सोमवार, 28 दिसंबर 2009

बच्चों के यौवन पर दाग लगने से रोकिए!


समय के साथ तेजी से बदल रहा लोगों का मन-मिजाज। परंतु पृथ्वी व चांद, सूरज वहीं है, ठीक इसी तरह स्त्री-पुरुष में आज भी भेदभाव कायम है। स्त्री चाहे जिस मुकाम पर पहुंच जाए, उसे पुरुष के सामने झुकना ही पड़ता है। अभी के दौर में आधुनिकता के नाम पर लड़कियां जींस-शर्ट अधिक पसंद कर रही हैं। इसी तरह हाईस्कूल तक पहुंचते ही अधिकतर लड़कियों का झुकाव युवा लड़कों की ओर हो जा रहा है। कॉलेज में पढऩे वाली लड़की का यदि ब्यॉय फ्रेंड नहीं है तो इसे अपमान समझा जा रहा है। वहीं, लड़के तो लड़कियों से दोस्ती करने के लिए बेचैन दिखते हैं। किशोर से युवा की तरफ बढऩे के साथ ही विपरीत सेक्स की ओर रुझान आम बात है। परंतु दिक्कत वहां से शुरू होती है, जब कोई अठारह वर्ष का युवक व युवती एक-दूसरे के करीब आने की कोशिश करते हैं। करीब ये दोस्ती में नहीं बल्कि पति-पत्नी की तरह संबंध बनाने के लिए आते हैं। इस वक्त इन्हें मां-बाप, भाई-बहन या फिर समाज का कोई ख्याल नहीं आता। इनका कैरियर बर्बाद हो जाएगा, ये कहीं के नहीं रहेंगे, इस बात का होश भी कच्ची उम्र के चलते इन्हें नहीं रहता। संबंध बनाने के दो-तीन महीने के बाद बिजली तब गिरती है, जब लड़की को पता चलता है कि वह मां बननेवाली है। मारे शर्म के या तो वह खुदकुशी की कोशिश करती है या फिर गर्भ गिराने की बदनामी झेलती है। इसके साथ ही कलंकित होता है उसका पूरा परिवार। वहीं, लड़की का साथी या तो गायब हो जाता है, या फिर लड़की के परिवार द्वारा किए गए यौन उत्पीडऩ के केस में फंस हवालात की सजा काटता है। ऐसे कम ही खुशनसीब लड़की होती है, जिसे गर्भ ठहरने के बाद ही लड़का कबूल कर लेता है। परंतु यह उम्र शादी की नहीं होती, सो परिवार वाले इसके लिए राजी नहीं होते और अन्तत: लड़की के पास गर्भ गिराने के अलावा कोई रास्ता नहीं रहता। इसमें कसूर किसका है लड़की या लड़का या फिर अभिभावक, जिन्होंने बच्चों को इतनी आजादी दे रखी थी? बच्चियां बड़ी होने के साथ मां-बाप की जिम्मेवारी बढ़ जाती है। सौ में साठ फीसदी अभिभावक यह नहीं देखते कि बच्ची यदि कॉलेज गई है तो उसने कितने क्लास किए। उसके मित्रों की सूची में कौन-कौन लड़के हैं। कॉलेज कैसे जाती है, आने में विलंब क्यों हुआ, जिस विषय का वह कोचिंग करना चाहती है, क्या वास्तव में उसे जरूरत है या फिर टाइम पास? ऐसी छोटी-छोटी चीजों पर नजर रखकर बच्चों को दिग्भ्रमित होने से बचाया जा सकता है। बेटों के पिता की जिम्मेवारी भी बेटी के पिता से कम नहीं है? यदि उनका बेटा किस लड़की के साथ गलत हरकत करता है। ऐसे में बदनामी उनकी भी होती है, समाज में उनका सिर भी झुकता है। ऐसे में थोड़ी से चौकसी इस भीषण समस्या से बचा सकती है। अत: चेतिए और बच्चों को दोस्त बनाइए ताकि ये आपको अपने दिल की बात बेहिचक बता सकें। इससे आप गंभीर संकट में फंसने से बच जाएंगे। बिहार के छोटे-छोटे गांव से भी नाबालिग लड़के-लड़कियां शादी की नीयत से भागने लगे हैं। वहीं, अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि गर्भ गिरानेवालों की संख्या भी बढ़ी है। क्रमश...

