक्रिय होना कई संदेह को जन्म देता है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सत्ता संभालते ही अपराधियों के हौसले पस्त हो गये थे। सूबे में 'अपहरण उद्योग' पर विराम लग गया था। इस तरह की घटनाऒं को अंजाम देनेवालों में से अधिकतर या तो जेल जा चुके हैं या भय से छिप चुके हैं। नीतीश के विकास के नारे के सामने औंधे मुंह गिर चुके दिग्गजों के सामने अब उन्हें पछाड़ने का एक ही उपाय है कि वे अपने कुछ शातिरों की मदद से सूबे में तांडव मचाये ताकि विस चुनाव में उन्हें मुद्दा मिल सके।

गुरुवार, 28 मई 2009

अमेरिका के गाल पर उत्तर कोरिया का तमाचा

पूरा विश्व अमेरिका की तानाशाही से अवगत है। कमजोर देश हमेशा इस बात से भयभीत रहते हैं कि कहीं अमेरिका आर्थिक मदद देना बंद न कर दे। इन सारी बातों को जानते-समझते हुए भी उत्तर कोरिया ने परमाणु परीक्षण कर एक तरह से अमेरिका को खुलेआम चुनौती दे डाली है। अमेरिका के अलावा परमाणु संपन्न हर देश ने उत्तर कोरिया के इस परीक्षण की आलोचना की है। परमाणु संपन्न सभी देश यह जानते हैं कि यदि परमाणु युद्द शुरू हुआ तो पृथ्वी पर कोई नहीं बचेगा। आज अकेले अमेरिका के पास ही इतनी परमाणु शक्ति है कि वह पूरे संसार को कई बार नेस्तनाबूद कर सकता है। इसके पश्चात रूस की ताकत को भी कम करके नहीं आंका जा सकता है। अमेरिका ने 6 अगस्त 1945 में जापान के हिरोशिमा शहर पर यूरेनियम-23 से बने 12.5 किलोटन वाले परमाणु बम गिराया था। जिससे अस्सी हजार लोग मारे और चालीस हजार से अधिक घायल हो गये थे। पूरा हिरोशिमा शहर तबाह हो गया था। आज भी हिरोशिमा में जन्म लेने वाले कई बच्चे सामान्य नहीं होते। इस घटना की तबाही को पूरी दुनिया ने महसूस किया। इसके बावजूद परमाणु शक्ति हासिल करने की होड़ शुरू हो गयी। कुछ ही साल में कई देश परमाणु संपन्न हो गये। बाद में अमेरिका-रूस सहित कई देशों ने महसूस किया कि यदि छोटे-छोटे देश भी इस शक्ति को हासिल कर लेते हैं। और कहीं इसका गलत इस्तेमाल कर देते हैं तो पृथ्वी का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जिस विकास की दौड़ में हम रह रहे हैं, उससे काफी पीछे जाना पड़ेगा। यदि भूल से भी बड़े देश इसका इस्तेमाल कर देते हैं तो संसार ही मिट जाएगा। पूरा विश्व समुदाय इस पर चिंतन कर रहा है कि वैसे देश जो परमाणु संपन्न नहीं हैं, उन्हें कैसे रोका जाए। इसके लिये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई कानून बने हैं। सारे नियम को ताक पर रख उत्तर कोरिया ने परमाणु परीक्षण कर विश्व समुदाय के मुंह पर करार तमाचा जड़ा है। उत्तर कोरिया ने पहला परमाणु परीक्षण 9, अक्टूबर 2006 को किया था। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उसके परमाणु कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगा दिया था। परमाणु संपन्न बड़े देशों ने परमाणु कार्यक्रमों को रोकने के बदले ऊर्जा सहायता और दूसरे लाभ देने की पेशकश की थी। 2007 में उत्तर कोरिया परमाणु हथियारों को नष्ट करने के लिए राजी भी हो गया था। इसके बावजूद परमाणु परीक्षण इस बात का द्योतक है कि उत्तर कोरिया अमेरिका समेत विश्व बिरादरी को यह बताना चाहता है कि वे उसे कमजोर करके न आंके। एक चर्चा यह भी है कि उत्तर कोरिया के नेता किम जांग इल का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है। वे अपने तीन बेटों में एक को उत्तराधिकारी बनाने चाहते हैं। ऍसे में वे इस परीक्षण के जरिए दुनिया का ध्यान उत्तर कोरिया की ऒर खींचना चाहते हैं। अब वे परमाणु परीक्षण न करने के बदले अमेरिका से मनचाही मदद ले सकते हैं। फिलहाल परमाणु संपन्न अन्य देशों से उत्तर कोरिया की जबरदस्त तनातनी चल रही है। इसी क्रम में उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की धमकी भी दे दी है। उसने प्लूटोनियम बनाने वाले एक संयंत्र को दोबारा चालू कर दिया है। उत्तर कोरिया ने अमेरिका तक को भी चेतावनी दे डाली है कि यदि उसने सैन्य कार्रवाई के नापाक इरादे नहीं छोड़े तो अंजाम गंभीर होंगे। उत्तर कोरिया किसी भी हमले का जवाब देने को तैयार है। इधर, बढ़ती खींचातानी को देखते हुए रूस ने परमाणु युद्ध की आशंका जतायी है। साथ विश्व समुदाय से सोच-समझकर कार्रवाई करने की अपील की है। उत्तर कोरिया के इस रवैये से अमेरिका स्तब्ध है। अमेरिका जानता है कि उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था चरमरायी हुई है। उसे अपने देश के लोगों को खिलाने के लिए भी सहायता की जरूरत है। ऍसे में परमाणु परीक्षण की क्या जरूरत पड़ गयी? विश्व समुदाय हर हाल में उत्तर कोरिया के इस अभियान को रोकना चाहता है। परंतु सबसे अधिक चिंता अमेरिका को है। क्योंकि एक छोटा देश होने के बावजूद उत्तर कोरिया ने सिर उठाने की जुर्रत की है।

मंगलवार, 26 मई 2009

'प्रेस्टीज इस्यू' बनी फतुहा सीट

बिहार में 28 मई को फतुहा विधानसभा का उपचुनाव होना है। इस सीट पर अपने प्रत्याशी की जीत के लिए राजद-लोजपा के सुप्रीमो लालू प्रसाद और रामविलास ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। वहीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार किसी भी कीमत पर इस सीट को खोना नहीं चाहते हैं। जदयू विधायक सरयुग पासवान की मौत के बाद इस सीट पर चुनाव होना है। जदयू ने इस सीट पर अपने प्रत्याशी अरुण मांझी को खड़ा किया है। दिवंगत पासवान की विधवा टिकट न मिलने से नाराज होकर बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं। राजद-लोजपा गठबंधन की ऒर से पुनित राय चुनाव लड़ रहे हैं। पुनीत लोजपा उम्मीदवार हैं। लालू-रामविलास अपने खोये जनाधार पाने के लिए छटपटा रहे हैं। फतुहा में आयोजित एक चुनावी सभा में लालू प्रसाद ने कहा कि अब वे गांवों में जाएंगे। लोगों की समस्याऒं को सुनेंगे और उसका निबटारा करेंगे। यानी वे इस बात को मानते हैं कि इससे पहले उनसे चूक हुई है? भले ही इस बात को वे खुले शब्दों में न स्वीकार करें। फतुहा सीट दोनों नेताऒं के लिए 'प्रेस्टीज इस्यू' बन गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आश्वस्त हैं कि यह सीट जदयू के पाले में जाएगी। लालू-पासवान ने फतुहा में जमकर प्रचार किया है। लालू गांवों में जाकर ग्रामीणों से तक से भेंट की। उन्हें आश्वस्त भी किया कि वे उनके सबसे बड़े हमदर्द हैं। दोनों नेताऒं को कांग्रेस से भी भय है। पहली बार कांग्रेस ने इस सीट पर अपने प्रत्याशी खड़े किये हैं। कांग्रेस सवर्ण वोट यदि काटती है तो जदयू के पाले में यह सीट जाना तय है। कांग्रेस की भूमिका 'वोटकटवा' रूप में देखी जा रही है। इधर, जीत के प्रति आश्वस्त होने के बाद भी जदयू कोई रिस्क लेना नहीं चाहता है। वह किसी भी कीमत पर बिहार में राजद-लोजपा के पांव मजबूत नहीं होने देना चाहता है।

सोमवार, 25 मई 2009

पंजाब हिंसा से सबक ले सरकार

किसी भी घटना-दुर्घटना के बाद सड़क जाम और तोड़फोड़ देश में आम बात होती जा रही है। तोड़फोड़ करने वालों में कुछ असामाजिक तत्व तो कुछ युवा भी शामिल रहते हैं। युवा चाहते हैं कि उनकी बात सरकार तक पहुंचे, इसके लिये वे तोड़फोड़ के हथकंडे को अपनाते हैं। वहीं, असामाजिक तत्वों का कोई उद्धेश्य नहीं होता। किसी भी दुर्घटना के बाद यदि तोड़फोड़ होती है तो इसके लिये सरकार भी कम जिम्मेदार नहीं है। कुछ ही मामले ऍसे होते हैं जिसमें तोड़फोड़ व हंगामा करने वाले एकतरफा जिम्मेदार होते हैं। दोनों ही स्थितियों में तोड़फोड़ और देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना उचित नहीं है। यदि किसी व्यक्ति की हत्या हो जाती है तो उसके परिजनों की एक ही चाहत होती है कि दोषियों को सजा मिले। परंतु देश की कानून व्यवस्था ऍसी है कि दो दशक बाद भी कम ही लोगों को इंसाफ मिल पाता है। बिहार के सीतामढ़ी में 11 अगस्त 1998 को समाहरणालय में शांतिपूर्वक जुलूस इसके पश्चात सभा करने के लिए इक्ट्ठे हुए बाढ़ पीड़ितों पर तत्कालीन एसपी परेश सक्सेना ने गोली चलाने का हुक्म दिया था। इसमें पूर्व विधायक रामचरित्र राय, एक महिला सहित पांच लोग मारे गये थे। एसपी ने जदयू नेता मनोज कुमार समेत कई लोगों को प्रताड़ित भी किया गया था। तब मनोज ने एसपी पर मुकदमा दर्ज किया। इस मामले में आज तक उन्हें इंसाफ नहीं मिला। मनोज की आंखें न्याय की आस में आज भी नम हैं। इधर के कुछ वर्षों में देखने को मिल रहा है कि सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए लोग तोड़फोड़ व हंगामा का सहारा ले रहे हैं। सरकार उनकी मांगें तब सुनती हैं लाखों-करोड़ों की संपत्ति बर्बाद हो जाती है। 5 मई को सीतामढ़ी के पुपरी में करंट से बस में बैठे तीस से अधिक यात्री झुलसकर मर गये थे। अफसरों की नींद तब खुली थी जब ग्रामीणों ने हंगामा व तोड़फोड़ शुरू किया। जिस वक्त यह घटना घटी राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, लोजपा के रामविलास पासवान व मुख्यमंत्री चुनावी सभा में मशगूल थे। तीनों बड़े नेताऒ में से किसी ने घटनास्थल पर पहुंचना मुनासिब नहीं समझा था। इसी तरह आस्ट्रिया के वियाना में दो सिख गुटों के बीच झड़प में घायल संत रामानंद की मौत 25 मई को हो गयी। केन्द्र को जब इस बात की जानकारी हुई, उसी वक्त आस्ट्रिया सरकार से इस संबंध में संपर्क साधना चाहिए था कि वहां की सरकार क्या कार्रवाई कर रही है। देश के नाम सरकार का बयान जारी होना चाहिए था। परंतु ऍसा कुछ नहीं हुआ। नतीजन, सिखों को लगा कि सरकार इस संबंध में चिंतित नहीं है। सरकार का ध्यान इस मुद्दे पर जाए, सिखों ने 25 मई को जम्मूतवि एक्सप्रेस के 11 डिब्बे फूंक दिये। इसके अलावा कई बसों को आग के हवाले कर दिया। देखते ही देखते वियाना की आग पंजाब के जालंधर, लुधियाना, होशियारपुर पहुंच गयी। पंजाब में करोड़ों की संपत्ति को सिखों ने आग के हवाले कर दिया। बिगड़ते हालात पर काबू पाने के लिए सरकार ने कई जगहों पर कर्फ्यू लगा दिया। इतना होने पर केन्द्र की सरकार जागी और प्रधानमंत्री ने सिखों से धैर्य रखने की अपील की। यह भी बयान जारी किया गया कि आस्ट्रिया के अधिकारियों से संपर्क रखा जा रहा है। यहां ध्यान देनेवाली बात है कि सिख जानते हैं कि यह घटना दूसरे देश में हुआ है। ऍसे में उनका इरादा सिर्फ अपनी बात को सरकार तक पहुंचाना था। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट अपने एक मह्त्वपूर्ण फैसले में कह चुका है कि देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले से ही यह राशि वसूली जाएगी। इसके बावजूद उसका कोई असर नहीं दिख रहा है। जनता सरकार तक अपनी मांग कैसे पहुंचाए? इस पर सरकार को विचार करना चाहिए। तोड़फोड़ के बाद और करोड़ों की संपत्ति के नुकसान के बाद ही क्यों चेतती है सरकार? इसपर भी गंभीरता से मंथन होना चाहिए।

शुक्रवार, 22 मई 2009

बचिए चाटुकारों से

आप चाहे जिस माहौल में रहते हैं। बुद्धिजीवियों के बीच या गंवारों के बीच, गांव में या शहर में, दफ्तर में या घर में, दोस्तों के बीच या गैरों के बीच दिनभर में कई ऍसे व्यक्ति मिल जाएंगे जो चाटुकारिता कर आपसे अपना मतलब निकाल लेंगे। आप जबतक इस बात को समझेंगे तबतक ठगे जा चुके होंगे। ट्रेन में आप सफर कर रहे हैं, कई लोग अपने बातचीत से आपका ध्यान खींचने की कोशिश करते हैं। इस तरफ ज्यों ही आपका ध्यान जाता है और आप उसकी बातों में रुचि लेने लगते हैं। वह आपकी चाटुकारिता कर आपके नजदीक आने की कोशिश करता है। थोड़ी ही देर में वह आपको सिगरेट या फिर चाय या बिस्कुट के लिए आमंत्रित करता है। जैसे ही आप उसका साथ देते हैं, थोड़ी ही देर में आप नशे में झूमने लगते हैं। होश आने पर पता चलता है कि चाटुकारिता करते-करते उक्त व्यक्ति आपको चूना लगा फरार हो चुका है। आप लुट चुके हैं। व्यक्ति की सबसे बड़ी कमजोरी होती है कि वह अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है। वह यह सुनने के लिए कतई तैयार नहीं होता कि उसमें बहुत सारी कमियां हैं। उसके मित्र या खुद उसके घरवाले भी यदि उसे समझाते हैं कि 'तुम अपनी कमी को सुधारो, वह भड़क जाता है।' बाहर की छोड़िए घर में भी कई बार बच्चे अपने अभिभावक की चाटुकारिता करने से नहीं चूकते हैं। बच्चे ऍसा तब करते हैं जब उन्हें अभिभावक से किसी काम के लिए पैसे लेने हों या फिर दोस्तों के साथ कहीं घूमने का प्रोग्राम बना हो। कई बार अभिभावक जान-बूझकर बच्चों के सामने झुक जाते हैं वहीं कई बार अभिभावक बच्चों की बात सुन इतने आनंदित हो जाते हैं कि उन्हें इस बात का अहसास तक नहीं होता कि बच्चे अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। ठीक इसके विपरीत कभी-कभार अभिभावक भी बच्चों की चाटुकारिता कर अपना काम निकाल लेते हैं। परंतु घर की चाटुकारिता घातक नहीं होती। इसमें प्रेम का मिश्रण होता है। विभिन्न दफ्तरों में इस तरह की चाटुकारिता खूब देखने को मिलती है। बास की चाटुकारिता करने वालों को फायदा होता है। कई बार ऍसा भी होता है कि बास सही-गलत का फर्क नहीं कर पाते और चाटुकार के इर्द-गिर्द ही घूमते रहते हैं। इसका नुकसान दफ्तर के दूसरे साथियों को उठाना पड़ता है। कुछ साल पहले की बात है एक बार मेरे बास ने टेलीफोन पर आदेश दिया कि आप (काल्पनिक नाम) राजेश को तुरंत हटा दें। मैंने कहा कि आप उसे थोड़े दिन के लिए सस्पेंड कर दें परंतु उसे हटायें नहीं। बास ने कहा कि 'मेरे बाल पक गये हैं, तुम मुझे सिखाऒगे।' मैंने राजेश को नहीं हटाया। परंतु बास के अनुरूप सुधरने की हिदायत दी। थोड़ी नाराजगी के बाद बास मान भी गये। उन्हें लगा कि मैं सही कह रहा हूं। इसी क्रम में एक चाटुकार ने चाटुकारिता शुरू कर दी। उसने कहा कि 'बास यह तो आपके आदेश का उल्लंघन है।' उसका चाटुकारिता रंग लाया। बास ने राजेश को फिर हटाने के लिए कहा। राजेश के बिना दफ्तर का काम बाधित होता था। इसलिए मैं उसे हटाना नहीं चाहता था। हालांकि बाद में बास के दबाव में मुझे उसे हटाना पड़ा। पुन: कुछ ही दिन बाद बास ने फिर उसे रखने के लिए कहा। वजह थी कि दूसरे बड़े चाटुकार ने राजेश को रखने के लिए चाटुकारिता की। मैं काम पर विश्वास करता था। मुझे ये महसूस होता था कि यदि मेरा काम बेहतर होगा तो दफ्तर इसे पसंद करेगा। मैं यहां गलत था, अधिकतर दफ्तरों में काम बाद में चाटुकारिता पहले पसंद किया जाता है। मेरे चाटुकारिता न करने का परिणाम हुआ कि मुझे दो साल इन्क्रीमेंट नहीं मिला। एक बार प्रोमोशन से भी वंचित रहना पड़ा। अंतत: मुझे उस संस्थान को छोड़ना पड़ा। मीडिया में काम करने वाले एक मित्र से मैंने पूछा कि यार तुम कैसे बास की चाटुकारिता करते हो। उसने बताया कि वह बास ही नहीं; अन्य कई साथियों की भी चाटुकारिता करता है। उसने बताया कि यदि किसी जूनियर या सीनियर रिपोर्टर की वह कापी चेक करता है। गलतियां मिलने पर उक्त रिपोर्टर को बुलाकर कहता है कि इसमें काफी गलतियां हैं। इसे फिर से लिखकर लाएं तो वह रिपोर्टर अपनी भूल मानने के बदले गोलबंदी शुरू कर देता है। ऍसे में उससे यही कहना बेहतर है कि यार तुम्हारी कापी का तो कोई जवाब ही नहीं। उक्त रिपोर्टर जो गलती पन्द्रह साल पहले करता था। अब भी वही गलती करता है, वह खुद को सबसे सीनियर समझता है। इस तरह जूनियर रिपोर्टर से कम भी जानने वाले चाटुकारिता की बदौलत आज ऍसी कुर्सी पर विराजमान हैं जहां उन्हें नहीं होना चाहिए। चाटुकारिता करनेवाले लोगों से हमेशा सावधान ही रहना चाहिए। ये बिना मतलब कभी आपकी चाटुकारिता नहीं करनेवाले हैं। यह भी सही है कि इनकी चाटुकारिता से बड़े-बड़े लोग प्रभावित हो जाते हैं। फिर ये चाटुकार मतलब के लिए उनका शिकार करते हैं।

गुरुवार, 21 मई 2009

मंत्री नहीं बनेंगे लालू प्रसाद!

