शुक्रवार, 8 मई 2009

सीतामढ़ी-शिवहर की धरती बायोडीजल के लिए उपयुक्त

दुनिया के सभी देशों में पेट्रोल-डीजल की खपत कैसे कम की जाए, इस बात पर मंथन चल रहा है। ऎसे में बायोडीजल (जेट्रोफा) की खेती का महत्व काफी बढ़ गया है। बिहार के सीतामढ़ी व शिवहर जिले की धरती बायोडीजल के लिए काफी उपयुक्त है। फिलहाल दोनों जिले के 82 हेक्टेयर से अधिक भूमि में बायोडीजल की खेती की जा रही है। बाढ़ग्रस्त इलाका होने के कारण दोनों जिले के कई हेक्टेयर भूमि हर वर्ष बेकार हो जाती है। यही बेकार पड़ी भूमि बायोडीजल के लिए उपयुक्त है। एक कट्ठा जमीन में जेट्रोफा (रतनजोत ) के सिर्फ 46 पेड़ लगाये जाते हैं। दो पेड़ों के बीच की दूरी कम से कम दो मीटर होनी चाहिए। बीज बोने के दो वर्ष बाद जेट्रोफा फल देना शुरू कर देता है। परंतु नर्सरी लगाने पर एक वर्ष में ही यह फल देने लगता है। इस फल के अंदर से बीज निकलता है। इसी बीज से तेल निकाला जाता है जिसका इस्तेमाल डीजल के रूप में किया जा सकता है। एक कट्ठा जमीन में 23 किलो जेट्रोफा का बीज निकलता है। वहीं छठे वर्ष में एक पेड़ से पांच किलो बीज निकलता है। एक किलो बीज से चालीस फीसदी ही तेल निकाला जा सकता है। ऎसे में पांच साल बाद ही किसानों को फायदा शुरू होता है। इस पेड़ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके तेल में कार्बन मोनोआक्साइड गैस की मात्रा कम होती है। इससे पर्यावरण ठीक रहता है। इसके पेड़ की पत्तियां तेलचट होने के कारण जानवर इसे खा नहीं पाते हैं। सीतामढ़ी के एक किसान त्रिवेणी झा ने जबलपुर के एक सेमिनार में भाग लेकर इसकी खेती का गुर सीखा और एक छोटे प्रयास के तहत 75 डिसमिल भूमि में नर्सरी व बीज बोये। शुरुआती दौर में सीतामढ़ी के डुमरा प्रखंड के हरिछपड़ा में राम जानकी सिंह, फतहपुर में ब्रजबिहारी सिंह ने खेती शुरू किया। देखते-देखते यहां के सैकड़ों किसानों ने जेट्रोफा की खेती शुरू कर दी। सीतामढ़ी-शिवहर के किसानों द्वारा उपजाए गये जेट्रोफा (रतनजोत) के बीज जबलपुर व कोलकाता में अपनी पहचान बना चुका है। कोलकाता की कंपनी इसके बीज को जापान और जर्मनी भेजती है। इसके बीज को सीतामढ़ी के किसान जबलपुर से मंगवाते हैं। परंपरागत खेती में एक हेक्टेयर में 100 मजदूरों की जरूरत पड़ती है जबकि जेट्रोफा की खेती के लिए पांच मजदूरों की। बिना खाद व कीटनाशक डाले ही बंजर या बलुई भूमि पर इसकी खेती की जा सकती है। एक बार पेड़ लगाने पर पचास वर्षों तक यह फल देते रहता है। आंकड़े बताते हैं कि आनेवाले कुछ ही दशक में विश्व में डीजल समाप्त हो जाएगा। ऎसे में यही जेट्रोफा डीजल का स्थान लेगा। सरकार की ऒर से डीजल की खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहन के साथ ही आर्थिक मदद दी जानी चाहिए ताकि किसान इसके महत्व को समझे। वर्तमान में जेट्रोफा के बीज से यहां डीजल नहीं निकाला जा रहा है क्योंकि मांग के अनुरूप बीज की आपूर्ति नहीं हो पा रही है।

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