गुरुवार, 14 मई 2009

इन 'ललबबुऒं' को चाहिए तरक्की

25 डिग्री पारा में इन्हें 'लू' मार देता है। दस कदम चलने पर इनके पांव में सूजन आ जाती है। वेतन के लिए साइन करने पर इनकी अंगुलियां दु:खने लगती हैं। इनका शरीर गुलाब की पंखड़ी से भी नाजुक है। इन्हें आराम वाला काम चाहिए। वेतन भी आराम वाला ही चाहिए यानी साथ काम करने वाले से दोगुना। तरक्की मामले में ये हमेशा सबसे अगली पंक्ति में खड़े रहते हैं। अब जरा जनाब के व्यवहार के बारे में जानिए-इन्हें यदि आपसे जरूरत है तो आपके आगे-पीछे मंडराते रहेंगे। थोड़ी-थोड़ी देर में आपको चाकलेट या पान; आप जो भी पसंद करते हैं खिलाते रहेंगे। दफ्तर चाहे प्राइवेट हो या सरकारी 'ललबबुऒं' की कमी नहीं है। एक 'ललबबुआ' को उसके बास ने कहा-'यार कभी-कभी तुम भी काम कर लिया करो।' जनाब ने तपाक से उत्तर दिया-आप तो मेरे स्वभाव से अवगत हैं, मैंने आज तक काम नहीं किया है। काम करने से मेरी आंखें दु:खती हैं। ये जनाब प्रतिदिन दफ्तर में हाजिरी बनाने अवश्य पधारते हैं ताकि हर माह वेतन ले सकें। जब भी 'प्रोमोशन' का समय आता है ये जनाब बास की जी हुजूरी शुरू कर देते हैं। कई बार जी हुजूरी का फायदा उठा, इन्हें तरक्की भी मिल जाती है। आप जिस दफ्तर में काम कर रहे हैं वहां भी एक-दो 'ललबबुए' जरूर होंगे। यदि गलती से कभी आपने 'ललबबुए' को यह कह दिया कि तुम 'देहचोर' हो और चपरासी के लायक भी नहीं हो। इसका परिणाम आपको भुगतना पड़ेगा क्योंकि इस 'ललबबुए' की पकड़ बास के बास तक है। यह 'ललबबुआ' जानता है कि बास अपने बास की बात नहीं टालेंगे। इसी का वह फायदा उठाता है। इसकी कभी इच्छा हुई तो कुछ काम कर दिया। नहीं तो राम...राम...बाय बाय...यदि इस 'ललबबुए' के काम को कभी कोई सीनियर चेक कर रहा हो और उसमें गलती निकल जाए तो वह दांत निकालकर ठी...ठी...ठी...ठी...करने से भी बाज नहीं आता। ऍसे 'ललबबुए' की हर जगह चलती है। ये जानकारी तो क्लर्क का रखते हैं परंतु कुर्सी इन्हें अफसर वाली चाहिए। हरेक दफ्तर में ऍसे लोगों की भरमार है। ये नौकरी में आते हैं बड़ी पैरवी से और साठ साल तक बने भी रहते हैं। इन्हें समय-समय पर तरक्की भी मिलती रहती है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल सही तस्वीर दिखाई है बधाइ

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  2. वह ललबबुआ आपके दैनिक जागरण मुजफ्फरपुर का कौन है?

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