सोमवार, 15 जून 2009

तब ये कहती हैं मुझे प्यार करो...भाग-एक

हर चुनाव में सड़क, बेरोजगारी, महंगाई, देश की सुरक्षा, कश्मीर मसला, महिला आरक्षण जैसे मुद्दे तो उठाये जाते हैं। परंतु किसी चुनाव में इस बात की चर्चा नहीं होती कि वेश्यावृत्ति कैसे रोकें। वेश्यावृत्ति से मुक्त महिलाएं समाज में इज्जत से कैसे जिएं, इस बात को जोरदार ढंग से कभी नहीं उठाया गया है। ऍसा नहीं है कि इसके लिये कानून नहीं है या फिर पुलिस छापेमारी नहीं करती है। इसके बावजूद यह देशव्यापी मुद्दा कभी नहीं बना। हमें किसी वेश्या या कार्लगर्ल का वह रूप तो दिखता है, जिसमें वे जिस्म बेचकर मोटी रकम वसूलती हैं। परंतु पर्दे के पीछे उनकी जिंदगी की कड़वाहट को कोई नहीं देखता। कोई नहीं देखता कि वह जिंदा लाश जैसी है, जो ग्राहकों को देख उससे लिपट जाती है। उन्हें अपने जिस्म से खेलने को मजबूर करती है ताकि उसे अधिक से अधिक रुपये मिल सके। वह ग्राहक दुबारा भी उसके पास आये इसके लिये वह नये-नये नुस्खे अपनाती है। इस रूप के लिए कभी कोई महिला स्वेच्छा से तैयार नहीं होती। इसके लिये उसे तहखाने में बंदकर इस कदर प्रताड़ित किया जाता है कि वे मरनासन्न स्थिति में पहुंच जाती हैं। कई तो मर भी जाती हैं। ऍसे में यदि जान बचाने के लिए वे जिस्मफरोशी के धंधे के लिए हामी भरती है तो इसके लिये पूरा समाज दोषी है। देश के हजारों सफेदपोश इस कार्य में लिप्त हैं। ये सफेदपोश लाखों दलाल पाल रखे हैं। ये कम उम्र की लड़कियों को विभिन्न माध्यम से खरीदते हैं। फिर उन्हें विभिन्न शहरों में मौजूद 'जिस्म की मंडी' तक पहुंचा देते हैं। यहां उन्हें ग्राहकों को रिझाने का तरीका सिखाया जाता है। इसी में से कुछ सुंदर लड़कियों को कार्लगर्ल के रूप में होटलों में सप्लाई कर दिया जाता है। इस धंधे में सुंदर और कम उम्र की लड़कियों की मांग अधिक है। इस बात की जानकारी पुलिस प्रशासन को बखूबी होती है। पुलिस को हर माह एक मोटी रकम मिलती है। ऍसे में संबंधित इलाके में पुलिस छापेमारी नहीं करती है। यदि इस मंडी से कोई लड़की भागकर किसी छुटभैये नेता के पास पहुंच जाती है। इस क्रम में वह अपना दर्द उससे बयान करती है। तब, ये नेता जी पच्चीस-पचास लोगों को इक्ट्ठा कर हंगामा शुरू कर देते हैं। ऍसे हालात में पुलिस को छापेमारी करनी पड़ती है। परंतु इसकी सूचना मंडी के बड़े दलालों तक पुलिस पहले ही पहुंचा देती है। नतीजन, छापेमारी में पुलिस को कुछ भी हासिल नहीं होता। पुलिस दिखावे के तौर पर कुछ लोगों को पकड़कर बंद कर देती है जिसे बाद में जमानत पर छोड़ देती है। बाद में पता चलता है कि उक्त नेताजी को भी 'जिस्म की मंडी' से हिस्सा चाहिए। नेताजी ने पहले कई दलालों से इसके लिये संपर्क भी साधा था। कामयाबी नहीं मिलने पर उन्होंने हाथ आयी लड़की के सहारे हो हल्ला कर फिर से उल्लू साधने की कोशिश की। अफसोस उन्हें इस बार भी हिस्सेदारी नहीं मिली। इधर, चंद दिनों बाद फिर मंडी का व्यवसाय फलने-फूलने लगता है। देश के हर राज्य में दर्जनों स्वयंसेवी संस्था वेश्याटोली की महिलाऒं को रोजगार देने की योजना पर काम कर रही है। इसके बावजूद आंकड़े बताते हैं कि जिस्मफरोशी का धंधा बढ़ता ही जा रहा है। क्रमश...

3 टिप्‍पणियां:

  1. चालाकी से चल रहा जिस्मों का व्यापार।
    वेश्याओं के दर्द का किया खूब इजहार।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  2. रविकांत जी,
    आलेख महत्वपूर्ण है। चुनाव में जनता के जो मुद्दे उठना चाहिए वे नहीं उठते। वहाँ केवल फर्जी मुद्दे उठाए जाते हैं। आगे की कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी।
    इस आलेख को कुछ पैराओं में विभक्त कर देते तो पाठ सुगम हो जाता। और यह शब्द पुष्टिकरण भी हटा दें तो टिप्पणीकर्ताओं को सुविधा हो लेगी।

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