शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

नेताओं ने बढ़ाया नक्सलियों का मन!

यह सुनकर चौंकने वाली बात होगी कि नक्सलियों का मन कुछ नेताओं ने ही बढ़ाया है। आज नक्सली खून से जमीं को लाल कर रहे हैं। मुट्ठी भर नक्सली के सामने सरकार की ताकत कम पर जा रही है। इसके पीछे झांकने की ताकत मीडिया के अंदर या फिर बड़े-बड़े नेताओं में नहीं है। ऐसा नहीं है कि ये इन बातों से अनजान हैं। मीडिया के सामने इतनी बंदिशें हैं कि वह चाहकर भी कई बातों को उजागर नहीं कर सकता। देश के कई राज्यों में एक झारखंड भी नक्सली समस्याओं से गंभीर रूप से जूझ रहा है। बिहार के एक दर्जन से अधिक जिले भी नक्सलियों की चपेट में हैं। कहां ये किसे उड़ा देंगे, कहना मुश्किल है? हर घटना के बाद संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री दावा जरूर करते हैं कि जल्द ही इस संकट पर लगाम कसी जाएगी। परंतु वह दिन दूर-दूर तक आते नहीं दिख रहा है। बिहार से झारखंड जाने वाले रेलमार्ग में कई ऐसी जगहें हैं, जहां नक्सली विस्फोट कर चुके हैं। गुरुवार की रात यानी 19 नवंबर 2009 को उस समय हद हो गई जब मनोहरपुर के नजदीक मुंबई-हावड़ा रूट पर घाघरा और पोसेता स्टेशन के बीच टाटा-बिलासपुर ट्रेन को नक्सलियों ने बम से उड़ाने की कोशिश की। यह अलग बात है कि पूरी ट्रेन को ये नहीं उड़ा सकें। परंतु दो बोगियों के चिथड़े उड़ गए, वहीं आठ बागियां बेपटरी हो गईं। पांच से अधिक यात्रियों की मौत हो गई जबकि सौ से अधिक लोग घायल हो गए। कई की हालत अब-तब वाली थी। मदद पहुंचाने के लिए सुरक्षा दल काफी विलंब से पहुंचा, तबतक यात्रियों की चीखें हवा में गूंजती रहीं। कुछ ही सप्ताह पहले राजधानी एक्सप्रेस को भी नक्सलियों ने बंधक बना लिया था। तब कुछ नेताओं ने इस समस्या पर चिंता जताई थी। वहीं, पूरे मामले में पुलिस-प्रशासन निरीह बना रहा। बीते तारीख गवाह हैं कि अब तक किसी मामले में किसी नक्सली को फांसी की सजा नहीं दी गई है। पर्दे के पीछे की वजह यह है कि देश के जाने-माने नेता चुनाव के वक्त इन नक्सलियों से चोरी-छिपे मदद लेते हैं। पुन: जीतने के बाद संबंधित नेताओं से देश की बड़ी-बड़ी पार्टियां मदद लेती हैं। ऐसे में नक्सलियों पर बड़ी कार्रवाई की बात ही बेमानी होगी। ये नक्सली समय-समय पर अलग-अलग बातों को लेकर मासूम लोगों की जानें लेते रहते हैं। देश के रक्षा मंत्री ने पिछले दिनों कहा था कि नक्सलियों से सख्ती से निपटा जाएगा। आखिर कब? यह बड़ा प्रश्न है, इसका जवाब रक्षा मंत्री के पास नहीं है। आखिर क्या वजह है कि चंद नक्सली शासन को चुनौती दे रहे हैं और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। सिर्फ झारखंड में ही एसपी से लेकर दर्जनों पुलिस अफसरों का कत्ल नक्सली कर चुके हैं। हाल ही में बिहार के सीतामढ़ी जिले के बेलसंड अनुमंडल में नक्सलियों ने हमले किए थे, पुलिस घंटों बाद घटनास्थल पर पहुंची थी। इसी तरह इसी जिले के रून्नीसैदपुर प्रखंड में सैकड़ों की संख्या में नक्सलियों ने कई शराब दुकानों को नष्ट कर दिया था। यहां भी पुलिस नहीं पहुंची थी। पुलिस का साफ कहना था कि वे अपनी सुरक्षा को देखकर ही कोई कदम उठाएंगे। उनका सोचना कहीं से भी गलत नहीं है। वजह साफ है कि यदि कोई पुलिसकर्मी दिवंगत भी हो जाएगा तो सरकार अफसोस जताकर फिर पुलिसकर्मियों को पुराने हाल पर छोड़ देगी। देश की कानून व्यवस्था भी इतनी लचर है कि यहां पैसे के बल पर अपराधी आराम से छूट जाते हैं।

1 टिप्पणी: