मंगलवार, 16 जून 2009

तब ये कहती हैं मुझे प्यार करो...भाग-दो

बिहार का एक जिला सीतामढ़ी भी है। मां जानकी की जन्मस्थली होने की वजह से सीतामढ़ी की धरती अत्यंत पवित्र मानी जाती है। यहां के धूल को सिर पर लगा लेने से कई तीर्थस्थल का पुण्य प्राप्त हो जाता है। ऍसी कहावतें सुनने को मिलती हैं। सीतामढ़ी रेलवे जंक्शन से तकरीबन पांच किलोमीटर की दूरी पर मां जानकी का मंदिर है। यहां दूर-दूर से लोग मां का दर्शन करने आते हैं। मां जानकी के मंदिर से एक सड़क रीगा प्रखंड की ऒर जाती है। इसी के मुहाने के पास एक बस्ती नजर आती है। इसके चारों ऒर लखनदेई नदी का पानी बहते रहता है। बरसात के दिनों में तो एक चचरी के सहारे ही इस बस्ती तक पहुंचा जा सकता है। इसी बस्ती का नाम है 'बोहा टोला' यानी वेश्याऒं का मोहल्ला। एक तरफ मां जानकी को चढ़ावा पर चढ़ावा चढ़ता है। दूसरी तरफ 'बोहा टोला' में हर रोज किसी लड़की की आबरू लूटी जाती है। इन्हें लड़की से औरत बना दिया जाता है। इनकी चीखें इस कलयुग में न तो मां जानकी के पास पहुंचती है न ही सरकार के पास। कुछ नाबालिग तो कुछ बालिग लड़कियों की तकलीफें इस बस्ती की चहारदीवारी तक गूंज कर रह जाती है। धीरे-धीरे ये इस जीवन को जीने की आदि हो जाती हैं। इस बस्ती में ज्यादातर झोपड़ियां ही हैं। परंतु कुछ पक्के मकान भी नजर आते हैं। इस मकान के भीतर दलालों ने तहखाना बना रखा है। लड़कियों को अगवा कर या फिर खरीदने के बाद उन्हें तहखाने में पहुंचा दिया जाता है। जहां रोशनी की सारी व्यवस्था तो रहती है, परंतु टिमटिमाते दीये की रोशनी में ही इन्हें रखा जाता है। ताकि समय-समय पर इन लड़कियों को ये दाग सकें। यहां लोहे की छड़ी, छोटा जंजीर, रूई, मलहम जैसे कई सामान की व्यवस्था रहती है। लड़कियां किसी भी कीमत पर वेश्यावृत्ति के धंधे को अपनाने के लिए तैयार नहीं होती। यहां उपस्थित सभी दलाल इनके साथ बेरहमी से सामूहिक बलात्कार करते हैं। इनपर दलाल तबतक जुल्म ढ़ाते हैं जबतक ये इस पेशे को अपनाने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो जाती। जब ये लड़कियां हामी भर देती हैं। तब दलाल इन्हें मेडिकल चिकित्सा उपलब्ध कराते हैं ताकि इनके जख्म जल्द से जल्द सूख सके। फिर इन्हें सिखाया जाता है ग्राहकों से मोटी रकम वसूलने का तरीका। ग्राहक चाहे इनकी झोली में हजार या पांच हजार क्यों न दे दे। इन्हें मिलते हैं सौ या पचास ही। बाकी रुपये में कई हिस्से लगते हैं। दलाल से लेकर पुलिस और फिर सफेदपोशों तक पहुंचता है हिस्सा। 'बोहा टोला' से भागी एक लड़की ने इस बात का खुलासा कुछ साल पहले किया था। वह जब इस टोले से भागी थी तो कुछ लोगों ने उसे थाने की पुलिस तक पहुंचा दिया था। एक पत्रकार ने बड़ी चालाकी से उस लड़की से बात की, तब 'प्रताड़ना गृह' की बात सामने आयी। बाद में जब पुलिस ने छापेमारी की, तो इस बस्ती में दलालों ने आग लगा दी थी। सारी लड़कियों को ऍसे तहखाने में छिपा दिया गया, जहां पुलिस नहीं पहुंच पायी। इसके कुछ ही दिन बाद 'बोहा टोला' फिर से आबाद हो गया। आज पूरे भारत में हजारों जगहों पर 'बोहा टोला' मौजूद हैं। इसके बावजूद किसी चुनाव में यह मुद्दा नहीं बना। न ही किसी मंत्री, सांसद या विधायक ने इस मुद्दे को कभी उठाया। क्रमश...

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