मंगलवार, 23 जून 2009

बेटे के पास कैदी की तरह रहती है एक मां...

श्रवण भी एक बेटा ही था जिसकी कहानी इतिहास के पन्ने में दर्ज है। आज भी हर मां-बाप श्रवण तुल्य बेटा चाहते हैं। परंतु इतिहास तो इतिहास ही है। हां, कभी-कभार ऍसे बेटे की चर्चा सुनने को जरूर मिल जाती है, जो अपने मां-बाप को भगवान का दर्जा देते हैं। उन्हें पलकों पर बिठाकर रखते हैं। वर्ना अधिकतर क्रूर संतान की बात ही सामने आती है। हम यहां एक ऍसे बेटे की चर्चा करने जा रहे हैं जो अपनी पत्नी के कहने पर मां को प्रताड़ित करता है। उसकी मां चुपचाप इस जुल्म को वर्षों से सहती आ रही है। उसे यह जुल्म तबतक सहना होगा जबतक वह जीवित है। पर, धन्य है यह मां जो किसी के सामने यह बयान देने को तैयार नहीं है कि उसकी बहू प्रताड़ित करती है। उसका बेटा बहू के भय से खामोश सबकुछ देखता रहता है। परंतु, शायद ईश्वर से यह सब देखा नहीं गया। मां को मां न समझने वाले इस बेटे को पांच संतान हैं। चार बेटी व एक बेटा। यह बेटा भी शायद भगवान ने इसलिये दे दिया कि चौथी बेटी के जन्म के बाद यह बेटा मां से लिपट फूट-फूटकर बिलखने लगा कि उसका कोई वारिस नहीं रहेगा। मां ने दिल से आशीर्वाद देते हुए यह कहा कि हे भगवान यदि उन्होंने कोई भी अच्छा काम किया है तो इस बेटे की सभी गलतियों को माफ कर एक बेटा इसकी झोली में डाल दो। इसे मां का आशीर्वाद कहें या फिर भगवान का चमत्कार कि पांचवें संतान के रूप से इस बेटे को पुत्र की प्राप्ति हुई। इसके बाद भी बहू का रवैया नहीं बदला। उसकी दुष्टता कम होने की जगह पर बढ़ती गयी। यह सच्ची कहानी कुछ यूं है-बिहार के मुजफ्फरपुर के मझौलिया रोड में कृष्ण कुमार वर्मा का परिवार रहता है। इनका दो कमरों का अपना मकान है। यह जमीन इन्हें पिता की विरासत के रूप में मिली है। पेशे से वह बिजली विभाग में क्लर्क हैं। कद-काठी तो लंबा परंतु नजरें चुराकर बात करनेवाला है। इनकी पत्नी दो औसत महिलाओं को मिलाकर हैं। अधिकतर मुहल्लेवाले से इनकी पटरी नहीं बैठती है। यहां तक की पड़ोसी से बातचीत तक नहीं होती है। एक किरायादार को पता चला कि इनका मकान खाली है। रंजना नामक एक महिला जिसके पति बीमार रहते हैं, ने इस मकान को किराये पर ले लिया। कुछ ही समय बाद रंजना को पता चला कि इस घर में एक बूढ़ी महिला रहती हैं। इससे पहले इन्हें प्राय: किसी महिला के कराहने की आवाज सुनाई देती थी। एक दिन रूबरू होने पर बूढ़ी महिला ने बताया कि उसकी बहू उसे प्रताड़ित करती है। परंतु उन्होंने इस बात को किसी को भी न बताने के लिए कहा। यह भी कहा कि यदि किसी को बता देंगी तो वे मुकर जाएंगी। बूढ़ी महिला ने बताया कि उसके पति दारोगा से सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी मौत के बाद उनकी जिंदगी नरक से भी बदतर हो गयी है। हालांकि उन्हें पेंशन मिलती है। वे प्रतिमाह हजार रुपये से अधिक खाने के पैसे के रूप में बेटे को दे देती हैं। दवा का पैसा अलग से देती हैं। बूढ़ी महिला ठीक से चल नहीं सकती हैं। इनकी उम्र अस्सी के करीब है। इनके कंधे पर कूबड़ निकला हुआ है। पति के बनाये मकान के एक कमरे में ये दिनभर रहती हैं। शाम छह बजे इनकी बहू इन्हें ऊपर आने की इजाजत देती है। इससे पहले यदि वे पहुंची तो फिर गालियों से स्वागत होता है। दूसरी ओर रंजना को बातचीत में वृद्ध महिला की बहू ने बताया कि शादी के बाद वे काफी अनुशासन में रखती थीं। जिसका बदला वह अब ले रही हैं। वर्ष 2007 के कार्तिक छठ में वृद्ध महिला को बेटे-बहू ने एक कमरे में बंद कर दिया। उसी कमरे में खाने के लिए सत्तू-चूड़ा रख दिया। साथ ही एक बाल्टी में पीने का पानी। वृद्ध महिला उसी में रहती थी। इस बात का खुलासा तब हुआ जब शौच जाने के लिए टंकी का पानी खत्म हो गया और वृद्ध महिला ने रूम के अंदर से आवाज देकर दूसरे से मदद मांगी। इत्तफाक से रंजना उसी वक्त अपने ससुराल से लौटी थी जिस वक्त वृद्ध महिला मदद मांग रही थी। बाद में पता चला कि जब भी इनके बेटे-बहू घर से बाहर जाते हैं। इन्हें इसी तरह कमरे में बंद कर देते हैं। इससे इस मां की पीड़ा का अंदाजा सहज ही लगाया सकता है। क्लर्क बेटे-बहू का विचार भी भगवान ने कुछ यूं फेरा है कि इन्होंने अपनी पहली बेटी की शादी एक चपरासी से कर दी। दूसरे की शादी के लिए भी इसी तरह का लड़का ढूंढ रहे हैं। नौकरी के अलावा कई पेशे अपनाने के बाद भी इस घर की आर्थिक स्थिति अत्यंत नाजुक है। इसके बावजूद बहू-बेटे की समझ में यह बात नहीं आयी कि घर में मौजूद मां रूपी भगवान की इज्जत करें। उसे सम्मान दें। बेटे को जन्म देने के बाद मां गौरव से फूले नहीं समाती है कि बूढ़ापे का सहारा आ गया। परंतु अधिकतर बेटों का व्यवहार मां-बाप के हित के खिलाफ होता है। बेटे में बदलाव तब आता है जब घर में बहू आ जाती है। वहीं, बेटियों के दिल में हमेशा मां-बाप के लिए बेटों से अधिक प्यार होता है। इसके बावजूद समाज के लोग बेटे के लिए तरसते हैं। मुझे जब इस बात का पता चला तो मैंने हस्तक्षेप भी किया, परंतु बूढ़ी मां कोई भी बयान अपने बेटे के खिलाफ देने के लिए तैयार नहीं हुईं। देश में मौजूद कानून की विडंबना यह है कि उसे हर कार्रवाई के लिए सबूत चाहिए। ऍसी हजारों माताएं प्रतिदिन अपने बेटे-बहू से प्रताड़ित होती हैं। इसके बावजूद वे उफ तक नहीं करती। मेरा मानना है कि ऍसे बेटों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

रविवार, 21 जून 2009

बिहारः शिक्षकों को चपरासी से भी कम वेतन

सुनने में कुछ अजीब लगेगा, परंतु यह कड़वा सच है कि बिहार में एक लाख से अधिक सरकारी शिक्षकों को चपरासी से भी कम वेतन मिलता है। इन शिक्षकों को चपरासी भी ताने देते हैं, उन्हें आंखें दिखाते हैं। बिहार में सरकारी दफ्तरों में काम करनेवाले चपरासी का वेतन आठ हजार रुपये से कम नहीं हैं। परंतु इन शिक्षकों को चार से सात हजार रुपये ही मिलते हैं। पंचायत, ग्राम पंचायत, नगर पंचायत व प्रखंड के अनट्रेंड शिक्षकों को 4000, ट्रेंड को 5000 एवं हाईस्कूल के शिक्षकों को 6000 रुपये मानदेय के रूप में मिलते हैं। वहीं प्लस टू के शिक्षकों को 7000 रुपये मानदेय मिलते हैं। इन शिक्षकों ने जब मानदेय बढ़ाने के लिए धरना-प्रदर्शन शुरू किया तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दो टूक शब्दों में कहा कि जिन्हें नौकरी करनी है करें, वर्ना दूसरी नौकरी ढूंढ़ लें। उन्होंने यह भी कहा कि चपरासी सरकारी कर्मचारी हैं। शिक्षक सरकारी नहीं हैं। ये शिक्षक पंचायत, नगर निगम, जिला परिषद के अधीन कार्यरत हैं। नीतीश ने कहा कि मानदेय बढ़ाने के पहले शिक्षकों की दक्षता की जांच की जाएगी। एनुअल और सप्लीमेंट्री की तर्ज पर परीक्षा होगी। एनुअल दक्षता जांच परीक्षा में फेल होने पर एक आखिरी मौका देकर सप्लीमेंट्री दक्षता जांच परीक्षा ली जाएगी। इसमें सफल होने वाले शिक्षकों को मानदेय बढ़ाया जाएगा। विफल होने पर बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। इन शिक्षकों की मूल्यांकन परीक्षा 13 सितंबर को होने वाला है। मानव संसाधन विभाग के प्रधान सचिव ने कहा कि शिक्षक नियोजन नियमावली 2006 में स्पष्ट प्रावधान है कि नवनियोजित शिक्षकों का तीन वर्ष बाद मूल्यांकन किया जाएगा। इसी आधार पर शिक्षकों का मानदेय 400 से 500 बढ़ाया जाएगा। शिक्षकों के वेतन मामले को हवा दे रहे हैं राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद चुनाव के लिए उन्हें एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। अगले साल बिहार में विधानसभा का चुनाव होना है। ऍसे में नीतीश सरकार के लिए यह एक बड़ी समस्या बन सकती है? नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के रूप में 2005 में बिहार की सत्ता संभाली। तब उन्हें विरासत में मिली सूबे की टूटी सड़कें, गरीबी, बेरोजगारी। उस समय सूबे के सभी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी थी। दूसरी ओर टीचर ट्रेनिंग किये हजारों युवा बेरोजगार थे। कई ने तो टीचर ट्रेनिंग बीस साल पहले किया था। परंतु अब भी बेरोजगार थे। नीतीश ने चुनाव के पहले इन सभी को रोजगार देने की बात कही थी। सत्ता में आने के बाद इतने शिक्षकों की बहाली उनके लिये एक बड़ी चुनौती थी। इसके बावजूद नीतीश सरकार ने निर्णय लिया कि शिक्षकों की बहाली की जाएगी। आनन-फानन में एक लाख से अधिक शिक्षकों की बहाली कर दी गयी। उस समय बेरोजगारों ने यह नहीं देखा कि वे शिक्षक तो बन रहे हैं परंतु वेतन उन्हें चपरासी से भी कम मिलेगा? इतने पैसे में उनका गुजारा कैसे होगा? दूसरी ओर नीतीश सरकार की सोच थी कि इन शिक्षकों को उन्हीं के शहर या गांव में पोस्टिंग कर दी जाए। बहाल शिक्षकों की कोई परीक्षा नहीं ली गयी बल्कि डिग्री देख उनकी बहाली कर दी गयी। इसमें ऍसे शिक्षक भी शिक्षक बन गये जिन्हें सौ तक गिनती भी ठीक से नहीं आती थी। जब शिक्षकों ने स्कूलों में योगदान दिया तो वहां पहले से मौजूद शिक्षकों को पन्द्रह-बीस हजार मासिक मिल रहे थे। यह देख उन शिक्षकों की आत्मा ने धिक्कारा, जो वास्तव में योग्य थे। इधर, जबसे शिक्षकों को यह पता चला कि उनकी जांच परीक्षा होगी। फेल करने पर उनकी नौकरी जा सकती है। तबसे इन शिक्षकों में हड़कंप मचा हुआ है। यह हड़कंप उन शिक्षकों में अधिक है जो पेंशन के तौर पर वेतन उठा रहे हैं। वहीं योग्य शिक्षकों को इस बात की खुशी है कि जांच परीक्षा बाद उनके मानदेय में वृद्धि हो जाएगी। शिक्षकों का एक वर्ग अदालत जाने की तैयारी कर रहा है। इधर, दूसरे चरण की शिक्षक बहाली की प्रक्रिया भी अंतिम चरण में है। दो माह बाद 80 हजार नये शिक्षक योगदान देने वाले हैं। पहले चरण में शिक्षक बनने के बाद हजारों लड़कियों की शादी बिना दहेज हो गयी। बेटे के मां-बाप ने यह सोच दहेज नहीं लिया कि घर में कमाने वाली बहू आ रही है। उसी तरह हजारों ऍसे युवाओं के सिर पर भी सेहरा बंधा जिनकी शादी नौकरी न रहने की वजह से नहीं हो पा रही थी। इसका श्रेय नीतीश सरकार को ही जाता है। इसके बावजूद नीतीश सरकार को शिक्षकों से यह कहना चाहिए था कि समय-समय पर इनके मानदेय में बढ़ोतरी की जाएगी। बढ़ती महंगाई में मानदेय बढ़ाने की मांग कहीं से गलत नहीं है। परंतु पढ़ाई से कमजोर शिक्षकों को भी चाहिए कि वे बच्चों को पढ़ाने के लिए खुद को उस लायक बनायें।

शनिवार, 20 जून 2009

भगवान ये अमीर हैं, इन्हें पहले आशीर्वाद दीजिए!

