सोमवार, 28 दिसंबर 2009

बच्चों के यौवन पर दाग लगने से रोकिए!


समय के साथ तेजी से बदल रहा लोगों का मन-मिजाज। परंतु पृथ्वी व चांद, सूरज वहीं है, ठीक इसी तरह स्त्री-पुरुष में आज भी भेदभाव कायम है। स्त्री चाहे जिस मुकाम पर पहुंच जाए, उसे पुरुष के सामने झुकना ही पड़ता है। अभी के दौर में आधुनिकता के नाम पर लड़कियां जींस-शर्ट अधिक पसंद कर रही हैं। इसी तरह हाईस्कूल तक पहुंचते ही अधिकतर लड़कियों का झुकाव युवा लड़कों की ओर हो जा रहा है। कॉलेज में पढऩे वाली लड़की का यदि ब्यॉय फ्रेंड नहीं है तो इसे अपमान समझा जा रहा है। वहीं, लड़के तो लड़कियों से दोस्ती करने के लिए बेचैन दिखते हैं। किशोर से युवा की तरफ बढऩे के साथ ही विपरीत सेक्स की ओर रुझान आम बात है। परंतु दिक्कत वहां से शुरू होती है, जब कोई अठारह वर्ष का युवक व युवती एक-दूसरे के करीब आने की कोशिश करते हैं। करीब ये दोस्ती में नहीं बल्कि पति-पत्नी की तरह संबंध बनाने के लिए आते हैं। इस वक्त इन्हें मां-बाप, भाई-बहन या फिर समाज का कोई ख्याल नहीं आता। इनका कैरियर बर्बाद हो जाएगा, ये कहीं के नहीं रहेंगे, इस बात का होश भी कच्ची उम्र के चलते इन्हें नहीं रहता। संबंध बनाने के दो-तीन महीने के बाद बिजली तब गिरती है, जब लड़की को पता चलता है कि वह मां बननेवाली है। मारे शर्म के या तो वह खुदकुशी की कोशिश करती है या फिर गर्भ गिराने की बदनामी झेलती है। इसके साथ ही कलंकित होता है उसका पूरा परिवार। वहीं, लड़की का साथी या तो गायब हो जाता है, या फिर लड़की के परिवार द्वारा किए गए यौन उत्पीडऩ के केस में फंस हवालात की सजा काटता है। ऐसे कम ही खुशनसीब लड़की होती है, जिसे गर्भ ठहरने के बाद ही लड़का कबूल कर लेता है। परंतु यह उम्र शादी की नहीं होती, सो परिवार वाले इसके लिए राजी नहीं होते और अन्तत: लड़की के पास गर्भ गिराने के अलावा कोई रास्ता नहीं रहता। इसमें कसूर किसका है लड़की या लड़का या फिर अभिभावक, जिन्होंने बच्चों को इतनी आजादी दे रखी थी? बच्चियां बड़ी होने के साथ मां-बाप की जिम्मेवारी बढ़ जाती है। सौ में साठ फीसदी अभिभावक यह नहीं देखते कि बच्ची यदि कॉलेज गई है तो उसने कितने क्लास किए। उसके मित्रों की सूची में कौन-कौन लड़के हैं। कॉलेज कैसे जाती है, आने में विलंब क्यों हुआ, जिस विषय का वह कोचिंग करना चाहती है, क्या वास्तव में उसे जरूरत है या फिर टाइम पास? ऐसी छोटी-छोटी चीजों पर नजर रखकर बच्चों को दिग्भ्रमित होने से बचाया जा सकता है। बेटों के पिता की जिम्मेवारी भी बेटी के पिता से कम नहीं है? यदि उनका बेटा किस लड़की के साथ गलत हरकत करता है। ऐसे में बदनामी उनकी भी होती है, समाज में उनका सिर भी झुकता है। ऐसे में थोड़ी से चौकसी इस भीषण समस्या से बचा सकती है। अत: चेतिए और बच्चों को दोस्त बनाइए ताकि ये आपको अपने दिल की बात बेहिचक बता सकें। इससे आप गंभीर संकट में फंसने से बच जाएंगे। बिहार के छोटे-छोटे गांव से भी नाबालिग लड़के-लड़कियां शादी की नीयत से भागने लगे हैं। वहीं, अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि गर्भ गिरानेवालों की संख्या भी बढ़ी है। क्रमश...

7 टिप्‍पणियां:

  1. विचारणीय आलेख!!

    यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

    हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

    नववर्ष में संकल्प लें कि आप नए लोगों को जोड़ेंगे एवं पुरानों को प्रोत्साहित करेंगे - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

    आपका साधुवाद!!

    नववर्ष की अनेक शुभकामनाएँ!

    समीर लाल
    उड़न तश्तरी

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  2. इस वि‍षय पर बच्‍चों से ज्‍यादा मॉं बाप की मनोवैज्ञानि‍क काउंसलिन्‍ग की ज्‍यादा जरूरत है, नहीं ??

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  3. स्त्री चाहे जिस मुकाम पर पहुंच जाए, उसे पुरुष के सामने झुकना ही पड़ता है।
    achcha kiyaa aap ne bataa diyaa varna pataa nahin lagtaa

    kabhie kisi ne apane beto ko samjhanae kae liyae aalekh nahin likha ki aaj kal dna test bhi honae lagaa haen

    ek aalekh "balko" aur unake "mata pita" ko samjhanae kae liyae bhi likhee hee dae kyuki samsyaa dono ki haen

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  4. रविकांत जी आपसे शायद मुलाकात नहीं है। दो साल मुजफ्फरपुर में मैंने भी गुजरा है। शुक्ल सर के माध्यम से आपके ब्लॉग तक पहुंचा। आलेखों पर टिपण्णी बाद में.....

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  5. रविकांत जी,

    आपका आलेख पढ़कर हैरान हूँ, आप किस युग में जी रहे हैं? नारी को पुरुष के सामने झुकना ही पड़ता है किस जुर्म में? सिर्फ इस लिए कि वह पुरुष नहीं है. किसी भी मानव को झुकना तब पड़ता है जब वह किसी बात का दोषी हो अन्यथा २१ वीं सदी में दोनों एक दूसरे के पूरक बन कर जी रहे हैं. जहाँ तक लड़कियों कि पढ़ाई और स्वतंत्रता का सवाल है - हर दिशा में लड़कियों कि संख्या बढ़ रही है और वे अपने शिक्षा क्षेत्र में और कार्य क्षेत्र में काफी हद तक सफलता पूर्वक काम कर रही हैं. लड़कों से दोस्ती और उसके बाद भटकने कि नौबत तब आती है जब वे लक्ष्यहीन होती हैं . मैं एक या दो लड़कियों कि बात नहीं कर रही हूँ. बल्कि हजारों कि संख्या में कोचिंग में पढ़ रही लड़कियों के बारे में बात करती हूँ. ये सारे काम कहीं हजारों में एक लड़की या लडके के केस में होता है.
    उच्च वर्ग कि बात में नहीं कर रही हूँ , जहाँ न माँ और न बाप को बच्चों के लिए समय होता है वहाँ बच्चे भटक जाएँ तो और बात है. पर एक मध्यम वर्गीय परिवार में बच्चों को इच्छानुसार शिक्षा के लिए माप - बाप दोनों को ही अथक प्रयास और श्रम करना होता है. बच्चे इस बात को जानते हैं बल्कि मैं कहूँगी कि आज कि लड़कियाँ ३० साल पहले वाली लड़कियों से अधिक समझदार और परिपक्व हो रही हैं. रही बात गर्भपात कि बढ़ती हुई संख्या कि तो उसके कारणों का सूक्ष्म विश्लेषण अत्यंत आवश्यक है.
    फिर देश में बढ़ रही बलात्कार के मामलों के बारे में आपका क्या विचार है? नाबालिग बच्चियों यहाँ तक कि ३-८ साल कि बच्चियों को भी शिकार बना लिया जाता है. उसके लिए किस पर अंकुश लगाया जाय. इस विषय में विचार करके आलेख कि महती आवश्यकता है.

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