बुधवार, 13 मई 2009

केन्द्र में फिर बनेगी मिली-जुली सरकार!

लोकसभा के पांचवें चरण का चुनाव 13 मई को समाप्त हो गया। 16 को मतगणना हो जाएगा। इसके साथ ही किस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं, इसका खुलासा भी हो जाएगा। अब तक के चुनाव रुझान से यह साफ हो गया है कि किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने जा रहा है। देश की बड़ी पार्टियों के आलाकमान के चेहरे अभी से उतर गये हैं। उन्हें इस बात का भय सताने लगा है कि यदि क्षेत्रीय दलों ने मदद नहीं की तो सरकार बनाना मुश्किल हो जाएगा। यदि कई छोटे-छोटे दल की मदद से सरकार बनानी पड़ी तो ये पांच साल तक नासूर बनकर कष्ट देते रहेंगे। इस चुनाव में भी दो ही पार्टी को तिहाई में सीटें मिलने की उम्मीद है। ये है-कांग्रेस और भाजपा। बाकी सभी को दहाई से ज्यादा सीटें नहीं मिलने वाली है। अब तक के रुझान से तय माना जा रहा है कि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी। इसके बाद भाजपा का नंबर होगा। विभिन्न चैनलों द्वारा कराये गये 'एक्जिट पोल' में भी स्थिति स्पष्ट नहीं दिख रही है। कई बार 'एक्जिट पोल' के विपरीत ईवीएम से परिणाम निकलते हैं। कांग्रेस को विश्वास है कि वह सरकार बना लेगी। एक तो खुद को वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में देख रही है। कई छोटे दल इस ताक में रहते हैं कि सरकार किस पार्टी की बन रही है। समय के अनुसार ऎसे दल अपने दो-तीन या कुछ अधिक सांसद का समर्थन सरकार बनाने में देते हैं। बदले में ये अपने सभी सांसद को मंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। ऎसे दल सरकार बनाने में मदद के बदले अपनी हर उल्टी-सीधी मांगें पूरी करवाते हैं। सरकार गिर न जाए, इसके भय से इनकी हर मांगें मान भी ली जाती है। पिछले साल जब यूपीए से वामदलों ने परमाणु मुद्दे पर समर्थन वापस ले लिया था तो सरकार बचाने के लिए कांग्रेस को झामुमो के शिबू सोरेन तक से मदद लेनी पड़ी थी। बदले में शिबू सोरेन ने झारखंड के मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव कांग्रेस के सामने रखा था जिसे कांग्रेस को मान लेना पड़ा था। नतीजन झारखंड के मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को गद्दी छोड़नी पड़ी थी। हालांकि शिबू सोरेन विधानसभा का चुनाव हार गये थे जिससे उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देना पड़ा था और वहां राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा था। इसी तरह मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने भी कांग्रेस को अपना समर्थन दिया था। इसी पार्टी के अमर सिंह ने कुछ ही माह में कई बार समर्थन वापस लेने की धमकी दी थी। कुल मिलाकर मिली-जुली सरकार हमेशा अस्थिर ही रहती है। समर्थन देनेवाला दल हमेशा अपनी लंबी-चौड़ी मांगें रखता है। मांगें पूरी न होने पर समर्थन वापस लेने की धमकी देता है। इस तरह पूरे पांच साल तक सरकार अस्थिर बनी रहती है। इसका सबसे ज्यादा असर विकास कार्यों पर पड़ता है। 13 मई को अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने एक बयान में कहा कि कांग्रेस को भाजपा के साथ मिलकर केन्द्र में सरकार बनाना चाहिए। क्षेत्रीय दल की मदद से सरकार बनाने पर सरकार हमेशा डांवाडोल स्थिति में रहती है। ऎसे में सरकार चाहकर भी देश हित में बड़े फैसले नहीं कर पाती है। शत्रुघ्न इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि कम से कम ये दोनों पार्टियां एक नहीं हो सकती हैं। भाजपा पर सांप्रदायिकता को भड़काने का आरोप लगता रहा है। इसे मुस्लिम वोट भी अधिक नहीं मिल पाता है। वहीं कांग्रेस मुस्लिम वोट पर अपना एकाधिकार समझती है। हर चौक-चौराहे पर इसी बात की चर्चा हो रही है कि यदि फिर मिली-जुली सरकार बनी तो महंगाई और बढ़ेगी। पहले से मंदी की मार झेल रहे व्यवसायी भी कम चिन्तित नहीं है।

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