रविवार, 12 दिसंबर 2010

हे नारद मुनी...! यह है आधुनिक पॉलिटिक्स

समय सुबह की हो या शाम की। घर की बात हो या फिर चौराहे की। टेलीविजन देखने पर या फिर रेडियो सुनने पर-एक शब्द जरूर सुनने को मिल जाता है, वह है पॉलिटिक्स। अनगिनत लोगों को तो इसका सही से अर्थ भी नहीं पता। फिर भी इस शब्द को कहने से वे नहीं चुकते। क्योंकि, इनकी नजर में थोड़े लाभ के लिए दो लोगों को लड़ा देना-पॉलिटिक्स है। पीठ पीछे गाली-मुंह पर चमचई की सीमा पार-यह है आधुनिक पॉलिटिक्स। जात के नाम पर, धर्म के नाम पर लड़ाने वाले वास्तव में आधुनिक पॉलिटिक्स को पूरी तरह से समझ चुके हैं। इसलिए-जागिए, हे नारद मुनी जी और देखिए 21 सदी के पॉलिटिक्स को। किताबों के पन्नों में नहीं बल्कि राजनेताओं के मन में, घर-घर में और व्यक्ति-व्यक्ति में। आपकी हर राजनीति (इतिहास के पन्ने में सिमटे) इसमें डुबती नजर आएगी। वर्तमान की राजनीति में सिर्फ स्वयं का बोध होता है। स्वयं को कैसे बड़ा बनाएं। स्वयं का विकास कैसे करें। ऊपरी तबके से निचले तबके तक में इसका समावेश है। घर में भाई-भाई के बीच तालमेल नहीं है। जन्म देने वाली मां तक को बुढ़ापे में छोड़ दिया जाता है। किसके भरोसे, यह बड़ा सवाल है? गरीब पिता को पिता कहने में पढ़े-लिखे नौजवानों को शर्म आती है। ऐसे शख्स की सच्चाई जब सामने आती है तो उसे कोई अफसोस नहीं होता, कोई झिझक नहीं होती। लेकिन बोल जरूर फूट पड़ते हैं...पॉलिटिक्स करनी पड़ती है। पहले पॉलिटिक्सि की बातें बहुत ऊंची मानी जाती थीं, अब तो चाय दुकानदार भी बासी चाय को ताजा कहकर बेच डालता है। यदि किसी ने शिकायत कर दी तो बिफरते हुए बताता है-बेचने के लिए पॉलिटिक्सि करनी पड़ती है। ऐसे में कई ग्राहक कहीं और का रुख कर जाते हैं। बावजूद, थोड़े से फायदे के लिए वह गलत काम करने से बाज नहीं आता। हर शहर में भ्रष्ट्राचार का प्रवेश हो चुका है। भ्रष्ट्राचार को रोकने के लिए जांच एजेंसियां भी बनीं-सीबीआई, ईडी, सीवीसी, जेपीसी। परंतु हर जगह आधुनिक पॉलिटिक्स ही पॉलिटिक्स। ऐसे में कहां से होगा इंसाफ? और करेगा कौन? झारखंड राज्य बनने के पहले बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने कहा था कि उनके शव पर राज्य का बंटवारा होगा। जीते जी वे झारखंड राज्य नहीं बनने देंगे। कुछ ही समय पश्चात झारखंड राज्य बना। कहां गया लालू का बयान। यह है आधुनिक पॉलिटिक्स। इससे बिहार कितना पीछे चला गया। कभी-कभी तो एक झूठ से समूह प्रभावित हो जाता है। कई की जानें चली जाती हैं। फिर किसी राजनेता का बयान आता है कि छोटी-मोटी घटनाएं तो होती ही रहती हैं। यह है वर्तमान पॉलिटिक्स। झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन के चलते वहां की राजनीति हमेशा से अस्थिर रही है, क्योंकि वे आधुनिक पॉलिटिक्स अच्छी तरह से जानते हैं। इसलिए-हे नारद, जागिए और भटके लोगों को वो पॉलिटिक्स सिखाइए, जिससे लोगों की सोच सकारात्मक हो। वर्ना वो दिन दूर नहीं जब हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा होगा। क्योंकि, इस पॉलिटिक्स में पेड़ कट चुके होंगे, नदियां सुख चुकी होंगी, खेत फट चुके होंगे, सूरज देवता और विशाल हो चुके होंगे और हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा...।

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

अहंकार ने हराया, स्वार्थ ने डुबोया

इतिहास गवाह है कि अहंकार रावण का भी नहीं रहा। सच भी है-लोग मानते भी हैं-स्वीकारते भी हैं। बावजूद भूल पर भूल करते हैं। कम ही लोग होते हैं, जो लक्ष्मी-सरस्वती के दर्शन के बाद भी सामान्य रह पाते हैं। वर्ना, अहंकार में चूर लोग खुद को औरों से अलग समझने लगते हैं। यहीं से शुरू होता है पतन का रास्ता। क्यों हम पतन का रास्ता चुनें? क्यों यह मानें कि मृत्यु व दुख से हम परे हैं? इसी तरह की भूल ने राजद सुप्रीमो को आज कहां से कहां पहुंचा दिया। यह बात किसी से छिपी नहीं है। मीडिया के सामने गरजने वाले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, आज मुंह छुपा रहे हैं। इसका जिम्मेदार कोई और नहीं खुद लालू ही हैं। अहंकार ने इन्हें गए लोकसभा में हराकर 4 सीटों पर लाकर खड़ा कर दिया। यूं कहें कि हरा दिया तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, वहीं इनके स्वार्थ ने बिहार विधानसभा चुनाव 2010 में 22 सीटों पर लाकर खड़ा कर दिया। यानी पूरी तरह डुबो दिया। 1993 में लालू भगवान की जय के नारे लगते थे और वे मुग्धभाव में सुनते रहते थे। यही नहीं, उन्होंने खुद को राजा तक कहना शुरू कर दिया था। खुद को वे भगवान कृष्ण का वंशज मानने लगे थे। अच्छे दिनों में इनके मुंह से आग निकलती थी। आज लालू प्रसाद की धर्मपत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी दो-दो जगहों से चुनाव हार गईं, यह कोई मामूली बात नहीं है। 2004 के विस चुनाव परिणाम आने के बाद लालू चाहते तो लोजपा सुप्रीमो की मदद से सरकार बना सकते थे। लेकिन ये इस बात पर अड़े रहे थे कि राबड़ी देवी ही मुख्यमंत्री बनेंगी। तब रामविलास पासवान की जिद थी कि कोई मुसलमान मुख्यमंत्री हो। इस जिद ने बिहार को फिर चुनाव की भट्ठी में झोंक दिया। पुन: 2005 में नीतीश सरकार सत्ता में आई और शुरू हो गया लालू का पतन। हालांकि, पतन की ओर लालू ने उसी दिन चलना शुरू कर दिया था, जब चारा घोटाले में जेल जाने से पूर्व राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया। इन्हें राजद के किसी नेता पर भरोसा नहीं था। या यूं कहें कि किसी हालत में सत्ता को खोने का रिस्क नहीं उठाना चाहते थे। इनका साथ दे रहे और भाई बनने का स्वांग रच रहे लोजपा सुप्रीमो रामविलास भी आज हाशिये पर चले गए हैं। इन्हें इस चुनाव में महज तीन सीटें मिली हैं। बीस साल पहले लालू यादव को प्रचंड जन समर्थन मिला था, लेकिन वह सत्ता के मद में चूर थे। इनकी राजनीति जाति-धर्म पर केन्द्रित होकर रह गई थी। पूरे परिवार को विधायक-सांसद बना दिया था। बिहार की सड़कों पर अंधेरे में लोगों का निकलना दूभर हो गया। अपहरण ने उद्योग का रूप ले लिया था। राजद का कौन नेता कब किसे चोट पहुंचाएगा-कहना मुश्किल था। नतीजन, 1990 के दशक में अपराजेय माने जाने वाले लालू प्रसाद आज अस्वीकार्य हो गए। जदयू-भाजपा को 2010 के विस चुनाव में 206 सीट मिलना लालू को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं। वे इस बात को पचा नहीं पा रहे हैं। 24 नवंबर 2010 की मतगणना के बाद अब तक लालू प्रसाद खुलकर कुछ भी नहीं बोले हैं। जदयू-भाजपा की बयार ने विपक्ष को ही साफ कर दिया। संविधान कहता है विपक्ष का नेता के लिए दस फीसदी सीट होना आवश्यक है। मगर राजद के पास सिर्फ 22 सीटें ही हैं। हां, राजद-लोजपा गठबंधन मिलाकर 25 सीटें पूरी हो जा रही हैं। लालू प्रसाद अब भी यदि अहंकार में चूर रहे तो आने वाले समय में इनका राजनीति अस्तित्व ही मिट जाएगा। नीतीश सरकार ने भी यह भांप लिया है कि जनता अब जाग चुकी है। उसे आश्वासन नहीं रिजल्ट चाहिए-वो भी फौरन। इसलिए वक्त यदि आपको ऊंची कुर्सी पर बिठाती है तो उसकी इज्जत कीजिए। अहंकार तो कतई नहीं, वर्ना कुर्सी कहां पटकेगी कहना मुश्किल है। वक्त ने यदि पावर दिया है तो उसका सही इस्तेमाल कीजिए।

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

बॉस को चेहरा नहीं, काम दिखाइए

तुरंत लाभ लेने की होड़ में आजकल कमोवेश सभी दफ्तरों में एक 'ट्रेंड'चल पड़ा है कि नए बॉस को खुश कैसे किया जाए। कैसे उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाई जाए। देखा जाता है कि वर्षों से काम कर रहे कामचोर, देहचोर को भी उस समय पंख लग जाते हैं, जब पुराने बॉस का तबादला और नए का आगमन होता है। पुराने बॉस ने काफी सोच-समझकर ही कुछ लोगों को देहचोर और कामचोर का खिताब दिया था। नए बॉस को सबकुछ समझने में थोड़ा समय तो लग ही जाता है। ऐसे में कामचोर और देहचोर काम से ज्यादा समय उन चीजों को ढूंढने में बिता देते हैं, जिससे नए बॉस प्रसन्न हों। वहीं, चुगलखोर पुराने बॉस की चुगली में जुट जाते हैं। कभी सड़क की धूल फांक रहे लोगों को नौकरी देने वाले पुराने बॉस को भी ये गाली देने से नहीं चूकते। इन्हें लगता है कि ऐसा करने से नए बॉस खुश हो जाएंगे और तरक्की दे देंगे। परंतु, यह इनकी कितनी बड़ी भूल है-यह तो समय ही बताता है। ऐसे लोगों के हथकंडे भी अलग-अलग होते हैं। कोई नए बॉस को भगवान का दर्जा दे डालता है तो कोई विद्वान का। कोई कहता है पुराने बुरे थे-आप अच्छे हैं। कोई कहता है कि पुराने ने जिंदगी बर्बाद कर दी-आपसे आबाद होने की उम्मीद है। कोई बॉस को देखते ही काम तेजी से करने लगता है तो कोई उन्हें देखकर निर्देश देने लगता है। कोई झुककर पांव छुता है तो कोई हाथ जोड़कर उनका चेहरा निहारने में लग जाता है। यह है निजी कार्यालयों की सच्चाई। इस रोग से मीडिया के दफ्तर सबसे ज्यादा बीमार हैं-कहना गलत नहीं होगा। निजी दफ्तरों में सच को सच साबित करना काफी मुश्किल है। क्योंकि, सच पर यदि अडिग हुए तो नौकरी तक चली जाएगी? सवाल यह भी कि यदि सच बॉस को बताया जाए तो क्या वे मानेंगे? जवाब यही होगा कतई नहीं? वजह साफ है-काम करने वाला व्यक्ति यह नहीं कहेगा कि सही में वह कार्यों के प्रति सजग है? कहे भी तो क्यों? उसे यह अभिमान रहता है कि वह मेहनती और अपने कार्य के प्रति ईमानदार है। फिर वह सबूत क्यों दे, परंतु यह कलयुग है। यहां हर चीज का सबूत चाहिए। बॉस को भी सबूत चाहिए। हालांकि कुछ बॉस ऐसे भी होते हैं, जो ज्यादा आगे-पीछे करने वालों को तुरंत भांप लेते हैं और उन्हें दरकिनार कर देते हैं। परंतु इसमें थोड़ा वक्त लग जाता है। तबतक कई कामचोर, देहचोर और चुगलखोर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। हालांकि इनकी कलई भी जल्द ही खुल जाती है और वे कहीं के नहीं रहते हैं। इसलिए संस्थान के प्रति ईमानदार रहें न कि किसी व्यक्ति विशेष के प्रति। काम करने वाला हर बॉस अपने साथियों से यही उम्मीद करता है।

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

गॉड! अबकी मंदिर जरूर बनवाएंगे

विधानसभा की सुगबुगाहट के साथ ही बिहार के नेताओं को याद आने लगे-मंदिर व मस्जिद। गांव की पगडंडियां भी, जर्जर सड़कें, बिजली, चापाकल व स्कूल भी। याद क्यों न आए, चुनाव सामने जो है। सत्ता में आने को व्याकुल विपक्ष के यहां सरगर्मी कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। सत्ता पक्ष ने पांच साल में क्या-क्या गलती की है, सबकुछ ताबड़तोड़ कम्प्यूटर में फीड किया जा रहा है। कई ऐसे नेता, जो प्रदेश से ज्यादा दिल्ली-बाम्बे में रहना पसंद करते हैं। इनकी गाडिय़ां भी गांवों के जर्जर मंदिर के सामने रुकने लगी हैं। दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम और क्षमायाचना का दौर भी शुरू हो चुका है। भगवान इस बार पास करा (जीता) दें, अबकी अधूरा मंदिर जरूर बनवा देंगे। यह अलग बात है कि वायदे के पक्के, इन्होंने पिछले चुनाव भी यही कहा था। एक नेताजी तो तीन चुनाव में यही वादा कर चुके थे। इस बार जैसे ही वादा किया, एक ग्रामीण तपाक से पूछ बैठा-हुजूर फिर मंदिर नहीं बना। नेताजी बोले क्या करें, विपक्ष टांगे अड़ा देता है? बाद में नेता जी के साथ खड़े व्यक्ति ने कहा, इस बार तो विपक्ष में आप ही हैं? दो दशक से लगातार चुनाव जीत रहे, नेताजी यह भी भूल गए कि उनकी सत्ता जा चुकी है। खैर, बिहार में करीब दो दर्जन विपक्ष के नेता लगातार दौरे पर हैं। इस प्रदेश में फिलहाल जदयू-भाजपा की सरकार है। यहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं और विपक्ष में है राजद, जिसकी कमान वास्तव में लालू प्रसाद के पास है। लोकसभा में महज चार सीटें पाकर अत्यंत कमजोर हो चुके लालू प्रसाद की नजर अब विधानसभा चुनाव है। ये हर हाल में चुनाव जीत अपनी सरकार बनाना चाहते हैं। इसके लिए अपनी पार्टी के सभी विधायकों व कार्यकर्ताओं को तैयार रहने के लिए कहा है। कार्यकर्ताओं के जोश और नीतीश सरकार की खामियों को भंजाकर ये चुनावी नैया पार करने चाहते हैं। दौरे के बहाने कई नेता लोगों की मंशा को टटोलने का काम भी कर रहे हैं। हिन्दू नेता मस्जिद के पास पहुंचकर नमाज अदा करने की भूमिका निभा रहे हैं। मस्जिद की डेंटिंग-पेंटिंग की बातें भी कर रहे हैं, तो कई अबकी जरूर मंदिर बनवाने के अपने वायदे को दुहरा रहे हैं। वहीं नीतीश सरकार के मंत्री-विधायक निश्चिंत मुद्रा में हैं। हालांकि दूरदर्शी नीतीश कुमार अंदर से कम चिन्तित नहीं हैं, फिर भी इन्हें भरोसा है कि जनता इन्हीं के साथ खड़ी है। इधर, जनता नेताओं की पालिसी को समझ रही है। बिहार के एक समाजसेजी का कहना है कि ये नेता हर चुनाव में झूठे वादे करते हैं। इस बार जनता समझदार हो चुकी है, वह ऐसे नेताओं को वोट देने से अवश्य परहेज करेगी।

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

Asha Khemka meets Prime Minister Gordon Brown

The Non-Resident Indian principal of a top UK college has met Prime Minister Gordon Brown at a Downing Street reception to celebrate the highest performing and most quickly improving colleges in England. Asha Khemka OBE, principal and chief executive of West Nottinghamshire College, was one of only ten college principals personally invited to meet the Prime Minister, Business Secretary Lord Mandelson and Further Education Minister Kevin Brennan, out of the 62 colleges represented at the reception. The Mansfield-based college was awarded ‘grade 1: outstanding’ across all inspection categories by Ofsted (Office for Standards in Education) – the government department that inspects and regulates education providers – in July 2008, ranking it one of the best performing colleges in the country. Mrs Khemka, who lives in Burton-on-Trent, Staffordshire, said: “I was honoured to meet the Prime Minister and delighted that he fully recognises the important role that colleges play, both in society and in the country’s economic recovery.” She added: “He was particularly interested to hear about West Nottinghamshire College’s work to get people back into employment and the lead we’re taking to increase the number of apprenticeships.” Mrs Khemka, who was born and raised in Sitamarhi, is the only female college principal in the UK to originate from India. She was married at the age of 15 to19-year-old-medical student Shankar Khemka, of Motihari, and the couple were blessed with three children while living in Patna.In 1978 Mrs Khemka arrived in the UK with her children and her husband, who now works as a senior consultant orthopaedic surgeon at Queen’s Hospital, Burton-on-Trent. She was a full-time housewife for the first 20 years of her married life and returned to her own education as a mature student after raising her children. After completing her studies Mrs Khemka began her career as a part-time college lecturer. Today, she is one of the leading college principals in the UK.Since taking the helm at West Nottinghamshire College in 2006 she has transformed it in size and reputation. It is one of the largest colleges in the UK, with 25,000 students, 1,200 staff and an annual budget of £50 million.