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

सीतामढ़ी में शुंगकालीन तीन मूर्तियां


सरस्वती के उपासक रामशरण के पास हैं प्रतिमाएं :  यह जानकर हैरत होगी कि बिहार के सीतामढ़ी में भी शुंगकालीन तीन मूर्तियां हैं, पर है सौ फीसदी सच। वर्ष 1977 में भारत सरकार के अभिलेखों में इन मूर्तियों के नाम दर्ज किए गए। पेशे से व्यवसायी पर सरस्वती के सच्चे उपासक रामशरण अग्रवाल विगत चार दशकों से इन मूर्तियों को संभालकर एक बैंक के लॉकर में रखे हुए हैं। सीतामढ़ी शहर के कोट बाजार निवासी रामशरण उम्र के 64वें वर्ष में भी विद्यार्थी की तरह आठ घंटे पुस्तकों और अखबारों में उलझे रहते हैं। श्री अग्रवाल से जब इन मूर्तियों सहित कुछ सवाल पूछे गए तो वे कुछ मिनटों के लिए खामोश हो गए। शीघ्र ही तंद्रा तोड़ते हुए कहा कि 'स्वस्थ सोच संपदा बनाती है परंतु संपदा स्वस्थ सोच नहीं बनाती है।' इसे आत्मसात करने की जरूरत है। शुंग कालीन मूर्तियों के बारे में कहा कि 1966-1970 के बीच उन्होंने दरभंगा से पूर्वी चंपारण के छौड़ादानों प्रखंड की जुआफर पंचायत तक पैदल यात्रा की थी। इसी क्रम में जुआफर गांव में रुके। यहां के दो-तीन किसानों के पास पुरानी मूर्तियां देखीं। पहचानते देर न लगी कि ये मूर्तियां शुंग काल की हैं। मूर्तियों के प्रति इनकी रुचि देख वैद्यजी के नाम से प्रसिद्ध एक किसान ने इन्हें तीन मूर्तियां भेंट कीं। वैद्यजी ने श्री अग्रवाल को बताया कि पुरानी मूर्तियां उन्हें खेत की खुदाई में मिली थीं। यहां के कई पुराने घरों में भी ऐतिहासिक ईंट का इस्तेमाल किया गया था। 1972 में मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में ऑल इंडिया हिस्ट्री कांग्रेस का अधिवेशन हुआ,जिसमें बतौर डेलीगेट श्री अग्रवाल ने शिरकत की और मूर्तियों की चर्चा अधिवेशन में आए काशी प्रसाद जायसवाल इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. बीपी सिन्हा (अब स्वर्गीय), जैन एवं प्राकृत रिसर्च इंस्टीट्यूट वैशाली के निदेशक डॉ. रामेश्वर तांतिया (अब स्वर्गीय) और डॉ. देसाई नागपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष समेत दर्जनों विद्वानों के समक्ष की। सभी चौंक गए और कहा कि इसे देखने से उत्तर बिहार के पुरातत्व के प्रति धारणा ही बदल गई। 1977 में डॉ. माधवी अग्रवाल, भूतपूर्व निदेशक, पटना संग्रहालय के नेतृत्व में एक टीम आई और मूर्तियों का निरीक्षण कर भारत सरकार को अभिलेखों में दर्ज करने के लिए लिखा, जिसे मंजूर कर लिया गया। 1981 में सीतामढ़ी से नेपाल-तिब्बत सीमा तक स्कूटर से यात्रा करनेवाले और शेयर विशेषज्ञ श्री अग्रवाल को मंदी के बारे में तीन साल पूर्व ही आभास हो गया था। उन्होंने बताया कि कुषाण काल में भारत की विश्व जीडीपी में 22 फीसदी, ईस्ट इंडिया कंपनी के शुरू में 6 फीसदी और फिलहाल 1 फीसदी से भी कम हिस्सेदारी रह गई है। पिछले 12 वर्षों में पश्चिम की अर्थव्यवस्था वित्तीय सेवाओं पर केन्द्रित होती गई और उत्पादन की धुरी चीन व भारत की तरफ आ गई। ऐसे में झटका लगना तय था, जो मंदी के रूप में सामने आई। भारत में निवेश के लिए जल प्रबंधन एवं पर्यटन को वे सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। 1983 में सीतामढ़ी यात्रा के दौरान सच्चिदानंद हीरानंद (अज्ञेय जी), जैनेन्द्र कुमार जैसे साहित्य के विद्वान भी इनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके थे। इन विद्वानों से रामशरण को आशीर्वाद मिला। रामशरण को गुरु-शिष्य परंपरा में अटूट आस्था है और गौतम बुद्ध को मानव इतिहास का महानतम शिक्षक मानते हैं, जो गुरु भी हैं और गोविन्द भी। रामशरण बताते हैं कि उन्होंने अपने बड़े भाई व सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश बीएन अग्रवाल से बहुत कुछ सीखा है।

अध्ययनशील व कुशल वक्ता भी : आशा
इंग्लैंड में शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित और बिहार की निवासी आशा खेमका (यूके में न्यू कॉलेज नॉटिंघम में प्रिंसिपल और चीफ एक्जीक्यूटिव हैं) ने टेलीफोन पर बताया कि रामशरण एक अध्ययनशील व्यक्ति के साथ कुशल वक्ता भी हैं, जिनके हर शब्द नपे-तुले रहते हैं। कहा कि नेशनल ज्योग्राफिक एवं एकॉनामिस्ट, इंडिया टुडे, टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक जागरण समेत दर्जनभर से अधिक पत्र-पत्रिकाओं के रेगुलर पाठक हैं। आशा को अपने नाम के साथ ओबीई (ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश इम्पायर) लिखने का अधिकार भी प्राप्त है।

चेंजेज को पहले ही भांप लेते हैं : अरुण
बंगलूरू में भारत के एकमात्र फाइनेंसियल एक्टिविस्ट अरुण कुमार अग्रवाल ने दूरभाष पर बताया कि वे मोबाइल पर रामशरण अग्रवाल से आर्थिक मुद्दों पर प्राय: विचार-विमर्श करते रहते हैं। श्री अग्रवाल ने दावे के साथ कहा कि उत्तर बिहार में शेयर के बारे में रामशरण जैसा जानकार शायद ही कोई हो। यह भी कहा कि भविष्य में होने वाले चेंजेज को वे पहले ही भांप लेते हैं। मंदी के पहले ही उन्होंने इसकी परिकल्पना कर ली थी। महंगाई के संबंध में पूछने पर अरुण ने बताया कि फिलहाल घटने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

शिबू ही बनेंगे झारखंड के मुख्यमंत्री!


झारखंड विधानसभा में खंडित जनादेश के बाद भी सत्ता की 'कुंजी' झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के सुप्रीमो शिबू सोरेन (गुरुजी) के हाथ में ही है। शिबू को किसी पार्टी के नेता के साथ सरकार बनाने में कोई परहेज नहीं है। यानी हर हाल में शिबू को चाहिए मुख्यमंत्री की कुर्सी? 23 को हुए झारखंड विस चुनाव की मतगणना में कांग्रेस गठबंधन को 25, भाजपा को 18, जदयू को 02, राजद को 05, झामुमो को 18 और अन्य को 13 सीटें मिली हैं। कांग्रेस यदि गुरुजी को मुख्यमंत्री मान ले तो झामुमो और कांग्रेस गठबंधन की कुल 43 सीटें हो जा रही हैं, जो सरकार बनाने से दो अधिक है। सरकार बनाने के लिए यहां 41 सीटें चाहिए। मगर कांग्रेस शिबू को मुख्यमंत्री नहीं बनाना चाहती। झारखंड की अंदरुनी हालत काफी खराब है, इस बात को कांग्रेसी नेता बखूबी समझते हैं। कुछ कांग्रेसी नेता दबी जुबां में आलाकमान के सामने विरोध भी दर्ज करा चुके हैं। 25 दिसंबर 09 को झामुमो विधायक दल के नेता के रूप में शिबू सोरेन चुन लिए गए हैं। इसके साथ ही सरकार बनाने की सियासत और तेज हो गई है। सूत्र बताते हैं कि भाजपा ने गुरुजी की तरफ पांसे फेंक दिए हैं, इसी के भरोसे शिबू मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज होना चाहते हैं। हालांकि अबतक किसी दल के नेता की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। लेकिन कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकने के लिए भाजपा सांसद व पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा शिबू को समर्थन देने के लिए तैयार हैं। मुंडा शिबू खेमे के पल-पल की सूचना ले रहे हैं। कांग्रेस खेमा भी गहन विचार-विमर्श में डूबा है। अब देखना यह है कि गुरुजी किसकी मदद से मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते हैं? शिबू पहले ही बयान दे चुके हैं कि वे किसी दल को 'अछूत' नहीं मानते हैं। राज्य की 81 सदस्यीय विधानसभा सीटों में अकेले झामुमो के पास 18 सीटें हैं। ऐसे में सब पार्टियों की नजर शिबू की ओर ही है। इधर, केन्द्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुबोध कांत सहाय का कहना है कि शिबू को सरकार बनाने में कांग्रेस दो बार मदद कर चुकी है। कांग्रेस ने शिबू को 2005 में बाहर से सरकार बनाने में समर्थन दिया था, यह अलग बात है कि सरकार सिर्फ नौ दिन ही चल पाई थी। पुन: 27 अगस्त 2008 से 12 जनवरी 2009 तक शिबू सोरेन को कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था। मालूम हो कि झारखंड चुनाव में अबकी कांग्रेस-झाविमो को 25 सीटें मिलीं। कांग्रेस की सीटें नौ से बढकर इसबार 14 हो गई। वहीं, भाजपा-जदयू को भारी नुकसान उठाना पड़ा। झामुमो को एक सीट का फायदा हुआ। राजद को दो सीटों का नुकसान हुआ। लोजपा का तो खाता ही नहीं खुला।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

पांच मौत के जिम्मेवार कौन?

बिहार के मोतिहारी में सुगौली-रक्सौल रेलखंड में एक मानवरहित ढाला है, जिसे शीतलपुर ढाला के नाम से पुकारा जाता है। 22 दिसंबर को इसी गुमटी से एक मार्शल जीप गुजर रही थी, जो इंजन से जा टकराई। टक्कर इतनी भीषण थी कि मार्शल को घसीटते हुए इंजन आधा किलोमीटर दूर तक निकल गया। इस बीच मार्शल पर बैठे पांच लोगों की चीखें इंजन की आवाज पर भारी पड़ी, हालांकि ये चीखें चंद सेकेण्ड में ही शांत हो गईं, क्योंकि तबतक ये पांचों मर चुके थे। दो ऐसे मासूम थे, जिसे मौत का अर्थ तक मालूम नहीं था। एक थी-चार वर्षीय दिलजान खातुन तो दूसरा महज अठारह माह का नन्हा। इनके साथ ही मौत की नींद सो गए-इसकी मां फरीदा खातुन और नाना हबीबुल्लाह। यानी एक ही परिवार के चार। चालक को भी भागने का मौका नहीं मिला। समस्तीपुर के डीआरएम ने इस हादसे के लिए मार्शल के चालक को दोषी ठहराया है, जो अक्षरश: सही है। हालांकि वह बेचारा भी हमेशा के लिए सो चुका है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राहत कोष से पीडि़त परिवार के आश्रितों को पचास-पचास हजार देने की बात कही। इस घटना से आसपास के लोग आक्रोशित हो उठे और इंजन में ही आग लगा दी। उग्र लोगों ने रेलवे ट्रैक को जगह-जगह काट दिया। यानी पांच जान के साथ एक अरब रुपए का भी नुकसान। खैरियत यही थी कि इंजन से बोगिया नहीं जुड़ी हुई थीं। वर्ना आक्रोशित भीड़ शायद उसे भी फूंक देती। एक अरब का नुकसान किसका हुआ, सरकार का या फिर जनता का? यह यक्ष प्रश्न है जिसके बारे में हर व्यक्ति को सोचना होगा? भीड़ के किसी भी व्यक्ति में मरनेवालों के प्रति लगाव नहीं दिखा। पहले दो-चार लोगों ने हो-हल्ला किया, फिर क्या हुजूम ने ही तांडव शुरू कर दिया। इंजन को बुझाने का प्रयास भी लोगों ने विफल कर दिया। कसूर किसका, मार्शल चालक का या फिर इंजन चालक का या फिर रेलवे प्रशासन की व्यवस्था की? यह तो तय है कि सभी गांवों से गुजरनेवाले ढाले का मानवयुक्त नहीं बनाया जा सकता है, क्योंकि भारत के पास उतना संसाधन ही नहीं है? ऐसे में थोड़ी सी चौकसी से इस तरह की बड़ी घटना को टाली जा सकती है। यह घटना भी टाली जा सकती थी, यदि चालक ने ढाला को पार करते वक्त यह देखा होता कि इंजन आ रहा है तो पांच जिंदगियां बच जातीं। इस तरह के हादसे अलग-अलग राज्यों में प्राय: सुनने को मिलते हैं। चालक की छोटी गलती से कई जानें चली जाती हैं। इसके पीछे कम कसूरवार प्रशासन नहीं है? ऐसे लोगों को भी ड्राइविंग लाइसेंस आराम से मिल जाते हैं, जो हर वक्त नशे में धुत रहते हैं या फिर जिनकी समझ बहुत छोटी होती है। बिहार में तो पन्द्रह साल के किशोर भी ऑटो चालक बन गए हैं। आश्चर्य तब और लगता है जब इस ऑटो पर हर वर्ग के लोग बैठ जाते हैं। हां, दुर्घटना होने पर अवश्य पछताते हैं कि उनसे गलती हो गई। थोड़ी-सी चौकसी वाहन पर बैठनेवालों को भी बरतनी चाहिए। यदि चालक गाड़ी तेज चला रहा है तो उसे समझाया जा सकता है।

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

मंदी के नाम पर और कितना शोषण?

