शनिवार, 21 नवंबर 2009

हाय महंगाई : तुझे कब आएगी मौत

भारत के नब्बे फीसदी से अधिक लोग महंगाई की मौत का इंतजार बेसब्री से कर रहे हैं। वे अपने देवता से इसके लिए मिन्नतें कर रहे हैं। परंतु महंगाई की मौत किसी भी कीमत पर संभव नहीं है? हर चौक-चौराहे पर सबसे अधिक चर्चा आज इसी की हो रही है। हर चैनल, हर अखबार प्रतिदिन इसपर कवरेज देना नहीं भूलता है। महंगाई से गरीबों की थाली में खाने का वजन लगातार घट रहा है। लाखों गरीबों ने अपने बच्चों के दूध का वजन तक घटा दिया है। उनके गाल व पेट धंसते ही जा रहे हैं। मध्यम वर्ग के लोगों की थाली से भी दाल व सब्जी की मात्रा निरंतर घट रही है। कौन है इसके लिए जिम्मेदार? सरकार की नीति, उत्पादन कम होना या फिर जमाखोरी? वास्तव में तीनों ही इसके जिम्मेदार तत्व हैं। मंदी क्या आई कि हजारों हाथ बेरोजगार हो गए। वहीं लोकसभा चुनाव को लेकर भारत सरकार ने कर्मचारियों के वेतन में अप्रत्याशित वृद्धि कर दी। देखादेखी राज्य सरकारों ने भी अपने कर्मचारियों के वेतन बढ़ा दिए। वहीं प्राइवेट सेक्टर में काम करनेवाले वेतन मामले में सालों पीछे चले गए। सभी कंपनियों के पास एक ही बहाना रहा मंदी...मंदी...मंदी। इसी साल मानसून के पूर्व बंगाल में आइला क्या आया कि देश के अधिकतर हिस्सों में मानसून कमजोर पड़ गया, नतीजा चहुंओर सुखाड़ की गूंज। इससे उत्पादन कम होना स्वाभाविक है। इस बात का अंदाजा करते हुए बड़े व्यवसायियों ने जमकर जमाखोरी की और हैसियत के मुताबिक लाखों-करोड़ों कमाए और कमा रहे हैं। देश के वित्त मंत्री ने हाल में ही अपने एक बयान में कहा कि महंगाई पर लगाम कसना फिलहाल संभव नहीं है। अर्थात देश की जनता को और महंगाई झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। वित्त मंत्री ने यह बयान तब दे रहे हैं जब लोकसभा का चुनाव हो चुका है और केन्द्र में पांच सालों के लिए कांग्रेस की सरकार सुरक्षित हो चुकी है। ऐसे कांग्रेस का इतिहास रहा है कि इसके शासनकाल में महंगाई हमेशा बढ़ी है। कभी प्याज ने लोगों को रुलाया है तो कभी किसी और चीज ने। यह कांग्रेस का शासन ही है कि लोग चालीस रुपए किलो चीनी खा रहे हैं। गरीबों के घर में किसी मेहमान का स्वागत चाय पिलाकर ही करने की प्रथा इधर के दशकों में रही है। अब चाय की घूंट भी कड़वी हो गई है। यूं कहा जाए कि हर सामान के दाम में आग लगी है तो गलत नहीं होगा। शहर के छोटे-छोटे दुकानदार भी जमाखोरी कर मुनाफा कमाने में जुटे हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में इस साल आलू चौबीस रुपए किलो बिका जबकि पिछले साल नया आलू भी इस भाव नहीं बिका था। गरीब पहले कहा करते थे कि वे दाल-भात-चोखा खाने भर ही कमाते हैं। अब यह मिसाल बन गई है, क्योंकि दाल-भात-चोखा अब मध्यम वर्ग के लोगों की थाली में ही देखने को मिल रही है। गरीबों की थाली से उक्त सामग्री गायब हो चुकी है। बहरहाल सरकार को इन बातों से कोई मतलब नहीं है। उसे गरीब जनता अब चुनाव के समय याद आएगी।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

नेताओं ने बढ़ाया नक्सलियों का मन!

यह सुनकर चौंकने वाली बात होगी कि नक्सलियों का मन कुछ नेताओं ने ही बढ़ाया है। आज नक्सली खून से जमीं को लाल कर रहे हैं। मुट्ठी भर नक्सली के सामने सरकार की ताकत कम पर जा रही है। इसके पीछे झांकने की ताकत मीडिया के अंदर या फिर बड़े-बड़े नेताओं में नहीं है। ऐसा नहीं है कि ये इन बातों से अनजान हैं। मीडिया के सामने इतनी बंदिशें हैं कि वह चाहकर भी कई बातों को उजागर नहीं कर सकता। देश के कई राज्यों में एक झारखंड भी नक्सली समस्याओं से गंभीर रूप से जूझ रहा है। बिहार के एक दर्जन से अधिक जिले भी नक्सलियों की चपेट में हैं। कहां ये किसे उड़ा देंगे, कहना मुश्किल है? हर घटना के बाद संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री दावा जरूर करते हैं कि जल्द ही इस संकट पर लगाम कसी जाएगी। परंतु वह दिन दूर-दूर तक आते नहीं दिख रहा है। बिहार से झारखंड जाने वाले रेलमार्ग में कई ऐसी जगहें हैं, जहां नक्सली विस्फोट कर चुके हैं। गुरुवार की रात यानी 19 नवंबर 2009 को उस समय हद हो गई जब मनोहरपुर के नजदीक मुंबई-हावड़ा रूट पर घाघरा और पोसेता स्टेशन के बीच टाटा-बिलासपुर ट्रेन को नक्सलियों ने बम से उड़ाने की कोशिश की। यह अलग बात है कि पूरी ट्रेन को ये नहीं उड़ा सकें। परंतु दो बोगियों के चिथड़े उड़ गए, वहीं आठ बागियां बेपटरी हो गईं। पांच से अधिक यात्रियों की मौत हो गई जबकि सौ से अधिक लोग घायल हो गए। कई की हालत अब-तब वाली थी। मदद पहुंचाने के लिए सुरक्षा दल काफी विलंब से पहुंचा, तबतक यात्रियों की चीखें हवा में गूंजती रहीं। कुछ ही सप्ताह पहले राजधानी एक्सप्रेस को भी नक्सलियों ने बंधक बना लिया था। तब कुछ नेताओं ने इस समस्या पर चिंता जताई थी। वहीं, पूरे मामले में पुलिस-प्रशासन निरीह बना रहा। बीते तारीख गवाह हैं कि अब तक किसी मामले में किसी नक्सली को फांसी की सजा नहीं दी गई है। पर्दे के पीछे की वजह यह है कि देश के जाने-माने नेता चुनाव के वक्त इन नक्सलियों से चोरी-छिपे मदद लेते हैं। पुन: जीतने के बाद संबंधित नेताओं से देश की बड़ी-बड़ी पार्टियां मदद लेती हैं। ऐसे में नक्सलियों पर बड़ी कार्रवाई की बात ही बेमानी होगी। ये नक्सली समय-समय पर अलग-अलग बातों को लेकर मासूम लोगों की जानें लेते रहते हैं। देश के रक्षा मंत्री ने पिछले दिनों कहा था कि नक्सलियों से सख्ती से निपटा जाएगा। आखिर कब? यह बड़ा प्रश्न है, इसका जवाब रक्षा मंत्री के पास नहीं है। आखिर क्या वजह है कि चंद नक्सली शासन को चुनौती दे रहे हैं और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। सिर्फ झारखंड में ही एसपी से लेकर दर्जनों पुलिस अफसरों का कत्ल नक्सली कर चुके हैं। हाल ही में बिहार के सीतामढ़ी जिले के बेलसंड अनुमंडल में नक्सलियों ने हमले किए थे, पुलिस घंटों बाद घटनास्थल पर पहुंची थी। इसी तरह इसी जिले के रून्नीसैदपुर प्रखंड में सैकड़ों की संख्या में नक्सलियों ने कई शराब दुकानों को नष्ट कर दिया था। यहां भी पुलिस नहीं पहुंची थी। पुलिस का साफ कहना था कि वे अपनी सुरक्षा को देखकर ही कोई कदम उठाएंगे। उनका सोचना कहीं से भी गलत नहीं है। वजह साफ है कि यदि कोई पुलिसकर्मी दिवंगत भी हो जाएगा तो सरकार अफसोस जताकर फिर पुलिसकर्मियों को पुराने हाल पर छोड़ देगी। देश की कानून व्यवस्था भी इतनी लचर है कि यहां पैसे के बल पर अपराधी आराम से छूट जाते हैं।

शनिवार, 14 नवंबर 2009

दया के पात्र हैं ये 'काहिल'

बचपन में आपने काहिलों की कहानी सुनी होगी। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आज हर सरकारी दफ्तर में काहिलों की कहानी भरी-पड़ी है। आप किसी भी सरकारी दफ्तर चाहे बैंक हो या परिवहन विभाग या फिर बिजली विभाग में जाएं और देखें-यदि किसी विभाग की कार्यक्षमता तीस की है तो पांच गप्पे हांकते नजर आएंगे। वहीं, पांच का साप्ताहिक अवकाश रहेगा या फिर छुट्टी पर। यानी बीस कर्मचारियों के भरोसे पूरा दफ्तर चलता है। बैंक में लिखा रहता है कि यहां बेहतरीन सुविधा उपलब्ध है-यहां दो मिनट में सेविंग्स से राशि निकालें। लेकिन क्या किसी भी बैंक में ऐसा संभव है? बैंक में यदि एक भी ग्राहक नहीं है, तो भी दो मिनट में निकासी संभव नहीं है। वजह कोई चपर-चपर पान चबा रहा है तो कोई अमेरिका की राजनीति पर बात कर रहा है। आप उनकी बातों को सुनकर दंग रह जाएंगे, आप सोच में पड़ जाएंगे कि उनसे कैसे कहें कि आपको जल्दबाजी है। यदि कहीं उनकी तंद्रा भंग हुई और जनाब को महसूस हुआ कि आपका काम कर देना चाहिए तो आप मान लीजिए कि आपका दिन शुभ है। बिहार के मुजफ्फरपुर में सेन्ट्रल बैंक ऑफ इंडिया के एक मैनेजर स्तर के पदाधिकारी ने बातचीत में बताया कि उनके यहां कर्मचारियों की अत्यंत कमी है, इसीलिए पेंडिंग कार्यों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। मैं चौंका तो वे मेरा चेहरा निहारने लगे फिर हंस दिए। कहा-उनके यहां कार्यरत एक दर्जन काहिल कर्मचारी हैं। वे एक-दो काम में ही घंटों बीता देते हैं, क्योंकि उन्हें ग्राहक से ज्यादा प्रिय उनका भाषण है। ऐसे में इनसे वही काम लिया जाता है, जो तुरंत करना जरूरी न हो। इसी तरह आप रेलवे का रिजर्वेशन कराने जाते हैं तो देखेंगे कि टिकट काट रहा व्यक्ति के पास हर दस मिनट में या तो किसी का फोन आ जाएगा या फिर वह स्वयं उठकर किसी से गप्पे मारना प्रारंभ कर देगा। अपनी बारी का इंतजार कर रहे लोग मन ही मन उसे सैकड़ों गालियां देते हैं। कुछ लोग ऐसे काहिल पर आक्रोश उतार देते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि ये दया के पात्र हैं। आंकड़ें गवाह हैं कि हर सरकारी दफ्तरों में काहिलों की संख्या अधिक होती है। हालांकि निजी दफ्तर भी इस मामले में बहुत पीछे नहीं हैं। सरकारी दफ्तरों में काहिलों की संख्या अधिक होने की वजह है कि यहां एक बार किसी ने नौकरी पा ली तो तीस साल के लिए निश्चिंत हो जाता है। हालांकि निजी दफ्तरों में भी एक से बढ़कर एक काहिल भरे-पड़े हैं। परंतु इनमें अधिकतर 'पैरवीपुत्र' ही नजर आते हैं। इन्हें लगता है कि ये काम न भी करेंगे तो इनका नुकसान कोई नहीं कर सकता है। ऐसा नहीं है कि ये सौ फीसदी निकम्मे होते हैं, क्योंकि यदि ऐसा होता तो इनकी भर्ती ही नहीं हुई होती। ये काहिल इसलिए बनकर रहते हैं ताकि इनसे कोई अधिक काम न लें। बचे समय में ये बयानबाजी कर दूसरों को परेशान करने का काम जरूर करते हैं। इन काहिलों से सबसे ज्यादा परेशानी काम करने वाले लोगों को होती है। मेरे समझ से ऐसे काहिलों से कोई समझौता नहीं करना चाहिए। अपने दोस्त की इजाजत से एक निजी अनुभव भी शेयर करना चाहूंगा-मेरा एक मित्र है। उनके यहां मेरा हमेशा आना-जाना रहता है। मैं जब भी उनके यहां जाता हूं वे अपनी पत्नी से उलझते नजर आते हैं। मैंने मित्र को समझाया-यार क्यों उलझते हो? उसने कहा उदाहरण देकर बताता हूं-उसने अपनी पत्नी को आवाज दी और कहा कि जरा दो प्याली चाय भेजना। तब दिन के बारह बज रहे थे। एक बजे मैंने अपने मित्र को कहा कि मुझे आफिस जाना है फिर कभी आऊंगा। उसने कहा-चाय तो पी लो। मैंने कहा-फिर कभी। क्योंकि तबतक चाय नहीं आई थी। बात मेरी समझ में आ चुकी थी कि वह पत्नी से क्यों उलझता है? मेरा दोस्त काम करने में अत्यंत फास्ट है। वहीं उसकी पत्नी इसके विपरीत। ऐसे में बात-बात पर तू-तू-मैं-मैं होना स्वाभाविक है। मेरे दोस्त की शादी के पन्द्रह साल होने जा रहे हैं, इसके बावजूद वह अपनी पत्नी को नहीं बदल सका। एक मनोचिकित्सक ने बताया कि देश में काहिलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, यह अत्यंत चिंता की बात है। यह अलग बात है कि इसपर कोई ध्यान नहीं दे रहा है।

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

अमेरिका ने माना-प्रतिभावान हैं भारतीय

हर भारतीय युवक ऊंची शिक्षा के लिए विदेश जाना चाहता है, उसे लगता है कि वहां की पढ़ाई भारत से अधिक उच्चस्तरीय है। युवाओं के मन में यह भी शंका रहती है कि अमेरिका, इंग्लैंड के लोग भारतीय से अधिक प्रतिभावान होते हैं। परंतु यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह इंडियन व एशियाई देशों की कल्पना के सिवा कुछ नहीं है। अब यह सवाल उठता है कि यदि यह कल्पना है तो फिर आज दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका कैसे है? मान लीजिए-यदि कोई गरीब तपती गर्मी में ढिबरी की रोशनी में पढ़ाई कर रहा है। ऐसे में उसका आधा ध्यान शरीर से निकलने वाले पसीने और आधा ध्यान मच्छरों से लड़ते हुए निकल जाता है। वहीं, एयरकंडीशन में बैठकर पढऩे वाले छात्र बिना किसी परेशानी के पढ़ाई पूरी कर लेता है। अब जरा इसपर विचार कीजिए कि ढिबरी में पढऩे वाले छात्र ने अधिक मेहनत की, परंतु परीक्षा में उसे कम माक्र्स मिले। वहीं, एयरकंडीशन में पढ़ाई करनेवाले छात्र को अधिक। इतना ही नहीं दूसरे वर्ग वाले छात्र के पास कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा भी है। अब चलते हैं अमेरिका में-यहां भारतीय छात्र को पढ़ाई के लिए आधुनिक सुविधा मिल जाती है और वह जी-तोड़कर शिक्षा हासिल करने लगता है, उसे कुछ कर जो दिखाना है? यही कारण है कि भारतीय छात्र अमेरिका, इंग्लैण्ड, जापान में जाकर पताका फहरा रहे हैं। भारतीय छात्र की मेहनत के आगे अमेरिकी छात्र टिक नहीं पा रहे हैं। एक सर्वेक्षण में जब यह बात सामने आई तो अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा पिछले दिनों चिन्तित हो उठे और यहां के छात्रों को पढ़ाई के प्रति ध्यान देने की नसीहत दे डाली। ओबामा की इस चिंता से भारतीय छात्रों को और उत्साहित होना चाहिए। यह भी जानकार आश्चर्य होगा कि इंग्लैंड व कई अन्य देशों की सरकार भी भारतीय छात्रों की प्रतिभा का उदाहरण देने लगे हैं। इन देशों में स्कूल-कॉलेज की तरफ से कई अनुसंधान भी चल रहा है। कई बड़े स्तर के प्रोफेसर इस अभियान में जुटे हैं कि उनके देश के छात्र कमजोर न हों। ये बातें भारतीय छात्रों के इरादे को और मजबूत करती हैं। भारत के कई ऐसे मां-बाप भी अपने बच्चे को विदेशों में भेजते हैं, जिनकी हैसियत अत्यंत कमजोर होती है। ऐसे में यदि यह बेटा अपनी प्रतिभा का पताका नहीं फहराएगा तो इनका दिल तो टूटेगा ही साथ ही अन्य अभिभावक भी निराश होंगे। यह अलग बात है कि भारतीय प्रतिभा को दबाने की कोशिश कुछ देश करते हैं। अभी हाल ही में आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हमले किए गए। इतिहास गवाह है कि भारतीय शुरू से ही मजबूत कलेजा रखते हैं। इनका हौसला तोडऩा किसी देश के लिए आसान नहीं है। इस बात को दूरदर्शी बराक ओबामा ने थोड़ा ही सही महसूस तो किया ही है, तभी वे अपने देश के नौजवानों की चिंता में डूब गए हैं। आज दुनिया के अधिकतर देशों में भारतीय छाए हुए हैं। उनकी प्रतिभा बोल रही है।