बचपन से यही सिखाया-पढ़ाया जाता है कि भगवान की नजर में सभी समान हैं। न कोई अमीर और न ही कोई गरीब। धार्मिक किताबें भी यही कहती हैं। परंतु कुछ पुजारियों ने इसे उलट दिया है। ये पुजारी अमीरों को बिना इंतजार कराये ही भगवान का दर्शन करवा देते हैं जबकि गरीब घंटों इंतजार के बाद ही दर्शन कर पाते हैं। पूरे भारत में जितने मंदिर-मस्जिद हैं। इनमें से इने-गिने को छोड़ सभी में जैसे ही कोई अमीर या वीआईपी भगवान दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लंबी कतार में खड़े गरीब व सामान्य भक्तों को रोक दिया जाता है। ये चिलचिलाती धूप हो या सर्द हवा, अपनी बारी का इंतजार करते हैं। ये वीआईपी या अमीर जबतक भगवान का दर्शन ठीक से नहीं कर लेते तबतक कोई प्रवेश नहीं कर सकता। बिहार में राबड़ी देवी जब मुख्यमंत्री थी तो वे कार्तिक छठ करती थीं। जिस गंगा घाट पर वे अर्घ्य देने जाती थीं। उस घाट पर कोई आम आदमी अर्घ्य नहीं दे सकता था। घाट पर सैकड़ों की संख्या में सुरक्षाकर्मी पहले से ही तैनात रहते थे। यहां तक कि वे जिस मार्ग से जाती थीं। उस मार्ग पर भी आवागमन रोक दिया जाता था। इससे जनता को कितनी परेशानी होती थी। यह तो जनता ही समझती थी। किसी राज्य के मुख्यमंत्री यदि कहीं देवी-देवता के दर्शन के लिए जाते हैं तो उस वक्त आम जनता को रोक दिया जाता है। यानी भगवान के किसी मंदिर में यदि देवी या देवता का दर्शन बिना लाइन लगे करना हो तो इसके लिये अमीर या वीआईपी होना जरूरी है। अभिषेक बच्चन की शादी के पहले अमिताभ बच्चन कई बार वाराणसी गये। वहां के कई ऎसे मंदिरों में वे गये जहां बिना पंक्ति में आये देवी दर्शन कठिन है। इसके बावजूद उनके लिये सारे भक्तों को रोक दिया गया था। इसकी एक बड़ी वजह चढ़ावे की राशि का अधिक होना भी है। बड़ी हस्तियां जब देवी-देवता के दर्शन के लिए जाती हैं तो वे लाखों में चढ़ावा चढ़ाते हैं। ऍसे में पुजारी और मंदिर का भाग्य खुल जाता है। कई पुजारी तो ललचायी नजरों से ऍसे दानकर्ता का इंतजार करते हैं। सीतामढ़ी में मां जानकी मंदिर में मौजूद पुजारी को हरवक्त ऍसे भक्त का इंतजार होता है, जो चढ़ावा ठीक-ठाक दे। यानी दान की राशि अधिक हो। गरीब भक्त को यहां दरकिनार कर दिया जाता है। उन्हें काफी समय तक मां के दर्शन के लिए इंतजार करना पड़ता है। यहीं नहीं कई बार तो पुजारी बेबाक कह देते हैं कि महंगाई बढ़ गयी है। ऍसे में चढ़ावे की राशि भी बढ़नी चाहिए। एक पत्रकार को जब मंदिर के चढ़ावे के बारे में जानकारी मिली तो वे बिना परिचय दिये ही मंदिर में मां के दर्शन के लिए गये। प्रसाद के अलावा उन्होंने पुजारी को चढ़ावे के लिए पांच का सिक्का दिया। पुजारी ने इशारे-इशारे में कहा कि चढ़ावा अधिक होना चाहिए। इससे देवी जल्द प्रसन्न होती हैं। उक्त पत्रकार से पहले वहां कई गरीब भक्त अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। पत्रकार ने 51 रुपये निकालकर पुजारी को दे दिये। इससे पुजारी प्रसन्न हो गया। यह भी कहा कि यहां से कोई खाली हाथ नहीं जाता। यानी इस पुजारी के अनुसार, जो गरीब भक्त चढ़ावा नहीं देते मां जानकी उन्हें खाली वापस लौटा देती हैं?