प्रधानमंत्री बनने का दावा करने वाले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद क्या इस बार मंत्री भी बन पायेंगे? कांग्रेस उनके सामने घास डालने के लिए भी तैयार नहीं है। लालू विनती भरे स्वर में यूपीए को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा कर चुके हैं। इसके बावजूद यूपीए की महत्वपूर्ण बैठकों में उन्हें आमंत्रित नहीं किया जा रहा है। लालू चारा घोटाले के आरोपी हैं। उन्हें इस बात का भय सता रहा है कि कहीं उनके खिलाफ सीबीआई ने टेढ़ा रुख अपनाया तो उन्हें फिर से जेल की हवा खानी पड़ेगी। चारा घोटाले में जब वे पिछली बार जेल गये थे तो बिहार में उनकी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं। इस वजह से जेल में उन्हें किसी तरह की असुविधा नहीं हुई थी। उन्हें यह भी महसूस नहीं हुआ था कि वे जेल में हैं। परंतु इस बार बिहार में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं, वे भी उनके खिलाफ अवसर ढूंढ़ रहे हैं। लालू एक दूरदर्शी व्यक्ति हैं, उन्हें इस बात का अंदाजा है। तभी वे यूपीए को हर हाल में समर्थन देना चाहते हैं ताकि सीबीआई के प्रहार से वे बच सकें। लालू मंत्रिमंडल में शामिल न हों, इसके लिये कई कांग्रेसी नेता विरोध कर रहे हैं। पिछले चुनाव में लालू के पाले में 22 सीटें आयी थीं। इस बार राजद को सिर्फ चार सीटें मिलीं। ऍसे में लालू यूपीए से 'बार्गेन' की स्थिति में नहीं हैं। 16 मई को मतगणना शुरू होने के तीन घंटे बाद ही लालू का चेहरा सफेद पड़ गया था। वे ठीक से बोल भी नहीं पा रहे थे। पूरा रिजल्ट आने के बाद भी उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि उनकी पराजय हो चुकी है। इस बार यूपीए लालू के सामने चारा डालने के लिए तैयार नहीं है। सिंह की तरह दहाड़ने वाले लालू की आवाज धीमी पड़ चुकी है। वे हार मान चुके हैं। यह भी महसूस कर चुके हैं कि यदि वे बिहार में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़े होते तो उन्हें इतना अधिक नुकसान नहीं होता। लालू को कहीं से कोई उम्मीद की किरण नजर नहीं आ रही है कि इस बार उन्हें मंत्री की कुर्सी मिलेगी। सत्ता सुख पाने को बेचैन लालू हर तरफ हाथ-पांव मार रहे हैं कि चार सांसदों के समर्थन के बदले उन्हें मंत्री की कुर्सी मिल जाए। कांग्रेस में कई मंत्री उनके हितैषी भी हैं। ऍसे में मुमकिन है कि थोड़ी झिड़की के बाद कांग्रेस उन्हें कोई पद दे दे। राजनीति में सबकुछ संभव है, ऍसे में शायद लालू की मिन्नतें काम आ जाए। चुनाव के पहले कांग्रेस के खिलाफ बयान देनेवाले लालू ने आज चुप्पी साध ली है। लालू का कहना है कि जनता ने उन्हें नकारा है। वे जनता के दरबार में फिर जाएंगे। अपनी भूल को सुधारेंगे और फिर जीतेंगे। उनके पुराने दिन फिर लौटेंगे। परंतु इसके लिये लालू को पांच साल इंतजार करना होगा।

बुधवार, 20 मई 2009

वाकई मर गया प्रभाकरण !

श्रीलंका ने अधिकारिक रूप से 19 मई को घोषणा कर दी कि लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण मारा गया। प्रभाकरण का शव भी मिल गया। श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि पच्चीस साल बाद तमिल विद्रोहियों से श्री लंका मुक्त हो गया। राजीव गांधी की हत्या में भी प्रभाकरण का ही हाथ था। इस लिहाज से भारत के लिए यह एक बहुत बड़ी खुशखबरी है, परंतु एक सवाल यह भी है कि क्या वास्तव में प्रभाकरण इतनी आसानी से मारा गया। हालांकि श्रीलंका की सेना ने जब ठोक-बजाकर हर तरह से तसल्ली कर ली। इसके पश्चात ही महिंदा राजपक्षे ने अपना बयान दिया। प्रभाकरण की लाश की पहचान ऍसे लोगों से भी करायी गयी है जो कभी उसके नजदीक रहे थे। इसके बावजदू प्रभाकरण मारा गया, इस बात पर यकीन नहीं होता। हालांकि इसमें शक की गुंजाइश नहीं है। परंतु, एक तरफ श्रीलंका की सरकार जब प्रभाकरण की लाश मिलने की पुष्टि कर रही थी। दूसरी तरफ उसके कुछ समर्थक भी बयान दे रहे थे कि प्रभाकरण जिंदा हैं। श्री लंका की सरकार के दावे के बाद भी कुछ सवालों के जवाब नहीं मिल रहे हैं। प्रभाकरण की उम्र कोई 54 के आसपास थी। परंतु उसका शव उसके बेटे से अधिक जवान दिखा। उसके चेहरे पर कोई झुर्री नजर नहीं आ रही थी। श्रीलंका का एकबार बयान आया कि भागते वक्त सेना ने मार गिराया। फिर बयान आया कि उसने भागने की कोई कोशिश नहीं की। उसके समर्थकों की मानें तो वह जिंदा और सुरक्षित है। यदि उनकी यह कल्पना हकीकत है तो तत्काल प्रभाकरण सामने आनेवाला नहीं है। वह इस मौके का फायदा उठाकर किसी सुरक्षित स्थान पर शरण लेगा। इसके पश्चात लड़ाकू क्षमता मजबूत करेगा। प्रभाकरण का दिमाग एक साथ कई ऒर काम करता था। ऍसे में यह संभव है कि मेडिकल साइंस की मदद से खुद के बचाव के लिए एक कवच बनाया हो जिसका इस्तेमाल इस बुरे वक्त में इस रूप में किया हो। प्रभाकरण की डीएनए जांच पर भी सवाल उठ रहे हैं। श्रीलंका की सेना ने दो घंटे में ही यह टेस्ट पूरा कर लिया जबकि इस टेस्ट के लिए चार घंटे से अधिक का समय चाहिए। यह भी एक सवाल उठ रहा है कि घने जंगलों में कैसे इस जांच को पूरा किया गया। प्रभाकरण का संबंध भारत के झारखंड राज्य से भी था। वह एक बार झारखंड आया भी था। लिट्टे समर्थक भारतीय नेता पी. नेदुमारन ने भी दावा किया है कि प्रभाकरण जिंदा है और सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा है कि वे दोबारा सक्रिय होंगे। इसमें एक बात और सामने आ रही है कि प्रभाकरण तो मर गया अब कहीं लिट्टे का आंदोलन कमजोर न पड़ जाए। इसलिए उसके समर्थक इस तरह के बयान देकर श्रीलंका की सरकार को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं। उम्मीद है कि श्रीलंका की सरकार जल्द ही इस भ्रम पर भी विराम लगा देगी।

बिना सत्ता कैसे रहेंगे रामविलास पासवान!

लोकसभा चुनाव में रामविलास पासवान ने राजद सुप्रीमो से हाथ क्या मिलाया कि लोजपा का सूपड़ा ही साफ हो गया। चुनाव के दो माह पहले लालू-पासवान पुरानी बात भुलाकर भाई बन चुके थे। 'भाई' बनना कितना घातक हुआ, इस बात को पासवान बखूबी समझ रहे हैं। पासवान देश के उन चंद नेता में शामिल हैं जो बिना सत्ता सुख के नहीं रह सकते हैं। यही कारण है कि जिस पार्टी की सरकार बनती है वे उसमें शामिल हो जाते हैं। ये वाजपेयी की सरकार में भी शामिल हो चुके हैं। पिछले चुनाव में लोजपा को बिहार में चार सीटें मिली थीं। पासवान ने कांग्रेस को समर्थन दिया था, बदले में इन्हें केन्द्रीय मंत्री की कुर्सी मिली थी। इस चुनाव में उनका सूपड़ा साफ हो चुका है। वे शून्य पर आउट हो चुके हैं। अब ये कैसे मंत्री बनेंगे? यह एक ज्वलंत सवाल है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि फिलहाल ये राज्यसभा सांसद बनकर कोई न कोई मंत्री पद जरूर पा लेंगे। हालांकि कांग्रेस किसी भी कीमत पर इन्हें घास डालने को तैयार नहीं है। पासवान कई दूसरी पार्टियों से भी संपर्क में हैं, जो सत्ता सुख पाने में इनकी मदद करे। यदि सारी 'जुगाड़ व्यवस्था' ' फेल हो जाती है तब पासवान क्या करेंगे? सत्ता इनके लिये भोजन से कम जरूरी नहीं है। इस चुनाव में एक और आश्चर्यजनक बात सामने आयी कि खुद को दलितों का मसीहा कहने वाले रामविलास को दलितों ने भी पूरी तरह से नकार दिया। लालू से हाथ मिलाने की बात अब ये सदैव याद रखेंगे। चुनाव के ठीक पहले लालू-पासवान ने आपस में गठबंधन कर बिहार के 40 में से 37 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। कांग्रेस के पाले में गयी थीं सिर्फ तीन सीटें। इससे भड़की कांग्रेस ने बिहार की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। चुनाव के ठीक पहले लालू-पासवान का एक होना जनता को नहीं भाया। जनता ने दोनों नेताऒं के खिलाफ अपने मताधिकार का प्रयोग किया जिससे लोजपा का सूपड़ा ही साफ हो गया। राजद के रघुवंश प्रसाद सिंह भी मानते हैं कि चुनाव के पहले दोनों नेताऒं का मिलन जनता को रास नहीं आया। पासवान को अब खोया जनाधार पाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। बिहार में सोलह माह बाद विधानसभा का चुनाव होना है। यह चुनाव भी उनके लिये काफी महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल यह देखना है कि पासवान अपनी 'जुगाड़ व्यवस्था' में फेल होते हैं या पास।

मंगलवार, 19 मई 2009

लालू के विरोध में उठने लगे स्वर

रेल मंत्री के पद से हटते ही लालू प्रसाद के खिलाफ एक साथ कई तरफ विरोध के स्वर गूंजने लगे हैं। चुनाव में करारी हार के बाद लालू को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करने की आवाज भी तेज हो गयी है। बिहार में एकजुट कांग्रेसजन का कहना है कि लालू के चलते पार्टी को काफी नुकसान उठाना पड़ा है। ऍसे में इन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करने का कोई औचित्व नहीं है। लालू के विरोध में पटना में कांग्रेसियों ने जमकर प्रदर्शन किया। वहीं, केन्द्रीय मंत्रिमंडल का इस्तीफा होते ही 19 मई को लालू के पटना स्थित आवास से आरपीएफ का कैंप उखड़ गया। रेलवे ने आवास के भीतर चल रहे कैम्प कार्यालय को भी समेटना की कवायद शुरू कर दी है। इससे लालू प्रसाद के आवास पर हड़कंप मंच गया। उनके आवास पर कोई चार दर्जन जवान तैनात किये गये थे। देखते ही देखते यह बात वरीय अधिकारियों तक पहुंच गयी। बात बढ़ते देख वरीय आरपीएफ अधिकारी ने दो दर्जन जवानों को पुनः आवास पर भेज दिया। साथ ही अपना बयान भी बदल दिया। कहा कि-फटे तंबू बदलने के लिए जवानों को हटाया गया था। रेलवे के एक अधिकारी ने दबी जबां में कहा कि रेल मंत्रालय से आदेश आने के बाद ही अब जवानों को हटाया जाएगा। सूत्र बताते हैं कि लालू प्रसाद इस बार बिना शर्त यूपीए को समर्थन देने को राजी हैं। दूसरे शब्दों में मिन्नतें कर रहे हैं कि किसी तरह यूपीए राजद को भी शामिल कर ले। सूत्र यह भी बता रहे हैं कि लालू प्रसाद जी तोड़ कोशिश में लगे हुए हैं कि किसी तरह उन्हें कोई मंत्री का पद मिल जाए। हालांकि कहीं से भी इसकी संभावना नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस में कई बड़े नेताऒं ने भी खुलकर कहा है कि लालू को दरकिनार कर चलना चाहिए। परंतु राजद के ही पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह को कांग्रेस लोकसभा का अध्यक्ष बनाना चाहती है। राहुल गांधी को रघुवंश प्रसाद का काम काफी पसंद आया था। हालांकि इस पर अभी पूर्ण रूप से सहमति नहीं बनी है। लालू समय के अनुसार रंग बदलने में माहिर नेता हैं। ऍसे में वे खुद के लिए 'जुगार' लगाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि पांच वर्ष तक उन्हें सत्ता सुख से अलग न रहना पड़े। यह भी सच है कि ऍसा पहली बार देखा जा रहा है कि लालू के विरोध में एक साथ कई आवाजें मुखर होने लगी हैं। इससे पहले वे जोड़-तोड़ की राजनीति कर हर आवाज को दबाते रहे हैं।

सोमवार, 18 मई 2009

देश में हो स्थायी सरकार

इस चुनाव में जनता ने कांग्रेस को वोट देकर साबित कर दिया कि सबको विकास के साथ देश में स्थायी सरकार चाहिए। मिली-जुली सरकार न तो जनता के विश्वास पर खड़ी उतर पाती है न ही देश हित में कोई बड़ा फैसला ही ले पाती है। यह अलग बात है कि बिहार में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें ही मिलीं। इसकी वजह यहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं जो जनता की नजर में विकास पुरुष हैं। अब तक नीतीश ने लाखों बेरोजगार युवकों को रोजगार दिया है। इसमें बड़ी संख्या में टीचर की बहाली भी है। जनता ने इस बार बिहार में बाहुबली सहित लोजपा का सूपड़ा भी साफ कर दिया। नीतीश लहर कुछ इस तरह बही जिसमें बड़े-बड़े दिग्गज बह गये। बड़े स्तर पर कराये गये सर्वे में यह बात सामने उभरकर आयी कि जनता ऍसी ही सरकार चाहती है जो पांच साल तक स्थायी रहे। वह बार-बार चुनाव को झेलने के लिए तैयार नहीं है। वोटर वो चाहे हिन्दू हो या मुसलमान सभी को चाहिए 'विकास'। मंदिर बने या मस्जिद यह सब बाद में पहले रोजी-रोटी और सुरक्षा चाहिए। यही कारण है कि भाजपा को पिछले चुनाव से इस बार बीस सीटें कम मिलीं। पिछले चुनाव में भाजपा को 138 जबकि इस बार 118 सीटें ही मिलीं। वहीं कांग्रेस को पिछली बार 145 अबकी 206 सीटें मिलीं। यदि यूपीए गठबंधन की बात करें तो इसके पास 261 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए 272 के जादुई आंकड़े पार करने के लिए यूपीए को जितनी सीटें चाहिए, उससे कई गुना अधिक निर्दलीय सहित सपा-राजद बिना शर्त अपना समर्थन देने के लिए तैयार हैं। भाजपा ने चुनाव से पहले कई लुभावने पांसें जनता के सामने फेंके थे। हिन्दूत्व का नारा भी दिया था, परंतु सब फेल। सिर्फ हिन्दू होने या मुसलमान होने से पेट नहीं भरता। इस बात को जनता ने इस बार बखूबी समझा। जनता ने तो यूपीए सरकार के गठन के लिए फूलों का रास्ता बना दिया। अब केन्द्र में सरकार बन जाने के बाद जनता यह भी चाहेगी कि सरकार मंदी से बेरोजगार लाखों लोगों के लिए कुछ करे। वे कंपनियां जो बर्बाद होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं, सरकार इनके लिए भी कुछ करे। जनता की नजर इसपर भी रहेगी कि सरकार देश को कैसे मंदी से उबारती है। सैकड़ों कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को यह कहकर इन्क्रीमेंट नहीं दिया कि कंपनी घाटे में चल रही है। इन सबकी नजरें नयी सरकार रहेंगी। पाकिस्तान, आंतकवाद जैसे मुद्दे देश में मुंह खोले खड़े हैं। देश में महंगाई की दर भले ही घटी हो परंतु हर चीज की कीमत में भारी उछाल आया है। करोडों गरीबों को दाल-रोटी नसीब नहीं हो रहा है। नयी सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाती है।

...तो चेहरा नहीं दिखायेंगे लालू

बात 23 अप्रैल की है। बिहार के 12 सीटों पर दूसरे चरण के लोस चुनाव के घंटे भर बाद ही राजद और लोजपा को लगने लगा था कि उनकी स्थिति ठीक नहीं है। लोजपा सुप्रीमो का भाग्य ईवीएम में बंद हो चुका था। मतदान के थोड़ी देर बाद ही रामविलास पासवान राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के घर पहुंचे। लालू ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि यदि रामविलास पासवान हाजीपुर से दो लाख से कम वोट से जीते तो हम लोग अपना चेहरा नहीं दिखायेंगे। यह खबर अखबार व कई टेलीविजन चैनलों पर आयी। 16 मई को ईवीएम में से राजद-लोजपा के विरोध में 'जिन्न' निकलना शुरू हुआ। लोजपा का सूपड़ा बिहार से साफ हो गया। वह शून्य पर आउट हो गयी। पिछले चुनाव में बिहार में राजद को 22 सीटें मिली थीं। इस चुनाव में लालू प्रसाद पाटलिपुत्रा से चुनाव हार गये। यह संयोग ही है कि वे छपरा से चुनाव जीत गये। लालू के सारे दिग्गज मैदान में ढेर हो गये। राजद के खाते में सिर्फ चार सीटें आयीं। लालू हार के दर्द से कराह उठे। उन्होंने मीडिया के लिए दरवाजे बंद कर दिये। इस बात की खबर जब चैनलों पर आने लगी तो लालू ने कहा कि कांग्रेस के साथ मिलकर नहीं लड़ने से करारी हार का सामना करना पड़ा है। पासवान ने भी कुछ इसी तरह का राग अलापा और दिल्ली के लिए रवाना हो गए। लालू की छटपटाहट देखने लायक थी। यह जगजाहिर है कि लालू सत्ता सुख के बिना एक पल भी नहीं रह सकते हैं। लालू के उस बयान को सभी भूल गये कि उन्होंने चेहरा न दिखाने की बात कही थी। इस पर किसी ने सवाल तक नहीं किया। लालू-पासवान न सिर्फ अपना चेहरा दिखाएंगे बल्कि राजनीति भी करेंगे। फिर ये नेता इस तरह के बेतुका बयान क्यों देते हैं? क्या सबसे ज्यादा मूर्ख इन्हें जनता ही नजर आती है? यह सोचने वाली बात है कि जिस तरह ये नेता समय के अनुसार अपना बयान बदल देते हैं। ऎसे में जनता कैसे विश्वास करे कि ये कौन-सा बयान सही दे रहे और कौन-सा गलत। अब लालू प्रसाद इस बात के लिए बेचैन हैं कि यूपीए में कैसे शामिल हों। कांग्रेस के कई नेता बयान दे चुके हैं कि उन्हें किसी के समर्थन कि जरूरत नहीं है। कांग्रेस का यह भी बयान आ चुका है कि ये 'असली' दोस्तों पर ही भरोसा करेंगे। लालू-रामविलास ने चुनाव के पहले बिहार में कांग्रेस की झोली में सिर्फ तीन सीटें डाली थीं। इससे बौखलायी कांग्रेस ने बिहार की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। इसका नुकसान लालू-पासवान को उठाना पड़ा। बिहार के यादवों ने ही लालू प्रसाद को नकार दिया। उनके खुद के अलावा जो तीन सीटें मिली हैं। तीनों पर राजपूत को जीत मिली है। लालू हर हाल में यूपीए के साथ बने रहने की बात दुहरा रहे हैं। यह तो तय है कि कांग्रेस यदि उन्हें यूपीए में शामिल करती भी है तो लालू को मनचाही कुर्सी नहीं मिलने वाली है।

शुक्रवार, 15 मई 2009

नीतीश ने बदले सुर, भाजपा को झटका

कहते हैं राजनीति में सबकुछ जायज है। अपने फायदे के लिए नेता कभी भी अपना सुर बदल सकते हैं। ये कब कौन-सा रंग अपनाएंगे कहना मुश्किल है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 15 मई को पटना में कहा कि वे उसी पार्टी को अपना समर्थन देंगे जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देगा। उनके इस बयान से भाजपा को जोरदार झटका लगा है क्योंकि अबतक नीतीश कुमार एलके आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए समर्थन देने की बात करते रहे हैं। अभी तक के चुनावी आंकड़े से लगता है कि कांग्रेस सांठगांठ कर सरकार बनाने में कामयाब हो जाएगी। यदि कुछ सीटें कम पड़ रही हो तो भी नीतीश के समर्थन से जादुई आंकड़ा 272 को छूने में कांग्रेस कामयाब हो जाएगी। यदि नीतीश कांग्रेस को अपना समर्थन देते हैं तो बिहार में उनकी सरकार गिर सकती है क्योंकि तब भाजपा अपना समर्थन वापस ले सकती है। यह भी हो सकता है कि नीतीश ने अंधेरे में पांसा फेंका हो। यह भी संभव है कि भाजपा के खिलाफ तीसरे मोर्चे को समर्थन दे दें। हालांकि इसका अंदेशा कम है। नीतीश वोट को अपने पाले में करने के लिए कांग्रेस कई बार पांसा फेंक चुका है। यह सत्ता का ही खेल है कि लोकसभा चुनाव के दो सप्ताह पहले तक राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद और लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान एक-दूसरे के खिलाफ बयान देते रहे हैं। फौरन चुनाव में गठबंधन के बाद एक-दूसरे को भाई कहने लगे। कहने लगे कि दोनों भाई मिलकर विकास करेंगे। उनके इस मिलाप पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तीखी टिप्पणी की थी। यह भी कहा था कि चुनाव बाद और केन्द्र में सरकार बनते ही दोनों एक-दूसरे के खिलाफ फिर से बयान देना शुरू कर देंगे। नीतीश ने यह भी कहा था कि दोनों मनचाही कुर्सी के लिए केन्द्र पर दबाव बनाने के लिए ऍसा कर रहे हैं। 30 मई को तीसरे चरण के चुनाव के बाद कांग्रेस को महसूस होने लगा कि बिना त्रीय पार्टियों की मदद से सरकार बनाना संभव नहीं होगा। ऍसे में स्वच्छ छवि के नेता माने जाने वाले नीतीश कुमार पर कांग्रेस की नजर गयी। कांग्रेस के राहुल गांधी ने एक चुनावी सभा में नीतीश कुमार की प्रशंसा कर दी। उन्होंने बिहार में हो रहे विकास की भी तारीफ की। इससे साफ हो गया कि कांग्रेस नीतीश वोट को अपने पाले में करना चाहती है। तब नीतीश ने कड़ा बयान जारी कर कहा कि वे एलके आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए समर्थन करेंगे। 13 मई को पांचवें चरण का चुनाव समाप्त हो गया और सभी पार्टियों को यह अंदाजा हो गया कि उन्हें कितने वोट मिलेंगे। इसके साथ ही शुरू हो गया सांठगांठ का दौर। तीन दिन ही पहले कोसी विवाद को लेकर प्रधानमंत्री ने नीतीश कुमार को टेलीफोन कर बात की थी। इससे साफ होने लगा था कि नीतीश कुमार अपना समर्थन कांग्रेस को दे सकते हैं।

गुरुवार, 14 मई 2009

इन 'ललबबुऒं' को चाहिए तरक्की

25 डिग्री पारा में इन्हें 'लू' मार देता है। दस कदम चलने पर इनके पांव में सूजन आ जाती है। वेतन के लिए साइन करने पर इनकी अंगुलियां दु:खने लगती हैं। इनका शरीर गुलाब की पंखड़ी से भी नाजुक है। इन्हें आराम वाला काम चाहिए। वेतन भी आराम वाला ही चाहिए यानी साथ काम करने वाले से दोगुना। तरक्की मामले में ये हमेशा सबसे अगली पंक्ति में खड़े रहते हैं। अब जरा जनाब के व्यवहार के बारे में जानिए-इन्हें यदि आपसे जरूरत है तो आपके आगे-पीछे मंडराते रहेंगे। थोड़ी-थोड़ी देर में आपको चाकलेट या पान; आप जो भी पसंद करते हैं खिलाते रहेंगे। दफ्तर चाहे प्राइवेट हो या सरकारी 'ललबबुऒं' की कमी नहीं है। एक 'ललबबुआ' को उसके बास ने कहा-'यार कभी-कभी तुम भी काम कर लिया करो।' जनाब ने तपाक से उत्तर दिया-आप तो मेरे स्वभाव से अवगत हैं, मैंने आज तक काम नहीं किया है। काम करने से मेरी आंखें दु:खती हैं। ये जनाब प्रतिदिन दफ्तर में हाजिरी बनाने अवश्य पधारते हैं ताकि हर माह वेतन ले सकें। जब भी 'प्रोमोशन' का समय आता है ये जनाब बास की जी हुजूरी शुरू कर देते हैं। कई बार जी हुजूरी का फायदा उठा, इन्हें तरक्की भी मिल जाती है। आप जिस दफ्तर में काम कर रहे हैं वहां भी एक-दो 'ललबबुए' जरूर होंगे। यदि गलती से कभी आपने 'ललबबुए' को यह कह दिया कि तुम 'देहचोर' हो और चपरासी के लायक भी नहीं हो। इसका परिणाम आपको भुगतना पड़ेगा क्योंकि इस 'ललबबुए' की पकड़ बास के बास तक है। यह 'ललबबुआ' जानता है कि बास अपने बास की बात नहीं टालेंगे। इसी का वह फायदा उठाता है। इसकी कभी इच्छा हुई तो कुछ काम कर दिया। नहीं तो राम...राम...बाय बाय...यदि इस 'ललबबुए' के काम को कभी कोई सीनियर चेक कर रहा हो और उसमें गलती निकल जाए तो वह दांत निकालकर ठी...ठी...ठी...ठी...करने से भी बाज नहीं आता। ऍसे 'ललबबुए' की हर जगह चलती है। ये जानकारी तो क्लर्क का रखते हैं परंतु कुर्सी इन्हें अफसर वाली चाहिए। हरेक दफ्तर में ऍसे लोगों की भरमार है। ये नौकरी में आते हैं बड़ी पैरवी से और साठ साल तक बने भी रहते हैं। इन्हें समय-समय पर तरक्की भी मिलती रहती है।

