रविवार, 31 जनवरी 2010

अमेरिका की दोहरी नीति और भारत


दुनिया जानती है-मानती है कि पाकिस्तान ने ही आतंकियों को जन्म दिया। समय-समय पर पाकिस्तान इन आतंकियों को भारत विरोधी कार्यों के लिए इस्तेमाल करता रहा और कर रहा है। भारत ने कभी इसका मुंहतोड़ जवाब नहीं दिया। यदि दिया होता तो पाकिस्तान भारत की ओर कभी बुरी नजरों से देखने का दुस्साहस नहीं करता। भारत के कुछ स्वार्थी नेताओं और यहां के संविधान के लचीलापन का ही नतीजा है कि पाकिस्तान से मुकाबले के पहले वह अमेरिका के सामने दहाड़े मारकर रोता है। तब, अमेरिका किसी अभिभावक की भांति भारत को पुचकार देता है। वह यह भी आश्वासन देता है कि आतंकी हमलों से निपटने में मदद करेगा। यह कहने में भी नहीं चूकता कि पाकिस्तान गलत कर रहा है। इस आश्वासन के साथ जब भारत के नेता अमेरिका से लौटते हैं तो ऐसा लगता है कि वे जंग जीतकर आ रहे हैं। ठीक उसी समय पाकिस्तान का कोई बड़ा नेता जब अमेरिका के पास जाता है तो उसे भी वही आश्वासन मिलता है। यहां पर भारत को दोषी ठहराने से भी अमेरिका पीछे नहीं रहता है। अमेरिका की इस दोहरी नीति से भारत को सावधान हो जाना चाहिए। उसे अमेरिका के सामने रोना और भीख मांगना बंद कर देना चाहिए। भारत के कुछ नेता ऐसे हैं, जो कुर्सीं के लिए कुछ भी कर सकते हैं? मुट्ठी भर नक्सलियों से लडऩे में राज्य व केन्द्र सरकार की योजना बार-बार फेल हो जा रही है। बाबरी मस्जिद के दोषियों को सरकार आज तक सजा नहीं दिला पाई। इससे पता चलता है कि भारत की कानून व्यवस्था कितनी लचीली है? जब भी भारत के नेता अमेरिका के सामने नाक रगडऩे जाते हैं, यहां के लाखों लोगों के खून में उबाल आ जाता है। यह अलग बात है कि लोग अपनी बात को न तो मजबूत ढंग से रख पाते हैं न ही विरोध कर पाते हैं? यहां के लोगों में कूट-कूटकर प्रतिभा भरी-पड़ी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि विदेश जाने वाला अधिकतर भारतीय आज मजबूत स्थिति में हैं। पूरी दुनिया में अमेरिका की तानाशाही बढ़ती ही जा रही है। हर देश कुछ भी करने के पहले उसे सलाम करना नहीं भूलता है। परंतु एशियाई देश अमेरिका की तानाशाही को महसूस करने लगे हैं। भारत के पड़ोसी देश चीन अमेरिका की नीतियों को बहुत पहले ही समझ चुका था और वह उसकी परवाह भी नहीं करता। अमेरिका आज के समय में चीन को अपने ऊपर मंडराता खतरे के रूप में देख रहा है। अमेरिका भारत के इतिहास से परिचित है, इसलिए वह इसे खतरे के रूप में नहीं देखता है। भारतीयों नेताओं को चाहिए कि कम से कम देश हित में अमेरिका से दो टूक बात करने का साहस जुटाएं और खुद को कमजोर न दर्शाएं। तभी अमेरिका अपनी दोहरी नीति को छाड़ेगा। इसके लिए देश के विपक्षी नेताओं को भी साथ देने की जरूरत है। खिचड़ी पार्टियों से बनी केन्द्र सरकार को हर वक्त यही भय सताता है कि कहीं कोई पार्टी उसकी टांग न खींच दे। पिछली बार परमाणु मामले में केन्द्र की सरकार गिरते-गिरते बची थी। इसके बावजूद एक सवाल तो है कि आखिर कब तक अमेरिका के सामने झुकेगा भारत।

बच्चों के पेट पर डाका!


