रविवार, 31 मई 2009

बिहार में 'अपहरण उद्योग' ने फिर पसारा पांव

बिहार में अपहरणकर्ताऒं ने फिर से पांव पसारना शुरू कर दिया है। 29 मई को पटना के मासूम सत्यम और बेतिया के जितेन्द्र की हत्या अपहरणकर्ताऒं ने कर दी थी। सत्यम की हत्या तो रोंगटे खड़े कर देनेवाले हैं क्योंकि उसकी उम्र महज आठ साल थी। सत्यम का हत्यारा अविनाश की उम्र भी सिर्फ चौदह साल है। इस हत्या में उसने अपने दोस्त खुशीर्द की मदद ली थी। दोनों पकड़े जा चुके हैं और अपना अपराध कबूल चुके हैं। दोनों ने यह भी बताया कि हत्या करने की प्रेरणा उन्हें 'अपहरण' फिल्म देखकर मिली। बेतिया के छात्र जितेन्द्र का अपहरण कुछ ही दिन पहले पेशेवर बदमाशों ने कर लिया था। उसका भी शव गोपालपुर थाने के शिवाघाट पुल के समीप से बरामद किया गया। इस घटना के एक सप्ताह पहले ही पटना के एक ठेकेदार व जदयू नेता सत्येन्द्र सिंह का अपहरण कर लिया गया था। इस मामले में यहां के वरीय पुलिस अधिकारी दबी जबान में स्वीकार कर चुके हैं कि सत्येन्द्र की हत्या कर दी गयी है। परंतु शव न मिलने के चलते पुलिस खुलकर कुछ भी बताने से इनकार कर रही है। इस मामले में पूर्व सांसद विजय कृष्ण के बेटे का नाम आ रहा है। इसी हफ्ते मुजफ्फरपुर के मोतीपुर से चिकित्सक के बेटे का अपहरण किया गया है। पुलिस इस मामले में अब तक सुराग नहीं ढूंढ़ सकी है। इसी क्रम में 31 मई को मुजफ्फरपुर के देवरिया थाने के सोहांसी गांव से तीन वर्षीय ऋतिक का अपहरण कर लिया गया। एक के बाद एक हो रही अपहरण की घटनाऒं ने सूबे की पुलिस की नींद उड़ा कर रख दी है। सत्यम के हत्यारे तो नाबालिग हैं और फिल्म देखकर अपहरण की योजना बनायी थी। हत्यारा अविनाश को सत्यम 'भैया' कहता था। आठ साल का मासूम परंतु चंचल सत्यम को क्या पता कि 'भैया' ही उसकी जान ले लेगा। अविनाश उसे साइकिल पर बैठाकर अपने कमरे में ले गया था। सूत्र बताते हैं कि अपने दोस्त खुशीर्द के साथ मिलकर उसने सत्यम के शरीर से छेड़खानी भी की थी। सत्यम जोर-जोर से चिल्लाने लगा और घर जाने की जिद करने लगा। अविनाश ने घबराकर उसके मुंह को जोर से दबा दिया। बेचारे सत्यम ने कुछ ही पल में तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। तब अपने दोस्त के साथ मिलकर अविनाश ने सत्यम के शव को एक बोरे में बंद कर दिया और कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया। फिर गुलजारबाग के एक बूथ से सत्यम के पिता को टेलीफोन कर पचास लाख की फिरौती मांगी। नहीं देने पर सत्यम को जान से मारने की धमकी दी। तबतक मामला पुलिस के पास पहुंच चुका था। पुलिस ने अविनाश को गिरफ्तार कर लिया। उसने कुछ मिनट में अपना जुर्म स्वीकार कर लिया। अविनाश डीएवी का छात्र था। उसके पिता किराना का दुकान चलाते थे। आक्रोशित लोगों ने दुकान तक फूंक डाली। सत्यम की हत्या में किसी बड़े और शातिर गिरोह का हाथ नहीं था। यह बात सामने आ चुकी है। परंतु बाकी सभी अपहरण में शातिर बदमाशों की संलिप्तता है। इस लोकसभा चुनाव में कई दिग्गजों की करारी हार हुई है। इसके पश्चात एकाएक 'अपहरण उद्योग' का सक्रिय होना कई संदेह को जन्म देता है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सत्ता संभालते ही अपराधियों के हौसले पस्त हो गये थे। सूबे में 'अपहरण उद्योग' पर विराम लग गया था। इस तरह की घटनाऒं को अंजाम देनेवालों में से अधिकतर या तो जेल जा चुके हैं या भय से छिप चुके हैं। नीतीश के विकास के नारे के सामने औंधे मुंह गिर चुके दिग्गजों के सामने अब उन्हें पछाड़ने का एक ही उपाय है कि वे अपने कुछ शातिरों की मदद से सूबे में तांडव मचाये ताकि विस चुनाव में उन्हें मुद्दा मिल सके।

1 टिप्पणी:

  1. आपने बिलकुल सही लिखा..चुनावों के बाद अचानक ही इन मामलो की बाढ़ सी आ गयी है...!हालाँकि बिहार में यह उद्योग हमेशा ही चलता रहा है..परन्तु नए लोगों और बच्चों का इस और आकर्षित होना एक खतरनाक संकेत है...

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