मायावती को सुप्रीम कोर्ट का तमाचा

वरुण गांधी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के लिए जोरदार तमाचे से कम नहीं है। यह तमाचा उन सभी नेताऒ के गाल पर भी जो कानून की ताकत को कम करके आंकते हैं। सुप्रीम कोर्ट कई बार ऍसे फैसले सुनाता है जिससे भारतवासियों का विश्वास कानून के प्रति बढ़ जाता है। वरुण मामला भी कुछ इसी तरह का है। सुप्रीम कोर्ट ने 14 मई को उत्तरप्रदेश की सरकार को वरुण पर से रासुका हटाने का आदेश दिया है। भाजपा के उम्मीदवार वरुण गांधी ने पीलीभीत में भड़काउ भाषण दिये थे। यह भाषण सांप्रदायिकता को भड़काने वाला था। इस भाषण के बाद नेताऒ ने वोट के लिए राजनीति करनी शुरू कर दी। हर कोई वरुण के भाषण को मुद्दा बनाना चाहता था। शुरू के दौर में भाजपा ने बयान दिया कि वरुण के भाषण से पार्टी का कोई लेना देना नहीं है। बाद में उत्तरप्रदेश की सरकार ने वरुण पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून [रासुका] लगा दिया। रासुका लगते ही वरुण को जेल जाना पड़ा। इसके बाद भाजपा को अहसास हुआ कि इसे चुनावी मुद्दा बनाया जा सकता है। तब भाजपा के राजनाथ सिंह ने जगह-जगह घूमकर भाषण देना शुरू किया कि वरुण के साथ ज्यादती हुई है। यूपीए सरकार में शामिल राजद के सुप्रीमो लालू प्रसाद ने तो वरुण के बारे में अपने भाषण में यहां तक कह दिया कि यदि वे गृह मंत्री होते तो वरुण के छाती पर बुल्डोजर चढ़वा देते। मीडिया में जब यह खबर आयी तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने कानून का बुल्डोजर चढ़वाने की बात कही थी। वरुण के बारे में राजनीति के जानकारों का कहना है कि वरुण ने जानबूझकर भड़काउ भाषण दिये ताकि राजनीति में अपना स्थान बना सकें। वहीं एक पक्ष का कहना है कि वरुण राजनीति में अभी कच्चे हैं। रासुका हटाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से वरुण को काफी राहत मिली है। वहीं बसपा को झटका लगा है। कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव शुक्ला ने युवा भाजपा नेता और बसपा सरकार पर वोट बैंक की राजनीति में लिप्त होने का आरोप लगाया है। उन्होंने दावा किया कि यह प्रकरण वरुण को मदद नहीं करेगा क्योंकि भाजपा नेतृत्व आखिरकार उन्हें किनारे कर देगा। कांग्रेसी नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने कहा कि युवा नेता भाजपा के लिए लाभदायक होने के बजाय 'भार' अधिक हैं।

बुधवार, 13 मई 2009

केन्द्र में फिर बनेगी मिली-जुली सरकार!

लोकसभा के पांचवें चरण का चुनाव 13 मई को समाप्त हो गया। 16 को मतगणना हो जाएगा। इसके साथ ही किस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं, इसका खुलासा भी हो जाएगा। अब तक के चुनाव रुझान से यह साफ हो गया है कि किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने जा रहा है। देश की बड़ी पार्टियों के आलाकमान के चेहरे अभी से उतर गये हैं। उन्हें इस बात का भय सताने लगा है कि यदि क्षेत्रीय दलों ने मदद नहीं की तो सरकार बनाना मुश्किल हो जाएगा। यदि कई छोटे-छोटे दल की मदद से सरकार बनानी पड़ी तो ये पांच साल तक नासूर बनकर कष्ट देते रहेंगे। इस चुनाव में भी दो ही पार्टी को तिहाई में सीटें मिलने की उम्मीद है। ये है-कांग्रेस और भाजपा। बाकी सभी को दहाई से ज्यादा सीटें नहीं मिलने वाली है। अब तक के रुझान से तय माना जा रहा है कि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी। इसके बाद भाजपा का नंबर होगा। विभिन्न चैनलों द्वारा कराये गये 'एक्जिट पोल' में भी स्थिति स्पष्ट नहीं दिख रही है। कई बार 'एक्जिट पोल' के विपरीत ईवीएम से परिणाम निकलते हैं। कांग्रेस को विश्वास है कि वह सरकार बना लेगी। एक तो खुद को वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में देख रही है। कई छोटे दल इस ताक में रहते हैं कि सरकार किस पार्टी की बन रही है। समय के अनुसार ऎसे दल अपने दो-तीन या कुछ अधिक सांसद का समर्थन सरकार बनाने में देते हैं। बदले में ये अपने सभी सांसद को मंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। ऎसे दल सरकार बनाने में मदद के बदले अपनी हर उल्टी-सीधी मांगें पूरी करवाते हैं। सरकार गिर न जाए, इसके भय से इनकी हर मांगें मान भी ली जाती है। पिछले साल जब यूपीए से वामदलों ने परमाणु मुद्दे पर समर्थन वापस ले लिया था तो सरकार बचाने के लिए कांग्रेस को झामुमो के शिबू सोरेन तक से मदद लेनी पड़ी थी। बदले में शिबू सोरेन ने झारखंड के मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव कांग्रेस के सामने रखा था जिसे कांग्रेस को मान लेना पड़ा था। नतीजन झारखंड के मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को गद्दी छोड़नी पड़ी थी। हालांकि शिबू सोरेन विधानसभा का चुनाव हार गये थे जिससे उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देना पड़ा था और वहां राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा था। इसी तरह मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने भी कांग्रेस को अपना समर्थन दिया था। इसी पार्टी के अमर सिंह ने कुछ ही माह में कई बार समर्थन वापस लेने की धमकी दी थी। कुल मिलाकर मिली-जुली सरकार हमेशा अस्थिर ही रहती है। समर्थन देनेवाला दल हमेशा अपनी लंबी-चौड़ी मांगें रखता है। मांगें पूरी न होने पर समर्थन वापस लेने की धमकी देता है। इस तरह पूरे पांच साल तक सरकार अस्थिर बनी रहती है। इसका सबसे ज्यादा असर विकास कार्यों पर पड़ता है। 13 मई को अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने एक बयान में कहा कि कांग्रेस को भाजपा के साथ मिलकर केन्द्र में सरकार बनाना चाहिए। क्षेत्रीय दल की मदद से सरकार बनाने पर सरकार हमेशा डांवाडोल स्थिति में रहती है। ऎसे में सरकार चाहकर भी देश हित में बड़े फैसले नहीं कर पाती है। शत्रुघ्न इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि कम से कम ये दोनों पार्टियां एक नहीं हो सकती हैं। भाजपा पर सांप्रदायिकता को भड़काने का आरोप लगता रहा है। इसे मुस्लिम वोट भी अधिक नहीं मिल पाता है। वहीं कांग्रेस मुस्लिम वोट पर अपना एकाधिकार समझती है। हर चौक-चौराहे पर इसी बात की चर्चा हो रही है कि यदि फिर मिली-जुली सरकार बनी तो महंगाई और बढ़ेगी। पहले से मंदी की मार झेल रहे व्यवसायी भी कम चिन्तित नहीं है।

मंगलवार, 12 मई 2009

पीएम झुके, नीतीश को किया टेलीफोन

कोसी प्रलय के रुपये को लेकर कई दिनों से चल रहा आरोप-प्रत्यारोप पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंगलवार (12 मई) को विराम लगाने की भरपूर कोशिश की। प्रधानमंत्री ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को टेलीफोन कर इस मुद्दे पर बात की। इस बात की चर्चा राजनीति महकमे में जोरों पर है। कई राजनेता मानते हैं कि चार चरणों के चुनाव के कांग्रेस को महसूस होने लगा है कि सरकार बनाने के लिए उसे अन्य पार्टियों की मदद लेनी पड़ेगी। राजद-लोजपा पहले ही कांग्रेस को ठेंगा दिखा चुके हैं। इसी का परिणाम रहा कि कांग्रेस को बिहार में अकेले चुनाव लड़ना पड़ा। परिस्थिति को भांपकर ही पिछले हफ्ते राहुल गांधी ने नीतीश कुमार की तारीफ की थी। हालांकि नीतीश ने साफ-साफ कहा था कि एलके आडवाणी ही प्रधानमंत्री बनेंगे। मामला कुछ यूं है-रविवार को लुधियाना में आयोजित राजग की रैली में नीतीश ने केंद्र पर आरोप लगाया था कि बिहार में लोकसभा संपन्न होने के दस मिनट बाद ही केंद्र ने फैक्स भेजकर कोसी प्रलय से निबटने के लिए दिये गये 1000 करोड़ रुपये वापस मांग लिये। इसका जवाब प्रधानमंत्री ने लुधियाना में ही यह दिया कि बाढ़ राहत के रुपये बिहार सरकार के पास महीनों पड़े रहे। यहां की सरकार राशि खर्च ही नहीं कर सकी। मनमोहन सिंह ने यह भी कहा था कि नीतीश झूठे हैं। इस पर पुनः नीतीश ने आक्रोश और आश्चर्य जताते हुए कहा था कि रुपये खर्च कर दिये गये हैं। कोसी मुद्दे पर उठते विवाद को देख 12 मई को प्रधानमंत्री ने 'यूटर्न' ले लिया। उन्होंने झुकते हुए नीतीश को टेलीफोन किया और इस मामले में बात की। उन्होंने नीतीश को आश्वासन दिलाया कि कोसी मसले पर विचार किया जाएगा। इस मामले में नीतीश ने कहा कि प्रधानमंत्री को इस मसले पर शीघ्र ही निर्णय लेना चाहिए। वहीं राजनीति के जानकारों का कहना है कि कांग्रेस चाहती है कि नीतीश को वह अपने में मिला ले ताकि सत्ता के जादुई आंकड़े को वह आसानी से पार कर सके। पिछले ही सप्ताह बिहार के प्रदेश अध्यक्ष ने भी नीतीश की प्रशंसा की थी। इतना तो तय है कि किसी भी पार्टी को इस चुनाव में पूर्ण बहुमत नहीं मिलने जा रहा है। ऎसे में गठजोड़ की राजनीति अभी से शुरू हो गयी है।