विश्व के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मंदी के बादल लगभग छंट चुके हैं। भारत के वित्त मंत्री भी घोषणा कर चुके हैं कि फिर से रोजगार के नए अवसर खुलने लगे हैं। परंतु भारत के मध्यम निजी कंपनियों और कुछ उच्च कंपनियों में अभी मंदी का दौर खत्म नहीं हुआ है? मंदी के बहाने अबतक सैकड़ों कंपनियां हजारों लोगों को बाहर का रास्ता दिखा चुकी है। उनलोगों पर गाज अधिक गिरी, जिनके वेतन अधिक थे। कम वेतन वाले तो कुछ सुरक्षित बच गए परंतु अधिक वेतन वाले बेकाम हो गए। मंदी के बहाने फायदे में चली रही कंपनियों ने भी छंटनी के नाम पर कर्मचारियों का जमकर दोहन किया। काम के घंटे बढ़ा दिए जबकि तनख्वाह में फूटी कौड़ी भी बढ़ोतरी नहीं की। गोपनीय आंकड़ों पर गौर किया जाए तो सैकड़ों कंपनियों ने दो वर्षों से मंदी के नाम पर अपने किसी कर्मचारी को 'इन्क्रीमेंट' तक नहीं दिया है। यदि किसी कर्मचारी ने हिम्मत करके अपनी बात रखने की कोशिश की तो नौकरी से निकाल देने की धमकी मिलती है। ऐसे में ये कर्मचारी किससे शिकायत करें, कहां जाएं, अंधी सरकार तो पहले से ही कंबल ओढ़कर सोई हुई है? महंगाई पहले से घरों में समा चुकी है। भारत की एक बड़ी कंपनी की शाखा बिहार में भी है। यहां के कई ऐसे कर्मचारियों से जबरन इस्तीफा ले लिया गया, जो बीस साल से अधिक समय से उस कंपनी में बने हुए थे। इनका कार्य भी बेहतर माना जाता रहा है। इनके बॉस ने कहा कि या तो इस्तीफा दें, वर्ना कोई इल्जाम लगाकर निकाल दिया जाएगा। मजबूर होकर कर्मचारियों को इस्तीफा देना पड़ा। एक दशक पहले तक बड़ी कंपनियों में नौकरी 'पर्मानेंट' होती थी। किसी कर्मचारी को हटाना आसान भी नहीं था। अब सभी कंपनियों में नौकरी 'कांट्रेक्ट' पर दी जा रही है, जिसे कंपनी जब चाहे हटा दे रही है। इसका कहीं विरोध नहीं हो रहा क्योंकि सरकार ही पक्ष में खड़ी है। इधर, हजारों कर्मचारी डर के साये में नौकरी कर रहे हैं। मंदी की दस्तक के साथ ही कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को न सिर्फ डराया बल्कि जमकर शोषण भी किया और कर रहे हैं। आसमान छूती महंगाई ने कम वेतन पाने वालों के घर से दाल की कटोरी गायब कर दी है। गृहणियां अपने पतियों से उलझ रही हैं कि खर्च कैसे चलाएं? इसका जवाब निजी कंपनी के कर्मचारियों के पास नहीं है। हालांकि कर्मचारियों के मस्तिष्क में एक बात अवश्य तैर रही है कि मंदी के नाम पर उनका और कितना शोषण किया जाएगा? कांट्रेक्ट पर बहाली करते वक्त ही कंपनियां कर्मचारियों से लिखता लेती है कि यदि उनका कार्य ठीक-ठाक नहीं रहा तो उन्हें 'कांट्रेक्ट' की अवधि के पूर्व भी हटाया जा सकता है। ऐसे में खामोश रहना इनकी मजबूरी है, लेकिन कब तक?

रविवार, 20 दिसंबर 2009

चेतिए! बच्चे ' पॉर्न साइट' देख रहे...

