शुक्रवार, 19 जून 2009

पत्रकारों को भी भाते हैं चाटुकार

आज आम आदमी की कौन कहे पत्रकारों को भी चाटुकार ही अधिक भाते हैं। हर व्यक्ति अपनी तारीफ सुनना चाहता है। गलती से किसी ने सच मुंह पर कह दिया तो लोग भड़क जाते हैं। लाल-पीले हो जाते हैं। देख लेने की धमकी दे देते हैं। सच कहने वाले के खिलाफ मोर्चा तक खोल देते हैं। यह सिलसिला तब तक चलता है जबतक सच कहने वाले व्यक्ति की हालत पतली न हो जाए। इसी तरह यदि किसी पत्रकार की खबर पेज वन पर छपी हो। वह भी बाइलाइन, ऎसे में वह सीना चौड़ा किये किसी दफ्तर में जाता है। मान लीजिए वहां कोई क्लर्क नया आया हो। उसने पत्रकार महोदय से परिचय पूछ लिया। इस पर पत्रकार महोदय भड़क उठते हैं। यह भी कहते हैं कि पेज वन पर उन्हीं की बाइलाइन छपी है। इसी समय चपरासी आकर कहता है कि पत्रकार जी को साहेब बुला रहे हैं। पत्रकार का सीना और फूल जाता है। वे लंबे-लंबे डग भरते हुए अधिकारी के कमरे में प्रवेश करते हैं। फिर शुरू होता है बातचीत का दौर। इस क्रम में पत्रकार महोदय यह जरूर कहते हैं कि आज पेज वन पर उन्हीं की खबर छपी है। इस बीच यदि अधिकारी ने दबी जबां से कह दिया कि खबर में त्रुटि रह गयी है। संयोग से जो खबर छपी है, इसी अधिकारी के बयान से छपी है जिससे पत्रकार महोदय बात कर रहे हैं। ऍसे में पत्रकार महोदय भड़क जाते हैं। यह भी कहते हैं कि उन्होंने तो ठीक लिखा था। परंतु आफिस में बैठे डेस्क के साथियों ने अपने मन से इसमें कुछ जोड़ दिया। यह भी कहने से नहीं चूकते हैं कि वे इसका खंडन छपवा देंगे। यदि पत्रकार महोदय को अपनी गलती सुनने की आदत रहती तो शायद उनसे ऍसी गलती नहीं होती। वे अपनी गलती औरों पर नहीं थोपते, न ही उनमें घमंड दिखता। अपनी प्रशंसा सुनने के घमंड में चूर होकर ये पिछले बीस साल से एक ही गलती दुहरा रहे हैं। इनके आधे से अधिक बाल भी सफेद हो चुके हैं। इसके बावजूद इनमें कोई बदलाव नहीं आया। ये अपनी कापी में बीस साल पहले जो गलती करते थे आज भी कर रहे हैं। परंतु किसी की इतनी जुर्रत नहीं है कि कोई यह कह दे कि आप हर लाइन में गलती लिखते हैं। आफिस में इनकी गिनती 'बकलोल' और पैरवी से नौकरी पाने वाले पत्रकार के रूप में होती है। अब एक दूसरे दर्जे के पत्रकार की चर्चा करते हैं। इनके पास जानकारी है। ये 'पैरवीपुत्र' भी नहीं है। परंतु इन्हें अपनी जानकारी का इतना घमंड है कि ये सभी को अपने से कम जानकार बताते हैं। यदि ये कोई खबर लिख रहे हैं और किसी ने टोक दिया कि इसका 'इंट्रो' दमदार नहीं है या उनकी पढ़ी या लिखी खबर को किसी ने कुछ शब्द इधर-उधर कर दिया। इसके लिये ये जनाब पूर दफ्तर को सिर पर उठा लेंगे। हर हाल में इन्हें ऍसा कोई चाहिए जो हर वक्त यह कहता रहे कि आप महान हैं। आपके जैसा पत्रकार तो देश में इने-गिने ही हैं। ऍसा कहने से ही इनके दिल को खुशी मिलती है। ऍसा नहीं है कि तारीफ सुनने की आदत सिर्फ पत्रकारों में ही है। यह बुराई नब्बे फीसदी लोगों में है। पान वाले दुकानदार तक इस रोग से पीड़ित हैं। यदि किसी ने यह कह दिया कि 'भैया' आपके पान की क्वालिटी में कमी आ रही है। वह दुकानदार तुरंत पलटवार कहते हुए कहेगा कि आपको जहां पसंद है, वहीं खा लिया करें। वह इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं कि उसे क्वालिटी में सुधार करना चाहिए। ऍसे में चाटुकारिता करने वाले की तो हर जगह जय हो, जय हो रहेगा। परंतु इससे परे स्वभाव वाले को हमेशा परेशानी का सामना करना पड़ेगा। पत्रकारों की गिनती बुद्धिजीवी में होती है। जब उन्हें ही चाटुकार अधिक भाते हैं तो आम आदमी की कौन कहे? परंतु इससे बचने का प्रयास करना चाहिए। अपनी गलती सुनने की आदत डालने वालों को फायदा ही फायदा होता है। वे अपनी गलती सुनकर इसे सुधारने का प्रयास करते हैं। वहीं गलती सुनकर भड़क जाने वाले हमेशा इस भ्रम में जीते हैं कि वे ही बेहतर हैं...

4 टिप्‍पणियां:

  1. किसी की पंक्तियाँ हैं-

    अपना अवगुण नहीं देखता अजब जगत का हाल।
    निज आँखों से सूझता सच है अपना भाल।।

    नोट - वर्ड वेरीफिकेशन हँटाने का प्रबंध करें।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  2. एकदम सच है। बहुत बार तो पत्रकार महोदय के चमत्कार से कॉर्पोरेट घटनाओं की ऐसी रिपोर्टें छप जाती हैं कि हम लोग हँसते ही रह जाते हैं - कभी खिसियाई तो कभी गरियाई मुद्रा में।

    चाटुकार तो सभी को भाते हैं। इस मिठाई का आनन्द 'मधुमेह' के रोगी और अ-रोगी दोनों उठाते हैं।

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  3. सही लिखा।लेकिन चाटुकार तो सभी को भाते हैं अब ऐसे मे सावधानी कौन बरतता है.....अपनी अलोचना कोई नही सुनना चाहता। जो जितना ज्यादा प्रसिद्ध है वह उतना ही अलोचना सुनना पसंद नही करता...

    नोट - वर्ड वेरीफिकेशन हँटाने का प्रबंध करें।

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  4. पत्रकार ही क्यों...चाटुकार तो सभी को अच्छे लगते हैं...

    "चाटुकार नियरे राखिये, बिन चाटुकार सब सून,
    चाटुकार बिन न ऊबरे हो, पत्नी या मानुष की जून "
    (क्षमायाचना सहित)

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