रविवार, 3 मई 2009

यहां जिंदगी की कीमत चंद रुपये!


कई साल पहले राज बब्बर की एक फिल्म आयी थी। फिल्म का नाम था-दूल्हा बिकता है। यह फिल्म काफी चली थी। तब सबकी जबां पर एक सवाल था कि चंद रुपये की खातिर एक दूल्हे ने खुद को बेच दिया। फिल्म के दूल्हे ने जब खुद को बेचा तो उसे इतने रुपये मिले थे कि उसके मकसद पूरे हो गये थे। परंतु जीवन का हकीकत ठीक इसके विपरीत है। भारत में लाखों ऎसे गरीब नौजवान हैं जिन्हें जान की बाजी लगाने के बाद भी भरपेट रोटी नसीब नहीं होती। इनमें से कोई बिना तैराकी सीखे तेज धार में नाव चला रहा है। कोई बिना बिना ट्रेनिंग लिये एनएच जैसा व्यस्त मार्ग पर ट्रक चला रहा है। ऎसे में ये आये-दिन हादसे के शिकार हो रहे हैं। दिनभर की मेहनत के बाद भी इन्हें भरपेट भोजन व छत नसीब नहीं होती। इसी तरह बिना किसी 'प्रोपर ट्रेनिंग' के आपके पास-पड़ोस में कई बिजली मिस्त्री मिल जाएंगे। घर में बिजली का तार टूट जाने पर बिना सोचे-समझे किसी बिजली मिस्त्री को बुला लिया जाता है। उस समय किसी को यह सोचने की फुर्सत नहीं रहती कि बिजली ठीक करनेवाला व्यक्ति को इस संबंध में कोई जानकारी है भी या नहीं? ऎसे में यदि कोई घटना घट जाए तो 'हम' भी कम जिम्मेवार नहीं हैं। बिहार के समस्तीपुर जिले में एक प्राइवेट बिजली मिस्त्री जिसने कोई ट्रेनिंग नहीं ली थी, 3 मई 2009 को अपनी जान गंवा बैठा। वह कभी बीस तो कभी पचास रुपये कमा लेता था। वह एक बिजली के पोल पर लाइन काटने के लिए रविवार को चढ़ा था। इसी बीच उस तार में करंट आ गया और वह झटका खाकर पोल के तार पर ही गिर पड़ा। उसी तार पर उसक मृत शरीर पांच घंटे तक पड़ा रहा। इसके पश्चात बिजली विभाग व पुलिस की नींद तब खुली जब वहां के स्थानीय लोगों ने इस मामले में जमकर हंगामा किया और सड़क जाम कर दिया। मोरसंड गांव के गोखुला टोले का रहनेवाला रामसेवक सिंह निजी मिस्त्री के रूप में कई सालों से बिजली विभाग की मदद किया करता था। 3 मई को उसे पता चला कि एक गांव में शार्ट-सर्किट से आग लग गयी है। पूसा सब स्टेशन के निर्देश पर शट डाउन के बाद वह पोल पर चढ़कर तार काटनेवाला ही था कि उसमें करंट आ गया जिससे वह काल के गाल में समा गया। गरीब रामसेवक कोई सरकारी मिस्त्री नहीं था जिसके मरने पर सरकार कुछ रुपये देगी। वह बिजली विभाग के कहने पर पोल पर चढ़ा, इसका सुबूत भी उसके पास लिखित नहीं था। यह आदेश जिसे मौखिक दिया गया था, वह अब नहीं रहा। बिजली विभाग का कोई अधिकारी या कर्मचारी सामने आकर नहीं कहेगा कि वह उनके लिये काम करता था। उसके पास कोई डिग्री भी नहीं थी। ऎसे में बिजली विभाग या अन्य लोग उससे कैसे बिजली का काम करवाते थे। ऎसे ढेरों सारे सवाल सामने खड़े हैं? परंतु इसका जवाब कौन देगा? रामसेवक का परिवार अनाथ हो गया। प्रतिदिन किसी न किसी हादसे में कोई 'रामसेवक' मारा जाता है। यहां जान की कीमत कौड़ी से भी कम है तभी चंद सिक्कों की खातिर अनगिनत गरीब उस काम को करने के लिए तैयार रहते हैं जिसके बारे में इनकी जानकारी अधूरी है।

1 टिप्पणी:

  1. बात तो आपने ठीक कही है। किसी शायर ने कहा है कि-

    कभी आँसू कभी खुशी बेची, हम गरीबों ने बेकसी बेची।
    चन्द साँसें खरीदने के लिए, रोज थोड़ी सी जिन्दगी बेची।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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