शुक्रवार, 19 जून 2009

पत्रकारों को भी भाते हैं चाटुकार

आज आम आदमी की कौन कहे पत्रकारों को भी चाटुकार ही अधिक भाते हैं। हर व्यक्ति अपनी तारीफ सुनना चाहता है। गलती से किसी ने सच मुंह पर कह दिया तो लोग भड़क जाते हैं। लाल-पीले हो जाते हैं। देख लेने की धमकी दे देते हैं। सच कहने वाले के खिलाफ मोर्चा तक खोल देते हैं। यह सिलसिला तब तक चलता है जबतक सच कहने वाले व्यक्ति की हालत पतली न हो जाए। इसी तरह यदि किसी पत्रकार की खबर पेज वन पर छपी हो। वह भी बाइलाइन, ऎसे में वह सीना चौड़ा किये किसी दफ्तर में जाता है। मान लीजिए वहां कोई क्लर्क नया आया हो। उसने पत्रकार महोदय से परिचय पूछ लिया। इस पर पत्रकार महोदय भड़क उठते हैं। यह भी कहते हैं कि पेज वन पर उन्हीं की बाइलाइन छपी है। इसी समय चपरासी आकर कहता है कि पत्रकार जी को साहेब बुला रहे हैं। पत्रकार का सीना और फूल जाता है। वे लंबे-लंबे डग भरते हुए अधिकारी के कमरे में प्रवेश करते हैं। फिर शुरू होता है बातचीत का दौर। इस क्रम में पत्रकार महोदय यह जरूर कहते हैं कि आज पेज वन पर उन्हीं की खबर छपी है। इस बीच यदि अधिकारी ने दबी जबां से कह दिया कि खबर में त्रुटि रह गयी है। संयोग से जो खबर छपी है, इसी अधिकारी के बयान से छपी है जिससे पत्रकार महोदय बात कर रहे हैं। ऍसे में पत्रकार महोदय भड़क जाते हैं। यह भी कहते हैं कि उन्होंने तो ठीक लिखा था। परंतु आफिस में बैठे डेस्क के साथियों ने अपने मन से इसमें कुछ जोड़ दिया। यह भी कहने से नहीं चूकते हैं कि वे इसका खंडन छपवा देंगे। यदि पत्रकार महोदय को अपनी गलती सुनने की आदत रहती तो शायद उनसे ऍसी गलती नहीं होती। वे अपनी गलती औरों पर नहीं थोपते, न ही उनमें घमंड दिखता। अपनी प्रशंसा सुनने के घमंड में चूर होकर ये पिछले बीस साल से एक ही गलती दुहरा रहे हैं। इनके आधे से अधिक बाल भी सफेद हो चुके हैं। इसके बावजूद इनमें कोई बदलाव नहीं आया। ये अपनी कापी में बीस साल पहले जो गलती करते थे आज भी कर रहे हैं। परंतु किसी की इतनी जुर्रत नहीं है कि कोई यह कह दे कि आप हर लाइन में गलती लिखते हैं। आफिस में इनकी गिनती 'बकलोल' और पैरवी से नौकरी पाने वाले पत्रकार के रूप में होती है। अब एक दूसरे दर्जे के पत्रकार की चर्चा करते हैं। इनके पास जानकारी है। ये 'पैरवीपुत्र' भी नहीं है। परंतु इन्हें अपनी जानकारी का इतना घमंड है कि ये सभी को अपने से कम जानकार बताते हैं। यदि ये कोई खबर लिख रहे हैं और किसी ने टोक दिया कि इसका 'इंट्रो' दमदार नहीं है या उनकी पढ़ी या लिखी खबर को किसी ने कुछ शब्द इधर-उधर कर दिया। इसके लिये ये जनाब पूर दफ्तर को सिर पर उठा लेंगे। हर हाल में इन्हें ऍसा कोई चाहिए जो हर वक्त यह कहता रहे कि आप महान हैं। आपके जैसा पत्रकार तो देश में इने-गिने ही हैं। ऍसा कहने से ही इनके दिल को खुशी मिलती है। ऍसा नहीं है कि तारीफ सुनने की आदत सिर्फ पत्रकारों में ही है। यह बुराई नब्बे फीसदी लोगों में है। पान वाले दुकानदार तक इस रोग से पीड़ित हैं। यदि किसी ने यह कह दिया कि 'भैया' आपके पान की क्वालिटी में कमी आ रही है। वह दुकानदार तुरंत पलटवार कहते हुए कहेगा कि आपको जहां पसंद है, वहीं खा लिया करें। वह इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं कि उसे क्वालिटी में सुधार करना चाहिए। ऍसे में चाटुकारिता करने वाले की तो हर जगह जय हो, जय हो रहेगा। परंतु इससे परे स्वभाव वाले को हमेशा परेशानी का सामना करना पड़ेगा। पत्रकारों की गिनती बुद्धिजीवी में होती है। जब उन्हें ही चाटुकार अधिक भाते हैं तो आम आदमी की कौन कहे? परंतु इससे बचने का प्रयास करना चाहिए। अपनी गलती सुनने की आदत डालने वालों को फायदा ही फायदा होता है। वे अपनी गलती सुनकर इसे सुधारने का प्रयास करते हैं। वहीं गलती सुनकर भड़क जाने वाले हमेशा इस भ्रम में जीते हैं कि वे ही बेहतर हैं...

बुधवार, 17 जून 2009

इन्हें चाहिए जींस वाली लड़कियां

तब ये कहती हैं मुझे प्यार करो...भाग-अंतिम
आखिर क्यों नहीं रुक रहा जिस्मफरोशी का धंधा? क्यों नहीं सरकार इस पर रोक लगा पा रही है? क्यों नहीं इस मुद्दे पर कोई नेता आवाज उठाता है? क्योंकि इसके पीछे कई नेता भी प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेवार हैं। कई नेताऒं को पत्नी के रहते भी चाहिए जींस वाली लड़की। वो भी कालेज गर्ल की तरह देखने में सुंदर, उनकी उम्र भी कम होनी चाहिए। कई नेता शादी के वक्त नेता नहीं रहते। उनके पास लाखों का धन भी नहीं होता। ये आम आदमी की तरह गरीब रहते हैं। वक्त के साथ चापलूसी कर जब ये नेता बन जाते हैं। फिर विधायक या उससे आगे। इसके बाद इनके पास करोड़ों रुपये एकाएक आ जाते हैं। आलीशान मकान व कई-कई एयरकंडीशन गाड़ियां भी। परंतु पत्नी तो देखने में साधारण और देहाती ही है। ऍसे में इनके लिये जींस वाली लड़की इनके साथ काम करने वाले लोग मुहैया कराते हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव का मतगणना का काम चल रहा था। सीतामढ़ी में राजद प्रत्याशी सीताराम यादव व जदयू प्रत्याशी नवल किशोर राय मतगणना स्थल पर बैठे थे। वहीं, शिवहर के राजद प्रत्याशी सीताराम सिंह और भाजपा प्रत्याशी अनवारूल हक की नजरें भी मतों की गिनती पर थीं। अंतत: सीतामढ़ी से सीताराम यादव और शिवहर से सीताराम सिंह की जीत हो गयी। नवल किशोर राय और अनवारूल हक हार गये। इसी समय एक न्यूज चैनल पर आ रहा एक समाचार ने सभी को चौंका कर रख दिया। न्यूज चैनल यह दिखा रहा था कि नवल किशोर राय और अनवारूल हक किसी होटल के अलग-अलग कमरे में बैठे हैं जहां दो जींस वाली खूबसूरत लड़कियां प्रवेश करती हैं। इसके पश्चात दोनों लड़कियों से आलिंगन करते हैं, फिर आगे...! इस समाचार को पूरे भारत के लोगों ने देखा और सुना। जिस समय का यह सीन दिखाया जा रहा था, उस वक्त दोनों सांसद थे। नवल किशोर राय सीतामढ़ी के एमपी थे। वहीं, अनवारूल हक शिवहर के सांसद थे। यह बात जब सामने आयी तो अनवारूल हक ने यह बयान दिया कि वे मर्द हैं। उन्हें अपने किये पर कोई पछतावा नहीं है। दूसरी ओर नवल किशोर राय ने बयान दिया कि न्यूज चैनल की खबर में वे नहीं थे बल्कि उनका कोई हमशक्ल था। इसके बाद से दोनों नेताओं ने कोई चुनाव नहीं जीता जबकि ये कई बार चुनाव लड़े। यहां तक कि ये विधायक के चुनाव में भी ये बुरी तरह हारे। इस समाचार को जानने के बाद अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब देश के सांसद जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठा कोई व्यक्ति इस तरह की हरकतों में शामिल हैं तो जिस्मफरोशी के धंधे पर कैसे रोक लगायी जा सकती है। समाप्त

