सोमवार, 13 जुलाई 2009

बिहार : मिड डे मील का सच

कुछ साल पहले बिहार में चारा घोटाले का मामला सामने आया था। इस घोटाले की जब जांच की गयी तो पता चला कि इसमें बड़े-बड़े नेता व अधिकारी शामिल हैं। तब के मुख्यमंत्री व राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद भी इस घोटाले में शामिल थे। पशुओं के चारे के करोड़ों रुपये नेताओं व अफसरों ने पचा लिये। यह मामला अब भी कोर्ट में चल रहा है। इसी तरह बिहार के मिड डे मील में भी घोटाले का मामला परत-दर-परत सामने आ रहा है। यह अलग बात है कि इसमें एक साथ करोड़ों के घोटाले का मामला सामने नहीं आया है। इसकी राशि टुकड़े-टुकड़े में स्कूलों तक पहुंचती है। ऎसे में घोटाले का स्वरूप छोटा-छोटा परंतु आंकड़े बड़े हैं। यदि मिड डे मील के घपले की जांच सीबीआई से करायी जाए तो करोड़ों के घोटाले का भेद खुल जाएगा। प्राथमिक व मध्य विद्यालयों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों को पढ़ाई के प्रति रुचि बनी रहे और वे प्रतिदिन पढ़ने आये, इसी खातिर इस योजना की शुरुआत की गयी थी। इससे पहले लाखों गरीब अभिभावक इसलिए अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते थे कि घर पर रहने पर वे खेतों में काम करते थे। देश में सबसे पहले इस योजना की शुरुआत मद्रास सिटी में की गयी थी। उद्देश्य था कि समाज से वंचित गरीब बच्चों को भी भरपेट भोजन मिले। इससे स्कूल आने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी थी। इसके पश्चात सुप्रीम कोर्ट ने एक ऎतिहासिक फैसले में 28 नवंबर 2001 को इसे पूरे देश में लागू करने का निर्देश दिया। इस योजना के लागू होते ही हजारों लोगों को जैसे रोजगार मिल गया। इस योजना में अधिक से अधिक कमाई कैसे हो, इसपर शिक्षक से लेकर स्कूल के प्रधानाध्यापक फिर जिला शिक्षा अधिकार तक विचार-विमर्श करते हैं। सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, सिवान, शिवहर सहित कई जिले में दर्जनों ऎसे स्कूल हैं, जहां छात्र तो सौ हैं परंतु पच्चीस-तीस ही नियमित आते हैं। ऎसे में हजारों रुपये प्रतिमाह एक स्कूल से सीधे आमदनी हो जाती है। इसके पश्चात चावल की निम्न 'क्वालिटी' का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार द्वारा जारी मेन्यू में खिचड़ी भी बच्चों को दी जाती है। इसमें आए दिन कीड़े मिलने की शिकायतें बिहार में आम बात है। कई बार कीड़ों की संख्या इतनी अधिक रहती है कि बच्चे भोजन करते ही गंभीर रूप से बीमार हो जाते हैं। इनके अभिभावकों के हो-हल्ला के बाद प्रशासन की नींद खुलती है। जांच में घोटाले का मामला सामने आता है। सरकारी मेन्यू के अनुसार बच्चों को सोमवार को चावल व कढ़ी, मंगलवार को चावल-दाल व सब्जी, बुधवार को खिचड़ी, गुरुवार को सब्जी पोलाव, शुक्रवार को चावल व छोला, शनिवार को खिचड़ी व चोखा देना है। परंतु बिहार के दर्जनभर स्कूलों में ही इसका पालन हो पाता है। वह भी चालीस फीसदी ही। अधिकतर स्कूलों में गुरुजी के लिए भी इसी योजना से भोजन बनता है। उनका भोजन उनके घर की तरह ही स्वादिष्ट होता है। इस योजना में अब तक सैकड़ों लोगों को दोषी पाया गया। कार्रवाई के नाम पर अधिकतर मामलों में पैसे लेकर 'फूल' के 'चाबुक' चलाये गये। गरीब बच्चों को स्कूलों में पौष्ठिक भोजन देने की योजना सरकार की फाइलों में ही सिमटकर रह गयी है। पहली जुलाई को बिहार के विधानसभा में भाकपा विधायक ने इस मामले को मजबूती से उठाया। मानव संसाधन मंत्री इसका कोई जवाब नहीं दे सके। नतीजतन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने इस मामले की जांच सदन की कमिटी से कराने की बात कही। बच्चों के भोजन में घपला करने से शिक्षक से लेकर अधिकारी तक बाज नहीं आ रहे हैं। सभी को अपना-अपना हिस्सा चाहिए। परंतु बड़े होने पर जिसके कंधे पर देश की बागडोर आने वाली है। उसकी चिंता किसी को नहीं है। कई स्कूलों में तो अभिभावकों ने अपने बच्चों को स्कूल में खाने से मना कर दिया तो कई ने अपने बच्चों को विद्यालय भेजना ही बंद कर दिया। यही है बिहार के मिड डे मील का सच।

शनिवार, 11 जुलाई 2009

ममता के श्वेत पत्र से लालू भयभीत क्यों!

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है। लालू खुद के ही बुने जाल में फंसते दिख रहे हैं। लोकसभा में करारी हार के बाद रेल मंत्री की कुर्सी तो पहले ही चली गयी। रेलवे की आमदनी पर ममता श्वेत पत्र लाने की घोषणा पहले ही कर चुकी हैं। इस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 11 जुलाई को मुहर भी लगा दी। इससे लालू बिलबिला उठे हैं। उनके चेहरे पर भय का साया मंडराने लगा है। हालांकि लालू इसे बखूबी छिपाने की कोशिश में जुटे हैं। इसके बावजूद उनका चेहरा साथ नहीं दे रहा है। इससे पता चलता है कि दाल में कुछ तो काला है। लालू यूपीए सरकार में पिछले पांच साल तक रेल मंत्री रह चुके हैं। हर बजट में उन्होंने रेलवे को फायदे में दिखाया। ममता बनर्जी ने जब तीन जुलाई को रेल बजट पेश किया तो लालू पर जमकर निशाना साधा। बाद में ममता ने संसद में बताया कि रेलवे के पास मात्र 8,361 करोड़ रुपये अतिरिक्त हैं। जबकि लालू कहते रहे हैं कि यह रकम 90 हजार करोड़ से अधिक हैं। श्वेत पत्र लाने के नाम पर पहले तो लालू ने संसद में ही ममता पर जमकर तीर छोड़े। यहां तक कि जिस यूपीए सरकार को वे बाहर से समर्थन दे रहे हैं। उस पर भी निशाने साधे। इसके बावजूद श्वेत पत्र लाने के फैसले पर सरकार अडिग रही। 11 जुलाई को जदयू के विधान पार्षद संजय सिंह ने संवाददाता सम्मेलन में यह जानकारी दी कि लालू ने बिना एडवरटीजमेंट व किसी अन्य औपचारिकता के 216 लोगों की बहाली ट्रैकमैन व पोर्टर के पद पर की थी। इसमें डेढ़ सौ लोग लालू के ही जाति के हैं। वहीं, 22 लोग लालू के ससुराल के हैं। इससे बिहार की राजनीति में भूचाल आ गया है। लालू इस मामले में भी फंसते नजर आ रहे हैं। इधर, लालू अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में नब्बे हजार करोड़ राशि के 'सरप्लस' की बात पर कायम हैं। वे रेल मंत्री ममता पर निशाना साधने से कोई गुरेज नहीं कर रहे हैं। हालांकि वे खुलकर ममता का नाम लेने से परहेज कर रहे हैं। दरअसल लालू प्रसाद ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि कभी वे मंत्री पद से बेदखल कर दिये जाएंगे। बिहार में करोड़ों रुपये के चारा घोटाले में वे कई बार पहले ही जेल जा चुके हैं। यह केस अभी तक खत्म नहीं हुआ है। अब कहीं रेलवे में भी तो कुछ हेरफेर नहीं किया गया है? इस बात को बिहार के जदयू नेता खूब उछाल रहे हैं। नेताओं का कहना है कि यदि सबकुछ ठीक है तो लालू इतना घबरा क्यों हो रहे हैं? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यहां तक कह दिया कि पूर्व रेलमंत्री व राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद श्वेत पत्र से डरकर पहले ही गुनाह कबूल ले रहे हैं। श्वेत पत्र लाने की प्रधानमंत्री की मंजूरी के बाद लालू का जख्म और हरा हो गया है। लोकसभा चुनाव में बिहार में लालू-पासवान ने सिर्फ तीन सीटें कांग्रेस को दी थीं। इससे नाराज होकर कांग्रेस ने सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े कर दिये थे। इसका फायदा जदयू-भाजपा ने उठाया। लोजपा का सूपड़ा साफ हो गया। वहीं लालू के पाले में सिर्फ चार सीटें आयीं।

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

तब पाकिस्तान का नाम होगा 'तालिस्तान' !