शुक्रवार, 8 मई 2009

सीतामढ़ी-शिवहर की धरती बायोडीजल के लिए उपयुक्त

दुनिया के सभी देशों में पेट्रोल-डीजल की खपत कैसे कम की जाए, इस बात पर मंथन चल रहा है। ऎसे में बायोडीजल (जेट्रोफा) की खेती का महत्व काफी बढ़ गया है। बिहार के सीतामढ़ी व शिवहर जिले की धरती बायोडीजल के लिए काफी उपयुक्त है। फिलहाल दोनों जिले के 82 हेक्टेयर से अधिक भूमि में बायोडीजल की खेती की जा रही है। बाढ़ग्रस्त इलाका होने के कारण दोनों जिले के कई हेक्टेयर भूमि हर वर्ष बेकार हो जाती है। यही बेकार पड़ी भूमि बायोडीजल के लिए उपयुक्त है। एक कट्ठा जमीन में जेट्रोफा (रतनजोत ) के सिर्फ 46 पेड़ लगाये जाते हैं। दो पेड़ों के बीच की दूरी कम से कम दो मीटर होनी चाहिए। बीज बोने के दो वर्ष बाद जेट्रोफा फल देना शुरू कर देता है। परंतु नर्सरी लगाने पर एक वर्ष में ही यह फल देने लगता है। इस फल के अंदर से बीज निकलता है। इसी बीज से तेल निकाला जाता है जिसका इस्तेमाल डीजल के रूप में किया जा सकता है। एक कट्ठा जमीन में 23 किलो जेट्रोफा का बीज निकलता है। वहीं छठे वर्ष में एक पेड़ से पांच किलो बीज निकलता है। एक किलो बीज से चालीस फीसदी ही तेल निकाला जा सकता है। ऎसे में पांच साल बाद ही किसानों को फायदा शुरू होता है। इस पेड़ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके तेल में कार्बन मोनोआक्साइड गैस की मात्रा कम होती है। इससे पर्यावरण ठीक रहता है। इसके पेड़ की पत्तियां तेलचट होने के कारण जानवर इसे खा नहीं पाते हैं। सीतामढ़ी के एक किसान त्रिवेणी झा ने जबलपुर के एक सेमिनार में भाग लेकर इसकी खेती का गुर सीखा और एक छोटे प्रयास के तहत 75 डिसमिल भूमि में नर्सरी व बीज बोये। शुरुआती दौर में सीतामढ़ी के डुमरा प्रखंड के हरिछपड़ा में राम जानकी सिंह, फतहपुर में ब्रजबिहारी सिंह ने खेती शुरू किया। देखते-देखते यहां के सैकड़ों किसानों ने जेट्रोफा की खेती शुरू कर दी। सीतामढ़ी-शिवहर के किसानों द्वारा उपजाए गये जेट्रोफा (रतनजोत) के बीज जबलपुर व कोलकाता में अपनी पहचान बना चुका है। कोलकाता की कंपनी इसके बीज को जापान और जर्मनी भेजती है। इसके बीज को सीतामढ़ी के किसान जबलपुर से मंगवाते हैं। परंपरागत खेती में एक हेक्टेयर में 100 मजदूरों की जरूरत पड़ती है जबकि जेट्रोफा की खेती के लिए पांच मजदूरों की। बिना खाद व कीटनाशक डाले ही बंजर या बलुई भूमि पर इसकी खेती की जा सकती है। एक बार पेड़ लगाने पर पचास वर्षों तक यह फल देते रहता है। आंकड़े बताते हैं कि आनेवाले कुछ ही दशक में विश्व में डीजल समाप्त हो जाएगा। ऎसे में यही जेट्रोफा डीजल का स्थान लेगा। सरकार की ऒर से डीजल की खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहन के साथ ही आर्थिक मदद दी जानी चाहिए ताकि किसान इसके महत्व को समझे। वर्तमान में जेट्रोफा के बीज से यहां डीजल नहीं निकाला जा रहा है क्योंकि मांग के अनुरूप बीज की आपूर्ति नहीं हो पा रही है।

बुधवार, 6 मई 2009

चौकीदार बना नक्सलियों का हमदर्द

बिहार के कई जिलों में नक्सली अपना पांव पसार चुके हैं। इनकी गतिविधियां और क्रुरता दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। मुखिया समेत दर्जनों लोगों के आवास को ये नक्सली डाइनाइट से उड़ा चुके हैं। ये अधिकतर झूंड में ही हमला करते हैं। अब तक अनगिनत लोगों को ये मौत के घाट भी उतार चुके हैं। ऎसे में इनके प्रति जनता का आक्रोश भी बढ़ता जा रहा है। परंतु यह भी सच है कि चंद लोगों को रुपये का लालच देकर ये एक तरह से उन्हें खरीद लेते हैं। बदले में वह व्यक्ति मददगार के रूप में इन्हें छिपने की जगह मुहैया कराता है। वह पुलिस की खुफिया कार्रवाई की रिपोर्ट से भी अवगत कराता है। मददगार यह भूल जाता है कि चंद रुपये लेकर नक्सलियों की मदद बाद में कितना घातक होगा? इक्के-दुक्के लोगों के चलते ही इनकी सक्रियता बढ़ने के साथ ही पहले से अधिक जानलेवा साबित हो रही है। इन इक्के-दुक्के लोगों में किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी यहां तक की पुलिस के कुछ नुमाइंदे भी शामिल हैं। एक चौकीदार की मदद से मशरख के एक गांव से दो नक्सलियों के फरार होने का मामला सामने आया है। यह पुलिस के मुंह पर किसी जोरदार तमाचा से कम नहीं है। मालूम हो कि दूसरे चरण (23 अप्रैल) का लोकसभा चुनाव कराकर लौटने के क्रम में मुजफ्फरपुर के देवरिया थाना अंतर्गत कर्पूरी चौक के पास नक्सलियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट कर पुलिस वाहन उड़ा दिया। इस घटना में मजिस्ट्रेट व दारोगा समेत पांच लोग मारे गये थे। पुलिस वाहन के चिथड़े-चिथड़े उड़ गये थे। एक पुलिसकर्मी का हाथ ही उड़ गया था और वह बेहोश होकर घंटों वहीं पड़ा रहा था। घटनास्थल पर पुलिस फोर्स घंटों बाद पहुंची थी। बाद में इस घटना की छानबीन शुरू हुई तो परत-दर-परत जानकारी सामने आयी। सभी जानकारियां चौंकाने वाली थी। यह भी पता चला था कि इस कांड की साजिश झारखंड के चतरा में रची गयी थी। इधर पुलिस को पता चला कि सिवान के मशरख के एक गांव में दो नक्सली छिपे हैं। बड़े पुलिस अधिकारियों ने मशरख के थाना प्रभारी को तुरंत दोनों को गिरफ्तार करने के लिए कहा। इसी थाने में मौजूद एक चौकीदार ने यह सूचना दोनों नक्सलियों के पास पहुंचा दी। दोनों नक्सली फरार हो गये और थाना प्रभारी हाथ मलते रह गये। बाद में चौकीदार को गिरफ्तार कर लिया गया। उससे पूछताछ का दौर जारी है। वहीं थाना प्रभारी को भी 6 मई को निलंबित कर दिया गया। नक्सलियों की मददगार को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। तभी चंद रुपये के लालच में इन्हें पनाह देनेवालों में भय उत्पन्न होगा। एक मददगार के चलते ये नक्सली न जाने कितने मासूम लोगों को बेरहमी से कत्ल कर देते हैं। घटना के कुछ ही दिन बाद पुलिस भी जांच में सुस्त पड़ जाती है। परंतु जिनके परिवार के अभिभावक या इकलौता वारिस मारा जाता है। उनके घरों में ताजिंदगी अंधेरा छा जाता है।

मंगलवार, 5 मई 2009

...यमराज बनी बस


मां जानकी की जन्मस्थली सीतामढ़ी के लिए 5 मई (मंगलवार) अमंगल लेकर आया। अमंगल ऎसा जिसमें बाईस लोग करंट से असमय काल के गाल में समा गये। इनकी मौत इतनी भयानक थी कि शव देखने वालों की आंखें भी नम हो गयीं। बिना किसी रिश्ते-नाते के घटनास्थल पर पहुंचने वाले लोगों की आंखों से आंसू के बूंद टपक रहे थे। करंट से जले इन मृतकों में बच्चे, महिलाएं व बूढ़े भी शामिल थे। घर से चंदन-टीका कर और हंसते हुए वे सीतामढ़ी के पुपरी अनुमंडल से मुजफ्फरपुर आने के लिए सवार हुए थे। बस में 45 सीट थी। सभी पर यात्री थे। बस की छत पर भी कुछ लोग सवार थे। किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह यात्रा उनकी अंतिम है। यह भी नहीं सोचा होगा कि उनकी मौत इतनी भयानक होगी। बस तीन बचे पुपरी से खुली थी। कई बच्चे जिद कर खिड़की के किनारे बैठे थे। बाहर के सीन देख बच्चे कभी-कभी जोर-जोर से हंस भी पड़ते थे। महज आधा घंटा के सफर के बाद बस कोइली-शरीफपुर गांव के पास पहुंची। वहां 11 हजार वोल्ट का तार हवा में लटक रहा था। ड्राइवर ने सोचा कि वह साइड से बस को भगा लेगा। बस के अंदर बैठे सभी यात्री गपशप में मशगूल थे। इसी बीच एकाएक सारे यात्रियों के चीत्कार से इलाका दहल उठा। 11 हजार वोल्ट का तार बस में काल बनकर प्रवेश कर चुका था। छत पर बैठे कुछ यात्री को इतना तेज झटका लगा कि वे नीचे गिर पड़े। कुछ अन्य भी इसी आपाधापी में नीचे गिर पड़े। ये गंभीर रूप से चोटिल हो गये हैं। गेट के पास खड़े दो-तीन यात्री बाहर की ऒर कूद गये। जबतक ये संभलते तबतक एक साथ दर्जनों चीखें और चंद मिनट बाद पूरे बस में शव ही शव...इस सीन को देखने वाले की आंखें पथरा-सी गयी हैं। चीख इतना दर्दनाक था कि आसपास के गांव के सैकड़ों ग्रामीण तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गये। जब तक बिजली काटी गयी और अधिकारी पहुंचे। तबतक तो शव से गंध निकलने लगा था। किसी के पांव की जली हड्डी दीख रही थी। किसी का बुरी तरह झुलसा हाथ और चेहरा। बिहार सरकार के पास जब यह खबर पहुंची तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जांच का आदेश दे दिया। जिस वक्त यह घटना घटी राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, लोजपा के रामविलास पासवान व मुख्यमंत्री चुनावी सभा में मशगूल थे। तीनों बड़े नेताऒ में से किसी ने घटनास्थल पर पहुंचना मुनासिब नहीं समझा। बिजली विभाग ने मृतकों के परिजनों को एक-एक लाख देने की घोषणा कर अपने कर्तव्य से मुक्ति पा लिया। बिहार क्या भारत का इने-गिने ही ऎसे इलाके हैं जहां बिजली के तार कम लटके दिखेंगे। हर इलाके की घनी बस्ती से ट्रकें व बसें गुजरती हैं। इन इलाकों में भी तार झूलते रहते हैं। पूरे प्रदेश में रोज करंट की चपेट में आने से किसी न किसी की मौत हो जाती है। इसमें अधिकतर बिजली विभाग की लापरवाही से होता है। जर्जर लटकते तार आये दिन यमराज बन किसी न किसी का शिकार करते हैं। इसके बाद भी बिजली विभाग के साथ ही सरकार भी खामोश रहती है। सीतामढ़ी हादसे के वास्तविक दोषी को भी कोई सजा नहीं होने जा रही है। न ही सरकार इस घटना से चेतने जा रही है।