मंगलवार, 16 जून 2009

तब ये कहती हैं मुझे प्यार करो...भाग-दो

बिहार का एक जिला सीतामढ़ी भी है। मां जानकी की जन्मस्थली होने की वजह से सीतामढ़ी की धरती अत्यंत पवित्र मानी जाती है। यहां के धूल को सिर पर लगा लेने से कई तीर्थस्थल का पुण्य प्राप्त हो जाता है। ऍसी कहावतें सुनने को मिलती हैं। सीतामढ़ी रेलवे जंक्शन से तकरीबन पांच किलोमीटर की दूरी पर मां जानकी का मंदिर है। यहां दूर-दूर से लोग मां का दर्शन करने आते हैं। मां जानकी के मंदिर से एक सड़क रीगा प्रखंड की ऒर जाती है। इसी के मुहाने के पास एक बस्ती नजर आती है। इसके चारों ऒर लखनदेई नदी का पानी बहते रहता है। बरसात के दिनों में तो एक चचरी के सहारे ही इस बस्ती तक पहुंचा जा सकता है। इसी बस्ती का नाम है 'बोहा टोला' यानी वेश्याऒं का मोहल्ला। एक तरफ मां जानकी को चढ़ावा पर चढ़ावा चढ़ता है। दूसरी तरफ 'बोहा टोला' में हर रोज किसी लड़की की आबरू लूटी जाती है। इन्हें लड़की से औरत बना दिया जाता है। इनकी चीखें इस कलयुग में न तो मां जानकी के पास पहुंचती है न ही सरकार के पास। कुछ नाबालिग तो कुछ बालिग लड़कियों की तकलीफें इस बस्ती की चहारदीवारी तक गूंज कर रह जाती है। धीरे-धीरे ये इस जीवन को जीने की आदि हो जाती हैं। इस बस्ती में ज्यादातर झोपड़ियां ही हैं। परंतु कुछ पक्के मकान भी नजर आते हैं। इस मकान के भीतर दलालों ने तहखाना बना रखा है। लड़कियों को अगवा कर या फिर खरीदने के बाद उन्हें तहखाने में पहुंचा दिया जाता है। जहां रोशनी की सारी व्यवस्था तो रहती है, परंतु टिमटिमाते दीये की रोशनी में ही इन्हें रखा जाता है। ताकि समय-समय पर इन लड़कियों को ये दाग सकें। यहां लोहे की छड़ी, छोटा जंजीर, रूई, मलहम जैसे कई सामान की व्यवस्था रहती है। लड़कियां किसी भी कीमत पर वेश्यावृत्ति के धंधे को अपनाने के लिए तैयार नहीं होती। यहां उपस्थित सभी दलाल इनके साथ बेरहमी से सामूहिक बलात्कार करते हैं। इनपर दलाल तबतक जुल्म ढ़ाते हैं जबतक ये इस पेशे को अपनाने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो जाती। जब ये लड़कियां हामी भर देती हैं। तब दलाल इन्हें मेडिकल चिकित्सा उपलब्ध कराते हैं ताकि इनके जख्म जल्द से जल्द सूख सके। फिर इन्हें सिखाया जाता है ग्राहकों से मोटी रकम वसूलने का तरीका। ग्राहक चाहे इनकी झोली में हजार या पांच हजार क्यों न दे दे। इन्हें मिलते हैं सौ या पचास ही। बाकी रुपये में कई हिस्से लगते हैं। दलाल से लेकर पुलिस और फिर सफेदपोशों तक पहुंचता है हिस्सा। 'बोहा टोला' से भागी एक लड़की ने इस बात का खुलासा कुछ साल पहले किया था। वह जब इस टोले से भागी थी तो कुछ लोगों ने उसे थाने की पुलिस तक पहुंचा दिया था। एक पत्रकार ने बड़ी चालाकी से उस लड़की से बात की, तब 'प्रताड़ना गृह' की बात सामने आयी। बाद में जब पुलिस ने छापेमारी की, तो इस बस्ती में दलालों ने आग लगा दी थी। सारी लड़कियों को ऍसे तहखाने में छिपा दिया गया, जहां पुलिस नहीं पहुंच पायी। इसके कुछ ही दिन बाद 'बोहा टोला' फिर से आबाद हो गया। आज पूरे भारत में हजारों जगहों पर 'बोहा टोला' मौजूद हैं। इसके बावजूद किसी चुनाव में यह मुद्दा नहीं बना। न ही किसी मंत्री, सांसद या विधायक ने इस मुद्दे को कभी उठाया। क्रमश...