इंटरनेट मानव के लिए एक जरूरत बन चुकी है, जिसे नकारना समाज को वर्षों पीछे ले जाना होगा। भारत में इंटरनेट की जरूरत हर तरह के लोग महसूस करने लगे हैं। यही कारण है कि उच्च वर्ग के लोगों के अलावा अब मध्यम वर्ग के लोग भी इंटरनेट इस्तेमाल करने लगे हैं। ऐसे लोग जिनके पास इंटरनेट की सुविधा नहीं है वे साइबर कैफे की ओर रुख करने लगे हैं। बिहार में मध्यम वर्ग की लड़कियां भी अब बेहिचक साइबर कैफे पहुंचने लगी हैं। इंटरनेट में जानकारियों का खजाना भरा-पड़ा है, आपको कोई जानकारी चाहिए, बस क्लिक कीजिए-जानकारी ही जानकारी। अब चलते हैं, इसके निगेटिव पहलू की ओर। इसमें हजारों साइट ऐसे हैं, जो किशोरों पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं। लाखों अभिभावक ऐसे हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने की खुली छूट दे रखी है। ऐसे में बारह साल का किशोर भी ' पॉर्न साइट' खोलना सीख गया है, इतना ही नहीं वह 'पॉर्न वीडियो' भी देखता है। ऐसे में अभिभावकों की जिम्मेदारी बनती है कि वह खुद के सामने ही बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने की इजाजत दे। यहां तक कि आफिस जाते वक्त कंप्यूटर में 'पासवर्ड' अवश्य डाल दे। बच्चे देश के भविष्य हैं, ऐसे में यह निगरानी अत्यंत जरूरी है। बच्चे हर चीज को जानना चाहते हैं, ऐसे में ज्ञान के अभाव में गलत चीजें देख वे उल्टी-सीधी हरकते करने लगते हैं। इससे कई बार अभिभावकों का सिर समाज में झुक जाता है। थाने में दर्ज मामले बताते हैं कि छेड़खानी मामले में चौदह साल के किशोर भी आरोपित किए जाते हैं और उन्हें हिरासत में ले रिमांड होम भी भेजा जाता है। अब जरा युवाओं पर इंटरनेट के असर की पड़ताल पर भी गौर फरमाना जरूरी है। संस्कारी युवाओं को सबसे अधिक चिंता भविष्य को लेकर होती है, क्योंकि इनमें कुछ बनने का जज्बा रहता है। यदि किसी युवा को 'पॉर्न साइट' देखने की लत पड़ गई तो उसकी पढाई-लिखाई चौपट तो होती है, साथ ही स्वास्थ्य भी खराब कर बैठता है। इधर, अभिभावक समझ नहीं पाते कि उनके बेटे को क्या रोग लग गया? वर्तमान में कॉर्ल गर्लस भी ईमेल और मोबाइल से ग्राहक पटाने लगी हैं। ऐसे में इनके शिकार नौजवान अधिक होते हैं। गलत हरकतों के चलते कई नौजवानों को जेल की हवा भी खानी पड़ती है। इनके अभिभावकों को भी बात तब समझ में आती है, जब काफी देर हो चुकी होती है। इसलिए, चेतिए कि आपके बच्चे क्या कर रहे हैं, कहीं ये पॉर्न साइट तो नहीं देख रहे हैं। पुलिस डायरी कहती है कि छेड़खानी व बलात्कार मामलों में जबरदस्त इजाफा हुआ है। कई वरीय पुलिस अधिकारी तो यह भी मानते हैं कि युवाओं को बिगाड़ रहा है इंटरनेट। बिहार के अखबारों में प्रतिदिन प्रेमी संग प्रेमिका फरार की खबरें छपती है। पुलिस तक इस घटना से तंग आ चुकी है।

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

इन्हें लाश की राजनीति में भी शर्म नहीं आती!

प्रसंग-एक : निठारी कांड का एक पात्र सुरेन्द्र कोली, जो छोटे-छोटे बच्चों को टुकड़ों में काटकर उसका गोश्त खाता था। फिलहाल जेल में हैं, कोली की चर्चा छिड़ते ही लोगों के चेहरे पर घृणा के भाव उभर आते हैं जबकि वह अपने जुर्म की सजा भुगत रहा है। कोली जैसे हत्यारे ने अपने जघन्य अपराध को माना।
प्रसंग-दो : दिल्ली में गए वर्ष हुए एक बम विस्फोट की जानकारी जब तत्कालीन गृह मंत्री को मिली तो उन्होंने पहले सूट बदला, पाउडर चपोड़े फिर देखने गए कि कितने लोग मारे गए हैं? गृह मंत्री ने मरे लोगों के शवों पर कत्थक करने से पहले खुद को सजा-संवार लिया था। इस घटना के कुछ ही माह बाद ये पद से हट गए, परंतु इन्हें कभी पछतावा नहीं हुआ।
प्रसंग-तीन : झारखंड राज्य बनने के पहले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री थे, इन्होंने एक भाषण में कहा था कि उनके शव पर ही राज्य का बंटवारा होगा। यानी जीते जी वे बंटवारे की बात को स्वीकार नहीं करेंगे। कुछ दिनों बाद झारखंड स्वतंत्र राज्य बना। लालू प्रसाद अब भी राजनीति कर रहे हैं। इन्हें कोई पछतावा नहीं कि झारखंड बनने से बिहार कमजोर हो गया।
सतीश श्रीवास्तव जी आपके लेख जलियांवाला बाग के खानदान ही खत्म! मैंने पढ़ा, आपको बधाई कि आपने एक ऐसे विषय को छुआ जिसे लाशों पर राजनीति करने वाले इतिहास का मरा पात्र भी मानने को तैयार नहीं हैं। आपके लेख से मस्तिष्क में 'आइला' उठा, उसे शांत करने के लिए उक्त प्रसंगों का सहारा लेना पड़ा। जिस देश के नेता को जलियांवाला बाग के शहीद को शहीद मानने में परेशानी हो रही है, इनके लिए कौन-सा शब्द इस्तेमाल किया जाए। इसपर पर गंभीरता से विचार करना होगा? हाल ही में मनसे नेताओं ने सपा विधायक अबू आजमी को हिन्दी में शपथ लेने के लिए प्रताडि़त किया था। मनसे नेताओं को शायद मां को मां कहने में भी शर्म आती है। ऐसे विचारधारा के नेता भला शहीद को शहीद आसानी से कैसे कहेंगे, कैसे मान लेंगे। जलियांवाला बाग की घटना तो भारतीय के मुंह पर अंग्रेजों का एक ऐसा तमाचा था जिससे भारतीय टूट जाए, झूक जाए। परंतु इसी घटना ने भारत में आजादी की ऐसी मशाल जलाई जिसमें अंग्रेज धू-धूकर जल गए। केन्द्र व राज्य सरकारों ने स्वतंत्रता सेनानियों को तो कई सुविधाएं दीं, क्योंकि ये जिंदा हैं, वोट दे सकते हैं, इन्हें गद्दी पर बिठा सकते हैं। परंतु 1919 में घटी जलियांवाला बाग की घटना के शहीदों को अबतक शहीद का दर्जा न मिलना वास्तव में चिंतनीय है। इसमें मारे गए शहीदों की गिनती भी नेताओं को सही से याद नहीं है। जहां अंग्रेजी हुकू मत की पंजाब सरक ार की रिपोर्ट में बाग में 379 लोगों के मारे जाने की बात स्वीकारी गई थी, वहीं अमृतसर सेवा सोसायटी ने उसी समय 530 शहीदों की सूची तैयार की थी। जबकि आजाद भारत सरकार का कोई अधिकारिक दस्तावेज अब तक जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों को शहीद ही नहीं मानता। शहीद हरिराम बल के पौत्र भूषण बहल 1980 से जलियांवाला बाग के शहीदों को स्वतंत्रता सेनानी घोषित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब वह 60 के हो चुके हैं। इनके संघर्ष का ही नतीजा है कि सोलह लोगों के वारिसों का पता लग गया है।