कहते हैं बच्चों में भगवान का वास होता है, उसकी गलतियां भी क्षम्य होती हैं। परंतु, यदि बिहार में मिड डे मील की पड़ताल करें तो चौंक जाना स्वाभाविक होगा कि यहां बच्चों के पेट पर भी डाका डालने से लोग बाज नहीं आते। घोटालेबाजी करनेवालों की नजरें छोटे-छोटे बच्चों के पेट पर हर वक्त जमी रहती हैं। जैसे ही मौका मिला, ये घोटाले को अंजाम दे डालते हैं। मिड डे मील में भी घोटाले का मामला परत-दर-परत सामने आ रहा है। यह अलग बात है कि इसमें एक साथ करोड़ों के घोटाले का मामला सामने नहीं आया है। इसकी राशि टुकड़े-टुकड़े में स्कूलों तक पहुंचती है। ऐसे में घोटाले का स्वरूप छोटा-छोटा परंतु आंकड़े बड़े हैं। यदि सीबीआई मिड डे मील की इमानदारी से जांच करे तो अबतक हुए घोटाले का भेद खुलना तय है। प्राथमिक व मध्य विद्यालयों में पढऩे वाले गरीब बच्चों को पढ़ाई के प्रति रुचि बनी रहे और वे प्रतिदिन पढऩे आएं, इसी खातिर इस योजना की शुरुआत की गई थी। इससे पहले लाखों गरीब अभिभावक इसलिए अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते थे कि वे खेतों में काम करते थे। देश में सबसे पहले इस योजना की शुरुआत मद्रास सिटी में की गई थी। उद्देश्य था कि समाज से वंचित गरीब बच्चों को भी भरपेट भोजन मिले। इससे स्कूल आने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी थी। इसके पश्चात सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में 28 नवंबर 2001 को इसे पूरे देश में लागू करने का निर्देश दिया। इस योजना के लागू होते ही हजारों लोगों को जैसे रोजगार मिल गया। इस योजना में अधिक से अधिक कमाई कैसे हो, इसपर शिक्षक से लेकर स्कूल के प्रधानाध्यापक फिर जिला शिक्षा अधिकारी तक विचार-विमर्श करते हैं। सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, सिवान, शिवहर सहित कई जिले में दर्जनों ऐसे स्कूल हैं, जहां छात्र तो सौ हैं परंतु पच्चीस-तीस ही नियमित आते हैं। ऐसे में हजारों रुपए प्रतिमाह एक स्कूल से सीधे आमदनी हो जाती है। इसके पश्चात चावल की निम्न क्वालिटी का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार द्वारा जारी मेन्यू में खिचड़ी भी बच्चों को दी जाती है। इसमें आए दिन कीड़े मिलने की शिकायतें बिहार में आम बात है। कई बार कीड़ों की संख्या इतनी अधिक रहती है कि बच्चे भोजन करते ही गंभीर रूप से बीमार हो जाते हैं। इनके अभिभावकों के हो-हल्ला के बाद प्रशासन की नींद खुलती है। जांच में घोटाले का मामला सामने आता है। इस योजना में गड़बड़ी के लिए अबतक सैकड़ों कर्मचारी को दोषी पाया जा चुका है। कार्रवाई के नाम पर अधिकतर मामलों में पैसे लेकर 'फूल' के 'चाबुक' चलाए गए, परंतु कोई कार्रवाई नहीं की गई। सरकारी मेन्यू के अनुसार, बच्चों को सोमवार को चावल व कढ़ी, मंगलवार को चावल-दाल व सब्जी, बुधवार को खिचड़ी, गुरुवार को सब्जी पोलाव, शुक्रवार को चावल व छोला, शनिवार को खिचड़ी व चोखा देना है। परंतु बिहार के दर्जनभर स्कूलों में ही इसका पालन हो पाता है। वह भी चालीस फीसदी ही। अधिकतर स्कूलों में गुरुजी के लिए भी इसी योजना से भोजन बनता है। उनका भोजन उनके घर की तरह ही स्वादिष्ट होता है। पहली जुलाई को बिहार के विधानसभा में भाकपा विधायक ने गड़बड़ी मामले को मजबूती से उठाया था। मानव संसाधन मंत्री इसका कोई जवाब नहीं दे सके थे। नतीजतन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा था। उन्होंने इस मामले की जांच सदन की कमिटी से कराने की बात कही। बावजूद बच्चों के भोजन में घपला करने से शिक्षक से लेकर अधिकारी तक बाज नहीं आ रहे हैं। सभी को अपना-अपना हिस्सा चाहिए। परंतु बड़े होने पर जिसके कंधे पर देश की बागडोर आने वाली है। उसकी चिंता किसी को नहीं है। कई स्कूलों में तो अभिभावकों ने अपने बच्चों को स्कूल में खाने से मना कर दिया तो कई ने अपने बच्चों को विद्यालय भेजना ही बंद कर दिया। यही है बिहार के मिड डे मील का सच।

शनिवार, 23 जनवरी 2010

मुंबई हमले के समय कहां थे मराठी?

