बुधवार, 6 मई 2009

चौकीदार बना नक्सलियों का हमदर्द

बिहार के कई जिलों में नक्सली अपना पांव पसार चुके हैं। इनकी गतिविधियां और क्रुरता दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। मुखिया समेत दर्जनों लोगों के आवास को ये नक्सली डाइनाइट से उड़ा चुके हैं। ये अधिकतर झूंड में ही हमला करते हैं। अब तक अनगिनत लोगों को ये मौत के घाट भी उतार चुके हैं। ऎसे में इनके प्रति जनता का आक्रोश भी बढ़ता जा रहा है। परंतु यह भी सच है कि चंद लोगों को रुपये का लालच देकर ये एक तरह से उन्हें खरीद लेते हैं। बदले में वह व्यक्ति मददगार के रूप में इन्हें छिपने की जगह मुहैया कराता है। वह पुलिस की खुफिया कार्रवाई की रिपोर्ट से भी अवगत कराता है। मददगार यह भूल जाता है कि चंद रुपये लेकर नक्सलियों की मदद बाद में कितना घातक होगा? इक्के-दुक्के लोगों के चलते ही इनकी सक्रियता बढ़ने के साथ ही पहले से अधिक जानलेवा साबित हो रही है। इन इक्के-दुक्के लोगों में किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी यहां तक की पुलिस के कुछ नुमाइंदे भी शामिल हैं। एक चौकीदार की मदद से मशरख के एक गांव से दो नक्सलियों के फरार होने का मामला सामने आया है। यह पुलिस के मुंह पर किसी जोरदार तमाचा से कम नहीं है। मालूम हो कि दूसरे चरण (23 अप्रैल) का लोकसभा चुनाव कराकर लौटने के क्रम में मुजफ्फरपुर के देवरिया थाना अंतर्गत कर्पूरी चौक के पास नक्सलियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट कर पुलिस वाहन उड़ा दिया। इस घटना में मजिस्ट्रेट व दारोगा समेत पांच लोग मारे गये थे। पुलिस वाहन के चिथड़े-चिथड़े उड़ गये थे। एक पुलिसकर्मी का हाथ ही उड़ गया था और वह बेहोश होकर घंटों वहीं पड़ा रहा था। घटनास्थल पर पुलिस फोर्स घंटों बाद पहुंची थी। बाद में इस घटना की छानबीन शुरू हुई तो परत-दर-परत जानकारी सामने आयी। सभी जानकारियां चौंकाने वाली थी। यह भी पता चला था कि इस कांड की साजिश झारखंड के चतरा में रची गयी थी। इधर पुलिस को पता चला कि सिवान के मशरख के एक गांव में दो नक्सली छिपे हैं। बड़े पुलिस अधिकारियों ने मशरख के थाना प्रभारी को तुरंत दोनों को गिरफ्तार करने के लिए कहा। इसी थाने में मौजूद एक चौकीदार ने यह सूचना दोनों नक्सलियों के पास पहुंचा दी। दोनों नक्सली फरार हो गये और थाना प्रभारी हाथ मलते रह गये। बाद में चौकीदार को गिरफ्तार कर लिया गया। उससे पूछताछ का दौर जारी है। वहीं थाना प्रभारी को भी 6 मई को निलंबित कर दिया गया। नक्सलियों की मददगार को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। तभी चंद रुपये के लालच में इन्हें पनाह देनेवालों में भय उत्पन्न होगा। एक मददगार के चलते ये नक्सली न जाने कितने मासूम लोगों को बेरहमी से कत्ल कर देते हैं। घटना के कुछ ही दिन बाद पुलिस भी जांच में सुस्त पड़ जाती है। परंतु जिनके परिवार के अभिभावक या इकलौता वारिस मारा जाता है। उनके घरों में ताजिंदगी अंधेरा छा जाता है।

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