रविवार, 21 जून 2009

बिहारः शिक्षकों को चपरासी से भी कम वेतन

सुनने में कुछ अजीब लगेगा, परंतु यह कड़वा सच है कि बिहार में एक लाख से अधिक सरकारी शिक्षकों को चपरासी से भी कम वेतन मिलता है। इन शिक्षकों को चपरासी भी ताने देते हैं, उन्हें आंखें दिखाते हैं। बिहार में सरकारी दफ्तरों में काम करनेवाले चपरासी का वेतन आठ हजार रुपये से कम नहीं हैं। परंतु इन शिक्षकों को चार से सात हजार रुपये ही मिलते हैं। पंचायत, ग्राम पंचायत, नगर पंचायत व प्रखंड के अनट्रेंड शिक्षकों को 4000, ट्रेंड को 5000 एवं हाईस्कूल के शिक्षकों को 6000 रुपये मानदेय के रूप में मिलते हैं। वहीं प्लस टू के शिक्षकों को 7000 रुपये मानदेय मिलते हैं। इन शिक्षकों ने जब मानदेय बढ़ाने के लिए धरना-प्रदर्शन शुरू किया तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दो टूक शब्दों में कहा कि जिन्हें नौकरी करनी है करें, वर्ना दूसरी नौकरी ढूंढ़ लें। उन्होंने यह भी कहा कि चपरासी सरकारी कर्मचारी हैं। शिक्षक सरकारी नहीं हैं। ये शिक्षक पंचायत, नगर निगम, जिला परिषद के अधीन कार्यरत हैं। नीतीश ने कहा कि मानदेय बढ़ाने के पहले शिक्षकों की दक्षता की जांच की जाएगी। एनुअल और सप्लीमेंट्री की तर्ज पर परीक्षा होगी। एनुअल दक्षता जांच परीक्षा में फेल होने पर एक आखिरी मौका देकर सप्लीमेंट्री दक्षता जांच परीक्षा ली जाएगी। इसमें सफल होने वाले शिक्षकों को मानदेय बढ़ाया जाएगा। विफल होने पर बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। इन शिक्षकों की मूल्यांकन परीक्षा 13 सितंबर को होने वाला है। मानव संसाधन विभाग के प्रधान सचिव ने कहा कि शिक्षक नियोजन नियमावली 2006 में स्पष्ट प्रावधान है कि नवनियोजित शिक्षकों का तीन वर्ष बाद मूल्यांकन किया जाएगा। इसी आधार पर शिक्षकों का मानदेय 400 से 500 बढ़ाया जाएगा। शिक्षकों के वेतन मामले को हवा दे रहे हैं राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद चुनाव के लिए उन्हें एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। अगले साल बिहार में विधानसभा का चुनाव होना है। ऍसे में नीतीश सरकार के लिए यह एक बड़ी समस्या बन सकती है? नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के रूप में 2005 में बिहार की सत्ता संभाली। तब उन्हें विरासत में मिली सूबे की टूटी सड़कें, गरीबी, बेरोजगारी। उस समय सूबे के सभी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी थी। दूसरी ओर टीचर ट्रेनिंग किये हजारों युवा बेरोजगार थे। कई ने तो टीचर ट्रेनिंग बीस साल पहले किया था। परंतु अब भी बेरोजगार थे। नीतीश ने चुनाव के पहले इन सभी को रोजगार देने की बात कही थी। सत्ता में आने के बाद इतने शिक्षकों की बहाली उनके लिये एक बड़ी चुनौती थी। इसके बावजूद नीतीश सरकार ने निर्णय लिया कि शिक्षकों की बहाली की जाएगी। आनन-फानन में एक लाख से अधिक शिक्षकों की बहाली कर दी गयी। उस समय बेरोजगारों ने यह नहीं देखा कि वे शिक्षक तो बन रहे हैं परंतु वेतन उन्हें चपरासी से भी कम मिलेगा? इतने पैसे में उनका गुजारा कैसे होगा? दूसरी ओर नीतीश सरकार की सोच थी कि इन शिक्षकों को उन्हीं के शहर या गांव में पोस्टिंग कर दी जाए। बहाल शिक्षकों की कोई परीक्षा नहीं ली गयी बल्कि डिग्री देख उनकी बहाली कर दी गयी। इसमें ऍसे शिक्षक भी शिक्षक बन गये जिन्हें सौ तक गिनती भी ठीक से नहीं आती थी। जब शिक्षकों ने स्कूलों में योगदान दिया तो वहां पहले से मौजूद शिक्षकों को पन्द्रह-बीस हजार मासिक मिल रहे थे। यह देख उन शिक्षकों की आत्मा ने धिक्कारा, जो वास्तव में योग्य थे। इधर, जबसे शिक्षकों को यह पता चला कि उनकी जांच परीक्षा होगी। फेल करने पर उनकी नौकरी जा सकती है। तबसे इन शिक्षकों में हड़कंप मचा हुआ है। यह हड़कंप उन शिक्षकों में अधिक है जो पेंशन के तौर पर वेतन उठा रहे हैं। वहीं योग्य शिक्षकों को इस बात की खुशी है कि जांच परीक्षा बाद उनके मानदेय में वृद्धि हो जाएगी। शिक्षकों का एक वर्ग अदालत जाने की तैयारी कर रहा है। इधर, दूसरे चरण की शिक्षक बहाली की प्रक्रिया भी अंतिम चरण में है। दो माह बाद 80 हजार नये शिक्षक योगदान देने वाले हैं। पहले चरण में शिक्षक बनने के बाद हजारों लड़कियों की शादी बिना दहेज हो गयी। बेटे के मां-बाप ने यह सोच दहेज नहीं लिया कि घर में कमाने वाली बहू आ रही है। उसी तरह हजारों ऍसे युवाओं के सिर पर भी सेहरा बंधा जिनकी शादी नौकरी न रहने की वजह से नहीं हो पा रही थी। इसका श्रेय नीतीश सरकार को ही जाता है। इसके बावजूद नीतीश सरकार को शिक्षकों से यह कहना चाहिए था कि समय-समय पर इनके मानदेय में बढ़ोतरी की जाएगी। बढ़ती महंगाई में मानदेय बढ़ाने की मांग कहीं से गलत नहीं है। परंतु पढ़ाई से कमजोर शिक्षकों को भी चाहिए कि वे बच्चों को पढ़ाने के लिए खुद को उस लायक बनायें।