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

आस्था से हारी मृत्यु, जीता आतंक

ऐसे दौर में जब बिना स्वार्थ कोई व्यक्ति अपने धर्म के बारे में सोचता तक नहीं। ऐसे दौर में जब स्वार्थ के लिए व्यक्ति धर्म परिवर्तन करने तक में नहीं हिचकता। ऐसे ही दौर में पाकिस्तान के पेशावर में जसपाल सिंह और महाल सिंह ने अपना सिर कलम करवा लिया, मगर धर्म परिवर्तन नहीं किया। माना कि आस्था से हार गई मृत्यु और जीत गया आतंक। यूं तो दोनों की मौत दुनिया के लिए कोई मायने नहीं रखती, क्योंकि आदमी की सोच ही मरती जा रही है। परंतु इनकी कुर्बानी ने निश्चित रूप से गुरु गोविन्द सिंह की याद को तरोताजा कर दिया है। इतिहास गवाह है कि गुरु गोविन्द सिंह ने आस्था एवं कर्तव्य निर्वाहन के लिए शहादत दे दी थी। यहां बताएं कि पाकिस्तान के पश्चिमी सीमांत इलाकों में तालिबानी आतंकियों का ही राज कायम है। तालिबानी आतंकियों ने कई सिखों का अपहरण पिछले दिनों कर लिया था। आतंकी चाहते थे कि ये सिख धर्म परिवर्तन कर उनके बुरे कार्यों में मदद करें। यह अलग बात है कि जांबाज जसपाल व महाल इनके सामने नहीं झुके। तब तालिबानी आतंकियों ने 21 फरवरी को दोनों के सिर काट डाले और पेशावर के एक गुरुद्वारे के पास फेंक दिया। मामला हर तरह से धर्म परिवर्तन का ही था। पर दुनिया के सामने यह बात सामने आई कि फिरौती के लिए सिखों का आतंकियों ने अपहरण किया था और नियत समय पर राशि न देने की वजह से इन्हें मौत के घाट उतार दिया। इस बात को गौण कर दिया गया कि तालिबानी आतंकी धर्म परिवर्तन कराना चाहते थे। मीडिया ने भी आपने दायरे को समेटे इसमें अंदर झांकने की कोशिश नहीं की? वजह साफ थी कि मामला तूल पकड़ता तो लोग सड़कों पर उतर हिंसा का रास्ता अख्तियार करते। लेकिन सच को उसकी पूर्णता में नहीं लिखना न तो उपयोगी होता है और न ही फलित। इस बात को किसे समझाया जाए और कौन रखेगा इसे याद? दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के कई इलाकों पर तालिबानी आतंकियों का कब्जा है। पाकिस्तान इन इलाकों में चाहकर भी किसी को सुरक्षा नहीं दे सकता। या यूं कहें कि पाकिस्तानियों को ही इन इलाकों में सुरक्षा की जरूरत है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। ऐसे में भारत सरकार का यह बयान कि दो सिखों की हत्या मामले में वह पाकिस्तान से बात करेगा, प्रासंगिक नहीं बल्कि हास्यास्पद है। भारत व अमेरिका ने मिलकर इसी तालिबान से वार्ता करने की योजना बनाई थी। यह बात भी सामने आई थी कि दोनों देश अच्छे-बुरे तालिबानियों की खोज करेंगे। एक सच यह भी है कि अमेरिका की नजर में अच्छे तालिबानी वो हैं, जो यह आश्वासन दें कि वे अमेरिका पर हमला नहीं बोलेंगे। अब भारत सरकार बताए कि वह अच्छे तालिबानियों को कैसे परिभाषित करेगी। क्योंकि, इतिहास का सच यह भी है कि 'पर्ल हार्बर' पर आक्रमण नहीं हुआ तो अमेरिका द्वितीय विश्वयुद्ध में सक्रिय नहीं हुआ। वर्तमान का सच यह है कि जबतक न्यूयार्क में 'वर्ल्ड ट्रेड' सेंटर पर हमला नहीं हुआ, तबतक अमेरिका ने नहीं जाना कि आतंकवाद की पीड़ा क्या होती है? इतिहास गवाह रहा है कि भारत आक्रमण के पक्ष में कभी नहीं रहा है। परंतु अब समय आ गया है कि आतंक मुद्दे पर भारत कठोर निर्णय ले। पाकिस्तान में सदियों से सिख रह रहे हैं। इनकी सुरक्षा कैसे हो, इसपर पर भी भारत सरकार को विचार करना चाहिए। यहां बता दें कि इन सिखों की मौत से बिहार के सीतामढ़ी निवासी रामशरण अग्रवाल इतने मर्माहत हुए कि इन्होंने 22 फरवरी को दिनभर का उपवास रखा।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

तालिबान की नजर परमाणु बम पर!

जैसी करनी वैसी भरनी वाली कहावत पाकिस्तान पर एकदम सटीक बैठती है। अमेरिका की मदद के बावजूद तालिबान के हमले को पाकिस्तान रोक नहीं पा रहा है। तालिबान की ताकत के सामने वह बेबस दिख रहा है? कोई दिन ऐसा नहीं है कि तालिबान बेगुनाहों की जान न लेता हो। कभी मस्जिद में तो कभी किसी सार्वजनिक स्थल पर बमबारी-गोलीबारी करना उसके 'डेली रूटीन' में शामिल है। आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले एक साल में वह हजारों-हजार बेगुनाहों की जान ले चुका है। वर्तमान में तालिबान ने खुद का एक बहुत बड़ा 'नेटवर्क' तैयार कर रखा है। वह पाकिस्तान की लड़कियों तक को दिनदहाड़े उठा ले जाता है। सूत्र बताते हैं कि तालिबान लाहौर पर कब्जा जमाने के लिए भी बेचैन है। उसके पास अत्याधुनिक हथियार भी है। हजारों की संख्या में मानव बम भी है, जो उसके इशारे पर कहीं भी किसी को मिटाकर मिटने को तैयार बैठे हैं। तालिबान की नजर अब पाकिस्तान के परमाणु हथियार पर है। यह सब यदि हो रहा है तो इसके लिए खुद पाकिस्तान ही जिम्मेवार है। दुनिया जानती है कि भारत को चोट पहुंचाने और कश्मीर हड़पने की नीयत से पाकिस्तान ने ही तालिबान को जन्म दिया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने गए दिनों खुद स्वीकार किया था कि तालिबान को उन्हीं के देश की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अमेरिका की सीआईए की मदद से खड़ा किया। पाकिस्तान का मकसद क्या रहा होगा, इस बात से हर भारतीय बखूबी अवगत है। जरदारी का यह भी आरोप था कि पूर्व राष्ट्रपति मुशरर्फ को तालिबानियों से विशेष लगाव था। यह जगजाहिर है कि तीन दशक पहले अमेरिका-भारत के रिश्ते आज की तरह सौहार्दपूर्ण नहीं थे। अमेरिका का झुकाव भारत की तरफ तब हुआ, जब उसे लगने लगा कि इंडिया तेजी से विश्व पटल पर महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। अब अमेरिका मानता है कि पाकिस्तान में आंतकियों का मजबूत गढ़ है। सात जुलाई 2009 को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुई एक बैठक में भी जरदारी ने माना था कि पाक ने ही आतंकी पैदा किये। यह भी कहा कि अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 को हुए हमले के पहले ये आतंकी 'हीरो' समझे जाते थे। इस हमले के बाद आतंकियों का मन इतना अधिक बढ़ गया कि वे पाकिस्तान को ही निशाना बनाना शुरू कर दिये। जरदारी ने यह स्वीकार किया कि छद्म कूटनीतिक हितों के लिए ही आतंकियों को पाला-पोसा गया। यह गलती आज पाकिस्तान पर ही भारी पड़ रही है। तालिबान ताबड़तोड़ पाकिस्तानी जनता पर हमला कर रहा है। सूत्रों की मानें तो ओसामा बिन लादेन भी तालिबान में ही है। अब अमेरिका भी इस बात से घबराने लगा है कि यदि तालिबानी आतंकी पाकिस्तान के परमाणु हथियार तक पहुंच गये तो कई देशों में तबाही मचा देंगे। देर से ही सही यदि जरदारी ने माना है कि पाकिस्तान की ही देन है तालिबानी आतंकी। ऐसे में पाकिस्तान को इन आतंकियों को जल्द से जल्द कुचल देना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता तो आने वाला समय पाकिस्तान के लिए और दुरूह होगा। तालिबान में अनगिनत 'मोस्ट वांटेड' आतंकी छिपे हैं। इनकी तलाश अमेरिका भी सालों से कर रहा है। ये आतंकी अमेरिका पर हमले की साजिश भी रच रहे हैं। यह अलग बात है कि ये उसमें सफल नहीं हो पा रहे हैं।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

मुर्दों को भी चाहिए पैसे!

कहते हैं कि मरने के बाद व्यक्ति खाली हाथ ही जाता है। सत्य है, पर शास्त्र बताते हैं कि मरनेवाले की आत्मा को तबतक शांति नहीं मिलती, जबतक उसका क्रियाक्रम ठीक ढंग से न किया जाए। बस, इसी का फायदा उठाते हैं डोम और पंडित। पंडित जी मरनेवाले परिवार से हजारों तो डोम भी सैकड़ों रुपए वसूल लेते हैं। अपनों के मरने के गम में सराबोर अनगिनत लोगों को इस आडम्बर को पूरा करने में जेवर व जमीन तक बेच देनी पड़ती है। 21वीं सदी में भी डोम श्मशान घाट का राजा बना हुआ है। बिहार की बात करें तो यहां कोई ऐसा श्मशान घाट नहीं है, जहां डोम मनमानी और रंगदारी न करते हों। यदि जेबें भरी न हों तो मृतक का शव जलाना मुश्किल नहीं असंभव है। अर्थात, मरने के बाद भी चाहिए हजारों-हजार रुपए, यानी शव...श्मशान...डोम...रुपए भी सत्य है।
प्रसंग एक : मनुष्य जीवन भर किसी व्यक्ति को चाहे कितना कष्ट क्यों न पहुंचाए परंतु उसके मरने के बाद धूमधाम से दाह संस्कार जरूर करता है। उसे डर रहता है कि कहीं उसकी आत्मा उसे तंग करना न शुरू कर दे। इस अंधविश्वास में लगभग सभी मनुष्य रहते हैं, जीते हैं। इसी का फायदा उठाते हैं डोम और पंडित। दाह-संस्कार के क्रम में पंडित जी बार-बार यह कहना नहीं भूलते कि दान में कमी होने पर मृतक की आत्मा भटकती रहेगी।
 प्रसंग दो : एक हकीकत...पटना निवासी एक गरीब व्यक्ति की मौत एक माह पूर्व हो गई थी। सारे परिजन गम में डूबे थे। यहां कोई बुजुर्ग नहीं था। पड़ोसियों ने बताया कि मृतक को ले जाने के लिए आवश्यक सामान मंगवाना होगा। इस बीच झोले के साथ एक पंडित जी लंबे-लंबे डग भरते हुए कहीं से पधार गए। उनसे पूछा गया कि क्या-क्या मंगवाना है। इसपर, उन्होंने लंबी-चौड़ी सूची परिजनों को थमा दी। सामान आने के आद मृतक को जलाने के लिए गुलबी घाट पर ले जाया गया। पता चला कि पहले रजिस्ट्रेशन होता है। इसकी व्यवस्था सरकार की तरफ से की गई है, राशि भी कम लगती है। खैर, रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी करने के बाद परिजनों ने जलाने के लिए लकड़ी खरीदे। इसके बाद लकड़ी सजाने वालों से शुरू हुआ मोल-तोल। वह हजार के नीचे बात ही नहीं कर रहा था। इस परिवार के सदस्य एक-दूसरे से फुसफुसा रहे थे कि पैसे कहां से आएंगे? खैर घाट पर आए एक पड़ोसी से उधार लेकर इसकी भी व्यवस्था हुई। तबतक घाट का डोम लंबे-लंबे पग भरता पहुंचा। पंडित जी फुसफुसाए आग देने के लिए डोम ही दियासलाई जलाता है। डोम से कहा गया कि 'भैया मेरे' जरा दियासलाई जला दीजिए। डोम भड़का और कहा-पहले बीस हजार निकालो। परिजन भौंचक-उन्हें लगा कि बीस रुपए मांग रहा है। मृतक के एक बेटे ने दस-दस के दो नोट निकालकर डोम को दिए। डोम ने दोनों रुपए जमीन पर फेंक दिए और 'गरजा' भीख दे रहो हो क्या? वह आप से अब 'तुम' पर उतर गया था। इसी बीच एक अन्य मृतक की लाश पहुंची, जिसे देख उसकी आंखें चमकने लगीं। वह भागता-हांफता वहां पहुंचा। इस शव के साथ आनेवाले परिजन कुछ मालदार दिख रहे थे। इधर, चिता सजाये परिजन सोचने लगे कि अब शव कैसे जलाएं। पंडित जी फिर फुसफुसाये, दो हजार में पट जाएगा। परिजन बोले कहां से लाए इतने रुपए, खुद दियासलाई जला लेंगे। पंडित जी बोले, ऐसा अनर्थ न कीजिएगा। आत्मा भटकती रहेगी, आपलोग चैन से जी नहीं पाइएगा। इसके पश्चात यहां आए सभी पड़ोसियों से उधार लेने का सिलसिला शुरू हुआ। जीवन में कभी उधार न देनेवाले भी दो सौ उधार दे दिए। इस तरह दो हजार जमा किए गए। हजार विनती और हाथ-पैर जोडऩे के बाद डोम ने माचिस जलाई। सभी परिजन जाड़े में भी पसीने-पसीने हो गए। यह सोचकर कि क्या शव को जलाने के लिए भी इतनी मिन्नतें करनी पड़ती हैं। पुन: अगले दिन पंडित जी कई पन्ने की लिस्ट थमा दी। इसे पूरा करने में परिजनों को हजारों रुपए खर्च करने पड़े। किसी ने जेवर बेच डाले तो किसी ने उधार लिए। परंतु पंडित जी के बताये सारे पूजा-पाठ करवाए। यह सोचकर कि कहीं उनके अभिभावक की आत्मा न भटके।
प्रसंग तीन : सरकार को यह कानून तो बनाना ही चाहिए कि शव जलाने में इस तरह की सौदेबाजी न हो। घाटों पर चल रहे डोम के रंगदारी को खत्म करने की दिशा में कभी कोई कदम नहीं उठाया गया। माना कि धनी लोग अपनी इच्छा से लाखों खर्च कर देते हैं। परंतु वे कहां जाएं और किससे फरियाद करें, जो अत्यंत गरीब हैं। श्मशान घाट पर पूरी तरह डोम का वर्चस्व है।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

इस राहुल-उस राहुल में दिखा फर्क

युवाओं व कांग्रेसियों में जोश भर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी दो फरवरी 2010 को वापस लौट गए। वे दो दिनी बिहार दौरे पर आए थे। इस दौरान उन्होंने न सिर्फ कांग्रेसियों में जोश भरा बल्कि युवाओं को भी राजनीति में शामिल होने का खुला ऑफर दिया। राहुल बिहार का दौरा पहले भी कर चुके हैं पर इस बार के दौरे में वे काफी बदले-बदले नजर आए। राहुल ने अबकी खुलकर कहा कि लोग उन्हें बिहारी समझें, यहां के लोगों का हर दुख-दर्द उनका है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि राहुल ने हर वो बात कही, जो यहां के लोग सुनना चाहते थे। कांग्रेस की नजर इसी साल बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव पर है। राहुल ने इस दौरे से चुनाव का बिगुल फूंक दिया। हालांकि गए वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पाले में सिर्फ तीन सीटें ही आई थीं। लेकिन जनाधार में बढ़ोतरी हुई थी। कई प्रत्याशी तो जीतते-जीतते हार गए थे। इससे पहले राजद सुप्रीमो डेढ़ दशक तक कांग्रेस को अंगुलियों पर नचाते रहे थे। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को जोर का झटका तब लगा था, जब राजद-लोजपा के प्रमुखों ने गठबंधन कर कांग्रेस के लिए सिर्फ तीन सीटें छोड़ दी थीं। इससे नाराज कांग्रेस ने अकेले ही बिहार की चालीसों लोकसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए थे। लोस चुनाव में ही सोनिया गांधी व राहुल गांधी के जादुई मंत्र का ही नतीजा रहा कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा सीटें मिलीं। राहुल गांधी के दो दिनी बिहार दौरे का मुख्य उद्धेश्य विस चुनाव ही माना जा रहा है। राहुल की नजरें युवाओं पर ही अधिक रहीं। हालांकि पार्टी कार्यकर्ताओं में भी उन्होंने जोश भरा। परंतु उधार के जोश से विधानसभा चुनाव में मनोनुकूल स्थान बनाना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा? राहुल की इच्छा है कि युवा मैदान में उतरें। जाहिर है कि युवा यदि चुनाव मैदान में उतरेंगे तो न सिर्फ उनका पूरा परिवार बल्कि बुजुर्गों को भी न चाहते हुए भी साथ देना होगा। राहुल अपने दौरे के दौरान दरभंगा, पटना के छात्र-छात्राओं से भी मिले। अपने कार्यक्रम के दौरान ही डालमियानगर में राहुल ने कहा कि केरल में चार युवा चुनाव मैदान में उतरे, सभी की जीत हुई। पहली बार उन्होंने कहा कि यहां के लोग उन्हें बिहारी समझें। ये हर सुख-दुख में यहां के लोगों के साथ हैं। मुंबई सबका है, न कि सिर्फ मराठियों का। मुंबई में बिहारियों को जाने या रहने से कोई नहीं रोक सकता, यदि कोई ऐसा करता है तो वे इसके खिलाफ आवाज उठाएंगे। यानी राहुल गांधी ने हर वो बातें कहीं, जो बिहार के लोग सुनना चाहते थे। इसके बावजूद कई जगह उनका विरोध हुआ, क्योंकि कड़ी सुरक्षा की वजह से बहुत सारे लोग उनसे मिल नहीं पाए। ऐसे में इनलोगों ने आक्रोश जताकर अपनी बात रखीं। अब देखना है कि राहुल ने जो जोश युवाओं और कांग्रेसियों में भरा है, उसका कितना फायदा विधानसभा चुनाव में होता है। कांग्रेस को पिछली बार से अधिक सीटें आनी तो तय है। परंतु फायदा कितना होगा, कहना जल्दबाजी होगी। कांग्रेस के जगदीश टाइटलर कई बार दुहरा चुके हैं कि राहुल के बाद सोनियां गांधी बिहार दौरे पर आएंगी। इस साल होने वाले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस अपने पक्ष में फैसला चाहती है। परंतु, फैसला तो जनता के हाथों में है और जनता चुप है, खामोश है।

रविवार, 31 जनवरी 2010

अमेरिका की दोहरी नीति और भारत


दुनिया जानती है-मानती है कि पाकिस्तान ने ही आतंकियों को जन्म दिया। समय-समय पर पाकिस्तान इन आतंकियों को भारत विरोधी कार्यों के लिए इस्तेमाल करता रहा और कर रहा है। भारत ने कभी इसका मुंहतोड़ जवाब नहीं दिया। यदि दिया होता तो पाकिस्तान भारत की ओर कभी बुरी नजरों से देखने का दुस्साहस नहीं करता। भारत के कुछ स्वार्थी नेताओं और यहां के संविधान के लचीलापन का ही नतीजा है कि पाकिस्तान से मुकाबले के पहले वह अमेरिका के सामने दहाड़े मारकर रोता है। तब, अमेरिका किसी अभिभावक की भांति भारत को पुचकार देता है। वह यह भी आश्वासन देता है कि आतंकी हमलों से निपटने में मदद करेगा। यह कहने में भी नहीं चूकता कि पाकिस्तान गलत कर रहा है। इस आश्वासन के साथ जब भारत के नेता अमेरिका से लौटते हैं तो ऐसा लगता है कि वे जंग जीतकर आ रहे हैं। ठीक उसी समय पाकिस्तान का कोई बड़ा नेता जब अमेरिका के पास जाता है तो उसे भी वही आश्वासन मिलता है। यहां पर भारत को दोषी ठहराने से भी अमेरिका पीछे नहीं रहता है। अमेरिका की इस दोहरी नीति से भारत को सावधान हो जाना चाहिए। उसे अमेरिका के सामने रोना और भीख मांगना बंद कर देना चाहिए। भारत के कुछ नेता ऐसे हैं, जो कुर्सीं के लिए कुछ भी कर सकते हैं? मुट्ठी भर नक्सलियों से लडऩे में राज्य व केन्द्र सरकार की योजना बार-बार फेल हो जा रही है। बाबरी मस्जिद के दोषियों को सरकार आज तक सजा नहीं दिला पाई। इससे पता चलता है कि भारत की कानून व्यवस्था कितनी लचीली है? जब भी भारत के नेता अमेरिका के सामने नाक रगडऩे जाते हैं, यहां के लाखों लोगों के खून में उबाल आ जाता है। यह अलग बात है कि लोग अपनी बात को न तो मजबूत ढंग से रख पाते हैं न ही विरोध कर पाते हैं? यहां के लोगों में कूट-कूटकर प्रतिभा भरी-पड़ी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि विदेश जाने वाला अधिकतर भारतीय आज मजबूत स्थिति में हैं। पूरी दुनिया में अमेरिका की तानाशाही बढ़ती ही जा रही है। हर देश कुछ भी करने के पहले उसे सलाम करना नहीं भूलता है। परंतु एशियाई देश अमेरिका की तानाशाही को महसूस करने लगे हैं। भारत के पड़ोसी देश चीन अमेरिका की नीतियों को बहुत पहले ही समझ चुका था और वह उसकी परवाह भी नहीं करता। अमेरिका आज के समय में चीन को अपने ऊपर मंडराता खतरे के रूप में देख रहा है। अमेरिका भारत के इतिहास से परिचित है, इसलिए वह इसे खतरे के रूप में नहीं देखता है। भारतीयों नेताओं को चाहिए कि कम से कम देश हित में अमेरिका से दो टूक बात करने का साहस जुटाएं और खुद को कमजोर न दर्शाएं। तभी अमेरिका अपनी दोहरी नीति को छाड़ेगा। इसके लिए देश के विपक्षी नेताओं को भी साथ देने की जरूरत है। खिचड़ी पार्टियों से बनी केन्द्र सरकार को हर वक्त यही भय सताता है कि कहीं कोई पार्टी उसकी टांग न खींच दे। पिछली बार परमाणु मामले में केन्द्र की सरकार गिरते-गिरते बची थी। इसके बावजूद एक सवाल तो है कि आखिर कब तक अमेरिका के सामने झुकेगा भारत।

