शनिवार, 5 दिसंबर 2009

आग लगे पर अपना घर न जले?

आग लगे पर अपना घर न जले, सड़क से अतिक्रमण हटे पर अपनों को बख्श दिया जाए, मंदी में छंटनी हो पर अपने बचे रहे, सड़क वनवे हो पर अपने घर के रास्ते में नहीं, बाल मजदूरी खत्म हो पर घर में मौजूद बाल मजदूर को न हटाए जाए, जनसंख्या नियंत्रण को सरकार कड़ाई से लागू करे पर चंद घरों में यह लागू न हो-जी हां हम बात कर रहे हैं कुछ नेताओं और अफसरों की मानसिकता की। आखिर क्या वजह है कि देश की आजादी के दशकों बाद भी बाल मजदूरों से काम लिया जा रहा है, लाखों बच्चे अब भी स्कूल से बाहर हैं। आप इसके पीछे जाएंगे तो पता चलेगा कि सबसे ज्यादा बाल मजदूर उन्हीं अफसरों व नेताओं के घरों में कार्य कर रहे हैं, जो चीख-चीखकर इसे लागू करने के लिए कहते हैं। ऐसा न करने पर ये अपने अधीनस्थों को कार्रवाई की धमकी भी देते हैं, यहां तक की समय-समय पर कुछ अधीनस्थों को निलंबित भी कर देते हैं। ऐसे में क्या यह संभव है कि आनेवाले सौ सालों में भी देश में बाल मजदूरों की संख्या शून्य हो जाए? मंदी ने जब विश्वव्यापी हमला किया तो भारत भी महीनों कांपता रहा। कई कंपनियों ने इसका बहाना बनाकर सैकड़ों लोगों को नौकरी से निकाल दिया। परंतु क्या किसी कंपनी ने एक भी अपने को नौकरी से निकाला। जवाब होगा कि नहीं...नहीं। बल्कि मंदी में भी ऐसे लोगों को तरक्की मिली। वहीं ऐसे काबिल युवा-अधेड़ यहां तक कि सेवानिवृत्ति के कगार पर पहुंचे लोग भी सड़कों पर आ गए। ऐसे समय में भारत सरकार ने अपने सारे कर्मचारियों के वेतन में अप्रत्याशित वृद्धि कर दी। वजह थी-लोकसभा चुनाव। सरकार को उस वक्त यह ध्यान नहीं आया कि घर से सड़क पर आने वाले लोगों के लिए भी कुछ करे। केन्द्र की तर्ज पर राज्यों ने भी वेतन वृद्धि कर दी। इस बात की सूचना मिलते ही मकान मालिकों ने किराये में अप्रत्याशित वृद्धि कर दी। इसका परिणाम उन लोगों को ज्यादा भुगतना पड़ा, जो नौकरी तो पहले ही गंवा चुके थे, इन्हें अब गांव के पुस्तैनी मकान में शरण लेनी पड़ी। क्या यही है इंसाफ है, क्या यही सोच से भारत की गिनती विकसित देशों में होगी? इसका भी जवाब होगा-नहीं...नहीं और नहीं। सैकड़ों योजनाओं पर हर साल करोड़ों खर्च करने के बाद भी आखिर क्या वजह है कि विकास की गति इतनी धीमी है? गांव की सड़कें आज भी टूटी-फूटी स्थिति में है। विकास के लिए दिल्ली से चली राशि का दस फीसदी भी संबंधित योजना पर खर्च नहीं हो पाती है। यदि वास्तव में सौ फीसदी राशि विकास पर खर्च हुई होती तो आज भारत विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आ चुका होता। हाल ही झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा द्वारा किए गए करोड़ों के घपले पर पूरा देश अचंभित है। आए दिन घूसखोर अफसर दबोचे जा रहे हैं। पांच साल पहले किसी दुकान में किरानी का काम करनेवाला व वर्तमान में एमपी के पास करोड़ों रुपए आखिर कहां से आ गए? यही नेता माइक पर गला फाड़-फाड़कर चीखता है कि अमूक सरकार घूसखोरी पर रोक नहीं लगा पा रही है जबकि सबसे बड़ा रिश्वतखोर यही है। जनसंख्या नियंत्रण के लिए नारे दिए गए कि सुखी परिवार मतलब-हम दो हमारे दो। क्या इसका पालन वो लोग कर रहे हैं जिन्होंने इस नारे को मजबूती से बुलंद किया। देश के दर्जनों मंत्री स्तर के ऐसे नेता हैं जो न तो ये खुद इसका पालन कर रहे हैं और न ही उनके बेटे या फिर बेटियां? यानी नियम बनाने वाले ही असली कानून के तोड़क हैं, यह कहना कहीं से गलत न होगा। इतना तय है कि इस कछुआ चाल और पिछड़ी मानसिकता से देश को विकसित राष्ट्र बनने में सैकड़ों साल अभी और लगेंगे।

1 टिप्पणी:

  1. इस कछुआ चाल और पिछड़ी मानसिकता से देश को विकसित राष्ट्र बनने में सैकड़ों साल अभी और लगेंगे।
    उम्मीद पर दुनिया कायम है ...करते रहिये ....!!

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