गुरुवार, 4 जून 2009

एमपी बनने के लिए फिर दौड़ लगायेंगे पासवान

सत्ता सुख से वंचित लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान फिलहाल सांसद बनने के लिए बेचैन हैं। वे हर हाल में कहीं भी स्थान पा लेना चाहते हैं। पासवान इस बात को बखूबी समझ रहे हैं कि यदि 'जुगाड़ व्यवस्था' में थोड़ी भी लापरवाही हुई तो पांच साल तक उन्हें गुमनामी के दौर से गुजरना होगा। कांग्रेस को इस बार कई दलों ने बिना शर्त समर्थन दिया है। ऍसे में पांच साल के पहले लोकसभा चुनाव होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। लोकसभा चुनाव के पहले राजद-लोजपा व समाजवादी पार्टी ने हाथ मिलाया था। बिहार में लोजपा का सूपड़ा साफ होने के बाद रामविलास को फिलहाल कोई 'ठौर' नहीं है। रामविलास के बारे में बिहार के लोगों का मानना है कि वे बिना सत्ता सुख रह ही नहीं सकते हैं। यह भी मानना है कि इनकी 'जुगाड़ व्यवस्था' काफी मजबूत होती है। सत्ता तक पहुंचने के लिए वे कोई न कोई सीढ़ी बना ही लेते हैं। इधर, यह बात सामने आयी है कि पासवान उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद से उपचुनाव लड़ेंगे। ये यहां से सपा के समर्थित उम्मीदवार होंगे। यह सीट सपा के अखिलेश यादव के त्यागपत्र देने से खाली हुई है। यादव फिरोजाबाद के अलावा कन्नौज से भी जीते थे। उन्होंने फिरोजाबाद से त्यागपत्र दे दिया जिससे यह सीट खाली हो गयी है। पासवान यहां से अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं ताकि वे संसद तक पहुंच सकें। यदि पासवान यहां से जीत जाते हैं और संसद तक पहुंच जाते हैं तो बिहार में राजनीति करना उन्हें काफी भारी पड़ेगा। बिहार से लोजपा पार्टी का निशान ही मिट जाएगा। 2011 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी इनका नामोनिशान मिट जाएगा। इसी लोस चुनाव में रामविलास पासवान ने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद से हाथ मिलाया था। इस हाथ मिलाने के चक्कर में लोजपा का सूपड़ा ही साफ हो गया। चुनाव के दो माह पहले लालू-पासवान पुरानी बात भुलाकर गले मिल चुके थे। गले मिलना कितना घातक हुआ, इस बात को पासवान बखूबी समझ रहे हैं। पासवान सत्ता सुख के लिए वाजपेयी की सरकार में भी शामिल हो चुके हैं। पिछले चुनाव में लोजपा को बिहार में चार सीटें मिली थीं। पासवान ने कांग्रेस को समर्थन दिया था, बदले में इन्हें केन्द्रीय मंत्री की कुर्सी मिली थी। इस चुनाव में वे शून्य पर आउट हो चुके हैं। अब ये कैसे मंत्री बनेंगे? यह एक ज्वलंत सवाल है। सत्ता पासवान के लिए भोजन से कम जरूरी नहीं है। इस चुनाव में एक और आश्चर्यजनक बात सामने आयी कि खुद को दलितों का मसीहा कहने वाले रामविलास को दलितों ने भी पूरी तरह से नकार दिया। अब पासवान कोई भी कुर्बानी देकर संसद तक की दौड़ लगाना चाहते हैं। अब देखना यह है कि इस दौड़ में उनकी हार होती है या जीत?

3 टिप्‍पणियां:

  1. राजनीति व चुनावों भी दोबारा परीक्षा की सुविधा होनी चहिए। यूँ पाँच साल बर्बाद नहीं होने चाहिए।
    घुघूती बासूती

    उत्तर देंहटाएं
  2. पासवान जी तो यह ही कहते होंगे आजकल - हम होंगे कामयाब एक दिन....

    उत्तर देंहटाएं