सोमवार, 15 जून 2009

तब ये कहती हैं मुझे प्यार करो...भाग-एक

हर चुनाव में सड़क, बेरोजगारी, महंगाई, देश की सुरक्षा, कश्मीर मसला, महिला आरक्षण जैसे मुद्दे तो उठाये जाते हैं। परंतु किसी चुनाव में इस बात की चर्चा नहीं होती कि वेश्यावृत्ति कैसे रोकें। वेश्यावृत्ति से मुक्त महिलाएं समाज में इज्जत से कैसे जिएं, इस बात को जोरदार ढंग से कभी नहीं उठाया गया है। ऍसा नहीं है कि इसके लिये कानून नहीं है या फिर पुलिस छापेमारी नहीं करती है। इसके बावजूद यह देशव्यापी मुद्दा कभी नहीं बना। हमें किसी वेश्या या कार्लगर्ल का वह रूप तो दिखता है, जिसमें वे जिस्म बेचकर मोटी रकम वसूलती हैं। परंतु पर्दे के पीछे उनकी जिंदगी की कड़वाहट को कोई नहीं देखता। कोई नहीं देखता कि वह जिंदा लाश जैसी है, जो ग्राहकों को देख उससे लिपट जाती है। उन्हें अपने जिस्म से खेलने को मजबूर करती है ताकि उसे अधिक से अधिक रुपये मिल सके। वह ग्राहक दुबारा भी उसके पास आये इसके लिये वह नये-नये नुस्खे अपनाती है। इस रूप के लिए कभी कोई महिला स्वेच्छा से तैयार नहीं होती। इसके लिये उसे तहखाने में बंदकर इस कदर प्रताड़ित किया जाता है कि वे मरनासन्न स्थिति में पहुंच जाती हैं। कई तो मर भी जाती हैं। ऍसे में यदि जान बचाने के लिए वे जिस्मफरोशी के धंधे के लिए हामी भरती है तो इसके लिये पूरा समाज दोषी है। देश के हजारों सफेदपोश इस कार्य में लिप्त हैं। ये सफेदपोश लाखों दलाल पाल रखे हैं। ये कम उम्र की लड़कियों को विभिन्न माध्यम से खरीदते हैं। फिर उन्हें विभिन्न शहरों में मौजूद 'जिस्म की मंडी' तक पहुंचा देते हैं। यहां उन्हें ग्राहकों को रिझाने का तरीका सिखाया जाता है। इसी में से कुछ सुंदर लड़कियों को कार्लगर्ल के रूप में होटलों में सप्लाई कर दिया जाता है। इस धंधे में सुंदर और कम उम्र की लड़कियों की मांग अधिक है। इस बात की जानकारी पुलिस प्रशासन को बखूबी होती है। पुलिस को हर माह एक मोटी रकम मिलती है। ऍसे में संबंधित इलाके में पुलिस छापेमारी नहीं करती है। यदि इस मंडी से कोई लड़की भागकर किसी छुटभैये नेता के पास पहुंच जाती है। इस क्रम में वह अपना दर्द उससे बयान करती है। तब, ये नेता जी पच्चीस-पचास लोगों को इक्ट्ठा कर हंगामा शुरू कर देते हैं। ऍसे हालात में पुलिस को छापेमारी करनी पड़ती है। परंतु इसकी सूचना मंडी के बड़े दलालों तक पुलिस पहले ही पहुंचा देती है। नतीजन, छापेमारी में पुलिस को कुछ भी हासिल नहीं होता। पुलिस दिखावे के तौर पर कुछ लोगों को पकड़कर बंद कर देती है जिसे बाद में जमानत पर छोड़ देती है। बाद में पता चलता है कि उक्त नेताजी को भी 'जिस्म की मंडी' से हिस्सा चाहिए। नेताजी ने पहले कई दलालों से इसके लिये संपर्क भी साधा था। कामयाबी नहीं मिलने पर उन्होंने हाथ आयी लड़की के सहारे हो हल्ला कर फिर से उल्लू साधने की कोशिश की। अफसोस उन्हें इस बार भी हिस्सेदारी नहीं मिली। इधर, चंद दिनों बाद फिर मंडी का व्यवसाय फलने-फूलने लगता है। देश के हर राज्य में दर्जनों स्वयंसेवी संस्था वेश्याटोली की महिलाऒं को रोजगार देने की योजना पर काम कर रही है। इसके बावजूद आंकड़े बताते हैं कि जिस्मफरोशी का धंधा बढ़ता ही जा रहा है। क्रमश...

शनिवार, 13 जून 2009

भाजपा-राजद को नया झटका

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा-राजद के कई नेता जमीन तलाशने में जुट गये हैं। भाजपा में मौजूद कई ऍसे नेता हैं, जो मंत्री बनने के लिए व्याकुल हैं। कई को अब लगने लगा है कि भाजपा शायद ही कभी सरकार बना सके। ऍसे में कई सांसदों को शायद मंत्री बनने के लिए बूढ़ा होने तक या इससे आगे तक इंतजार करना पड़े। बिहार में राजद अंतिम सांसें गिन रहा है। इसके नेता पाला बदलने को बेचैन हैं। वे सुरक्षित भविष्य चाहते हैं। फिलहाल इन्हें जदयू के नीतीश कुमार ज्यादा पसंद आ रहे हैं। जदयू को जबरदस्त सफलता मिलने के बाद राजद के विधायकों की नजर नीतीश कुमार की ऒर है। 13 जून को बिहार और झारखंड के दो नेताऒं ने सबको आश्चर्य में डाल दिया। बिहार में राजद सुप्रीमो के करीबी और विश्वासपात्र माने जाने वाले श्याम रजक ने इस्तीफा दे दिया। वहीं, हजारीबाग के सांसद और भाजपा के उपाध्यक्ष यशवंत सिन्हा ने भी त्यागपत्र दे दिया, जिस वक्त यह मामला सामने आया राजनाथ नयी दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे। राजनाथ ने इस दौरान कहा कि पार्टी में अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यशवंत सिन्हा के पहले भाजपा के ही जसवंत सिंह ने पार्टी पर अंगुली उठायी थी। यशवंत ने अपना त्यागपत्र आलाकमान को भेज दिया। इस्तीफे में उन्होंने राजनाथ और अरुण जेटली पर सीधा निशाना साधा है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद एलके आडवाणी ने इस्तीफा देकर मिसाल कायम की। परंतु कुछ नेता पद से चिपके रहे। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। इधर, श्याम रजक का इस्तीफा विधानसभाध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने स्वीकार कर लिया। श्री रजक ने विधानसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया। वे राजद के टिकट पर 1995 से लगातार तीन बार फुलवारीशरीफ (सुरक्षित) क्षेत्र से विधानसभा के सदस्य रहे हैं। वे नौ साल तक राज्यमंत्री भी थे। उन्होंने आरोप लगाया है कि राजद के कुछ नेता जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल कर उन्हें अपमानित कर रहे हैं। राजद सुप्रीमो इस पर मौन हैं। उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। श्याम रजक ने जदयू में जाने के संकेत दिये हैं। उनके इस फैसले से राजद को करारा झटका लगा है। श्याम हमेशा लालू की रक्षा में ढाल बने रहे हैं। इसका प्रभाव निश्चित रूप से राजद पर पड़ेगा। लालू प्रसाद ने फिलहाल इसपर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं दी है। राजद के कई नेता लालू से खफा चल रहे हैं। यह अलग बात है कि ऍसे नेता अभी भी जमे हुए हैं। सूत्रों के अनुसार, कई नेता पाला बदलने की तैयारी में हैं परंतु वे नीतीश कुमार की हरी झंडी का इंतजार कर रहे हैं। राजद वर्तमान में गंभीर संकट काल से गुजर रहा है। राजद के कई विधायकों को लगने लगा है कि लालू अब डूबते सूरज हैं जबकि नीतीश उगते सूरज। यही कारण है कि ऍसे नेता नीतीश से आलिंगन के लिए आतुर हैं। भाजपा संक्रमणकाल से गुजर रही है। पार्टी में वाजपेयी जैसे नेताऒं की घोर कमी है। आडवाणी भी पार्टी में पहले की तरह रुचि नहीं ले रहे हैं। ऍसे में पार्टी का बिखंडन तय माना जा रहा है।

गुरुवार, 4 जून 2009

मीरा की मदद से कांग्रेस को चाहिए बिहार

बिहार की मीरा कुमार लोकसभा की अध्यक्ष बन चुकी हैं। राष्ट्रपति के बाद पहली बार देश के एक और महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर किसी महिला ने अपनी जगह बनायी है। दलित की बेटी को इतना बड़ा सम्मान वास्तव में पूरे देश के लिए गर्व की बात है। कांग्रेस ने मीरा को यह सम्मान देकर एक साथ कई निशाने साधे हैं। कांग्रेस ने पूरे देश को यह संदेश दिया कि उसके शासनकाल में महिलाएं पूरी तरह से सुरक्षित तो हैं ही। साथ ही अति पिछड़े वर्ग की महिलाऒं के लिए भी पार्टी में विशेष स्थान है। मीरा कुमार को पहले जलसंसाधन मंत्री बनाया गया। बाद में उनका नाम लोस अध्यक्ष के लिए आया। इस राजनीति के पीछे कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति है। कांग्रेस को मीरा की मदद से पूरा बिहार चाहिए। इस चुनाव में बिहार में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें ही मिली हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस को तीन सीटें मिली थीं जबकि कांग्रेस और राजद में गठबंधन था। राजद के लालू प्रसाद की लताड़ के बाद इस चुनाव में कांग्रेस ने बिहार में अपने बलबूते प्रत्याशियों को खड़ा किया था। इसके बावजूद उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। कांग्रेस की सोच है कि 2011 में बिहार में विधानसभा का चुनाव होना है। विस चुनाव को कांग्रेस अपने बलबूते लड़ना चाहती है। इसकी तैयारी उसने मीरा को लोकसभा अध्यक्ष बनाकर शुरू कर दी है। तीस साल बाद बिहार से किसी को लोकसभा अध्यक्ष बनाया गया है। मीरा के पहले बिहार के बलिराम भगत को लोकसभा का अध्यक्ष बनाया गया था। बलिराम सिर्फ चौदह माह जनवरी 1976 से मार्च 1977 तक इस कुर्सी पर विराजमान थे। मीरा कुमार पूर्व डिप्टी पीएम जगजीवन राम की पुत्री हैं। मीरा 1985 में भारतीय विदेश सेवा की नौकरी छोड़ राजनीति के मैदान में उतरी थीं। पहली बार 1985 में उत्तरप्रदेश के बिजनौर से ये लोकसभा सदस्य के रूप में चुनी गयीं। 2004 में अपने पिता की परंपरागत संसदीय क्षेत्र सासाराम से लोकसभा सदस्य के रूप में चुनी गयीं और केन्द्र में मंत्री बनीं। मीरा का जन्म 31 मार्च 1945 को पटना में हुआ था। उन्होंने काफी ऊंचे दर्जे की शिक्षा हासिल की। मीरा राजनीति में हर उतार-चढ़ाव से अवगत हैं। यही वजह है कि कांग्रेस ने ठोक-बजाकर इनका चयन लोकसभा अध्यक्ष के रूप में किया। अब कांग्रेस को बिहार में कितनी सफलता मिलती है। यह तो आनेवाला वक्त ही बतायेगा। इस चुनाव में उत्तरप्रदेश में सफलता मिलने के बाद उत्साहित कांग्रेस की नजर अब बिहार पर है। राहुल गांधी बिहार में हर हाल में कांग्रेस का जनाधार बढ़ाना चाहते हैं।

