शनिवार, 4 जुलाई 2009

यहां हवा बहते ही जलायी जाती हैं मोमबत्तियां

बिहार में चाहे राजधानी पटना हो या फिर कोई अन्य जिला, यहां हवा बहते ही गृहणियां मोमबत्तियां जलाने में जुट जाती हैं। वहीं, धनाढ़य लोग जनरेटर की ओर लपकते हैं। हम यहां चर्चा करने जा रहे हैं बिहार की कमजोर बिजली व्यवस्था की। देश में मानसून ने दस्तक दे दिया है। ऎसे में हवा के साथ बारिश स्वाभाविक है। तेज हवा चलते ही यहां की बिजली गुल हो जाती है। उमस भरी गर्मी और आकाश में मंडराते काले बादल से दिन में भी 'शाम' का बोध होता है। गृहणियां सामान्य से थोड़ी भी तेज हवा बहने पर मोमबत्तियां/दीये की तलाश में घरों में भागती नजर आती हैं। यदि दिन का समय हो तो हाथ पंखे की खोज पहले रहती हैं। धनाढ़य वर्ग के लोग तो बिजली गुल होने के पहले ही जेनरेटर चलाकर बैठ जाते हैं ताकि अंधेरे में उन्हें एक मिनट भी न रहना पड़े। बिहार में लालू प्रसाद मुख्यमंत्री थे तब भी बिजली की यही स्थिति थी। अब विकास पुरुष माने जाने वाले नीतीश कुमार के शासनकाल में भी पूर्ववत स्थिति बरकरार है। मुख्यमंत्री पद संभालते ही नीतीश कुमार ने भी इसके लिये केन्द्र को जिम्मेवार ठहरा दिया कि केन्द्र बिजली मामले में मदद नहीं कर रहा है। सामान्य तौर पर यदि शहरी गली में कहीं बिजली का तार टूटकर गिर जाए तो उसे ठीक करने में विभाग को चार दिन लग जाते हैं। कभी-कभी तो सप्ताह भर भी। हां, इसके लिये यदि मुहल्लेवासियों ने हंगामा, सड़क जाम कर अपना विरोध जताया हो तो इसका निबटारा उसी दिन संभव है। तेज हवा यदि चली तो लोग मान लेते हैं कि दो दिन बिजली का दर्शन नहीं होगा। पूरे बिहार में हर सड़क पर बिजली के जर्जर लटकते तार दिख जाएंगे। ये जर्जर तार हल्का हिल-डुल भी बर्दाश्त करने लायक नहीं है। सच कहा जाए तो अधिकतर तार मरनासन्न हालत में हैं। ऍसे में तेज हवा की मार ये कैसे झेलेंगे? हर सरकार के पास रटा-रटाया जवाब रहता है कि पिछली सरकार ने हालात बदतर कर दिये। कम बिजली के मसले पर तो सीधा आरोप केन्द्र पर लगाया जाता है। वास्तव में कुछ ही मामलों में केन्द्र जिम्मेवार होता है। बिहार की राजधानी पटना में भी हल्की हवा चलते ही घंटों बिजली गुल हो जाती है। जहां तक बिजली आपूर्ति की बात है प्रदेश के किसी भी जिले में बीस घंटे बिजली नहीं मिलती है। छोटे जिलों में तो पांच घंटे बिजली भी मुश्किल है।

1 टिप्पणी:

  1. तमाम दावो के बावज़ूद स्थिति तो यही है

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