3 टिप्‍पणियां:

  1. जब कोई और चारा नहीं, कहीं और कुछ करते नहीं बना तो चलो शिक्षक बना जाये- जब तक ये मनोवृत्ति रहेगी, शिक्षा का स्तर ऊँचा नहीं हो सकता। ज़रूरी है कि शिक्षकों को उनकी योग्यता अनुसार मेहनताना दिया जाये, जब तक काम के अनुरूप वेतन नहीं दिया जायेगा, शिक्षकों में क्षोभ का होना स्वाभाविक है, मगर इससे बच्चे का भविष्य बिगाड़ना भी गुनाह है। भारत में बहुत कुछ बदलना ज़रूरी है, मगर पहल करने वाले को भी कुछ करने नहीं दिया जाता, वहाँ की व्यवस्था के चलते...सिर्फ़ दूर से दुखी ही हो सकते हैं हम।

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  2. काश सरकारें समझ पातीं, अध्यापक का वेतन समाज और देश के लिए investment है.

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  3. बिहारः शिक्षकों को चपरासी से भी कम वेतन
    http://journalism-ravikant.blogspot.com/2009/06/blog-post_21.html#comment-form
    Dear
    Good evening!
    I don't know much computer but after reading your blog "Abov Topic"
    I can say that :
    1. Most are not able for good salary. Those are they are not trying more.
    2. Here we can say that we are not getting even good English, Hindi teacher.
    3. Even Primary Teachers.
    4. These days I don't know the teacher who can pronounce devnagari very well.
    5. So if such dedicated teachers are there, We are ready to give them good salary.
    6. But I don't know the definition of good because no one can give salary to a teacher even after making shoe of his/her skin.
    7. We make co-sharere.
    Hope for good reply.
    TEACEHR IS TEACHER AND PEON IS PEON
    BYE

    --
    RAMESH SACHDEVA
    DIRECTOR,
    HPS DAY-BOARDING SENIOR SECONDARY SCHOOL,
    "A SCHOOL WHERE LEARNING & STUDYING @ SPEED OF THOUGHTS"
    SHERGARH (M.DABWALI)-125104
    DISTT. SIRSA (HARYANA) - INDIA
    HERE DREAMS ARE TAKING SHAPE
    +91-1668-230327, 229327
    www.hpsshergarh.wordpress.com

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