हमारा संविधान संप्रभु है। यह सभी भारतीय नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करता है। परंतु, विडंबना यह है कि बिहार का नागरिक कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकता। नगालैंड में घर नहीं बना सकता और अब महाराष्ट्र में टैक्सी नहीं चला सकता? हां, कश्मीर में जमीन खरीदने और नगालैंड में घर बनाने के लिए यदि ऊंची पैरवी है तो सपना पूरा हो सकता है। यानी सारे नियम-कानून गरीब व मध्यम वर्ग के लिए? ऊंच वर्ग के लोगों के लिए नियम के ऊपर नियम। महाराष्ट्र सरकार ने बीस जनवरी 2010 को मनसे प्रमुख राज ठाकरे के नक्शे कदम पर चलते हुए यह जताने का प्रयास किया था कि वह मराठियों की हितैषी है। इसके लिए महाराष्ट्र के कैबिनेट ने टैक्सी के परमिट मामले में एक बड़ा फैसला किया। टैक्सी का परमिट उसे ही दिया जाएगा, जिसे मराठी पढऩे-लिखने और बोलने आएगा। इसके अलावा वह महाराष्ट्र में पन्द्रह सालों से रहता हो। इस फैसले से देश के सभी लोग स्तब्ध। महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी के गठबंधन वाली सरकार है। इसके बावजूद केन्द्र सरकार की चुप्पी ने सबकुछ बयां कर दिया। कसूर किसका, केन्द्र या राज्य या फिर राजनीति स्वार्थ का। गए दिनों राज ठाकरे के लोगों ने बिहारी टैक्सी चालकों की खुलेआम पिटाई की थी। केन्द्र यह सब मूकदर्शक हो देखती रही थी। इसके बाद भी मनसे के तेरह विधायक जीत गए। इससे साबित हो रहा है कि ‌हावी हो रहा क्षेत्रवाद। केन्द्र सरकार चाहकर भी इसपर अंकुश नहीं लगा पा रही है। वजह सरकार के कई पांव, एक भी बैठा तो औंधे मुंह गिरना तय। हालांकि जब देश भर में महाराष्ट्र सरकार के फैसले की छीछालेदर शुरू हुई तो अगले ही दिन मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण पलटते दिखे। कुछ भी हो, इस तरह की हरकतों से देश के संविधान पर अंगुली उठती है। विदेशी मुल्कों में भारत की शाख पर धब्बा लगता है? 2008 में 26 दिसंबर को जब पाक आतंकियों ने मुंबई घेर लिया था और दो सौ लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। उस वक्त राज ठाकरे और उनके लोगों ने मराठावाद का नारा क्यों नहीं दिया? भारतीय सुरक्षाकर्मी यदि उस वक्त मैदान में नहीं उतरे होते तो मुंबई को तीन दिनों में आतंकियों से छुटकारा नहीं मिलता। उस वक्त महाराष्ट्र की मदद करनेवाला न तो मराठी था और न ही मुंबई निवासी। मदद करनेवाला सुरक्षाकर्मी सिर्फ भारतीय और सिर्फ भारतीय थे। तब, क्यों नहीं राज ठाकरे आगे आए ? क्यों नहीं महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री आगे आए? तब सबको जान का खतरा था। कुछ राजनैतिक ताकतें क्षेत्रवाद को बढ़ावा दे रही हैं। महाराष्ट्र सरकार इस मामले में कुछ ज्यादा ही आगे है। महाराष्ट्र सरकार को इस बात का अहसास होना चाहिए कि महाराष्ट्र में देश के कोने-कोने के लोग रहते हैं, सभी की मिली-जुली मेहनत से आज का फला-फुला महाराष्ट्र है। क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वाले लोगों के खिलाफ केन्द्र को कड़े कदम उठाने चाहिए। नहीं तो एक दिन आएगा, जब राजनीतिक स्वार्थ के चलते हर राज्य में क्षेत्रवाद का बीज पनपेगा। और, इसका असर देश के विकास पर पड़ेगा।

