शनिवार, 21 नवंबर 2009

हाय महंगाई : तुझे कब आएगी मौत

भारत के नब्बे फीसदी से अधिक लोग महंगाई की मौत का इंतजार बेसब्री से कर रहे हैं। वे अपने देवता से इसके लिए मिन्नतें कर रहे हैं। परंतु महंगाई की मौत किसी भी कीमत पर संभव नहीं है? हर चौक-चौराहे पर सबसे अधिक चर्चा आज इसी की हो रही है। हर चैनल, हर अखबार प्रतिदिन इसपर कवरेज देना नहीं भूलता है। महंगाई से गरीबों की थाली में खाने का वजन लगातार घट रहा है। लाखों गरीबों ने अपने बच्चों के दूध का वजन तक घटा दिया है। उनके गाल व पेट धंसते ही जा रहे हैं। मध्यम वर्ग के लोगों की थाली से भी दाल व सब्जी की मात्रा निरंतर घट रही है। कौन है इसके लिए जिम्मेदार? सरकार की नीति, उत्पादन कम होना या फिर जमाखोरी? वास्तव में तीनों ही इसके जिम्मेदार तत्व हैं। मंदी क्या आई कि हजारों हाथ बेरोजगार हो गए। वहीं लोकसभा चुनाव को लेकर भारत सरकार ने कर्मचारियों के वेतन में अप्रत्याशित वृद्धि कर दी। देखादेखी राज्य सरकारों ने भी अपने कर्मचारियों के वेतन बढ़ा दिए। वहीं प्राइवेट सेक्टर में काम करनेवाले वेतन मामले में सालों पीछे चले गए। सभी कंपनियों के पास एक ही बहाना रहा मंदी...मंदी...मंदी। इसी साल मानसून के पूर्व बंगाल में आइला क्या आया कि देश के अधिकतर हिस्सों में मानसून कमजोर पड़ गया, नतीजा चहुंओर सुखाड़ की गूंज। इससे उत्पादन कम होना स्वाभाविक है। इस बात का अंदाजा करते हुए बड़े व्यवसायियों ने जमकर जमाखोरी की और हैसियत के मुताबिक लाखों-करोड़ों कमाए और कमा रहे हैं। देश के वित्त मंत्री ने हाल में ही अपने एक बयान में कहा कि महंगाई पर लगाम कसना फिलहाल संभव नहीं है। अर्थात देश की जनता को और महंगाई झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। वित्त मंत्री ने यह बयान तब दे रहे हैं जब लोकसभा का चुनाव हो चुका है और केन्द्र में पांच सालों के लिए कांग्रेस की सरकार सुरक्षित हो चुकी है। ऐसे कांग्रेस का इतिहास रहा है कि इसके शासनकाल में महंगाई हमेशा बढ़ी है। कभी प्याज ने लोगों को रुलाया है तो कभी किसी और चीज ने। यह कांग्रेस का शासन ही है कि लोग चालीस रुपए किलो चीनी खा रहे हैं। गरीबों के घर में किसी मेहमान का स्वागत चाय पिलाकर ही करने की प्रथा इधर के दशकों में रही है। अब चाय की घूंट भी कड़वी हो गई है। यूं कहा जाए कि हर सामान के दाम में आग लगी है तो गलत नहीं होगा। शहर के छोटे-छोटे दुकानदार भी जमाखोरी कर मुनाफा कमाने में जुटे हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में इस साल आलू चौबीस रुपए किलो बिका जबकि पिछले साल नया आलू भी इस भाव नहीं बिका था। गरीब पहले कहा करते थे कि वे दाल-भात-चोखा खाने भर ही कमाते हैं। अब यह मिसाल बन गई है, क्योंकि दाल-भात-चोखा अब मध्यम वर्ग के लोगों की थाली में ही देखने को मिल रही है। गरीबों की थाली से उक्त सामग्री गायब हो चुकी है। बहरहाल सरकार को इन बातों से कोई मतलब नहीं है। उसे गरीब जनता अब चुनाव के समय याद आएगी।

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