मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

पांच मौत के जिम्मेवार कौन?

बिहार के मोतिहारी में सुगौली-रक्सौल रेलखंड में एक मानवरहित ढाला है, जिसे शीतलपुर ढाला के नाम से पुकारा जाता है। 22 दिसंबर को इसी गुमटी से एक मार्शल जीप गुजर रही थी, जो इंजन से जा टकराई। टक्कर इतनी भीषण थी कि मार्शल को घसीटते हुए इंजन आधा किलोमीटर दूर तक निकल गया। इस बीच मार्शल पर बैठे पांच लोगों की चीखें इंजन की आवाज पर भारी पड़ी, हालांकि ये चीखें चंद सेकेण्ड में ही शांत हो गईं, क्योंकि तबतक ये पांचों मर चुके थे। दो ऐसे मासूम थे, जिसे मौत का अर्थ तक मालूम नहीं था। एक थी-चार वर्षीय दिलजान खातुन तो दूसरा महज अठारह माह का नन्हा। इनके साथ ही मौत की नींद सो गए-इसकी मां फरीदा खातुन और नाना हबीबुल्लाह। यानी एक ही परिवार के चार। चालक को भी भागने का मौका नहीं मिला। समस्तीपुर के डीआरएम ने इस हादसे के लिए मार्शल के चालक को दोषी ठहराया है, जो अक्षरश: सही है। हालांकि वह बेचारा भी हमेशा के लिए सो चुका है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राहत कोष से पीडि़त परिवार के आश्रितों को पचास-पचास हजार देने की बात कही। इस घटना से आसपास के लोग आक्रोशित हो उठे और इंजन में ही आग लगा दी। उग्र लोगों ने रेलवे ट्रैक को जगह-जगह काट दिया। यानी पांच जान के साथ एक अरब रुपए का भी नुकसान। खैरियत यही थी कि इंजन से बोगिया नहीं जुड़ी हुई थीं। वर्ना आक्रोशित भीड़ शायद उसे भी फूंक देती। एक अरब का नुकसान किसका हुआ, सरकार का या फिर जनता का? यह यक्ष प्रश्न है जिसके बारे में हर व्यक्ति को सोचना होगा? भीड़ के किसी भी व्यक्ति में मरनेवालों के प्रति लगाव नहीं दिखा। पहले दो-चार लोगों ने हो-हल्ला किया, फिर क्या हुजूम ने ही तांडव शुरू कर दिया। इंजन को बुझाने का प्रयास भी लोगों ने विफल कर दिया। कसूर किसका, मार्शल चालक का या फिर इंजन चालक का या फिर रेलवे प्रशासन की व्यवस्था की? यह तो तय है कि सभी गांवों से गुजरनेवाले ढाले का मानवयुक्त नहीं बनाया जा सकता है, क्योंकि भारत के पास उतना संसाधन ही नहीं है? ऐसे में थोड़ी सी चौकसी से इस तरह की बड़ी घटना को टाली जा सकती है। यह घटना भी टाली जा सकती थी, यदि चालक ने ढाला को पार करते वक्त यह देखा होता कि इंजन आ रहा है तो पांच जिंदगियां बच जातीं। इस तरह के हादसे अलग-अलग राज्यों में प्राय: सुनने को मिलते हैं। चालक की छोटी गलती से कई जानें चली जाती हैं। इसके पीछे कम कसूरवार प्रशासन नहीं है? ऐसे लोगों को भी ड्राइविंग लाइसेंस आराम से मिल जाते हैं, जो हर वक्त नशे में धुत रहते हैं या फिर जिनकी समझ बहुत छोटी होती है। बिहार में तो पन्द्रह साल के किशोर भी ऑटो चालक बन गए हैं। आश्चर्य तब और लगता है जब इस ऑटो पर हर वर्ग के लोग बैठ जाते हैं। हां, दुर्घटना होने पर अवश्य पछताते हैं कि उनसे गलती हो गई। थोड़ी-सी चौकसी वाहन पर बैठनेवालों को भी बरतनी चाहिए। यदि चालक गाड़ी तेज चला रहा है तो उसे समझाया जा सकता है।

1 टिप्पणी:

  1. aise ghatnaye pray hoti rahati hai aur sarkar aur prshasan aankhe moond kar band baitha hai hamare desh aur prdesh ki sarkaar ko is baare me sochane ki fursat nahi hai chahe jitani jaan jaye kitani sochniya sthiti hai ..

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