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

घर में मिठास, राजनीति में कड़वाहट


पिछले दिनों कृषि मंत्री शरद पवार ने चीनी की बढ़ती दर पर बयान दिया था कि वे ज्योतिषी नहीं हैं, जो यह बता सकें कि चीनी के दाम कब घटेंगे। शरद के इस बयान से जाहिर होता है कि भारत के गरीबों को नमक की चाय पिलाकर खुद के घर में मिठास बनाए रखना चाहते हैं। शरद के परिवार में दर्जनभर से अधिक चीनी मिले हैं, ऐसे में जितने दाम बढ़ेंगे, उनके घर में मिठास उतनी ही बढ़ेगी। शरद के बयान पर राजनीति में उबाल आया तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हस्तक्षेप करना पड़ा। मनमोहन का बयान आया कि महंगाई कम करने के लिए केन्द्र सरकार हर संभव कदम उठाएगी। यह खबर अखबारों में प्रथम पेज पर प्रमुखता से छापी गई। शरद मौके की नजाकत को देखते हुए एक सप्ताह चुप्पी साध बैठ गए। पुन: बीस जनवरी को उन्होंने फिर बयान दिया कि दूध के दाम में बढ़ोतरी होगी। उनके इस बयान से हर वर्ग के लोग उबल पड़े। जगह-जगह लोगों ने प्रदर्शन भी किया। विपक्ष ने तो बयानबाजी की पोटली खोल दी। हर तरफ निंदा ही निंदा। कई अर्थशास्त्रियों ने दबी जबां में कह डाला-'लगता है शरद के परिवारवाले अब दूध का धंधा शुरू करनेवाले हैं'। आंकड़े गवाह हैं कि किसी भी नेता के परिजन जिस चीज का व्यवसाय करते हैं। संबंधित विधायक या सांसद उसी विभाग का मंत्री बनना चाहते हैं। वजह साफ है कि इससे उनके परिवार को लाभ मिलेगा ताकि सात पुश्त बिना कमाए रोटी-मक्खन मिलता रहे। स्व. इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री थी और राजीव गांधी ने सोनिया गांधी से शादी कर ली थी। तब, इंदिरा ने नागरिकता के कानून में संशोधन कर दिया ताकि सोनिया को भारत का नागरिक बनने में कोई परेशानी न हो। पिछले सप्ताह ही रेल मंत्री ममता बनर्जी ने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के 'आजीवन फ्री रेलवे पास' को रद कर दिया। लालू ने रेल मंत्री से हटते-हटते खुद के लिए कई सुविधाएं सुरक्षित करवा लिया था। यह अलग बात है कि ममता एक-एक कर सभी सुविधाओं को रद कर रही हैं। पहले से महंगाई से त्राहि-त्राहि कर रहे गरीब से चाय भी दूर होती जा रही है। अब दूध के महंगा होने से बच्चे भी दूध-रोटी से महरूम हो जाएंगे। ऐसे में यह सवाल मंडरा रहा है कि शरद के परिवार वाले क्या अब दूध बेचेंगे? यह तय है कि दूध के दाम तुरंत नहीं भी बढ़ते हैं तो आने वाले समय में बढ़ेंगे? शरद ने चीनी की बढ़ती कीमतों का ठीकरा पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार के सिर भी फोड़ा था। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार वही नेता हैं, जिन्होंने 1999 में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री न बनाने के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग होकर यह पार्टी बनाई थी। शरद केंद्र सरकार में कृषि मंत्री के अलावा उपभोक्ता मामलों और खाद्य और लोक वितरण विभाग के भी मंत्री हैं। महाराष्ट्र में इन्हें एक बड़े किसान के रूप भी जाना जाता है। चार बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एवं छह बार लोकसभा के लिए चुने जा चुके और प्रधानमंत्री के प्रबल दावेदार शरद पवार की गिनती देश के बड़े नेता के रूप में होती है। सरकार के बनने-बिगडऩे में भी इनकी अहम भूमिका होती है। ऐसे में उत्तर भारत में दूध की कमी के संबंध में बयान देकर वे एक बार फिर विवादों में फंस गए हैं। शरद ने कहा कि उत्तरी राज्यों में उत्पादन में कमी से दूध की कमी हो गई है। यह कमी करीब अठारह लाख टन है। इधर, सूत्रों का दावा है कि सरकारी नीतियों के चलते दूध की कमी हुई है। इससे पहले ही निजी दूधियों ने दूध की कीमत 32 रुपए लीटर कर दी है, जबकि मदर डेयरी व अमूल के दूध की कीमत 28 रुपए लीटर है। अक्टूबर में दिल्ली समेत कई राज्यों में दूध के दाम दो रुपए लीटर बढ़े थे। इधर, आजादी के बाद भी बिहार की गिनती चीनी के मुख्य उत्पादक राज्य में होती थी। नीतीश ने सत्ता में आने के बाद बिहार में बंद पड़ी दस चीनी मिलों को खोलने के लिए केन्द्र से अनुमति मांगी, जिसे देने में केन्द्र को साढ़े तीन वर्ष लग गए। अक्टूबर 2009 में केन्द्र ने अनुमति दी, इसके पश्चात यहां चीनी मिल खोलने की सुगबुगाहट शुरू हुई। नीतीश सरकार ने इथेनाल बनाने की अनुमति भी मांगी थी। बिहार के पूर्णिया की बंद चीनी मिल बनमंकी एशिया की सबसे बड़ी मिल है। आज यदि ये मिलें चालू होतीं तो चीनी संकट इस तरह सर पे सवार नहीं होता। इन समस्याओं से अधिक शरद पवार को क्रिकेट के व्यवसायीकरण में रुचि रही है। शरद के इस तरह के बयान से यह भी अंदेशा हो रहा है कि कहीं कांग्रेस अपनी पुरानी नीति पर तो नहीं लौट रही है। यहां बता दें कि कांग्रेस पहले उत्पादन बढ़ाने की जगह उत्पादन को नियंत्रित कर व्यावसायिक लाभ में बदलने का काम करती रही है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि शरद का राजनीति ढलान शुरू हो गया है। कुछ भी हो शरद के इस बयान का पुरजोर विरोध विपक्ष और आम लोगों ने नहीं किया तो इनकी बयानबाजी और मनमानी बढ़ेगी, जिसका असर गरीबों पर सबसे ज्यादा पड़ेगा।

