शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

कब तक अमेरिका से भीख मांगेगा भारत

दुनिया जानती है-मानती है कि पाकिस्तान ने ही आतंकियों को जन्म दिया। समय-समय पर पाकिस्तान इन आतंकियों को भारत विरोधी कार्यों के लिए इस्तेमाल करता रहा और कर रहा है। भारत ने कभी इसका मुंहतोड़ जवाब नहीं दिया। यदि दिया होता तो पाकिस्तान भारत की ओर कभी बुरी नजरों से देखने का दुस्साहस नहीं करता। भारत के कुछ स्वार्थी नेताओं और यहां के संविधान के लचीलापन का नतीजा ही है कि पाकिस्तान से मुकाबले के पहले वह अमेरिका के सामने दहाड़े मारकर बच्चों की तरह रोता है। अमेरिका किसी अभिभावक की भांति भारत को पुचकार देता है। वह यह भी आश्वासन देता है कि आतंकी हमलों से निपटने में मदद करेगा। यह कहने में भी नहीं चूकता है कि पाकिस्तान गलत कर रहा है। इस आश्वासन को लेकर जब भारत के नेता अमेरिका से लौटते हैं तो ऐसा लगता है कि वे जंग जीतकर आ रहे हैं। ठीक उसी समय पाकिस्तान का कोई बड़ा नेता जब अमेरिका के पास जाता है तो उसे भी वही आश्वासन मिलता है। यहां पर भारत को दोषी ठहराने से भी अमेरिका पीछे नहीं रहता है। अमेरिका की इस दोहरी नीति से भारत को सावधान हो जाना चाहिए। उसे अमेरिका के सामने रोना और भीख मांगना बंद कर देना चाहिए। भारत के कुछ नेता ऐसे हैं, जो कुर्सीं के लिए देश को बेच सकते हैं? चंद भर नक्सलियों से लडऩे में राज्य व केन्द्र सरकार की योजना बार-बार फेल हो जा रही है। बाबरी मस्जिद के दोषियों को सरकार आज तक सजा नहीं दिला पाई। इससे यहां के कानून व्यवस्था का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है? जब भी भारत के नेता अमेरिका के सामने नाक रगडऩे जाते हैं, यहां के युवाओं के खून में उबाल आ जाता है। यह अलग बात है कि ये उतने सक्षम नहीं हैं कि अपनी बात को मजबूत ढंग से रखें या फिर विरोध करें? यहां के लोगों में कूट-कूटकर प्रतिभा भरी-पड़ी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि विदेश जाने वाला अधिकतर भारतीय आज काफी मजबूत स्थिति में हैं। भारत एक मजबूत और विशाल देश है। आज पूरी दुनिया में अमेरिका की तानाशाही चल रही है। हर देश कुछ भी करने के पहले उसे सलाम करना नहीं भूलता है। परंतु दुनिया के दर्जनों देश खासकर एशियाई देश अमेरिका की तानाशाही को महसूस करने लगे हैं। भारत के पड़ोसी देश चीन अमेरिका की नीतियों को बहुत पहले ही समझ चुका है और वह उसकी परवाह भी नहीं करता। अमेरिका आज के समय में चीन को अपने ऊपर मंडराता खतरा के रूप में देख रहा है। अमेरिका भारत के इतिहास से परिचित है, इसलिए वह इसे खतरा के रूप में नहीं देखता है। भारतीयों नेताओं को चाहिए कि कम से कम देश हित में अमेरिका से दो टूक बात करने का साहस जुटाएं और खुद को कमजोर न दर्शाए। तभी अमेरिका अपनी दोहरी नीति को छाड़ेगा। इसके लिए देश के विपक्षी नेताओं को भी साथ देने की जरूरत है। खिचड़ी पार्टियों से बनी केन्द्र सरकार को हर वक्त यही भय सताता है कि कहीं कोई पार्टी उसकी टांग न खींच दे। पिछली बार परमाणु मामले में केन्द्र की सरकार गिरते-गिरते बची थी। इस भय से भी निर्णय लेना कठिन होता है। परंतु अपनी कुर्सी बचाने के लिए अमेरिका के समक्ष बच्चों की तरह रोना-धोना भी ठीक नहीं है। इससे पूरा देश कमजोर हो रहा है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें