बुधवार, 4 नवंबर 2009

भय में जी रहे पाकिस्तानी

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज पाकिस्तान के सैकड़ों इलाकों में रहनेवाले लोग भय में जी रहे हैं। कोई दिन ऐसा नहीं होता कि यहां बम विस्फोट या फिर तालीबानी आतंकी हमला नहीं करते हैं। इन घटनाओं में कभी पचास तो कभी सौ से अधिक पाकिस्तानियों का मरना अब आम बात हो गई है। सुबह काम पर निकलने के बाद शाम में 'शौहर' घर पर लौटेंगे या नहीं इसका पता 'बेगम' को नहीं होता। पाकिस्तान दुनिया के मंचों पर दावा करता रहा है कि यहां की स्थिति बिल्कुल सामान्य है। परंतु सच्चाई ठीक इसके विपरीत है। ऐसी महिलाएं जिनका सुहाग अब इतिहास बन गया है या फिर वे मासूम जो सबकुछ खोकर अनाथ हो चुके हैं या फिर वो भवन जो अब खंडहर हैं-चीख-चीखकर यहां की स्थिति बता रहे हैं। इनका दर्द न तो पाकिस्तान की सरकार को नजर आती है न ही वहां की सेना को। हरेक दिन ऐसे सैकड़ों दर्द पाकर भी पाकिस्तान दुनिया के सामने उफ तक नहीं करता है। इसकी वजह वह खुद है, आजादी के बाद से पाकिस्तान को संसार में एक ही दुश्मन दिखाई देता है, और वह है-भारत। भारत को पटकनिया देने के लिए वह छह दशक से लगातार कोशिश में जुटा है। यह अलग बात है कि भारत से वह मुकाबला कर कभी नहीं जीत सकेगा। भारत को चोट पहुंचाने और कश्मीर हड़पने की नीयत से ही पाकिस्तान ने तालिबान को जन्म दिया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने पिछले दिनों खुद स्वीकार किया कि तालिबान को उन्हीं के देश की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अमेरिका की सीआईए की मदद से खड़ा किया है। पाकिस्तान का मकसद क्या रहा होगा, इस बात से हर भारतीय बखूबी अवगत है। जरदारी का यह भी आरोप था कि पूर्व राष्ट्रपति मुशरर्फ को तालिबानियों से विशेष लगाव था। यह जगजाहिर है कि तीन दशक पहले अमेरिका-भारत के रिश्ते आज की तरह सौहार्दपूर्ण नहीं थे। अमेरिका का झुकाव भारत की तरफ तब हुआ जब उसे लगने लगा कि भारत तेजी से विश्व पटल पर महाशक्ति के रूप में उभरता जा रहा है। ऐसे अमेरिका भी इस बात को स्वीकार करती है कि पाकिस्तान में आंतकियों का मजबूत गढ़ है। सात जुलाई 2009 को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुई एक बैठक में भी राष्ट्रपति जरदारी ने माना कि पाक ने ही पैदा किये आतंकी। उन्होंने कहा कि अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 को हुए हमले के पहले ये आतंकी हीरो समझे जाते थे। इस हमले के बाद आतंकियों का मन इतना अधिक बढ़ गया कि वे पाकिस्तान को ही निशाना बनाना शुरू कर दिये। जरदारी ने यह भी स्वीकार किया कि छद्म कूटनीतिक हितों के लिए ही आतंकियों को पाला-पोसा गया। यह गलती आज पाकिस्तान पर ही भारी पड़ रहा है। तालिबान ताबड़तोड़ पाकिस्तानी जनता पर हमला कर रहा है। सूत्रों की मानें तो ओसामा बिन लादेन भी तालिबान में ही है। अमेरिका सहित विश्व के कई देश इस बात से घबराने लगे हैं कि यदि तालिबानी आतंकी पाकिस्तान के परमाणु हथियार तक पहुंच गये तो कई देशों में तबाही मचा देंगे। पाकिस्तान के कुछ तानाशाह नेताओं द्वारा शुरू जहर की खेती धीरे-धीरे पाकिस्तानियों को ही लीलती जा रही है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आतंकवाद का संरक्षण वास्तव मे राजनीति के महारथी अपने फायदे के लिए ही इस्तमाल करते है........यदि ऐसा ना होता तो आतंक्वाद के सिर उठाते ही सरकारें उसे कुचल ना देती।पाकिस्तान में भी यही सब कुछ हुआ है जिसका परिणाम हमेशा की तरह निर्दोष जनता को भुगतना पड़ रहा है।लेकिन दुनिया इस से कभी सीख नही लेगी।....

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  2. आपके लेख और परमजीत बाली जी की टिप्पणी ने सब कुछ कह दिया.
    पाकिस्तान के लोग तो हमेशा ही भयभीत रहे हैं, कभी तालेबान से कभी जिहाद से और कभी लश्कर से. भय के कारण ही उनकी सपोर्ट भी करते हैं. पाकिस्तान क्या भारत में भी बहुत से ऐसे डरपोक थाली के बैंगन मिल जायेंगे.

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