सोमवार, 4 मई 2009

सबकी नजरें लालू, शत्रुघ्न पर


लोकसभा के चौथे चरण का चुनाव सात मई को होना है। बिहार में 37 सीटों पर चुनाव हो चुका है। सिर्फ तीन सीटों पर चुनाव होना बाकी है। परंतु इन सीटों पर सारे बिहारवासियों की नजरें टिकीं हैं। वजह है-इस दौर के चुनाव में राजद सुप्रीमो और रेल मंत्री लालू प्रसाद पाटलिपुत्र से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। वहीं, अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा पटना साहिब से अपना भाग्य आजमा रहे हैं। इनके मुकाबले के लिए कांग्रेस ने टीवी स्टार शेखर सुमन को मैदान में उतार दिया है। तीसरी सीट नालंदा को इसीलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि क्योंकि यह बिहार के मुख्यमंत्री का गृह जिला है। सभी चुनावी भाषण में हर पार्टी अपनी जीत का दावा कर रही है। लालू प्रसाद का दावा है कि बिहार की सभी सीटों पर राजद-लोजपा के प्रत्याशी ही जीतेंगे। वहीं, जदयू-भाजपा गठबंधन का कहना है कि इस चुनाव में बिहार से राजद-लोजपा का सफाया तय है। वहीं, कांग्रेस ताल ठोक कर कह रही है कि चुनाव के परिणाम अप्रत्याशित होंगे। वामदल भी उक्त सभी पार्टियों के सफाये की बात कहता है। नेताऒं के बयान किसी हंसाने वाले चुटकुले से कम मजेदार नहीं है। क्योंकि चुनाव के परिणाम आते ही इनके रंग और बयान तुरंत बदल जाएंगे। कम सीट पाने वाले कहेंगे कि चुनाव में जबरदस्त धांधली बरती गयी है। यानी नेताऒ के पास गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले कई जादुई नुस्खे हर पल मौजूद रहते हैं। एक नेता के साल भर के बयान का यदि निष्कर्ष निकाला जाए और उसे जनता के सामने परोसा जाए तो पढ़नेवाला व्यक्ति ही शर्म से पानी-पानी हो जाएगा। फिलहाल बिहारवासियों की नजरें लालू, शत्रुघ्न व शेखर सुमन पर टिकीं हैं। पाटलिपुत्र में राजद सुप्रीमो की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। लालू से दो-दो हाथ करने के लिए कभी उनका सहयोगी रहे कांग्रेस उम्मीदवार विजय सिंह और जदयू के रंजन यादव खड़े हैं। सर्वविदित है कि हार के डर से लालू हमेशा दो जगहों से चुनाव लड़ते हैं। वे सत्ता सुख के बिना एक पल भी नहीं रह सकते हैं, ऎसा उनके विरोधी व बिहारवासी भी मानते हैं। इधर, पटना साहिब से शत्रुघ्न सिन्हा भाजपा से और कांग्रेस से टीवी स्टार शेखर सुमन आमने-सामने हैं। कांग्रेस जानती है कि शेखर को कोई ईश्वरीय करिश्मा ही चुनाव जीता सकती है। इसके बावजूद वोट काटने और कांग्रेस का जनाधार बढ़ाने के लिए पार्टी ने ऎसा निर्णय लिया। उसी तरह नीतीश कुमार का गृह जिला नालंदा पर भी लोगों की खास नजर है। यहां से जदयू ने कौशलेन्द्र को मैदान में उतार दिया है। पिछले चुनाव में जदयू के टिकट पर यहां से रामस्वरूप प्रसाद जीते थे। रामस्वरूप इस बार कांग्रेस से ताल ठोंक रहे हैं।

रविवार, 3 मई 2009

यहां जिंदगी की कीमत चंद रुपये!


कई साल पहले राज बब्बर की एक फिल्म आयी थी। फिल्म का नाम था-दूल्हा बिकता है। यह फिल्म काफी चली थी। तब सबकी जबां पर एक सवाल था कि चंद रुपये की खातिर एक दूल्हे ने खुद को बेच दिया। फिल्म के दूल्हे ने जब खुद को बेचा तो उसे इतने रुपये मिले थे कि उसके मकसद पूरे हो गये थे। परंतु जीवन का हकीकत ठीक इसके विपरीत है। भारत में लाखों ऎसे गरीब नौजवान हैं जिन्हें जान की बाजी लगाने के बाद भी भरपेट रोटी नसीब नहीं होती। इनमें से कोई बिना तैराकी सीखे तेज धार में नाव चला रहा है। कोई बिना बिना ट्रेनिंग लिये एनएच जैसा व्यस्त मार्ग पर ट्रक चला रहा है। ऎसे में ये आये-दिन हादसे के शिकार हो रहे हैं। दिनभर की मेहनत के बाद भी इन्हें भरपेट भोजन व छत नसीब नहीं होती। इसी तरह बिना किसी 'प्रोपर ट्रेनिंग' के आपके पास-पड़ोस में कई बिजली मिस्त्री मिल जाएंगे। घर में बिजली का तार टूट जाने पर बिना सोचे-समझे किसी बिजली मिस्त्री को बुला लिया जाता है। उस समय किसी को यह सोचने की फुर्सत नहीं रहती कि बिजली ठीक करनेवाला व्यक्ति को इस संबंध में कोई जानकारी है भी या नहीं? ऎसे में यदि कोई घटना घट जाए तो 'हम' भी कम जिम्मेवार नहीं हैं। बिहार के समस्तीपुर जिले में एक प्राइवेट बिजली मिस्त्री जिसने कोई ट्रेनिंग नहीं ली थी, 3 मई 2009 को अपनी जान गंवा बैठा। वह कभी बीस तो कभी पचास रुपये कमा लेता था। वह एक बिजली के पोल पर लाइन काटने के लिए रविवार को चढ़ा था। इसी बीच उस तार में करंट आ गया और वह झटका खाकर पोल के तार पर ही गिर पड़ा। उसी तार पर उसक मृत शरीर पांच घंटे तक पड़ा रहा। इसके पश्चात बिजली विभाग व पुलिस की नींद तब खुली जब वहां के स्थानीय लोगों ने इस मामले में जमकर हंगामा किया और सड़क जाम कर दिया। मोरसंड गांव के गोखुला टोले का रहनेवाला रामसेवक सिंह निजी मिस्त्री के रूप में कई सालों से बिजली विभाग की मदद किया करता था। 3 मई को उसे पता चला कि एक गांव में शार्ट-सर्किट से आग लग गयी है। पूसा सब स्टेशन के निर्देश पर शट डाउन के बाद वह पोल पर चढ़कर तार काटनेवाला ही था कि उसमें करंट आ गया जिससे वह काल के गाल में समा गया। गरीब रामसेवक कोई सरकारी मिस्त्री नहीं था जिसके मरने पर सरकार कुछ रुपये देगी। वह बिजली विभाग के कहने पर पोल पर चढ़ा, इसका सुबूत भी उसके पास लिखित नहीं था। यह आदेश जिसे मौखिक दिया गया था, वह अब नहीं रहा। बिजली विभाग का कोई अधिकारी या कर्मचारी सामने आकर नहीं कहेगा कि वह उनके लिये काम करता था। उसके पास कोई डिग्री भी नहीं थी। ऎसे में बिजली विभाग या अन्य लोग उससे कैसे बिजली का काम करवाते थे। ऎसे ढेरों सारे सवाल सामने खड़े हैं? परंतु इसका जवाब कौन देगा? रामसेवक का परिवार अनाथ हो गया। प्रतिदिन किसी न किसी हादसे में कोई 'रामसेवक' मारा जाता है। यहां जान की कीमत कौड़ी से भी कम है तभी चंद सिक्कों की खातिर अनगिनत गरीब उस काम को करने के लिए तैयार रहते हैं जिसके बारे में इनकी जानकारी अधूरी है।