बच्चों के पेट पर डाका!


कहते हैं बच्चों में भगवान का वास होता है, उसकी गलतियां भी क्षम्य होती हैं। परंतु, यदि बिहार में मिड डे मील की पड़ताल करें तो चौंक जाना स्वाभाविक होगा कि यहां बच्चों के पेट पर भी डाका डालने से लोग बाज नहीं आते। घोटालेबाजी करनेवालों की नजरें छोटे-छोटे बच्चों के पेट पर हर वक्त जमी रहती हैं। जैसे ही मौका मिला, ये घोटाले को अंजाम दे डालते हैं। मिड डे मील में भी घोटाले का मामला परत-दर-परत सामने आ रहा है। यह अलग बात है कि इसमें एक साथ करोड़ों के घोटाले का मामला सामने नहीं आया है। इसकी राशि टुकड़े-टुकड़े में स्कूलों तक पहुंचती है। ऐसे में घोटाले का स्वरूप छोटा-छोटा परंतु आंकड़े बड़े हैं। यदि सीबीआई मिड डे मील की इमानदारी से जांच करे तो अबतक हुए घोटाले का भेद खुलना तय है। प्राथमिक व मध्य विद्यालयों में पढऩे वाले गरीब बच्चों को पढ़ाई के प्रति रुचि बनी रहे और वे प्रतिदिन पढऩे आएं, इसी खातिर इस योजना की शुरुआत की गई थी। इससे पहले लाखों गरीब अभिभावक इसलिए अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते थे कि वे खेतों में काम करते थे। देश में सबसे पहले इस योजना की शुरुआत मद्रास सिटी में की गई थी। उद्देश्य था कि समाज से वंचित गरीब बच्चों को भी भरपेट भोजन मिले। इससे स्कूल आने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी थी। इसके पश्चात सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में 28 नवंबर 2001 को इसे पूरे देश में लागू करने का निर्देश दिया। इस योजना के लागू होते ही हजारों लोगों को जैसे रोजगार मिल गया। इस योजना में अधिक से अधिक कमाई कैसे हो, इसपर शिक्षक से लेकर स्कूल के प्रधानाध्यापक फिर जिला शिक्षा अधिकारी तक विचार-विमर्श करते हैं। सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, सिवान, शिवहर सहित कई जिले में दर्जनों ऐसे स्कूल हैं, जहां छात्र तो सौ हैं परंतु पच्चीस-तीस ही नियमित आते हैं। ऐसे में हजारों रुपए प्रतिमाह एक स्कूल से सीधे आमदनी हो जाती है। इसके पश्चात चावल की निम्न क्वालिटी का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार द्वारा जारी मेन्यू में खिचड़ी भी बच्चों को दी जाती है। इसमें आए दिन कीड़े मिलने की शिकायतें बिहार में आम बात है। कई बार कीड़ों की संख्या इतनी अधिक रहती है कि बच्चे भोजन करते ही गंभीर रूप से बीमार हो जाते हैं। इनके अभिभावकों के हो-हल्ला के बाद प्रशासन की नींद खुलती है। जांच में घोटाले का मामला सामने आता है। इस योजना में गड़बड़ी के लिए अबतक सैकड़ों कर्मचारी को दोषी पाया जा चुका है। कार्रवाई के नाम पर अधिकतर मामलों में पैसे लेकर 'फूल' के 'चाबुक' चलाए गए, परंतु कोई कार्रवाई नहीं की गई। सरकारी मेन्यू के अनुसार, बच्चों को सोमवार को चावल व कढ़ी, मंगलवार को चावल-दाल व सब्जी, बुधवार को खिचड़ी, गुरुवार को सब्जी पोलाव, शुक्रवार को चावल व छोला, शनिवार को खिचड़ी व चोखा देना है। परंतु बिहार के दर्जनभर स्कूलों में ही इसका पालन हो पाता है। वह भी चालीस फीसदी ही। अधिकतर स्कूलों में गुरुजी के लिए भी इसी योजना से भोजन बनता है। उनका भोजन उनके घर की तरह ही स्वादिष्ट होता है। पहली जुलाई को बिहार के विधानसभा में भाकपा विधायक ने गड़बड़ी मामले को मजबूती से उठाया था। मानव संसाधन मंत्री इसका कोई जवाब नहीं दे सके थे। नतीजतन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा था। उन्होंने इस मामले की जांच सदन की कमिटी से कराने की बात कही। बावजूद बच्चों के भोजन में घपला करने से शिक्षक से लेकर अधिकारी तक बाज नहीं आ रहे हैं। सभी को अपना-अपना हिस्सा चाहिए। परंतु बड़े होने पर जिसके कंधे पर देश की बागडोर आने वाली है। उसकी चिंता किसी को नहीं है। कई स्कूलों में तो अभिभावकों ने अपने बच्चों को स्कूल में खाने से मना कर दिया तो कई ने अपने बच्चों को विद्यालय भेजना ही बंद कर दिया। यही है बिहार के मिड डे मील का सच।

शनिवार, 23 जनवरी 2010

मुंबई हमले के समय कहां थे मराठी?

हमारा संविधान संप्रभु है। यह सभी भारतीय नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करता है। परंतु, विडंबना यह है कि बिहार का नागरिक कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकता। नगालैंड में घर नहीं बना सकता और अब महाराष्ट्र में टैक्सी नहीं चला सकता? हां, कश्मीर में जमीन खरीदने और नगालैंड में घर बनाने के लिए यदि ऊंची पैरवी है तो सपना पूरा हो सकता है। यानी सारे नियम-कानून गरीब व मध्यम वर्ग के लिए? ऊंच वर्ग के लोगों के लिए नियम के ऊपर नियम। महाराष्ट्र सरकार ने बीस जनवरी 2010 को मनसे प्रमुख राज ठाकरे के नक्शे कदम पर चलते हुए यह जताने का प्रयास किया था कि वह मराठियों की हितैषी है। इसके लिए महाराष्ट्र के कैबिनेट ने टैक्सी के परमिट मामले में एक बड़ा फैसला किया। टैक्सी का परमिट उसे ही दिया जाएगा, जिसे मराठी पढऩे-लिखने और बोलने आएगा। इसके अलावा वह महाराष्ट्र में पन्द्रह सालों से रहता हो। इस फैसले से देश के सभी लोग स्तब्ध। महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी के गठबंधन वाली सरकार है। इसके बावजूद केन्द्र सरकार की चुप्पी ने सबकुछ बयां कर दिया। कसूर किसका, केन्द्र या राज्य या फिर राजनीति स्वार्थ का। गए दिनों राज ठाकरे के लोगों ने बिहारी टैक्सी चालकों की खुलेआम पिटाई की थी। केन्द्र यह सब मूकदर्शक हो देखती रही थी। इसके बाद भी मनसे के तेरह विधायक जीत गए। इससे साबित हो रहा है कि ‌हावी हो रहा क्षेत्रवाद। केन्द्र सरकार चाहकर भी इसपर अंकुश नहीं लगा पा रही है। वजह सरकार के कई पांव, एक भी बैठा तो औंधे मुंह गिरना तय। हालांकि जब देश भर में महाराष्ट्र सरकार के फैसले की छीछालेदर शुरू हुई तो अगले ही दिन मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण पलटते दिखे। कुछ भी हो, इस तरह की हरकतों से देश के संविधान पर अंगुली उठती है। विदेशी मुल्कों में भारत की शाख पर धब्बा लगता है? 2008 में 26 दिसंबर को जब पाक आतंकियों ने मुंबई घेर लिया था और दो सौ लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। उस वक्त राज ठाकरे और उनके लोगों ने मराठावाद का नारा क्यों नहीं दिया? भारतीय सुरक्षाकर्मी यदि उस वक्त मैदान में नहीं उतरे होते तो मुंबई को तीन दिनों में आतंकियों से छुटकारा नहीं मिलता। उस वक्त महाराष्ट्र की मदद करनेवाला न तो मराठी था और न ही मुंबई निवासी। मदद करनेवाला सुरक्षाकर्मी सिर्फ भारतीय और सिर्फ भारतीय थे। तब, क्यों नहीं राज ठाकरे आगे आए ? क्यों नहीं महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री आगे आए? तब सबको जान का खतरा था। कुछ राजनैतिक ताकतें क्षेत्रवाद को बढ़ावा दे रही हैं। महाराष्ट्र सरकार इस मामले में कुछ ज्यादा ही आगे है। महाराष्ट्र सरकार को इस बात का अहसास होना चाहिए कि महाराष्ट्र में देश के कोने-कोने के लोग रहते हैं, सभी की मिली-जुली मेहनत से आज का फला-फुला महाराष्ट्र है। क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वाले लोगों के खिलाफ केन्द्र को कड़े कदम उठाने चाहिए। नहीं तो एक दिन आएगा, जब राजनीतिक स्वार्थ के चलते हर राज्य में क्षेत्रवाद का बीज पनपेगा। और, इसका असर देश के विकास पर पड़ेगा।

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

घर में मिठास, राजनीति में कड़वाहट


पिछले दिनों कृषि मंत्री शरद पवार ने चीनी की बढ़ती दर पर बयान दिया था कि वे ज्योतिषी नहीं हैं, जो यह बता सकें कि चीनी के दाम कब घटेंगे। शरद के इस बयान से जाहिर होता है कि भारत के गरीबों को नमक की चाय पिलाकर खुद के घर में मिठास बनाए रखना चाहते हैं। शरद के परिवार में दर्जनभर से अधिक चीनी मिले हैं, ऐसे में जितने दाम बढ़ेंगे, उनके घर में मिठास उतनी ही बढ़ेगी। शरद के बयान पर राजनीति में उबाल आया तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हस्तक्षेप करना पड़ा। मनमोहन का बयान आया कि महंगाई कम करने के लिए केन्द्र सरकार हर संभव कदम उठाएगी। यह खबर अखबारों में प्रथम पेज पर प्रमुखता से छापी गई। शरद मौके की नजाकत को देखते हुए एक सप्ताह चुप्पी साध बैठ गए। पुन: बीस जनवरी को उन्होंने फिर बयान दिया कि दूध के दाम में बढ़ोतरी होगी। उनके इस बयान से हर वर्ग के लोग उबल पड़े। जगह-जगह लोगों ने प्रदर्शन भी किया। विपक्ष ने तो बयानबाजी की पोटली खोल दी। हर तरफ निंदा ही निंदा। कई अर्थशास्त्रियों ने दबी जबां में कह डाला-'लगता है शरद के परिवारवाले अब दूध का धंधा शुरू करनेवाले हैं'। आंकड़े गवाह हैं कि किसी भी नेता के परिजन जिस चीज का व्यवसाय करते हैं। संबंधित विधायक या सांसद उसी विभाग का मंत्री बनना चाहते हैं। वजह साफ है कि इससे उनके परिवार को लाभ मिलेगा ताकि सात पुश्त बिना कमाए रोटी-मक्खन मिलता रहे। स्व. इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री थी और राजीव गांधी ने सोनिया गांधी से शादी कर ली थी। तब, इंदिरा ने नागरिकता के कानून में संशोधन कर दिया ताकि सोनिया को भारत का नागरिक बनने में कोई परेशानी न हो। पिछले सप्ताह ही रेल मंत्री ममता बनर्जी ने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के 'आजीवन फ्री रेलवे पास' को रद कर दिया। लालू ने रेल मंत्री से हटते-हटते खुद के लिए कई सुविधाएं सुरक्षित करवा लिया था। यह अलग बात है कि ममता एक-एक कर सभी सुविधाओं को रद कर रही हैं। पहले से महंगाई से त्राहि-त्राहि कर रहे गरीब से चाय भी दूर होती जा रही है। अब दूध के महंगा होने से बच्चे भी दूध-रोटी से महरूम हो जाएंगे। ऐसे में यह सवाल मंडरा रहा है कि शरद के परिवार वाले क्या अब दूध बेचेंगे? यह तय है कि दूध के दाम तुरंत नहीं भी बढ़ते हैं तो आने वाले समय में बढ़ेंगे? शरद ने चीनी की बढ़ती कीमतों का ठीकरा पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार के सिर भी फोड़ा था। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार वही नेता हैं, जिन्होंने 1999 में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री न बनाने के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग होकर यह पार्टी बनाई थी। शरद केंद्र सरकार में कृषि मंत्री के अलावा उपभोक्ता मामलों और खाद्य और लोक वितरण विभाग के भी मंत्री हैं। महाराष्ट्र में इन्हें एक बड़े किसान के रूप भी जाना जाता है। चार बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एवं छह बार लोकसभा के लिए चुने जा चुके और प्रधानमंत्री के प्रबल दावेदार शरद पवार की गिनती देश के बड़े नेता के रूप में होती है। सरकार के बनने-बिगडऩे में भी इनकी अहम भूमिका होती है। ऐसे में उत्तर भारत में दूध की कमी के संबंध में बयान देकर वे एक बार फिर विवादों में फंस गए हैं। शरद ने कहा कि उत्तरी राज्यों में उत्पादन में कमी से दूध की कमी हो गई है। यह कमी करीब अठारह लाख टन है। इधर, सूत्रों का दावा है कि सरकारी नीतियों के चलते दूध की कमी हुई है। इससे पहले ही निजी दूधियों ने दूध की कीमत 32 रुपए लीटर कर दी है, जबकि मदर डेयरी व अमूल के दूध की कीमत 28 रुपए लीटर है। अक्टूबर में दिल्ली समेत कई राज्यों में दूध के दाम दो रुपए लीटर बढ़े थे। इधर, आजादी के बाद भी बिहार की गिनती चीनी के मुख्य उत्पादक राज्य में होती थी। नीतीश ने सत्ता में आने के बाद बिहार में बंद पड़ी दस चीनी मिलों को खोलने के लिए केन्द्र से अनुमति मांगी, जिसे देने में केन्द्र को साढ़े तीन वर्ष लग गए। अक्टूबर 2009 में केन्द्र ने अनुमति दी, इसके पश्चात यहां चीनी मिल खोलने की सुगबुगाहट शुरू हुई। नीतीश सरकार ने इथेनाल बनाने की अनुमति भी मांगी थी। बिहार के पूर्णिया की बंद चीनी मिल बनमंकी एशिया की सबसे बड़ी मिल है। आज यदि ये मिलें चालू होतीं तो चीनी संकट इस तरह सर पे सवार नहीं होता। इन समस्याओं से अधिक शरद पवार को क्रिकेट के व्यवसायीकरण में रुचि रही है। शरद के इस तरह के बयान से यह भी अंदेशा हो रहा है कि कहीं कांग्रेस अपनी पुरानी नीति पर तो नहीं लौट रही है। यहां बता दें कि कांग्रेस पहले उत्पादन बढ़ाने की जगह उत्पादन को नियंत्रित कर व्यावसायिक लाभ में बदलने का काम करती रही है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि शरद का राजनीति ढलान शुरू हो गया है। कुछ भी हो शरद के इस बयान का पुरजोर विरोध विपक्ष और आम लोगों ने नहीं किया तो इनकी बयानबाजी और मनमानी बढ़ेगी, जिसका असर गरीबों पर सबसे ज्यादा पड़ेगा।

रविवार, 17 जनवरी 2010

एक गुमनाम रेलवे मॉडलर


यह कहानी विदेशों में विख्यात पर अपने ही देश में गुमनाम एक ऐसे रेलवे मॉडलर की है, जो 78 वर्ष की उम्र में भी तीस साल वाले जज्बे के साथ कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर ऐ इंसान की तर्जुमा पर लगातार काम करता जा रहा है। इस मॉडलर की तकनीकी राय को जापान की टेनशोडो कंपनी आभार के साथ स्वीकार कर चुकी है। अपने देश के डीआरएम स्तर के अधिकारी प्रशंसा कर चुके हैैं। पर, आज तक उनके माडल को मान्यता नहीं मिली। मेट्रो चीफ ई. श्रीधरण हाल ही में उनके द्वारा मांगे जाने पर रामेश्वरम स्थित पुल के बारे में तकनीकी जानकारियां उपलब्ध करा चुके हैं। पांच दशक से रेलवे मॉडल बना रहे सीतामढ़ी के कोट बाजार निवासी इस रेलवे माडलर का नाम है देवी प्रसाद अग्रवाल। देवी दर्जनों वर्किंग स्टीम इंजन, डीजल इंजन, इलेक्ट्रिक इंजन का मॉडल बना चुके हैं। आजकल वे आनेवाले अत्याधुनिक रेलवे मॉडल का खाका बनाने का प्रयास कर रहे हैं। चौंकाने वाली बात है कि उन्होंने इंजीनियरिंग या कोई तकनीकी पढाई नहीं की है। मीडिया से कोसों दूर रहने वाले देवी 21वीं सदी में भी स्टीम इंजन को हटाने के खिलाफ हैं। उनका दावा है कि उनका रेल मॉडल भारतीय रेल मॉडल से दो दशक आगे है। वे भावी पीढ़ी को रेलवे का वर्किंग मॉडल बनाना सिखाना चाहते हैं। देवी प्रसाद कहते हैं कि खेल-खेल में 1948 में सबसे पहले उन्होंने एक डमी रेल इंजन बनाया, जिस पर सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल, काशी से उन्हें स्वर्ण जयंती पुरस्कार मिला। स्वर्ण जयंती समिति के सभापति स्व. डॉ. अमरनाथ झा ने उन्हें प्रेरित किया। 1955 में इंग्लैंड की पत्रिका हॉबिज वीकली पढ़कर उन्हें इंसपाइरेशन मिला और उन्होंने रेलवे मॉडल बनाने का प्रयास शुरू किया। 1956 में अमेरिका के सूचना विभाग के पास उन्होंने पत्र लिखकर तीन जानकारियां मांगीं। रेलवे मॉडल के पाट्र्स कहां-कहां बनते हैं, इसे कैसे मंगाएं और भुगतान कैसे करें? यहां की मदद से उनका संपर्क यूनेस्को से हुआ। यूनेस्को की ओर से उन्हें भरपूर मदद मिली। यहां तक कि विदेशी मुद्रा उपलब्ध कराने में भी संस्था ने सक्रिय भूमिका निभाई। इसी क्रम में जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका, जापान व आस्ट्रिया से रेलवे मॉडल का इक्विपमेंट, लिट्रेचर और पाट्र्स मंगवाए, लेकिन वहां के पाट्र्स भारतीय रेल से मेल नहीं खाते थे। यहां की रेल ब्रिटेन के इर्द-गिर्द घूमती थी। इसमें भारत के रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड ऑर्गनाइजेशन ने सहायता की और ब्लू पिं्रट उपलब्ध कराए। इस ब्लू प्रिंट को 45 फीसदी रिड्यूस कर उन्होंने स्टीम इंजन का मॉडल बनाया, जो न सिर्फ पटरियों पर दौड़ा, बल्कि छुक-छुक की आवाज भी निकाली। इसी क्रम में अमेरिका के एसी गिल बर्ट कंपनी के रिटायर्ड इंजीनियर की मदद से उन्होंने डीजल इंजन का पाट्र्स मंगवाया। इसी दौरान अमेरिका की संस्था नेशनल मॉडल रेल रोड एसोसिएशन से डिजिटल कमांड कंट्रोल की चर्चा हुई। इससे प्रभावित होकर इस संस्था ने इन्हें सम्मानित सदस्य बना लिया। 1965 में यूनेस्को के सहयोगी विभाग को युद्धपोत का मॉडल बनाकर भेजा, जिसे प्रदर्शनी में रखा गया। जापान की टेनशोडो कंपनी ने एक मॉडल बनाकर विचार-विमर्श के लिए उनके पास भेजा। उनकी राय से प्रभावित होकर जापान ने आभार जताया था। हाल ही में उन्होंने ई. श्रीधरण को पत्र लिखकर रामेश्वरम पुल से संबंधित तकनीकी जानकारी मांगी थी। श्रीधरण ने अपने हाथों से स्केच बनाकर उनके पास भेजा और आश्वासन दिया कि भविष्य में उनकी हर सहायता करेंगे। देवी प्रसाद बताते हैं कि उनके मॉडल को देखने पूर्व में गोरखपुर के डीपीआरओ, समस्तीपुर के डीआरएम श्री राव सहित कई अफसर आ चुके हैं। उन्हें मॉडल पसंद भी आए, बावजूद किसी ने दोबारा उनकी सुध नहीं ली। देवी प्रसाद का कहना है कि फिर भी वे कभी निराश नहीं हुए और जच्बे के साथ रेलवे मॉडल बना रहे हैं। उन्होंने बताया कि कभी एक रेलवे मॉडल बनाने में तीन हजार खर्च होते थे, अब दस हजार से अधिक लग रहे है''। पैसे कहां से आते है, के जवाब में उन्होंने कहा कि उनके इस कार्य में उनके विदेश में रह रहे परिवार के कुछ सदस्य और मित्र मदद करते हैं। उन्होंने कहा कि सीतामढ़ी में साइंस म्यूजियम बना तो वे अपने सभी रेल मॉडलों को दान में दे देंगे।

सोमवार, 11 जनवरी 2010

आशा प्रभात : एक अदम्य इच्छाशक्ति का नाम


आशा प्रभात, एक अदम्य इच्छाशक्ति का नाम-जो पुरातत्ववेता बनते-बनते बन गईं कवयित्रि और कथाकार। आज ये किसी परिचय की मुहताज नहीं हैं। इनकी किताबें विदेशों में भी सम्मानीय स्थान पा चुकी हैं। साहित्य की दुनिया में आज इनका नाम भी आदर के साथ लिया जाता है। तभी तो देश के विख्यात शायर बसीर भद्र ने सीतामढ़ी अखिल भारतीय मुशायरे के दौरान कहा था कि वे सीतामढ़ी को दो कारणों से ही जानते हैं-एक जानकी जन्म स्थली के रूप में, दूसरा आशा प्रभात की वजह से। बेपनाह मेहनत और लगन का ही नतीजा है कि आज ये दो-दो भाषाओं (हिन्दी व उर्दू) में किताबें लिखती हैं। इनकी नई किताबें आने का इंतजार भी हजारों पाठक बेसब्री से करते हैं। साहित्य रचना के साथ-साथ ये सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। लायनेस क्लब सीतामढ़ी वेस्ट की वे सक्रिय सदस्या तथा फिलहाल पीआरओ भी हैं। घर-गृहस्थी की व्यस्तता में पढऩे के लिए समय निकाल लेना कोई आसान काम नहीं है। बावजूद ये प्रतिदिन किताबों से उलझने और लेखन के लिए समय निकाल लेती हैं। ये शादी के बाद सीतामढ़ी में बस गईं। हालांकि उनका बचपन पूर्वी चंपारण जिले के एक छोटा-सा संपन्न कस्बा नरकटिया बाजार में बीता। पिता की प्रेरणा से उनके मन में साहित्य का बीज प्रस्फुटित हुआ। प्रश्नों के माध्यम से वे पिता को कुरेदती और उन्हें बहुत कुछ बताने पर आमादा करती। इनके पिता हर माह दर्जनों किताबें खरीदते थे और आशा सातवीं कक्षा में ही चुपके-चुपके सब पढ़ डालती थीं। आशा ने स्कूली काल में ही रवीन्द्र साहित्य, प्रेमचन्द्र, प्रसाद अमृतलाल नागर, अज्ञेय से लेकर अधिकांश बड़े लेखकों की कृ तियों का अध्ययन कर डाला। काव्य में सुभद्रा कुमारी चौहान, माखन लाल चतुर्वेदी, दिनकर, निराला तथा नेपाली की कविताएं आशा को कुछ अधिक ही भाती थीं। किताबों में उलझे देख कई बार इनके पिता भौंचक रह जाते थे, लेकिन आशा की रुचि देख ये मौन हो जाते थे। आशा ने दसवें वसंत में ही अनगिनत कविताओं और गजलों का संग्रह कर लिया। तब आशा के पिता को नहीं पता था कि एक दिन नन्हीं आशा खुद कविताएं, गजलें, कहानियां तथा उपन्यास लिखेंगी। आशा का जुनून और लगन का ही नतीजा है कि उनकी रचनाओं का भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त सभी भाषाओं में अनुवाद कराया गया। इतना ही नहीं विदेशों में भी उनकी कृतियों तथा रचनाओं को लोग चाव से पढते हैं। आशा के लिखे उपन्यास ''धुंध में उगा पेड़'' का कराची (पाकिस्तान) के स्तरीय पत्रिका मंशूर में धारावाहिक प्रकाशन 1995 में हुआ है तथा वह बहुत प्रशंसित हुआ। वर्ष 1996 में प्रकाशित इनका उर्दू, नज्मो-गजलों का संग्रह 'मरमूज'1996 के आईएएस के प्रश्न पत्र में स्थान पा चुका है। वर्ष 1999 में इन्हें एबीआई द्वारा वूमेन आफ दी इयर अवार्ड से नवाजा गया। वर्ष 2000 में एबीआई द्वारा ही प्रोफेशनल वूमेन्स एडवाइजर्स बोर्ड के लिए इन्हें नामित किया है। आशा की प्रकाशित पुस्तकों में 'दर्राचे' काव्य संग्रह (हिन्दी), 'जाने कितने मोड़' उपन्यास (हिन्दी-उर्दू) 'कैसा सच' कहानी संग्रह (हिन्दी) तथा अनुवादित कहानियों का संग्रह सहित कई हैं। वहीं, 'आज के अफसाने' उर्दू में शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। हिन्दी तथा उर्दू दोनों जुबानों में समान अधिकार रखनेवाली आशा प्रभात को बिहार राष्ट्रभाषा परिषद पटना द्वारा ''साहित्य सेवा सम्मान'', बिहार उर्दू अकादमी पटना-खसूसी सम्मान, उपन्यास ''धुंध में उगा पेड़'' के लिए प्रेमचन्द्र सम्मान व दिनकर सम्मान, दरीचे के लिए साहित्य संगम पुरस्कार और ''उर्दू दोस्त सम्मान'' पुरस्कार मिल चुका है। करीब ढाई दशकों से ये आकाशवाणी व दूरदर्शन की लोकप्रिय कवयित्रि के रूप में भी विख्यात हैं। हिन्दी में साहित्य अकादमी की पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य', 'कादम्बिनी' 'गंगनाचल', 'हंस', 'आजकल', 'शायर', 'किताबनुमा' सहित दर्जनों पत्रिकाओं में इनकी कविताएं, गजलें व कहानियां वर्षों से प्रकाशित होती रही हैं और हो रही हैं। बकौल आशा प्रभात-''पढऩा-लिखना कभी का शौक रहा अब मेरी मजबूरी बन चुकी है।''

बुधवार, 6 जनवरी 2010

कोमा में समाजवादी पार्टी!



