सोमवार, 1 जून 2009

...तो दिल ही दिल रो रहे लालू-पासवान

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद व लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान को पहली जून को एक और पराजय का सामना करना पड़ा। दोनों को ज्योंहि पता चला कि फतुहा विस उपचुनाव में एनडीए की जीत हुई है। दोनों दिल ही दिल में रो पड़े। फतुहा में 28 मई को वोट डाले गये थे। दोनों नेताऒं ने जमकर प्रचार किया था। राजद-लोजपा गठबंधन की ऒर से पुनित राय चुनाव लड़ रहे थे। पुनीत लोजपा उम्मीदवार थे। पुनित को जदयू के अरुण मांझी ने 10,400 मतों से पराजित कर दिया। लोकसभा चुनाव में बिहार से लोजपा का सूपड़ा साफ हो चुका है। रामविलास खुद हाजीपुर से चुनाव हार चुके हैं। लालू प्रसाद ने जैसे-तैसे अपनी नैया बचा ली। यदि सिर्फ पाटलिपुत्र से चुनाव लड़ते तो संसद में बैठने की जगह तक नहीं मिलती। लोस चुनाव में चार सीट मिलने के बाद वे कांग्रेस से 'बार्गेन' करने की स्थिति में नहीं थे। सो, उन्होंने जबरन बाहर से समर्थन देने की घोषणा की। लालू प्रसाद फिलहाल सिर्फ सांसद बनकर रह गये हैं। यादवों द्वारा नकारे जाने के बाद इनकी हालत काफी पतली हो चली है। चुनाव के पहले गर्जनेवाले लालू प्रसाद की वाणी में कुछ मधुरता दिख रही है। पहली जून को जब वे संसद पहुंचे तो सबका ध्यान खींचने वाले लालू काफी गुमशुम थे। हालांकि संसद में इनकी नजर जब दूसरे से टकरायी तो इन्होंने चेहरे पर हंसी लाने की भरपूर कोशिश की। परंतु बनावटी हंसी ने भी इनका साथ नहीं दिया। राजद-लोजपा के वरिष्ट नेता अपनी करारी हार की समीक्षा में जुट गये हैं। नीतीश के बढ़ते जनाधार से दोनों परेशान हैं। आगे भी यही स्थिति रही तो दोनों को राजनीति से 'वनवास' लेने की नौबत आ जाएगी। आम जनता यह समझ चुकी है कि इनके शासन काल में बिहार का विकास नहीं हो सकता है। पाटलिपुत्र से जदयू के टिकट पर सांसद बने रंजन प्रसाद यादव के अनुसार, लालू ने बिहार को परिवार का जागीर बना दिया था। इसी की सजा उन्हें मिली है। लालू ने सूबे के विकास के बदले परिवार का ज्यादा विकास किया। चारा घोटाले में लालू का आरोपित होना एक छोटा उदाहरण है। चारा घोटाले में जेल जाते वक्त उन्होंने अपनी पत्नी को राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया था जबकि उस समय उनकी पार्टी में कई दिग्गज मौजूद थे। 2005 के विधानसभा चुनाव के बाद भी यदि राजद-लोजपा का गठबंधन हुआ रहता तो बिहार में री-एलेक्शन नहीं होता। लोजपा के पास 29 विधायक थे। रामविलास का कहना था कि राजद को सरकार बनाने में तभी समर्थन देंगे जब लालू अपनी पत्नी के बदले किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बनाने के लिए राजी होंगे। लालू अपने परिवार को छोड़ किसी दूसरे को मुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार नहीं थे। नतीजन, री-एलेक्शन की नौबत आयी जिसमें नीतीश गठबंधन को बहुमत मिला। इस लोकसभा चुनाव में दोनों ने कांग्रेस को दरकिनार कर गठबंधन कर लिया। लालू-पासवान ने अपने हर भाषण में कहा कि दोनों भाई मिलकर सूबे का विकास करेंगे। यह बात जनता को रास नहीं आयी। लोगों ने इस बार इनकी तिकड़मबाजी को समझा और एकजुट होकर बाहर का रास्ता दिखा दिया। दोनों को कांग्रेस की ताकत का भी अंदाजा हो चुका था। आज लालू-पासवान दिल ही दिल रो रहे हैं। इनकी आंखों में आंसू नहीं दिख रहे हैं। परंतु दोनों के दर्द और बेचैनी बढ़ती जा रही है। दोनों की नजरें अब बिहार के उन रिक्त 17 सीटों पर हैं जहां छह माह के अंदर चुनाव होना है। लोकसभा चुनाव के चलते ये सीटें खाली हुई हैं।

2 टिप्‍पणियां:

  1. हर दल की सरकार में मंत्री बनने वाले व भारत में अवेध घुस आये बंगलादेशी नागरिको के लिए नागरिकता की मांग करने वाले देश द्रोही का सुपडा साफ़ होना ही चाहिए | हाजीपुर के मतदाताओं का आभार !

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  2. ravikant jee..bahut samay baad parivartan kee gadee sahee dishaa mein daur rahi hai...bas ab nitish kumar use thodee gati bhee de dein to aur bhee achha rahegaa......

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