सोमवार, 7 दिसंबर 2009

ये सही हैं, क्योंकि ये संपादक हैं?

बुद्धिजीवियों के सामने जैसे ही संपादक शब्द आता है, चंद ही सेकेण्ड में उनके चेहरे के भाव चढऩे-उतरने लगते हैं। सहसा शांत हो जाता है क्योंकि तब उनके सम्मुख एक ऐसे व्यक्ति का चेहरा उभरकर सामने आता है, जो विद्वानों का विद्वान होता है। सबका दर्द हरण करने वाला होता है। हर वर्ग के लोगों की समस्याओं को अपनी समस्या मानकर सही जगह पर उठानेवाला होता है। परंतु संपादक के चेहरे के पीछे का चेहरा किसी को नजर नहीं आता है। इस चेहरे को देखने के लिए जाना होगा किसी बड़े अखबार के दफ्तर में। यहां कई चेहरे बुझे नजर आएंगे, यानी काम के साथ सभी अपने-अपने गम में डूबे। नौकरी करनी है, सो काम तो करना ही है। इत्तफाक से यदि उसी वक्त संपादक जी पहुंच गए तो फिर क्या कहना, कुछ पल के लिए कर्फ्यू। वजह क्या है इसकी चर्चा भी जरूरी है। अखबार के दफ्तरों में तीन तरह के लोग अधिक होते हैं-पैरवीपुत्र, चाटुकार और काम करनेवाले। पैरवी पुत्र काम करें या न करें, उन्हें समय पर वेतन और तरक्की मिलनी तय है। गप्पबाजी में ये माहिर होते हैं। पर इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है, क्योंकि इनकी पहुंच संपादक के संपादक तक रहती है। दूसरे नंबर पर हैं चाटुकार-बोलने में तेज तर्रार और संपादक के सामने भी धौंस दिखाने वाले, सो इनकी चलती सबसे अधिक होती है। क्योंकि, ये संपादक के इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं। इनका जाल इतना मजबूत होता है कि हर संपादक इनके झांसे में आ जाते हैं। तीसरे नंबर पर वे हैं जो भटकते-भटकते और काफी संघर्ष से आए हैं। इन्हें ही सबसे ज्यादा काम करना पड़ता है। इनका वेतन भी कम बढ़ता है। तरक्की तो शायद कभी न मिले या फिर कभी संपादक की नजर इनपर चली जाए तो कुछ हो जाए। परंतु ऐसा कम ही देखने को मिलता है। ऐसे में ये हमेशा असंतोष की भावना लिए काम करते हैं। ये सबसे ज्यादा काम भी करते हैं परंतु फायदा मिलने के वक्त सबसे पहले पैरवीपुत्रों का नाम आता है। फिर चाटुकार या फिर एक-दो ऐसे, जो संपादक के खास होते हैं। यानी जिसके बारे में जमाना पाजिटिव सोचता है, उसका निगेटिव रूप? कुछ पचनेवाली बात तो नहीं है परंतु सत्य है। बिहार के एक बड़े अखबार के संपादक ने दो-तीन ऐसे लोगों को तरक्की इस वजह से नहीं दी, क्योंकि इनलोगों ने कभी चाटुकारिता नहीं की? कई बार संपादक स्तर के लोग बेगुनाह कर्मचारियों को दंडित भी कर देते हैं। बेगुनाह इस दर्द को लिए घूमते रहते हैं। परंतु ये किसी से कुछ कह भी नहीं सकते, क्योंकि संपादक स्तर के व्यक्ति का संबंध भी उसी लेवल के लोगों से होता है। ऐसे में नौकरी छोडऩे के बाद भी नौकरी न मिलने के डर से लोग दर्द को पीकर जीते हैं और काम करते हैं। ऐसा नहीं है कि देश के सभी संपादक ऐसे ही होते हैं। परंतु नब्बे फीसदी की स्थिति इसी तरह की है। ये संपादक हैं, सो सही हैं। इनका हर फैसला सही है। संपादक बनने के बाद ये इस बात को भूल जाते हैं कि इन्होंने भी अपने कैरियर की शुरुआत जमीन से ही की है।

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