समाजवादी पार्टी के महासचिव व प्रवक्ता अमर सिंह ने छह जनवरी को सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही सपा में भूचाल आ गया और सपा चली गई कोमा में। अमर सिंह फिलहाल दुबई में हैं और वहीं से इस्तीफा भेजे हैं। अमर ने इसकी वजह अपने खराब स्वास्थ्य को बताया है। उनका कहना है कि वे दूसरे के गुर्दे पर जी रहे हैं, ऐसे में चिकित्सकों ने उन्हें भाग-दौड़ से मना किया है। पार्टी में विभिन्न पदों पर रहते हुए यह मुमकिन नहीं था। सो, उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। उनके इस्तीफे को कांग्रेस और विपक्ष के नेताओं ने नाटक करार दिया है। यह भी कहा है कि अमर-मुलायम के बीच यह नया नाटक है। इधर, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने कहा कि वे अमर सिंह को हर हाल में मना लेंगे। सर्वविदित है कि अमर सिंह के गुर्दे का प्रत्यारोपण तीन महीने पहले सिंगापुर में हुआ था। इस ऑपरेशन के बाद कोई भी मरीज पूर्णरूपेण स्वस्थ नहीं रह सकता है। यदि हर पल वह परहेज से नहीं रहेगा तो उसकी जान कभी भी जा सकती है। यह अमर सिंह ही हैं कि तीन माह में ही माइक पकड़कर भाषण भी देने लगे। चूंकि गुर्दे रोग के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है। ऐसे में अमर सिंह को वास्तव में आराम की जरूरत है। इसके बावजूद देश के किसी भी पार्टी के नेता को अमर पर यकीन नहीं है कि वास्तव में उनका स्वास्थ्य खराब है। यहां तक कि उनकी पार्टी में भी एकरूपता नहीं है। वजह है-अमर सिंह शुरू से ही एक तिकड़मबाज नेता रहे हैं। वे अपने स्वार्थ के लिए कब क्या बोल देंगे, कहना मुश्किल है। कब अपने ही बयान से मुकर जाएंगे और मीडियाकर्मी को कटघरे में लाकर खड़े कर देंगे? मुलायम के दाहिना हाथ और हनुमान के रूप में जाने-जाने वाले अमर यदि इस्तीफा वापस नहीं लेते हैं तो सपा पर इसका असर पड़ेगा। हालांकि पार्टी के नेता उन्हें मनाने में जुट गए हैं। इसके पहले भी अमर सिंह इस्तीफा दे चुके हैं, जिसे मुलायम सिंह फाड़ कर फेंक चुके हैं। अमर ने दुबई से एक इलेक्ट्रोनिक चैनल को बताया कि उनका किसी से कोई मतभेद नहीं है। वे पार्टी में बने भी रहेंगे, वे सिर्फ पद से इस्तीफा दे रहे हैं। यहां बता दें कि महासचिव व प्रवक्ता के अलावा संसदीय बोर्ड की सदस्यता से भी अमर सिंह ने इस्तीफा दे दिया है। ऐसे एक पक्ष का कहना है कि अमर का मुलायम के साथ कुछ दिनों से अंदरूनी मतभेद चल रहा था। यही वजह है कि अमर ने त्यागपत्र दे दिया है। कुछ भी हो, फिलहाल सपा तो कोमा में चली गई है जिससे उबरने में उसे वक्त लगेगा।

सोमवार, 4 जनवरी 2010

कराची से आ रहा जाली नोट!


यूनुस अंसारी की गिरफ्तारी नेपाल पुलिस के लिए एक बड़ी सफलता मानी जा रही है। यूनुस से की गई पूछताछ में पुलिस को कई महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं। नेपाल पुलिस यूनुस से अभी अनगिनत सवालों का जवाब चाहती है। मसलन-दाउद इब्राहिम के संपर्क में यूनुस कैसे रहता था। उसका संपर्क सीधे था या फिर दाउद के शातिर के जरिए। भारतीय जाली नोट किसके माध्यम से यूनुस के पास पहुंचते थे। लाखों के जाली नोट आखिर पुलिस की आंखों से बचकर कैसे गंतव्य तक पहुंचाया जाता था। दाउद वर्तमान में कहां रह रहा है? इस तरह के अनगिनत सवाल नेपाल पुलिस के दिमाग में घूम रहा है। भारत की पुलिस भी इसका जवाब जानने के लिए बेचैन है। वहीं, पाकिस्तान के आईएसआई भी चौकस है कि यूनुस नेपाली पुलिस के सामने कहीं अपना मुंह न खोल दे। पाकिस्तान भी पूरे मामले पर नजर गड़ाये हुए है। इधर, नेपाल पुलिस का मानना है कि एक दिन में यूनुस से इतने सारे सवाल नहीं पूछे जा सकते हंै। जाहिर है कि इतनी आसानी से यूनुस गोपनीय राज खोलनेवाला नहीं है। ऐसे में नेपाल पुलिस ने यूनुस समेत तीन लोगों को पूछताछ के लिए दस दिनों के लिए रिमांड पर ले लिया है। पुलिस मान रही है कि वह इतने दिनों में यूनुस से सच उगलवा लेगी। जानकारी यह भी मिली है कि युनूस को बचाने के लिए उसके पक्षधर रणनीति बनाने में जुट गए हैं। ये हर हाल में यूनुस को बचाना चाहते हैं। इधर, सूत्र बता रहे हैं कि आईएसआई के नेतृत्व में पाकिस्तान के कराची, रावलपिंडी, क्वेटा के सरकारी प्रिंटिंग प्रेसों में अरबों के भारतीय जाली नोट छापे जा रहे हैं। पाकिस्तान में पांच सौ और हजार के ही नोट अधिक छापे जाते हैं। इसके पश्चात विभिन्न माध्यम से ये रुपए भारतीय क्षेत्रों में खपाने के लिए भेजे जाते हैं। यूनुस के पास मिले पच्चीस लाख रुपए पांच-पांच सौ के ही थे। सीमावर्ती क्षेत्रों की भारतीय पुलिस चौकस है। हालांकि, भारत सरकार की ओर से यूनुस मामले में अबतक कोई पहल नहीं की गई है। भारत को शुरू से ही संदेह रहा है कि जाली नोट का रैकेट पाकिस्तान के संरक्षण में ही फल-फूल रहा है। हालांकि पाकिस्तान इससे मुकरता रहा है। यूनुस यदि सच बोल देता है तो भी पाकिस्तान कतई नहीं मानेगा कि जाली नोट से उसका कुछ भी लेना-देना है। फिलहाल भारत, पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश सहित कई देशों की निगाहें यूनुस की ओर हैं। यूनुस यदि कबूलता है कि जाली नोट उसे पाकिस्तानी एजेंटों के माध्यम से मिलता है तो विश्व बिरादरी में पाकिस्तान की छीछालेदर तय है। हालांकि सूत्र बता रहे हैं कि यूनुस के हाथ इतने लंबे हैं कि वह जल्द ही पुलिस हिरासत से बाहर होगा।

रविवार, 3 जनवरी 2010

पिता पूर्व मंत्री, बेटा 'डॉन'

नेपाल के पूर्व भूमि सुधार मंत्री का बेटा 'डॉन' व दाऊद इब्राहिम का दायां हाथ। सुनकर चौंक जाना तय है, परंतु यह सौ फीसदी सच है। नेपाल में दाऊद का दाहिना हाथ और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी का एजेंट यूनुस अंसारी को नेपाल पुलिस ने दो जनवरी की रात गिरफ्तार कर लिया। इसके साथ ही कई देशों की नजरें नेपाल पर जा टिकीं। वजह थी-सभी यूनुस के जरिए दाउद के बारे में जानना चाहते थे। यूनुस के पास से बीस लाख से अधिक भारतीय जाली नोट भी मिले। इसके बारे में नेपाली पुलिस कुछ भी बताने से इनकार कर रही है। पुलिस यह मानती है कि यदि ज्यादा जानकारी मीडिया को दी जाएगी तो जांच प्रभावित होगी। एक पक्ष यह भी मान रहा है कि जल्द ही इस मामले को नेपाली पुलिस दबा देगी। वजह साफ है कि यूनुस के पिता सलीम मियां अंसारी राजा ज्ञानेन्द्र के शासन काल में भूमि सुधार मंत्री रह चुके हैं। वहीं, यूनुस खुद भी एक पार्टी का गठन कर चुनाव लड़ चुका है। यूनुस के पिता प्रभावशाली के साथ पैसे वाले व्यक्ति हैं, ऐसे में यहां की पुलिस पर राजनीति दबाव पडऩा तय माना जा रहा है। भारतीय पुलिस जानना चाहती है कि यूनुस के पास जाली नोट कहां से आए, परंतु यह तभी संभव है, जब भारत सरकार नेपाल सरकार से संपर्क साधे। नेपाल के पुलिस महानिरीक्षक की माने तो भारत से प्रत्यर्पण संधि न होने से यूनुस को भारत के हवाले नहीं किया जा सकता है। यूनुस नेपाल का ही निवासी है। वह न सिर्फ नकली नोट का बड़ा कारोबारी है बल्कि हथियार भी सप्लाई करता रहा है। भारत के मध्यप्रदेश में गए दिनों जाली नोटों के साथ अतीक मोहम्मद व रमेश गुप्ता को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। दोनों नेपाल के ही रहनेवाले हैं। दोनों ने पूछताद में यूनुस का नाम बताया था। तबसे नेपाली पुलिस यूनुस पर नजर रख रही थी। यह भी जानकारी मिली है कि यूनुस करोड़ों के भारतीय जाली नोट इधर से उधर करवाता था। जाली नोट के कारोबार में पाकिस्तान का भी हाथ माना जाता है। इस कारोबार से आतंकी संगठनों को धन मिलता है, जो भारत विरोधी कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जाली नोट का कारोबार इतना बढ़ चुका है कि बैंकों की एटीएम से भी जाली नोट निकलने के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे में भारत सरकार के विदेश विभाग को चेत जाना चाहिए और यूनुस को भारत में पूछताछ के लिए बुलाना चाहिए। केन्द्र सरकार यदि अपनी इच्छाशक्ति को मजबूत करे ले तो नेपाल सरकार कभी उसकी बात नहीं टालेगा। इधर, सूत्र बता रहे हैं कि नेपाल के पुलिस महानिरीक्षक के पास अभी से फोन आने लगे हैं कि यूनुस के केस को कमजोर किया जाए। हालांकि नेपाली पुलिस के लिए यह सबकुछ इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि बात न सिर्फ मीडिया में लीक हो चुकी है बल्कि कई देश भी यूनुस पर नजर रख रहे हैं।