गुरुवार, 5 नवंबर 2009

'नेताजी' की नजर...ये इंसान नहीं हैं...

महज एक वोट से सरकार बनती और गिर जाती है। चुनाव से सरकार बनने तक राज्य हो या केन्द्र दोनों को जनता की याद पल-पल आती है। इस समय तक हर नेता खुद को आम आदमी समझता है। चुनावी दौरे पर कभी वह किसी झोपड़ी में गरीब के साथ चाय की चुस्की लेते देखा जाता है तो कभी धूप में जनता के साथ पैदल चलते। नेताजी के पीछे 'कुत्ते' की तरह भाग रहा मीडिया इस खबर को मोटी-मोटी हेडिंग के साथ प्रकाशित करता है। परंतु चुनाव बाद सरकार बनते ही नेता 'आम' नहीं 'खास' हो जाता है। अब धूप उसे तीखी लगने लगती है, गरीब उसे जानवर दिखने लगते हैं। वह चलता है तो सुरक्षा में पुलिस की कई-कई गाडिय़ां उसके पीछे-पीछे चलती हैं। कहीं वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गया तो फिर क्या कहना-पूरे सूबे की पुलिस उसकी मुट्ठी में। वह जिस मार्ग से चलता है, सड़कें खाली करा दी जाती हैं। वजह बताया जाता है-सीएम को जान का खतरा है। जबतक सीएम गुजर नहीं जाते, तबतक आदमी चाहे वह गंभीर रूप से बीमार ही क्यों न हो। उसे इस रास्ते से गुजरने की इजाजत नहीं मिल सकती है। कई बार तो अस्पताल जा रही महिला रिक्शा पर ही बच्चे को जन्म दे देती है। दूसरे राज्यों से साक्षात्कार को आए कई बेरोजगार भी इसकी चपेट में आ जाते हैं। वक्त पर साक्षात्कार के लिए न पहुंचने के चलते वे चयनित नहीं हो पाते हैं। इस दर्द को ये नेता क्या जानें? इनमें से कुछ की सूचना बाद में जब मीडिया को मिलती है और वह उसे प्रकाशित कर देता है, तो संबंधित नेताजी अफसोस जताने में कोताही नहीं बरतते हैं। देश के किसी राज्य में बड़े नेताजी के आगमन से होने वाली जनता की परेशानी पर कभी चर्चा नहीं होती है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद जब राजधानी की सड़कों पर निकलते थे तो उनके पीछे कम से कम पन्द्रह और आगे दस चार चक्के की गाडिय़ां दौड़ती थीं। इस वजह से घंटों सड़कों पर जाम लगा रहता था। अभी दो दिन पूर्व ही दिल्ली में प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लगे जवानों ने एक ऐसे मरीज के एबुलेंस को रोक दिया, जो किडनी का रोगी था। उसकी मौत रास्ते में ही हो गई। यह सुरक्षा व्यवस्था की कितनी बड़ी चूक है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। देश में प्रतिदिन सुरक्षा के नाम पर हजारों मार्ग सील कर दिए जाते हैं। इससे जाम में फंस कई बच्चे बेहोश तो कई रोगी की मौत तक हो जाती है। ऐसे नेताओं को आम जनता की जान का कोई मतलब नहीं। आजादी के बाद देश के प्रथम राष्ट्रपति जब सड़क मार्ग से निकलते थे, उनके लिए सुरक्षा की उतनी व्यवस्था भी नहीं रहती थी, जितना कि आज एक मुख्यमंत्री के लिए रहती है। राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री की सुरक्षा जरूरी है, इसका मतलब यह नहीं कि आम आदमी की जिंदगी का कोई मोल ही न लगाया जाए। आम आदमी भी इंसान हैं, और इन्होंने ने ही नेताजी को 'आम' से 'खास' बनाया है। 'नेताजी' यदि इस बात को भूल गए हैं तो जनता इन्हें अगले चुनाव में इसका एहसास करा सकती है, उन्हें यह बात कतई नहीं भूलनी चाहिए।

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