एमपी बनने के लिए फिर दौड़ लगायेंगे पासवान

सत्ता सुख से वंचित लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान फिलहाल सांसद बनने के लिए बेचैन हैं। वे हर हाल में कहीं भी स्थान पा लेना चाहते हैं। पासवान इस बात को बखूबी समझ रहे हैं कि यदि 'जुगाड़ व्यवस्था' में थोड़ी भी लापरवाही हुई तो पांच साल तक उन्हें गुमनामी के दौर से गुजरना होगा। कांग्रेस को इस बार कई दलों ने बिना शर्त समर्थन दिया है। ऍसे में पांच साल के पहले लोकसभा चुनाव होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। लोकसभा चुनाव के पहले राजद-लोजपा व समाजवादी पार्टी ने हाथ मिलाया था। बिहार में लोजपा का सूपड़ा साफ होने के बाद रामविलास को फिलहाल कोई 'ठौर' नहीं है। रामविलास के बारे में बिहार के लोगों का मानना है कि वे बिना सत्ता सुख रह ही नहीं सकते हैं। यह भी मानना है कि इनकी 'जुगाड़ व्यवस्था' काफी मजबूत होती है। सत्ता तक पहुंचने के लिए वे कोई न कोई सीढ़ी बना ही लेते हैं। इधर, यह बात सामने आयी है कि पासवान उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद से उपचुनाव लड़ेंगे। ये यहां से सपा के समर्थित उम्मीदवार होंगे। यह सीट सपा के अखिलेश यादव के त्यागपत्र देने से खाली हुई है। यादव फिरोजाबाद के अलावा कन्नौज से भी जीते थे। उन्होंने फिरोजाबाद से त्यागपत्र दे दिया जिससे यह सीट खाली हो गयी है। पासवान यहां से अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं ताकि वे संसद तक पहुंच सकें। यदि पासवान यहां से जीत जाते हैं और संसद तक पहुंच जाते हैं तो बिहार में राजनीति करना उन्हें काफी भारी पड़ेगा। बिहार से लोजपा पार्टी का निशान ही मिट जाएगा। 2011 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी इनका नामोनिशान मिट जाएगा। इसी लोस चुनाव में रामविलास पासवान ने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद से हाथ मिलाया था। इस हाथ मिलाने के चक्कर में लोजपा का सूपड़ा ही साफ हो गया। चुनाव के दो माह पहले लालू-पासवान पुरानी बात भुलाकर गले मिल चुके थे। गले मिलना कितना घातक हुआ, इस बात को पासवान बखूबी समझ रहे हैं। पासवान सत्ता सुख के लिए वाजपेयी की सरकार में भी शामिल हो चुके हैं। पिछले चुनाव में लोजपा को बिहार में चार सीटें मिली थीं। पासवान ने कांग्रेस को समर्थन दिया था, बदले में इन्हें केन्द्रीय मंत्री की कुर्सी मिली थी। इस चुनाव में वे शून्य पर आउट हो चुके हैं। अब ये कैसे मंत्री बनेंगे? यह एक ज्वलंत सवाल है। सत्ता पासवान के लिए भोजन से कम जरूरी नहीं है। इस चुनाव में एक और आश्चर्यजनक बात सामने आयी कि खुद को दलितों का मसीहा कहने वाले रामविलास को दलितों ने भी पूरी तरह से नकार दिया। अब पासवान कोई भी कुर्बानी देकर संसद तक की दौड़ लगाना चाहते हैं। अब देखना यह है कि इस दौड़ में उनकी हार होती है या जीत?

सोमवार, 1 जून 2009

...तो दिल ही दिल रो रहे लालू-पासवान

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद व लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान को पहली जून को एक और पराजय का सामना करना पड़ा। दोनों को ज्योंहि पता चला कि फतुहा विस उपचुनाव में एनडीए की जीत हुई है। दोनों दिल ही दिल में रो पड़े। फतुहा में 28 मई को वोट डाले गये थे। दोनों नेताऒं ने जमकर प्रचार किया था। राजद-लोजपा गठबंधन की ऒर से पुनित राय चुनाव लड़ रहे थे। पुनीत लोजपा उम्मीदवार थे। पुनित को जदयू के अरुण मांझी ने 10,400 मतों से पराजित कर दिया। लोकसभा चुनाव में बिहार से लोजपा का सूपड़ा साफ हो चुका है। रामविलास खुद हाजीपुर से चुनाव हार चुके हैं। लालू प्रसाद ने जैसे-तैसे अपनी नैया बचा ली। यदि सिर्फ पाटलिपुत्र से चुनाव लड़ते तो संसद में बैठने की जगह तक नहीं मिलती। लोस चुनाव में चार सीट मिलने के बाद वे कांग्रेस से 'बार्गेन' करने की स्थिति में नहीं थे। सो, उन्होंने जबरन बाहर से समर्थन देने की घोषणा की। लालू प्रसाद फिलहाल सिर्फ सांसद बनकर रह गये हैं। यादवों द्वारा नकारे जाने के बाद इनकी हालत काफी पतली हो चली है। चुनाव के पहले गर्जनेवाले लालू प्रसाद की वाणी में कुछ मधुरता दिख रही है। पहली जून को जब वे संसद पहुंचे तो सबका ध्यान खींचने वाले लालू काफी गुमशुम थे। हालांकि संसद में इनकी नजर जब दूसरे से टकरायी तो इन्होंने चेहरे पर हंसी लाने की भरपूर कोशिश की। परंतु बनावटी हंसी ने भी इनका साथ नहीं दिया। राजद-लोजपा के वरिष्ट नेता अपनी करारी हार की समीक्षा में जुट गये हैं। नीतीश के बढ़ते जनाधार से दोनों परेशान हैं। आगे भी यही स्थिति रही तो दोनों को राजनीति से 'वनवास' लेने की नौबत आ जाएगी। आम जनता यह समझ चुकी है कि इनके शासन काल में बिहार का विकास नहीं हो सकता है। पाटलिपुत्र से जदयू के टिकट पर सांसद बने रंजन प्रसाद यादव के अनुसार, लालू ने बिहार को परिवार का जागीर बना दिया था। इसी की सजा उन्हें मिली है। लालू ने सूबे के विकास के बदले परिवार का ज्यादा विकास किया। चारा घोटाले में लालू का आरोपित होना एक छोटा उदाहरण है। चारा घोटाले में जेल जाते वक्त उन्होंने अपनी पत्नी को राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया था जबकि उस समय उनकी पार्टी में कई दिग्गज मौजूद थे। 2005 के विधानसभा चुनाव के बाद भी यदि राजद-लोजपा का गठबंधन हुआ रहता तो बिहार में री-एलेक्शन नहीं होता। लोजपा के पास 29 विधायक थे। रामविलास का कहना था कि राजद को सरकार बनाने में तभी समर्थन देंगे जब लालू अपनी पत्नी के बदले किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बनाने के लिए राजी होंगे। लालू अपने परिवार को छोड़ किसी दूसरे को मुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार नहीं थे। नतीजन, री-एलेक्शन की नौबत आयी जिसमें नीतीश गठबंधन को बहुमत मिला। इस लोकसभा चुनाव में दोनों ने कांग्रेस को दरकिनार कर गठबंधन कर लिया। लालू-पासवान ने अपने हर भाषण में कहा कि दोनों भाई मिलकर सूबे का विकास करेंगे। यह बात जनता को रास नहीं आयी। लोगों ने इस बार इनकी तिकड़मबाजी को समझा और एकजुट होकर बाहर का रास्ता दिखा दिया। दोनों को कांग्रेस की ताकत का भी अंदाजा हो चुका था। आज लालू-पासवान दिल ही दिल रो रहे हैं। इनकी आंखों में आंसू नहीं दिख रहे हैं। परंतु दोनों के दर्द और बेचैनी बढ़ती जा रही है। दोनों की नजरें अब बिहार के उन रिक्त 17 सीटों पर हैं जहां छह माह के अंदर चुनाव होना है। लोकसभा चुनाव के चलते ये सीटें खाली हुई हैं।