जैसी करनी वैसी भरनी वाली कहावत पाकिस्तान पर एकदम सटीक बैठता है। अमेरिका की मदद के बावजूद तालिबान के बढ़ते कदम को पाकिस्तान रोक नहीं पा रहा है। तालिबान की ताकत के सामने वह विवश नजर आ रहा है। कोई दिन ऎसा नहीं है कि तालिबान बेगुनाहों की जान नहीं लेता है। कभी मस्जिद में तो कभी किसी सार्वजनिक स्थल पर बमबारी करना तालिबान के 'डेली रूटीन' में शामिल है। एक वर्ष में हजारों निर्दोष लोगों की जानें तालिबान बेरहमी से ले लेता है। तालिबान के अस्तित्व को शुरू में पाकिस्तान खारिज करता रहा। फिलहाल तालिबान ने खुद का एक बहुत बड़ा 'नेटवर्क' तैयार कर रखा है। वह पाकिस्तान की लड़कियों तक को दिनदहाड़े उठा ले जाता है। सूत्र बताते हैं कि तालिबान लाहौर पर कब्जा करने के लिए भी बेचैन है। इसके पास अत्याधुनिक हथियार भी है। यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पाकिस्तान पर तालिबान का कब्जा होगा और पाकिस्तान का नाम 'तालिस्तान' होगा। बड़ी बात यह है कि इसके लिये खुद पाकिस्तान ही जिम्मेवार है। भारत को चोट पहुंचाने और कश्मीर हड़पने की नीयत से पाकिस्तान ने ही तालिबान को जन्म दिया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने पिछले दिनों खुद स्वीकार किया कि तालिबान को उन्हीं के देश की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अमेरिका की सीआईए की मदद से खड़ा किया है। पाकिस्तान का मकसद क्या रहा होगा, इस बात से हर भारतीय बखूबी अवगत है। जरदारी का यह भी आरोप था कि पूर्व राष्ट्रपति मुशरर्फ को तालिबानियों से विशेष लगाव था। यह जगजाहिर है कि तीन दशक पहले अमेरिका-भारत के रिश्ते आज की तरह सौहार्दपूर्ण नहीं थे। अमेरिका का झुकाव भारत की तरफ तब हुआ जब उसे लगने लगा कि इंडिया तेजी से विश्व पटल पर महाशक्ति के रूप में उभरता जा रहा है। ऎसे अमेरिका भी इस बात को स्वीकार करती है कि पाकिस्तान में आंतकियों का मजबूत गढ़ है। सात जुलाई 2009 को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुई एक बैठक में भी जरदारी ने माना कि पाक ने ही पैदा किये आतंकी। उन्होंने कहा कि अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 को हुए हमले के पहले ये आतंकी 'हीरो' समझे जाते थे। इस हमले के बाद आतंकियों का मन इतना अधिक बढ़ गया कि वे पाकिस्तान को ही निशाना बनाना शुरू कर दिये। जरदारी ने यह स्वीकार किया कि छद्म कूटनीतिक हितों के लिए ही आतंकियों को पाला-पोसा गया। यह गलती आज पाकिस्तान पर ही भारी पड़ रहा है। तालिबान ताबड़तोड़ पाकिस्तानी जनता पर हमला कर रहा है। सूत्रों की मानें तो ओसामा बिन लादेन भी तालिबान में ही है। अब अमेरिका भी इस बात से घबराने लगा है कि यदि तालिबानी आतंकी पाकिस्तान के परमाणु हथियार तक पहुंच गये तो कई देश में तबाही मचा देंगे। देर से ही सही यदि जरदारी ने मान लिया है कि पाकिस्तान की ही देन है तालिबानी आतंकी । ऎसे में पाकिस्तान को यह भी समझ लेना चाहिए कि भारत उसका दुश्मन नहीं है। उसे भारत समेत अन्य देशों की मदद से तालिबानी आतंकियों को जल्द से जल्द कुचल देना चाहिए। यदि वह ऎसा नहीं करता है तो आने वाले समय में तालिबानी आतंकी ही पाकिस्तान पर राज करेंगे और दर्जनों देश इससे प्रभावित होंगे। तालिबान का खतरा अमेरिका पर भी मंडरा रहा है। तालिबान में अनगिनत 'मोस्ट वांटेड' आतंकी छिपे हैं। इनकी तलाश अमेरिका सालों से कर रहा है। ये आतंकी अमेरिका पर हमले की साजिश भी रच रहे हैं। यह अलग बात है कि ये उसमें सफल नहीं हो पा रहे हैं।

सोमवार, 6 जुलाई 2009

विपक्ष के पाले में सिर्फ तल्ख टिप्पणी

केन्द्र की सत्ता की बागडोर चाहे कांग्रेस के पाले में हो या भाजपा के या फिर मिलीजुली ही क्यों न हो? विपक्ष में बैठने वाला हमेशा सत्ता पक्ष की बुराई ही ढूंढ़ता है। विपक्ष की नजर में सरकार कभी कोई अच्छा काम नहीं करती। या यूं कहें कि कर ही नहीं सकती है। पुनः विपक्ष में बैठने वाला जब सत्ता संभालता है तो उसे खुद के फैसले ही सही लगते हैं। वहीं, सत्ता पक्ष से विपक्ष में आनेवाले दल को वही रोग लग जाता है। विपक्ष हमेशा आलोचना कर जनता के सामने यह साबित करने की कोशिश करता है कि वही उसका सच्चा हमदर्द है। बेचारी भोली-भाली जनता ही इन नेताओं को सबसे बड़े मूर्ख नजर आते हैं। आज गांव की जनता भी नेताओं की तिकड़म को समझ चुकी है। ऎसा नहीं है कि सत्ता पक्ष में बैठनेवाली पार्टी हमेशा सही फैसला लेती है। कई बार तो उसके गलत फैसले से दर्जनों लोगों की जानें भी चली जाती हैं। वास्तव में विपक्ष को सरकार के वैसे ही फैसले का विरोध करना चाहिए जो देश हित में जरूरी है। देश की आजादी के बाद विपक्ष का इतिहास रहा है कि वह सरकार के हर फैसले का विरोध करता है। साल में कुछ फैसले ही ऍसे होते हैं जिसमें विपक्ष चुपचाप हामी भर देता है। ये फैसले अधिकतर देश की रक्षा से संबंधित होते हैं। विपक्ष इस मामले में इसीलिए विवश होता है कि देश हित के फैसले का विरोध करने पर देश की जनता की नजर में वह बेनकाब हो जाएगा। देश के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने 6 जुलाई को आम बजट पेश किया। इसमें अनगिनत बातें समाहित हैं। देश की रक्षा पर 34 प्रतिशत राशि की बढ़ोतरी की गयी है। पाकिस्तान और चीन के बढ़ते सामरिक ताकत के मद्देनजर यह अत्यंत ही जरूरी था। उसी तरह किसानों के लिए पैकेज की घोषणा तारीफ के काबिल है क्योंकि किसान देश की रीढ़ होते हैं। मंदी से निबटने के लिए भी प्रयास किया गया है। हालांकि यह काफी नहीं है। इसी तरह प्रिंट मीडिया को भी राहत दी गयी है। अल्पसंख्यकों, कमजोर तबके के लोगों की तरफ भी वित्त मंत्री ने ध्यान दिया है। हर साल 1.20 करोड़ लोगों को नौकरी मिले, इसके लिये भी कोशिश की गयी है। जीवनरक्षक दवाएं को सस्ती की गयी हैं। इससे गरीबों को भी फायदा होगा। बड़ी कारें, मकान, खेल के सामान, एलसीडी टेलीविजन, मोबाइल, कंम्यूटर, प्रेशर कुकर, ब्रांडेड गहने, सीएफएल बल्ब, चमड़ा उत्पाद को इस बजट में सस्ता किया गया है। इसी तरह सोना-चांदी, कपड़े, किचन के सामान मंहगे कर दिये गये हैं। प्रेशर कुकर, बल्ब सस्ता होने से गरीब भी लाभान्वित होंगे। इसके बावजूद आम जनता सबसे पहले चावल, दाल, सब्जी सस्ती हुई है या नहीं इस बात पर ज्यादा ध्यान देती है। बजट में ये चीजें सस्ती नहीं की गयी हैं । सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम पहले ही बढ़ा चुकी है। ऎसे में मालभाड़ा बढ़ने से चीजों के दाम तो यूं ही बढ़ जाएंगे। इसके अलावा वित्त मंत्री ने रेलवे से आने-जाने वाली कई चीजों पर सेवा कर लगा दिया है। इसका असर भी कहीं न कहीं महंगाई के रूप में सामने आएगा। विपक्ष को वजट के उस फैसले का स्वागत करना चाहिए जिसका फायदा गरीबों और आम जनता को प्रत्यक्ष रूप से होने जा रहा है। मसलन दवाएं सस्ती होने से गरीबों को भी लाभ होगा। किसानों के प्रति सरकार की विशेष रुचि भी प्रशंसनीय है। आम आदमी को दाल-रोट-सब्जी सस्ती दर पर मिले, विपक्ष को इस बात के लिए चिंतित होना चाहिए। लाखों गरीब मजदूर जो सौ रुपये भी प्रतिदिन नहीं कमा पाते, इन्हें दाल-भात-सब्जी इक्ट्ठे नसीब नहीं हो पाती। सत्ता पक्ष तो इस बारे में गंभीरता से कभी नहीं सोचता, क्योंकि बजट बनाने में जो अधिकारी सहयोग देते हैं, ये गरीब नहीं होते। ये एयरकंडीशन में बैठकर बजट को अंतिम रूप देते हैं। ये गरीबी और उसके थपेड़ों से कोसों दूर रहते हैं। ऎसे में इन्हें कीड़े-मकोड़े की तरह रहनेवाले गरीब की जिंदगी के बारे में थोड़ा अहसास भी नहीं हो पाता। ऎसे मुद्दे पर विपक्ष को आवाज उठानी चाहिए। परंतु अफसोस विपक्ष के पास सिर्फ तल्ख टिप्पणी है वोट से अलग कार्य नहीं।