सोमवार, 7 दिसंबर 2009

ये सही हैं, क्योंकि ये संपादक हैं?

बुद्धिजीवियों के सामने जैसे ही संपादक शब्द आता है, चंद ही सेकेण्ड में उनके चेहरे के भाव चढऩे-उतरने लगते हैं। सहसा शांत हो जाता है क्योंकि तब उनके सम्मुख एक ऐसे व्यक्ति का चेहरा उभरकर सामने आता है, जो विद्वानों का विद्वान होता है। सबका दर्द हरण करने वाला होता है। हर वर्ग के लोगों की समस्याओं को अपनी समस्या मानकर सही जगह पर उठानेवाला होता है। परंतु संपादक के चेहरे के पीछे का चेहरा किसी को नजर नहीं आता है। इस चेहरे को देखने के लिए जाना होगा किसी बड़े अखबार के दफ्तर में। यहां कई चेहरे बुझे नजर आएंगे, यानी काम के साथ सभी अपने-अपने गम में डूबे। नौकरी करनी है, सो काम तो करना ही है। इत्तफाक से यदि उसी वक्त संपादक जी पहुंच गए तो फिर क्या कहना, कुछ पल के लिए कर्फ्यू। वजह क्या है इसकी चर्चा भी जरूरी है। अखबार के दफ्तरों में तीन तरह के लोग अधिक होते हैं-पैरवीपुत्र, चाटुकार और काम करनेवाले। पैरवी पुत्र काम करें या न करें, उन्हें समय पर वेतन और तरक्की मिलनी तय है। गप्पबाजी में ये माहिर होते हैं। पर इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है, क्योंकि इनकी पहुंच संपादक के संपादक तक रहती है। दूसरे नंबर पर हैं चाटुकार-बोलने में तेज तर्रार और संपादक के सामने भी धौंस दिखाने वाले, सो इनकी चलती सबसे अधिक होती है। क्योंकि, ये संपादक के इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं। इनका जाल इतना मजबूत होता है कि हर संपादक इनके झांसे में आ जाते हैं। तीसरे नंबर पर वे हैं जो भटकते-भटकते और काफी संघर्ष से आए हैं। इन्हें ही सबसे ज्यादा काम करना पड़ता है। इनका वेतन भी कम बढ़ता है। तरक्की तो शायद कभी न मिले या फिर कभी संपादक की नजर इनपर चली जाए तो कुछ हो जाए। परंतु ऐसा कम ही देखने को मिलता है। ऐसे में ये हमेशा असंतोष की भावना लिए काम करते हैं। ये सबसे ज्यादा काम भी करते हैं परंतु फायदा मिलने के वक्त सबसे पहले पैरवीपुत्रों का नाम आता है। फिर चाटुकार या फिर एक-दो ऐसे, जो संपादक के खास होते हैं। यानी जिसके बारे में जमाना पाजिटिव सोचता है, उसका निगेटिव रूप? कुछ पचनेवाली बात तो नहीं है परंतु सत्य है। बिहार के एक बड़े अखबार के संपादक ने दो-तीन ऐसे लोगों को तरक्की इस वजह से नहीं दी, क्योंकि इनलोगों ने कभी चाटुकारिता नहीं की? कई बार संपादक स्तर के लोग बेगुनाह कर्मचारियों को दंडित भी कर देते हैं। बेगुनाह इस दर्द को लिए घूमते रहते हैं। परंतु ये किसी से कुछ कह भी नहीं सकते, क्योंकि संपादक स्तर के व्यक्ति का संबंध भी उसी लेवल के लोगों से होता है। ऐसे में नौकरी छोडऩे के बाद भी नौकरी न मिलने के डर से लोग दर्द को पीकर जीते हैं और काम करते हैं। ऐसा नहीं है कि देश के सभी संपादक ऐसे ही होते हैं। परंतु नब्बे फीसदी की स्थिति इसी तरह की है। ये संपादक हैं, सो सही हैं। इनका हर फैसला सही है। संपादक बनने के बाद ये इस बात को भूल जाते हैं कि इन्होंने भी अपने कैरियर की शुरुआत जमीन से ही की है।

रविवार, 6 दिसंबर 2009

भाजपा के आंगन में जानकी पराई क्यों?