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

एक गलती सौ अच्छाई पर भारी

आप किसी के लिए हमेशा अच्छा सोच रहे हैं, उसके हित में सबकुछ न्योछावर करने को तैयार हैं। वह व्यक्ति मित्र हो सकता है, रिश्तेदार हो सकता है। लेकिन, आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि आपका एक 'निगेटिव जवाब' सारे अच्छाई को धो देता है। वही व्यक्ति आपके बारे में विपरीत सोचने लगता है, उसकी नजरों से आप गिर जाते हैं, फिर वही आपको दुश्मन समझने लगता है। ऐसा क्यों होता है, इस बात पर सबको गौर फरमाना चाहिए। फिर 'ना' सुनने की आदत को जीवन में उतारने की आदत भी डालनी चाहिए। हमेशा लाभ लेने वाले व्यक्ति को सोचना चाहिए कि साल के 99 दिन उसे मदद मिली है। उसका नजदीकी आज क्यों इनकार कर रहा है। वह किसी संकट में तो नहीं है। कहीं आज उसे ही मदद की दरकार तो नहीं है। परंतु, ये दुनिया है-यहां एक गलती सौ अच्छाई पर भारी पड़ जाती है। आप आफिस जाते हैं-कभी कम तो कभी अधिक काम करते हैं। बॉस के नजर में आप काम करने वाले व्यक्ति हैं। आप पर विश्वास भी किया जाता है। किसी कारण वश यदि आपसे एक गलती हो गई- बोलने में, लिखने में या फिर समय पर पूरा न करने में। फिर क्या, बॉस का मूड ठीक रहा तो ठीक है वर्ना कहा जाएगा कि आप एक समस्या हैं। यदि भूलवश आपने यह कह दिया कि इससे पहले आपसे कहीं भी चूक नहीं हुई है तो बॉस और भड़क जाएंगे। संभव हो कि आपका टेबल ही बदल जाएं, आपके हवाले कोई पेंडिंग काम कर दिया जाए। अब जरा इसपर भी विचार कीजिए कि इसी बॉस के कहने पर आपने प्रतिदिन ड्यूटी से घंटा-दो घंटा अधिक काम किया। एक गलती क्या हुई कि सारा किया धरा मिट्टी में मिल गई। आप इससे कितने मर्माहत होंगे, कितने दु:खी होंगे। इसका अंदाजा उस बॉस को नहीं होता, क्योंकि फिलवक्त वह बॉस की कुर्सी पर है। कहने का अर्थ यह है कि एक गलती कई अच्छाइयों को दबा देती है। ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। मदद करने के पहले यह आकलन भी जरूरी है कि वास्तव में अमुक व्यक्ति को मदद की आवश्यक्ता हैं या नहीं। कलयुगी दौर में व्यक्ति फल कि चिंता पहले करता है, कर्म बाद में। ऐसे में अच्छा करने पर भी यदि कोई बुरा सोचता है तो मेरी नजर में वह किसी गुनहगार से कम नहीं है। बार-बार अच्छा करनेवाले व्यक्ति से यदि कभी भूल हो जाए तो उसे माफ कर देना चाहिए। साथ ही यह भी पता लगाना चाहिए कि उससे यह चूक कैसे हुई? न कि उससे नफरत भरी नजरों से देखना चाहिए। माह में उनतीस दिन यदि कोई व्यक्ति सही निर्णय लेता है तो एक दिन उससे भी भूल हो सकती है। इस बात को सदैव याद रखनी चाहिए। ऐसा न करनेवालों के आसपास कभी भी हितैषी खड़े नजर नहीं आएंगे। इनके इर्द-गिर्द सिर्फ चाटुकार ही मंडराते दिखेंगे।

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

इन्हें 'मां' को 'मां' कहने में भी शर्म आनी चाहिए

हिन्दी के नाम पर देश के मनसे नेताओं को हीनता क्यों? राष्ट्रभाषा के नाम पर भी ये राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं। महाराष्ट्र में नौ नवंबर को हिन्दी में शपथ ले रहे सपा विधायक अबू आजमी के खिलाफ मनसे विधायकों के तेवर और फिर मारपीट की घटना ने देश के गरूर को शर्मसार किया है। इससे देश के हर जिले में उबाल आ गया है। विदेशी मीडिया भी इस खबर को छापकर चटकारे लेने में पीछे नहीं रहा। देशवासी स्तब्ध हैं कि संविधान में वर्णित नियम को भी मनसे के नेता नहीं मान रहे हैं। पूरे देश के लोगों की इस संबंध में तीखी प्रतिक्रिया है। इनका मानना है कि जब ये हिन्दी को अपनी भाषा नहीं समझते तो फिर इन नेताओं को अपनी 'मां' को 'मां'कहने में भी शर्म आनी चाहिए। तारीख गवाह है कि दूसरे देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति जब भारत आते हैं तो वे अपनी मातृभाषा में भाषण देते हैं। वे ऐसा करते वक्त खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। यह अलग बात है कि यहां के बड़े नेता इस मामले में अब भी हीन भावना के शिकार हैं। इन्हें अब भी लगता है कि यदि हिन्दी में वे भाषण देंगे तो दूसरा देश इन्हें 'जाहिल' कहेगा। यहां से दूसरे देश जाने वाले नेता भी अंग्रेजी में भाषण देकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। क्षेत्रीय भाषाओं से किसी को कोई परहेज नहीं है, इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपने मातृभाषा को भूल जाएं या फिर उसका अपमान करें। मनसे नेताओं की दादागिरी तो दिनोंदिन बढती ही जा रही है। समय रहते भारत सरकार को चेत जाना चाहिए और इसपर रोक लगा देनी चाहिए। वर्ना,वह समय दूर नहीं जब हर राज्य में इस तरह की वारदात दुहराईं जाएंगी। मनसे प्रमुख राज ठाकरे कभी बिहार-उत्तरप्रदेश के लोगों पर निशाना साधते हैं कभी किसी अन्य राज्य पर। परंतु मनसे प्रमुख यह नहीं जानते कि यदि सभी राज्य के लोग मुंबई को छोड़ लौट जाएं तो वहां कुछ नहीं बचेगा और तब शायद राज ठाकरे व उनके चंद लोग अकेले ही सड़कों पर नजर आएंगे। देश का व्यावसायिक राजधानी होने के चलते मुंबई में देश के हर हिस्से के लोग रहते हैं। यह अलग बात है कि बिहार-उत्तरप्रदेश के लोगों की संख्या यहां अधिक है। इस घटना को देश के सभी राज्यों ने गंभीरता से लिया है। सभी के प्रमुखों ने इसकी निंदा की है। हालांकि देशवासियों के आक्रोश को देखते हुए मनसे के चार विधायकों को निलंबित कर दिया गया है। परंतु, देशवासी राज ठाकरे पर भी कार्रवाई चाहते हैं। मंगलवार को इसी मामले में बिहार के हाजीपुर में मनसे प्रमुख और उनके कई विधायकों के खिलाफ अदालत में मुकदमा दर्ज किया गया है। बिहार के लगभग हर जिले में लोगों ने बैठकें कर और राज ठाकरे का पुतला दहन कर इस घटना पर आक्रोश जताया है।

सोमवार, 9 नवंबर 2009

कैंसर है, टीएमसीएच भागिए

कैंसर आज भी लाइलाज बीमारी है। यूं तो इस रोग के विशेषज्ञों का मानना है कि पहले स्टेज में पता चलने पर इसका इलाज संभव है। परंतु हकीकत ठीक इसके उलट है। प्रारंभिक स्थिति में इसकी जानकारी वैसे ही लोगों को मिल पाती है, जो या तो खुद इस रोग के डाक्टर हैं या फिर ऐसे संपन्न लोग जो सर्दी होने पर भी चिकित्सकों की लंबी लाइन लगा देते हैं। अब चलते हैं उत्तर बिहार-जहां कैंसर का एक भी डाक्टर नहीं है। इस इलाके के लोगों को जब यह पता चलता है कि उसे कैंसर है। हांफता-भागता वह पटना या दिल्ली पहुंचता है। जांच में पता चलता है कि वह अब चंद दिनों का ही मेहमान है। यह जानकर भी ताज्जुब होगा कि उत्तर बिहार में अन्य रोगों के चिकित्सकों की कोई कमी नहीं है। सरकारी अस्पतालों में भी कैंसर का कोई चिकित्सक नहीं है। मुजफ्फरपुर को बिहार का व्यावसायिक राजधानी माना जाता है यहां का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल एसकेएमसीएच में भी इस रोग के इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में यहां के रोगी, कैंसर का शक होते ही पटना भागते हैं। अब चलते हैं बिहार की राजधानी पटना। यहां महावीर कैंसर संस्थान के अलावा आधा दर्जन से अधिक चिकित्सक नहीं हैं, जो यह पता लगा सकें कि मरीज को कैंसर है या नहीं। सेकेंड स्टेज वाले कैंसर रोगी का आपरेशन भी यहां सफल नहीं हो पाता है। कई रोगी का आपरेशन तो चिकित्सक पैसे की खातिर कर देते हैं, परंतु ये छह माह से भी अधिक जीवित नहीं रह पाते। वे भी आपरेशन के बाद बेड पर आश्रित की जिंदगी जीते हैं, खुद कुछ भी करने में असमर्थ रहते हैं। कैंसर के इलाज मामले में आज भी बिहार अन्य राज्यों से काफी पीछे है। ऐसे में यदि कैंसर है तो रोगी को सीधे मुंबई टीएमसीएच जाना चाहिए या फिर दिल्ली का एम्स। हालांकि दूसरे स्टेज में पहुंचने पर रोगी यहां भी नहीं बच पाते परंतु शारीरिक चीडफ़ाड़ का सामना कम करना पड़ता है। वैसे इस बीमारी की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जेड गुडी को इंग्लैंड जैसा विकसित राष्ट्र भी इलाज नहीं कर सका। जेड गुडी आपरेशन के कुछ ही माह बाद ईश्वर के पास आराम करने चली गईं। भारत सरकार व राज्य सरकारों को कैंसर जैसी बीमारी के बारे में गंभीरता से विचार-विमर्श करना चाहिए। बिहार में तो सरकार ने कभी कैंसर की भयावहता के बारे में गंभीरता से विचार ही नहीं किया। यदि ऐसा हुआ रहता तो संभवत: उत्तर बिहार में भी कई कैंसर के अच्छे डाक्टर होते। कैंसर के उन डाक्टरों पर तो कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, जो जानते हुए भी कि कैंसर का मरीज छह माह भी नहीं जीवित रहेगा, जीवन का प्रलोभन देकर आपरेशन कर देते हैं। पटना के ही एक चिकित्सक वीपी सिंह ने पचहतर वर्षीय स्व. हरेन्द्र प्रसाद का माउथ कैंसर का आपरेशन यह कह कर किया कि आपरेशन के बाद वे पांच साल तक जीवित रहेंगे। परंतु श्री प्रसाद आपरेशन के बाद न तो बोल सके, न खा सके और न ही चल सके। आपरेशन के बाद इन्हें पाइप से खाना दिया जाता रहा। वे बिस्तर से कभी नहीं उठ सके और छह माह में ही इनकी मौत हो गई। आपरेशन में चिकित्सक ने एक लाख से अधिक रुपए किसी न किसी तरह से ऐठें। हालांकि इस चिकित्सक पर परिजन अदालत में केस दर्ज करने की तैयारी में जुटे हैं। कुल मिलाकर इसी तरह के चिकित्सकों की भरमार पटना में भी है। अत: कैंसर है तो टीएमसीएच या एम्स या ऐसे जगह भागिए जहां आपको सही चिकित्सा मिले। सीतामढी के एक चिकित्सक डॉ रामाकांत सिंह उत्तर बिहार के मशहूर सर्जन थे। एकाएक इन्हें बुखार हुआ, एंटिबायोटिक से भी जब बुखार नहीं उतरा तो वे एम्स गए, जहां चिकित्सकों ने बताया कि इन्हें बल्ड कैंसर है वो भी अंतिम स्टेज में। वे माह भर के अंदर ही गुजर गए।

