शनिवार, 20 जून 2009

भगवान ये अमीर हैं, इन्हें पहले आशीर्वाद दीजिए!

बचपन से यही सिखाया-पढ़ाया जाता है कि भगवान की नजर में सभी समान हैं। न कोई अमीर और न ही कोई गरीब। धार्मिक किताबें भी यही कहती हैं। परंतु कुछ पुजारियों ने इसे उलट दिया है। ये पुजारी अमीरों को बिना इंतजार कराये ही भगवान का दर्शन करवा देते हैं जबकि गरीब घंटों इंतजार के बाद ही दर्शन कर पाते हैं। पूरे भारत में जितने मंदिर-मस्जिद हैं। इनमें से इने-गिने को छोड़ सभी में जैसे ही कोई अमीर या वीआईपी भगवान दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लंबी कतार में खड़े गरीब व सामान्य भक्तों को रोक दिया जाता है। ये चिलचिलाती धूप हो या सर्द हवा, अपनी बारी का इंतजार करते हैं। ये वीआईपी या अमीर जबतक भगवान का दर्शन ठीक से नहीं कर लेते तबतक कोई प्रवेश नहीं कर सकता। बिहार में राबड़ी देवी जब मुख्यमंत्री थी तो वे कार्तिक छठ करती थीं। जिस गंगा घाट पर वे अर्घ्य देने जाती थीं। उस घाट पर कोई आम आदमी अर्घ्य नहीं दे सकता था। घाट पर सैकड़ों की संख्या में सुरक्षाकर्मी पहले से ही तैनात रहते थे। यहां तक कि वे जिस मार्ग से जाती थीं। उस मार्ग पर भी आवागमन रोक दिया जाता था। इससे जनता को कितनी परेशानी होती थी। यह तो जनता ही समझती थी। किसी राज्य के मुख्यमंत्री यदि कहीं देवी-देवता के दर्शन के लिए जाते हैं तो उस वक्त आम जनता को रोक दिया जाता है। यानी भगवान के किसी मंदिर में यदि देवी या देवता का दर्शन बिना लाइन लगे करना हो तो इसके लिये अमीर या वीआईपी होना जरूरी है। अभिषेक बच्चन की शादी के पहले अमिताभ बच्चन कई बार वाराणसी गये। वहां के कई ऎसे मंदिरों में वे गये जहां बिना पंक्ति में आये देवी दर्शन कठिन है। इसके बावजूद उनके लिये सारे भक्तों को रोक दिया गया था। इसकी एक बड़ी वजह चढ़ावे की राशि का अधिक होना भी है। बड़ी हस्तियां जब देवी-देवता के दर्शन के लिए जाती हैं तो वे लाखों में चढ़ावा चढ़ाते हैं। ऍसे में पुजारी और मंदिर का भाग्य खुल जाता है। कई पुजारी तो ललचायी नजरों से ऍसे दानकर्ता का इंतजार करते हैं। सीतामढ़ी में मां जानकी मंदिर में मौजूद पुजारी को हरवक्त ऍसे भक्त का इंतजार होता है, जो चढ़ावा ठीक-ठाक दे। यानी दान की राशि अधिक हो। गरीब भक्त को यहां दरकिनार कर दिया जाता है। उन्हें काफी समय तक मां के दर्शन के लिए इंतजार करना पड़ता है। यहीं नहीं कई बार तो पुजारी बेबाक कह देते हैं कि महंगाई बढ़ गयी है। ऍसे में चढ़ावे की राशि भी बढ़नी चाहिए। एक पत्रकार को जब मंदिर के चढ़ावे के बारे में जानकारी मिली तो वे बिना परिचय दिये ही मंदिर में मां के दर्शन के लिए गये। प्रसाद के अलावा उन्होंने पुजारी को चढ़ावे के लिए पांच का सिक्का दिया। पुजारी ने इशारे-इशारे में कहा कि चढ़ावा अधिक होना चाहिए। इससे देवी जल्द प्रसन्न होती हैं। उक्त पत्रकार से पहले वहां कई गरीब भक्त अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। पत्रकार ने 51 रुपये निकालकर पुजारी को दे दिये। इससे पुजारी प्रसन्न हो गया। यह भी कहा कि यहां से कोई खाली हाथ नहीं जाता। यानी इस पुजारी के अनुसार, जो गरीब भक्त चढ़ावा नहीं देते मां जानकी उन्हें खाली वापस लौटा देती हैं?

5 टिप्‍पणियां:

  1. इसमें भगवान की गल्ती नहीं. पंडितों ने इसे व्यापार बना लिया है.

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  2. वास्तव में ऐसी जगहों पर अब ऐसे लोग कब्जा जमा चुके हैं जिन्हें सिर्फ भावनाओं से नही पैसो से सरोकार होता है। पंडित पुजारीयों का ही नही इस में प्रबंधको का भी हाथ होता है।जिस कारण भक्त को परेशानी उठानी पड़ती है।

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  3. ऐसे लोगों की भगवान नहीं सुनता और यदि सुनता है तो वह भगवान नहीं।

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  4. अरे यह तो हरेक मंदिर की व्यथा है, पर हम तो हमेशा लाईन में लगकर ही दर्शन करते हैं अरे जब भगवान के पास जाने की बारी आयेगी तो भी शायद पैसे देकर यही लोग जल्दी से चले जायेंगे।

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  5. धर्म के नाम पर उसके ठेकेदारों ने जो आडम्बर बना रक्खा है उससे मंदिरों के प्रति उदासीनता ही बढती है...मुझे ऐसे किसी भी मंदिर में जाने से नफरत है जहाँ अमीर गरीब में भेद रक्खा जाता हो...आप ने जो लिखा है सच लिखा है...
    नीरज

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