जिस हिन्दुत्व की रक्षा की लड़ाई का दावा भाजपा करती रही है, उसके आंगन में भगवान राम तो दिखते हैं परंतु माता जानकी पराई? अयोध्या में राम मंदिर बने इसके नाम पर अरबों रुपए रातोंरात चंदा देने के लिए देश के कई अमीर और गरीब से धनवान बने कुछ नेता तैयार हैं। भाजपा इसी हिन्दुत्व का ढिढ़ोरा पिटकर सत्ता का सुख भी हासिल कर चुकी है। परंतु वास्तव में हिन्दुत्व के प्रति वह कितनी ईमानदार है, यह देखना है तो एक बार सीतामढ़ी अवश्व जाएं। सीतामढ़ी माता जानकी की जन्मस्थली है। ऐसे में यहां भी हिन्दुत्व दिखना चाहिए। परंतु यहां एकबार आने के बाद कोई पर्यटक दुबारा आने के लिए नहीं सोचेगा। वजह जिला बनने के बाद भी विकास मामले में यह अत्यंत पिछड़ा हुआ है। यहां तक कि इस जिले को अब तक पर्यटन स्थल का दर्जा तक नहीं दिया जा सका है। जब राम के नाम पर मारामारी होती रही है और हो रही है तो फिर जानकी की जन्मस्थली के विकास के लिए भी कुछ तो होना ही चाहिए। इत्तफाक से बिहार में अभी जदयू-भाजपा की ही सरकार है। भाजपा के कई मंत्री और सांसद भी हैं। ऐसे में कम से कम उन्हें हिन्दुत्व का जलवा तो दिखाना ही चाहिए? इसी बहाने कम से कम सीतामढ़ी की जनता का कुछ तो भला हो जाता। परंतु किसी चुनाव में किसी नेता ने जानकी स्थल का भी विकास हो, इस बात को मजबूती से नहीं उठाया। यह अलग बात है कि जनता सबकुछ जानते हुए भी खामोश रहती है। उसकी चुप्पी कमजोरी नहीं, वह सोचती है कि राजनीति के पचड़े में वह क्यों पड़े? इस बार हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को झटका चुप्पी साधकर ही जनता ने देना उचित समझा। जनता के जवाब से भाजपा कम से कम चार साल तक तो और जरूर कराहेगी। देश चलाने वाले ही यदि पक्षपात करने लगेंगे तो कहां जाएगी जनता। ऐसे भी भारत में भांति-भांति के लोग रहते हैं। यहां मुसलमान, सिख, ईसाई सहित कई अन्य धर्मों को भी मानने वाले लोग रहते हैं। सभी की निगाहें सत्ता पर विराजमान बड़े नेताओं पर रहती है कि वह उनकी हित में कुछ करेगा। ऐसे में जात-पात धर्म के नाम पर लड़ानेवाले नेताओं से जनता को सावधान रहने की जरूरत है। २009 के चुनावी झटके से हांफ रही भाजपा ने तो अब नेतृत्व परिवर्तन का भी निर्णय ले लिया है। उसे लगने लगा है कि सिर्फ हिन्दुत्व और राम मंदिर के नाम पर जनता अब वोट देनेवाली नहीं है। यदि उसे सत्ता में बने रहना है तो कुछ और भी काम करना पड़ेगा। सीतामढ़ी की जनता की बार-बार मांग के बावजूद आज यह जिला पिछड़ा हुआ है। यहां के कई बुद्धिजीवियों ने व्यंग्यात्मक अंदाज में टिप्पणी भी कि भाजपा के आंगन में जानकी इतनी पड़ाई क्यों हैं? इस क्यों का जवाब तो भाजपा नेता ही दे सकते हैं।

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

आग लगे पर अपना घर न जले?

आग लगे पर अपना घर न जले, सड़क से अतिक्रमण हटे पर अपनों को बख्श दिया जाए, मंदी में छंटनी हो पर अपने बचे रहे, सड़क वनवे हो पर अपने घर के रास्ते में नहीं, बाल मजदूरी खत्म हो पर घर में मौजूद बाल मजदूर को न हटाए जाए, जनसंख्या नियंत्रण को सरकार कड़ाई से लागू करे पर चंद घरों में यह लागू न हो-जी हां हम बात कर रहे हैं कुछ नेताओं और अफसरों की मानसिकता की। आखिर क्या वजह है कि देश की आजादी के दशकों बाद भी बाल मजदूरों से काम लिया जा रहा है, लाखों बच्चे अब भी स्कूल से बाहर हैं। आप इसके पीछे जाएंगे तो पता चलेगा कि सबसे ज्यादा बाल मजदूर उन्हीं अफसरों व नेताओं के घरों में कार्य कर रहे हैं, जो चीख-चीखकर इसे लागू करने के लिए कहते हैं। ऐसा न करने पर ये अपने अधीनस्थों को कार्रवाई की धमकी भी देते हैं, यहां तक की समय-समय पर कुछ अधीनस्थों को निलंबित भी कर देते हैं। ऐसे में क्या यह संभव है कि आनेवाले सौ सालों में भी देश में बाल मजदूरों की संख्या शून्य हो जाए? मंदी ने जब विश्वव्यापी हमला किया तो भारत भी महीनों कांपता रहा। कई कंपनियों ने इसका बहाना बनाकर सैकड़ों लोगों को नौकरी से निकाल दिया। परंतु क्या किसी कंपनी ने एक भी अपने को नौकरी से निकाला। जवाब होगा कि नहीं...नहीं। बल्कि मंदी में भी ऐसे लोगों को तरक्की मिली। वहीं ऐसे काबिल युवा-अधेड़ यहां तक कि सेवानिवृत्ति के कगार पर पहुंचे लोग भी सड़कों पर आ गए। ऐसे समय में भारत सरकार ने अपने सारे कर्मचारियों के वेतन में अप्रत्याशित वृद्धि कर दी। वजह थी-लोकसभा चुनाव। सरकार को उस वक्त यह ध्यान नहीं आया कि घर से सड़क पर आने वाले लोगों के लिए भी कुछ करे। केन्द्र की तर्ज पर राज्यों ने भी वेतन वृद्धि कर दी। इस बात की सूचना मिलते ही मकान मालिकों ने किराये में अप्रत्याशित वृद्धि कर दी। इसका परिणाम उन लोगों को ज्यादा भुगतना पड़ा, जो नौकरी तो पहले ही गंवा चुके थे, इन्हें अब गांव के पुस्तैनी मकान में शरण लेनी पड़ी। क्या यही है इंसाफ है, क्या यही सोच से भारत की गिनती विकसित देशों में होगी? इसका भी जवाब होगा-नहीं...नहीं और नहीं। सैकड़ों योजनाओं पर हर साल करोड़ों खर्च करने के बाद भी आखिर क्या वजह है कि विकास की गति इतनी धीमी है? गांव की सड़कें आज भी टूटी-फूटी स्थिति में है। विकास के लिए दिल्ली से चली राशि का दस फीसदी भी संबंधित योजना पर खर्च नहीं हो पाती है। यदि वास्तव में सौ फीसदी राशि विकास पर खर्च हुई होती तो आज भारत विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आ चुका होता। हाल ही झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा द्वारा किए गए करोड़ों के घपले पर पूरा देश अचंभित है। आए दिन घूसखोर अफसर दबोचे जा रहे हैं। पांच साल पहले किसी दुकान में किरानी का काम करनेवाला व वर्तमान में एमपी के पास करोड़ों रुपए आखिर कहां से आ गए? यही नेता माइक पर गला फाड़-फाड़कर चीखता है कि अमूक सरकार घूसखोरी पर रोक नहीं लगा पा रही है जबकि सबसे बड़ा रिश्वतखोर यही है। जनसंख्या नियंत्रण के लिए नारे दिए गए कि सुखी परिवार मतलब-हम दो हमारे दो। क्या इसका पालन वो लोग कर रहे हैं जिन्होंने इस नारे को मजबूती से बुलंद किया। देश के दर्जनों मंत्री स्तर के ऐसे नेता हैं जो न तो ये खुद इसका पालन कर रहे हैं और न ही उनके बेटे या फिर बेटियां? यानी नियम बनाने वाले ही असली कानून के तोड़क हैं, यह कहना कहीं से गलत न होगा। इतना तय है कि इस कछुआ चाल और पिछड़ी मानसिकता से देश को विकसित राष्ट्र बनने में सैकड़ों साल अभी और लगेंगे।