रविवार, 17 जनवरी 2010

एक गुमनाम रेलवे मॉडलर


यह कहानी विदेशों में विख्यात पर अपने ही देश में गुमनाम एक ऐसे रेलवे मॉडलर की है, जो 78 वर्ष की उम्र में भी तीस साल वाले जज्बे के साथ कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर ऐ इंसान की तर्जुमा पर लगातार काम करता जा रहा है। इस मॉडलर की तकनीकी राय को जापान की टेनशोडो कंपनी आभार के साथ स्वीकार कर चुकी है। अपने देश के डीआरएम स्तर के अधिकारी प्रशंसा कर चुके हैैं। पर, आज तक उनके माडल को मान्यता नहीं मिली। मेट्रो चीफ ई. श्रीधरण हाल ही में उनके द्वारा मांगे जाने पर रामेश्वरम स्थित पुल के बारे में तकनीकी जानकारियां उपलब्ध करा चुके हैं। पांच दशक से रेलवे मॉडल बना रहे सीतामढ़ी के कोट बाजार निवासी इस रेलवे माडलर का नाम है देवी प्रसाद अग्रवाल। देवी दर्जनों वर्किंग स्टीम इंजन, डीजल इंजन, इलेक्ट्रिक इंजन का मॉडल बना चुके हैं। आजकल वे आनेवाले अत्याधुनिक रेलवे मॉडल का खाका बनाने का प्रयास कर रहे हैं। चौंकाने वाली बात है कि उन्होंने इंजीनियरिंग या कोई तकनीकी पढाई नहीं की है। मीडिया से कोसों दूर रहने वाले देवी 21वीं सदी में भी स्टीम इंजन को हटाने के खिलाफ हैं। उनका दावा है कि उनका रेल मॉडल भारतीय रेल मॉडल से दो दशक आगे है। वे भावी पीढ़ी को रेलवे का वर्किंग मॉडल बनाना सिखाना चाहते हैं। देवी प्रसाद कहते हैं कि खेल-खेल में 1948 में सबसे पहले उन्होंने एक डमी रेल इंजन बनाया, जिस पर सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल, काशी से उन्हें स्वर्ण जयंती पुरस्कार मिला। स्वर्ण जयंती समिति के सभापति स्व. डॉ. अमरनाथ झा ने उन्हें प्रेरित किया। 1955 में इंग्लैंड की पत्रिका हॉबिज वीकली पढ़कर उन्हें इंसपाइरेशन मिला और उन्होंने रेलवे मॉडल बनाने का प्रयास शुरू किया। 1956 में अमेरिका के सूचना विभाग के पास उन्होंने पत्र लिखकर तीन जानकारियां मांगीं। रेलवे मॉडल के पाट्र्स कहां-कहां बनते हैं, इसे कैसे मंगाएं और भुगतान कैसे करें? यहां की मदद से उनका संपर्क यूनेस्को से हुआ। यूनेस्को की ओर से उन्हें भरपूर मदद मिली। यहां तक कि विदेशी मुद्रा उपलब्ध कराने में भी संस्था ने सक्रिय भूमिका निभाई। इसी क्रम में जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका, जापान व आस्ट्रिया से रेलवे मॉडल का इक्विपमेंट, लिट्रेचर और पाट्र्स मंगवाए, लेकिन वहां के पाट्र्स भारतीय रेल से मेल नहीं खाते थे। यहां की रेल ब्रिटेन के इर्द-गिर्द घूमती थी। इसमें भारत के रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड ऑर्गनाइजेशन ने सहायता की और ब्लू पिं्रट उपलब्ध कराए। इस ब्लू प्रिंट को 45 फीसदी रिड्यूस कर उन्होंने स्टीम इंजन का मॉडल बनाया, जो न सिर्फ पटरियों पर दौड़ा, बल्कि छुक-छुक की आवाज भी निकाली। इसी क्रम में अमेरिका के एसी गिल बर्ट कंपनी के रिटायर्ड इंजीनियर की मदद से उन्होंने डीजल इंजन का पाट्र्स मंगवाया। इसी दौरान अमेरिका की संस्था नेशनल मॉडल रेल रोड एसोसिएशन से डिजिटल कमांड कंट्रोल की चर्चा हुई। इससे प्रभावित होकर इस संस्था ने इन्हें सम्मानित सदस्य बना लिया। 1965 में यूनेस्को के सहयोगी विभाग को युद्धपोत का मॉडल बनाकर भेजा, जिसे प्रदर्शनी में रखा गया। जापान की टेनशोडो कंपनी ने एक मॉडल बनाकर विचार-विमर्श के लिए उनके पास भेजा। उनकी राय से प्रभावित होकर जापान ने आभार जताया था। हाल ही में उन्होंने ई. श्रीधरण को पत्र लिखकर रामेश्वरम पुल से संबंधित तकनीकी जानकारी मांगी थी। श्रीधरण ने अपने हाथों से स्केच बनाकर उनके पास भेजा और आश्वासन दिया कि भविष्य में उनकी हर सहायता करेंगे। देवी प्रसाद बताते हैं कि उनके मॉडल को देखने पूर्व में गोरखपुर के डीपीआरओ, समस्तीपुर के डीआरएम श्री राव सहित कई अफसर आ चुके हैं। उन्हें मॉडल पसंद भी आए, बावजूद किसी ने दोबारा उनकी सुध नहीं ली। देवी प्रसाद का कहना है कि फिर भी वे कभी निराश नहीं हुए और जच्बे के साथ रेलवे मॉडल बना रहे हैं। उन्होंने बताया कि कभी एक रेलवे मॉडल बनाने में तीन हजार खर्च होते थे, अब दस हजार से अधिक लग रहे है''। पैसे कहां से आते है, के जवाब में उन्होंने कहा कि उनके इस कार्य में उनके विदेश में रह रहे परिवार के कुछ सदस्य और मित्र मदद करते हैं। उन्होंने कहा कि सीतामढ़ी में साइंस म्यूजियम बना तो वे अपने सभी रेल मॉडलों को दान में दे देंगे।