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

'नेताजी' की नजर...ये इंसान नहीं हैं...

महज एक वोट से सरकार बनती और गिर जाती है। चुनाव से सरकार बनने तक राज्य हो या केन्द्र दोनों को जनता की याद पल-पल आती है। इस समय तक हर नेता खुद को आम आदमी समझता है। चुनावी दौरे पर कभी वह किसी झोपड़ी में गरीब के साथ चाय की चुस्की लेते देखा जाता है तो कभी धूप में जनता के साथ पैदल चलते। नेताजी के पीछे 'कुत्ते' की तरह भाग रहा मीडिया इस खबर को मोटी-मोटी हेडिंग के साथ प्रकाशित करता है। परंतु चुनाव बाद सरकार बनते ही नेता 'आम' नहीं 'खास' हो जाता है। अब धूप उसे तीखी लगने लगती है, गरीब उसे जानवर दिखने लगते हैं। वह चलता है तो सुरक्षा में पुलिस की कई-कई गाडिय़ां उसके पीछे-पीछे चलती हैं। कहीं वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गया तो फिर क्या कहना-पूरे सूबे की पुलिस उसकी मुट्ठी में। वह जिस मार्ग से चलता है, सड़कें खाली करा दी जाती हैं। वजह बताया जाता है-सीएम को जान का खतरा है। जबतक सीएम गुजर नहीं जाते, तबतक आदमी चाहे वह गंभीर रूप से बीमार ही क्यों न हो। उसे इस रास्ते से गुजरने की इजाजत नहीं मिल सकती है। कई बार तो अस्पताल जा रही महिला रिक्शा पर ही बच्चे को जन्म दे देती है। दूसरे राज्यों से साक्षात्कार को आए कई बेरोजगार भी इसकी चपेट में आ जाते हैं। वक्त पर साक्षात्कार के लिए न पहुंचने के चलते वे चयनित नहीं हो पाते हैं। इस दर्द को ये नेता क्या जानें? इनमें से कुछ की सूचना बाद में जब मीडिया को मिलती है और वह उसे प्रकाशित कर देता है, तो संबंधित नेताजी अफसोस जताने में कोताही नहीं बरतते हैं। देश के किसी राज्य में बड़े नेताजी के आगमन से होने वाली जनता की परेशानी पर कभी चर्चा नहीं होती है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद जब राजधानी की सड़कों पर निकलते थे तो उनके पीछे कम से कम पन्द्रह और आगे दस चार चक्के की गाडिय़ां दौड़ती थीं। इस वजह से घंटों सड़कों पर जाम लगा रहता था। अभी दो दिन पूर्व ही दिल्ली में प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लगे जवानों ने एक ऐसे मरीज के एबुलेंस को रोक दिया, जो किडनी का रोगी था। उसकी मौत रास्ते में ही हो गई। यह सुरक्षा व्यवस्था की कितनी बड़ी चूक है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। देश में प्रतिदिन सुरक्षा के नाम पर हजारों मार्ग सील कर दिए जाते हैं। इससे जाम में फंस कई बच्चे बेहोश तो कई रोगी की मौत तक हो जाती है। ऐसे नेताओं को आम जनता की जान का कोई मतलब नहीं। आजादी के बाद देश के प्रथम राष्ट्रपति जब सड़क मार्ग से निकलते थे, उनके लिए सुरक्षा की उतनी व्यवस्था भी नहीं रहती थी, जितना कि आज एक मुख्यमंत्री के लिए रहती है। राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री की सुरक्षा जरूरी है, इसका मतलब यह नहीं कि आम आदमी की जिंदगी का कोई मोल ही न लगाया जाए। आम आदमी भी इंसान हैं, और इन्होंने ने ही नेताजी को 'आम' से 'खास' बनाया है। 'नेताजी' यदि इस बात को भूल गए हैं तो जनता इन्हें अगले चुनाव में इसका एहसास करा सकती है, उन्हें यह बात कतई नहीं भूलनी चाहिए।