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

कब तक अमेरिका से भीख मांगेगा भारत

दुनिया जानती है-मानती है कि पाकिस्तान ने ही आतंकियों को जन्म दिया। समय-समय पर पाकिस्तान इन आतंकियों को भारत विरोधी कार्यों के लिए इस्तेमाल करता रहा और कर रहा है। भारत ने कभी इसका मुंहतोड़ जवाब नहीं दिया। यदि दिया होता तो पाकिस्तान भारत की ओर कभी बुरी नजरों से देखने का दुस्साहस नहीं करता। भारत के कुछ स्वार्थी नेताओं और यहां के संविधान के लचीलापन का नतीजा ही है कि पाकिस्तान से मुकाबले के पहले वह अमेरिका के सामने दहाड़े मारकर बच्चों की तरह रोता है। अमेरिका किसी अभिभावक की भांति भारत को पुचकार देता है। वह यह भी आश्वासन देता है कि आतंकी हमलों से निपटने में मदद करेगा। यह कहने में भी नहीं चूकता है कि पाकिस्तान गलत कर रहा है। इस आश्वासन को लेकर जब भारत के नेता अमेरिका से लौटते हैं तो ऐसा लगता है कि वे जंग जीतकर आ रहे हैं। ठीक उसी समय पाकिस्तान का कोई बड़ा नेता जब अमेरिका के पास जाता है तो उसे भी वही आश्वासन मिलता है। यहां पर भारत को दोषी ठहराने से भी अमेरिका पीछे नहीं रहता है। अमेरिका की इस दोहरी नीति से भारत को सावधान हो जाना चाहिए। उसे अमेरिका के सामने रोना और भीख मांगना बंद कर देना चाहिए। भारत के कुछ नेता ऐसे हैं, जो कुर्सीं के लिए देश को बेच सकते हैं? चंद भर नक्सलियों से लडऩे में राज्य व केन्द्र सरकार की योजना बार-बार फेल हो जा रही है। बाबरी मस्जिद के दोषियों को सरकार आज तक सजा नहीं दिला पाई। इससे यहां के कानून व्यवस्था का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है? जब भी भारत के नेता अमेरिका के सामने नाक रगडऩे जाते हैं, यहां के युवाओं के खून में उबाल आ जाता है। यह अलग बात है कि ये उतने सक्षम नहीं हैं कि अपनी बात को मजबूत ढंग से रखें या फिर विरोध करें? यहां के लोगों में कूट-कूटकर प्रतिभा भरी-पड़ी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि विदेश जाने वाला अधिकतर भारतीय आज काफी मजबूत स्थिति में हैं। भारत एक मजबूत और विशाल देश है। आज पूरी दुनिया में अमेरिका की तानाशाही चल रही है। हर देश कुछ भी करने के पहले उसे सलाम करना नहीं भूलता है। परंतु दुनिया के दर्जनों देश खासकर एशियाई देश अमेरिका की तानाशाही को महसूस करने लगे हैं। भारत के पड़ोसी देश चीन अमेरिका की नीतियों को बहुत पहले ही समझ चुका है और वह उसकी परवाह भी नहीं करता। अमेरिका आज के समय में चीन को अपने ऊपर मंडराता खतरा के रूप में देख रहा है। अमेरिका भारत के इतिहास से परिचित है, इसलिए वह इसे खतरा के रूप में नहीं देखता है। भारतीयों नेताओं को चाहिए कि कम से कम देश हित में अमेरिका से दो टूक बात करने का साहस जुटाएं और खुद को कमजोर न दर्शाए। तभी अमेरिका अपनी दोहरी नीति को छाड़ेगा। इसके लिए देश के विपक्षी नेताओं को भी साथ देने की जरूरत है। खिचड़ी पार्टियों से बनी केन्द्र सरकार को हर वक्त यही भय सताता है कि कहीं कोई पार्टी उसकी टांग न खींच दे। पिछली बार परमाणु मामले में केन्द्र की सरकार गिरते-गिरते बची थी। इस भय से भी निर्णय लेना कठिन होता है। परंतु अपनी कुर्सी बचाने के लिए अमेरिका के समक्ष बच्चों की तरह रोना-धोना भी ठीक नहीं है। इससे पूरा देश कमजोर हो रहा है।