सोमवार, 11 जनवरी 2010

आशा प्रभात : एक अदम्य इच्छाशक्ति का नाम


आशा प्रभात, एक अदम्य इच्छाशक्ति का नाम-जो पुरातत्ववेता बनते-बनते बन गईं कवयित्रि और कथाकार। आज ये किसी परिचय की मुहताज नहीं हैं। इनकी किताबें विदेशों में भी सम्मानीय स्थान पा चुकी हैं। साहित्य की दुनिया में आज इनका नाम भी आदर के साथ लिया जाता है। तभी तो देश के विख्यात शायर बसीर भद्र ने सीतामढ़ी अखिल भारतीय मुशायरे के दौरान कहा था कि वे सीतामढ़ी को दो कारणों से ही जानते हैं-एक जानकी जन्म स्थली के रूप में, दूसरा आशा प्रभात की वजह से। बेपनाह मेहनत और लगन का ही नतीजा है कि आज ये दो-दो भाषाओं (हिन्दी व उर्दू) में किताबें लिखती हैं। इनकी नई किताबें आने का इंतजार भी हजारों पाठक बेसब्री से करते हैं। साहित्य रचना के साथ-साथ ये सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। लायनेस क्लब सीतामढ़ी वेस्ट की वे सक्रिय सदस्या तथा फिलहाल पीआरओ भी हैं। घर-गृहस्थी की व्यस्तता में पढऩे के लिए समय निकाल लेना कोई आसान काम नहीं है। बावजूद ये प्रतिदिन किताबों से उलझने और लेखन के लिए समय निकाल लेती हैं। ये शादी के बाद सीतामढ़ी में बस गईं। हालांकि उनका बचपन पूर्वी चंपारण जिले के एक छोटा-सा संपन्न कस्बा नरकटिया बाजार में बीता। पिता की प्रेरणा से उनके मन में साहित्य का बीज प्रस्फुटित हुआ। प्रश्नों के माध्यम से वे पिता को कुरेदती और उन्हें बहुत कुछ बताने पर आमादा करती। इनके पिता हर माह दर्जनों किताबें खरीदते थे और आशा सातवीं कक्षा में ही चुपके-चुपके सब पढ़ डालती थीं। आशा ने स्कूली काल में ही रवीन्द्र साहित्य, प्रेमचन्द्र, प्रसाद अमृतलाल नागर, अज्ञेय से लेकर अधिकांश बड़े लेखकों की कृ तियों का अध्ययन कर डाला। काव्य में सुभद्रा कुमारी चौहान, माखन लाल चतुर्वेदी, दिनकर, निराला तथा नेपाली की कविताएं आशा को कुछ अधिक ही भाती थीं। किताबों में उलझे देख कई बार इनके पिता भौंचक रह जाते थे, लेकिन आशा की रुचि देख ये मौन हो जाते थे। आशा ने दसवें वसंत में ही अनगिनत कविताओं और गजलों का संग्रह कर लिया। तब आशा के पिता को नहीं पता था कि एक दिन नन्हीं आशा खुद कविताएं, गजलें, कहानियां तथा उपन्यास लिखेंगी। आशा का जुनून और लगन का ही नतीजा है कि उनकी रचनाओं का भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त सभी भाषाओं में अनुवाद कराया गया। इतना ही नहीं विदेशों में भी उनकी कृतियों तथा रचनाओं को लोग चाव से पढते हैं। आशा के लिखे उपन्यास ''धुंध में उगा पेड़'' का कराची (पाकिस्तान) के स्तरीय पत्रिका मंशूर में धारावाहिक प्रकाशन 1995 में हुआ है तथा वह बहुत प्रशंसित हुआ। वर्ष 1996 में प्रकाशित इनका उर्दू, नज्मो-गजलों का संग्रह 'मरमूज'1996 के आईएएस के प्रश्न पत्र में स्थान पा चुका है। वर्ष 1999 में इन्हें एबीआई द्वारा वूमेन आफ दी इयर अवार्ड से नवाजा गया। वर्ष 2000 में एबीआई द्वारा ही प्रोफेशनल वूमेन्स एडवाइजर्स बोर्ड के लिए इन्हें नामित किया है। आशा की प्रकाशित पुस्तकों में 'दर्राचे' काव्य संग्रह (हिन्दी), 'जाने कितने मोड़' उपन्यास (हिन्दी-उर्दू) 'कैसा सच' कहानी संग्रह (हिन्दी) तथा अनुवादित कहानियों का संग्रह सहित कई हैं। वहीं, 'आज के अफसाने' उर्दू में शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। हिन्दी तथा उर्दू दोनों जुबानों में समान अधिकार रखनेवाली आशा प्रभात को बिहार राष्ट्रभाषा परिषद पटना द्वारा ''साहित्य सेवा सम्मान'', बिहार उर्दू अकादमी पटना-खसूसी सम्मान, उपन्यास ''धुंध में उगा पेड़'' के लिए प्रेमचन्द्र सम्मान व दिनकर सम्मान, दरीचे के लिए साहित्य संगम पुरस्कार और ''उर्दू दोस्त सम्मान'' पुरस्कार मिल चुका है। करीब ढाई दशकों से ये आकाशवाणी व दूरदर्शन की लोकप्रिय कवयित्रि के रूप में भी विख्यात हैं। हिन्दी में साहित्य अकादमी की पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य', 'कादम्बिनी' 'गंगनाचल', 'हंस', 'आजकल', 'शायर', 'किताबनुमा' सहित दर्जनों पत्रिकाओं में इनकी कविताएं, गजलें व कहानियां वर्षों से प्रकाशित होती रही हैं और हो रही हैं। बकौल आशा प्रभात-''पढऩा-लिखना कभी का शौक रहा अब मेरी मजबूरी बन चुकी है।''

बुधवार, 6 जनवरी 2010

कोमा में समाजवादी पार्टी!



समाजवादी पार्टी के महासचिव व प्रवक्ता अमर सिंह ने छह जनवरी को सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही सपा में भूचाल आ गया और सपा चली गई कोमा में। अमर सिंह फिलहाल दुबई में हैं और वहीं से इस्तीफा भेजे हैं। अमर ने इसकी वजह अपने खराब स्वास्थ्य को बताया है। उनका कहना है कि वे दूसरे के गुर्दे पर जी रहे हैं, ऐसे में चिकित्सकों ने उन्हें भाग-दौड़ से मना किया है। पार्टी में विभिन्न पदों पर रहते हुए यह मुमकिन नहीं था। सो, उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। उनके इस्तीफे को कांग्रेस और विपक्ष के नेताओं ने नाटक करार दिया है। यह भी कहा है कि अमर-मुलायम के बीच यह नया नाटक है। इधर, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने कहा कि वे अमर सिंह को हर हाल में मना लेंगे। सर्वविदित है कि अमर सिंह के गुर्दे का प्रत्यारोपण तीन महीने पहले सिंगापुर में हुआ था। इस ऑपरेशन के बाद कोई भी मरीज पूर्णरूपेण स्वस्थ नहीं रह सकता है। यदि हर पल वह परहेज से नहीं रहेगा तो उसकी जान कभी भी जा सकती है। यह अमर सिंह ही हैं कि तीन माह में ही माइक पकड़कर भाषण भी देने लगे। चूंकि गुर्दे रोग के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है। ऐसे में अमर सिंह को वास्तव में आराम की जरूरत है। इसके बावजूद देश के किसी भी पार्टी के नेता को अमर पर यकीन नहीं है कि वास्तव में उनका स्वास्थ्य खराब है। यहां तक कि उनकी पार्टी में भी एकरूपता नहीं है। वजह है-अमर सिंह शुरू से ही एक तिकड़मबाज नेता रहे हैं। वे अपने स्वार्थ के लिए कब क्या बोल देंगे, कहना मुश्किल है। कब अपने ही बयान से मुकर जाएंगे और मीडियाकर्मी को कटघरे में लाकर खड़े कर देंगे? मुलायम के दाहिना हाथ और हनुमान के रूप में जाने-जाने वाले अमर यदि इस्तीफा वापस नहीं लेते हैं तो सपा पर इसका असर पड़ेगा। हालांकि पार्टी के नेता उन्हें मनाने में जुट गए हैं। इसके पहले भी अमर सिंह इस्तीफा दे चुके हैं, जिसे मुलायम सिंह फाड़ कर फेंक चुके हैं। अमर ने दुबई से एक इलेक्ट्रोनिक चैनल को बताया कि उनका किसी से कोई मतभेद नहीं है। वे पार्टी में बने भी रहेंगे, वे सिर्फ पद से इस्तीफा दे रहे हैं। यहां बता दें कि महासचिव व प्रवक्ता के अलावा संसदीय बोर्ड की सदस्यता से भी अमर सिंह ने इस्तीफा दे दिया है। ऐसे एक पक्ष का कहना है कि अमर का मुलायम के साथ कुछ दिनों से अंदरूनी मतभेद चल रहा था। यही वजह है कि अमर ने त्यागपत्र दे दिया है। कुछ भी हो, फिलहाल सपा तो कोमा में चली गई है जिससे उबरने में उसे वक्त लगेगा।

सोमवार, 4 जनवरी 2010

कराची से आ रहा जाली नोट!