बुधवार, 4 नवंबर 2009

भय में जी रहे पाकिस्तानी

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज पाकिस्तान के सैकड़ों इलाकों में रहनेवाले लोग भय में जी रहे हैं। कोई दिन ऐसा नहीं होता कि यहां बम विस्फोट या फिर तालीबानी आतंकी हमला नहीं करते हैं। इन घटनाओं में कभी पचास तो कभी सौ से अधिक पाकिस्तानियों का मरना अब आम बात हो गई है। सुबह काम पर निकलने के बाद शाम में 'शौहर' घर पर लौटेंगे या नहीं इसका पता 'बेगम' को नहीं होता। पाकिस्तान दुनिया के मंचों पर दावा करता रहा है कि यहां की स्थिति बिल्कुल सामान्य है। परंतु सच्चाई ठीक इसके विपरीत है। ऐसी महिलाएं जिनका सुहाग अब इतिहास बन गया है या फिर वे मासूम जो सबकुछ खोकर अनाथ हो चुके हैं या फिर वो भवन जो अब खंडहर हैं-चीख-चीखकर यहां की स्थिति बता रहे हैं। इनका दर्द न तो पाकिस्तान की सरकार को नजर आती है न ही वहां की सेना को। हरेक दिन ऐसे सैकड़ों दर्द पाकर भी पाकिस्तान दुनिया के सामने उफ तक नहीं करता है। इसकी वजह वह खुद है, आजादी के बाद से पाकिस्तान को संसार में एक ही दुश्मन दिखाई देता है, और वह है-भारत। भारत को पटकनिया देने के लिए वह छह दशक से लगातार कोशिश में जुटा है। यह अलग बात है कि भारत से वह मुकाबला कर कभी नहीं जीत सकेगा। भारत को चोट पहुंचाने और कश्मीर हड़पने की नीयत से ही पाकिस्तान ने तालिबान को जन्म दिया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने पिछले दिनों खुद स्वीकार किया कि तालिबान को उन्हीं के देश की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अमेरिका की सीआईए की मदद से खड़ा किया है। पाकिस्तान का मकसद क्या रहा होगा, इस बात से हर भारतीय बखूबी अवगत है। जरदारी का यह भी आरोप था कि पूर्व राष्ट्रपति मुशरर्फ को तालिबानियों से विशेष लगाव था। यह जगजाहिर है कि तीन दशक पहले अमेरिका-भारत के रिश्ते आज की तरह सौहार्दपूर्ण नहीं थे। अमेरिका का झुकाव भारत की तरफ तब हुआ जब उसे लगने लगा कि भारत तेजी से विश्व पटल पर महाशक्ति के रूप में उभरता जा रहा है। ऐसे अमेरिका भी इस बात को स्वीकार करती है कि पाकिस्तान में आंतकियों का मजबूत गढ़ है। सात जुलाई 2009 को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुई एक बैठक में भी राष्ट्रपति जरदारी ने माना कि पाक ने ही पैदा किये आतंकी। उन्होंने कहा कि अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 को हुए हमले के पहले ये आतंकी हीरो समझे जाते थे। इस हमले के बाद आतंकियों का मन इतना अधिक बढ़ गया कि वे पाकिस्तान को ही निशाना बनाना शुरू कर दिये। जरदारी ने यह भी स्वीकार किया कि छद्म कूटनीतिक हितों के लिए ही आतंकियों को पाला-पोसा गया। यह गलती आज पाकिस्तान पर ही भारी पड़ रहा है। तालिबान ताबड़तोड़ पाकिस्तानी जनता पर हमला कर रहा है। सूत्रों की मानें तो ओसामा बिन लादेन भी तालिबान में ही है। अमेरिका सहित विश्व के कई देश इस बात से घबराने लगे हैं कि यदि तालिबानी आतंकी पाकिस्तान के परमाणु हथियार तक पहुंच गये तो कई देशों में तबाही मचा देंगे। पाकिस्तान के कुछ तानाशाह नेताओं द्वारा शुरू जहर की खेती धीरे-धीरे पाकिस्तानियों को ही लीलती जा रही है।