शनिवार, 4 जुलाई 2009

यहां हवा बहते ही जलायी जाती हैं मोमबत्तियां

बिहार में चाहे राजधानी पटना हो या फिर कोई अन्य जिला, यहां हवा बहते ही गृहणियां मोमबत्तियां जलाने में जुट जाती हैं। वहीं, धनाढ़य लोग जनरेटर की ओर लपकते हैं। हम यहां चर्चा करने जा रहे हैं बिहार की कमजोर बिजली व्यवस्था की। देश में मानसून ने दस्तक दे दिया है। ऎसे में हवा के साथ बारिश स्वाभाविक है। तेज हवा चलते ही यहां की बिजली गुल हो जाती है। उमस भरी गर्मी और आकाश में मंडराते काले बादल से दिन में भी 'शाम' का बोध होता है। गृहणियां सामान्य से थोड़ी भी तेज हवा बहने पर मोमबत्तियां/दीये की तलाश में घरों में भागती नजर आती हैं। यदि दिन का समय हो तो हाथ पंखे की खोज पहले रहती हैं। धनाढ़य वर्ग के लोग तो बिजली गुल होने के पहले ही जेनरेटर चलाकर बैठ जाते हैं ताकि अंधेरे में उन्हें एक मिनट भी न रहना पड़े। बिहार में लालू प्रसाद मुख्यमंत्री थे तब भी बिजली की यही स्थिति थी। अब विकास पुरुष माने जाने वाले नीतीश कुमार के शासनकाल में भी पूर्ववत स्थिति बरकरार है। मुख्यमंत्री पद संभालते ही नीतीश कुमार ने भी इसके लिये केन्द्र को जिम्मेवार ठहरा दिया कि केन्द्र बिजली मामले में मदद नहीं कर रहा है। सामान्य तौर पर यदि शहरी गली में कहीं बिजली का तार टूटकर गिर जाए तो उसे ठीक करने में विभाग को चार दिन लग जाते हैं। कभी-कभी तो सप्ताह भर भी। हां, इसके लिये यदि मुहल्लेवासियों ने हंगामा, सड़क जाम कर अपना विरोध जताया हो तो इसका निबटारा उसी दिन संभव है। तेज हवा यदि चली तो लोग मान लेते हैं कि दो दिन बिजली का दर्शन नहीं होगा। पूरे बिहार में हर सड़क पर बिजली के जर्जर लटकते तार दिख जाएंगे। ये जर्जर तार हल्का हिल-डुल भी बर्दाश्त करने लायक नहीं है। सच कहा जाए तो अधिकतर तार मरनासन्न हालत में हैं। ऍसे में तेज हवा की मार ये कैसे झेलेंगे? हर सरकार के पास रटा-रटाया जवाब रहता है कि पिछली सरकार ने हालात बदतर कर दिये। कम बिजली के मसले पर तो सीधा आरोप केन्द्र पर लगाया जाता है। वास्तव में कुछ ही मामलों में केन्द्र जिम्मेवार होता है। बिहार की राजधानी पटना में भी हल्की हवा चलते ही घंटों बिजली गुल हो जाती है। जहां तक बिजली आपूर्ति की बात है प्रदेश के किसी भी जिले में बीस घंटे बिजली नहीं मिलती है। छोटे जिलों में तो पांच घंटे बिजली भी मुश्किल है।