यूनुस अंसारी की गिरफ्तारी नेपाल पुलिस के लिए एक बड़ी सफलता मानी जा रही है। यूनुस से की गई पूछताछ में पुलिस को कई महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं। नेपाल पुलिस यूनुस से अभी अनगिनत सवालों का जवाब चाहती है। मसलन-दाउद इब्राहिम के संपर्क में यूनुस कैसे रहता था। उसका संपर्क सीधे था या फिर दाउद के शातिर के जरिए। भारतीय जाली नोट किसके माध्यम से यूनुस के पास पहुंचते थे। लाखों के जाली नोट आखिर पुलिस की आंखों से बचकर कैसे गंतव्य तक पहुंचाया जाता था। दाउद वर्तमान में कहां रह रहा है? इस तरह के अनगिनत सवाल नेपाल पुलिस के दिमाग में घूम रहा है। भारत की पुलिस भी इसका जवाब जानने के लिए बेचैन है। वहीं, पाकिस्तान के आईएसआई भी चौकस है कि यूनुस नेपाली पुलिस के सामने कहीं अपना मुंह न खोल दे। पाकिस्तान भी पूरे मामले पर नजर गड़ाये हुए है। इधर, नेपाल पुलिस का मानना है कि एक दिन में यूनुस से इतने सारे सवाल नहीं पूछे जा सकते हंै। जाहिर है कि इतनी आसानी से यूनुस गोपनीय राज खोलनेवाला नहीं है। ऐसे में नेपाल पुलिस ने यूनुस समेत तीन लोगों को पूछताछ के लिए दस दिनों के लिए रिमांड पर ले लिया है। पुलिस मान रही है कि वह इतने दिनों में यूनुस से सच उगलवा लेगी। जानकारी यह भी मिली है कि युनूस को बचाने के लिए उसके पक्षधर रणनीति बनाने में जुट गए हैं। ये हर हाल में यूनुस को बचाना चाहते हैं। इधर, सूत्र बता रहे हैं कि आईएसआई के नेतृत्व में पाकिस्तान के कराची, रावलपिंडी, क्वेटा के सरकारी प्रिंटिंग प्रेसों में अरबों के भारतीय जाली नोट छापे जा रहे हैं। पाकिस्तान में पांच सौ और हजार के ही नोट अधिक छापे जाते हैं। इसके पश्चात विभिन्न माध्यम से ये रुपए भारतीय क्षेत्रों में खपाने के लिए भेजे जाते हैं। यूनुस के पास मिले पच्चीस लाख रुपए पांच-पांच सौ के ही थे। सीमावर्ती क्षेत्रों की भारतीय पुलिस चौकस है। हालांकि, भारत सरकार की ओर से यूनुस मामले में अबतक कोई पहल नहीं की गई है। भारत को शुरू से ही संदेह रहा है कि जाली नोट का रैकेट पाकिस्तान के संरक्षण में ही फल-फूल रहा है। हालांकि पाकिस्तान इससे मुकरता रहा है। यूनुस यदि सच बोल देता है तो भी पाकिस्तान कतई नहीं मानेगा कि जाली नोट से उसका कुछ भी लेना-देना है। फिलहाल भारत, पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश सहित कई देशों की निगाहें यूनुस की ओर हैं। यूनुस यदि कबूलता है कि जाली नोट उसे पाकिस्तानी एजेंटों के माध्यम से मिलता है तो विश्व बिरादरी में पाकिस्तान की छीछालेदर तय है। हालांकि सूत्र बता रहे हैं कि यूनुस के हाथ इतने लंबे हैं कि वह जल्द ही पुलिस हिरासत से बाहर होगा।

रविवार, 3 जनवरी 2010

पिता पूर्व मंत्री, बेटा 'डॉन'

नेपाल के पूर्व भूमि सुधार मंत्री का बेटा 'डॉन' व दाऊद इब्राहिम का दायां हाथ। सुनकर चौंक जाना तय है, परंतु यह सौ फीसदी सच है। नेपाल में दाऊद का दाहिना हाथ और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी का एजेंट यूनुस अंसारी को नेपाल पुलिस ने दो जनवरी की रात गिरफ्तार कर लिया। इसके साथ ही कई देशों की नजरें नेपाल पर जा टिकीं। वजह थी-सभी यूनुस के जरिए दाउद के बारे में जानना चाहते थे। यूनुस के पास से बीस लाख से अधिक भारतीय जाली नोट भी मिले। इसके बारे में नेपाली पुलिस कुछ भी बताने से इनकार कर रही है। पुलिस यह मानती है कि यदि ज्यादा जानकारी मीडिया को दी जाएगी तो जांच प्रभावित होगी। एक पक्ष यह भी मान रहा है कि जल्द ही इस मामले को नेपाली पुलिस दबा देगी। वजह साफ है कि यूनुस के पिता सलीम मियां अंसारी राजा ज्ञानेन्द्र के शासन काल में भूमि सुधार मंत्री रह चुके हैं। वहीं, यूनुस खुद भी एक पार्टी का गठन कर चुनाव लड़ चुका है। यूनुस के पिता प्रभावशाली के साथ पैसे वाले व्यक्ति हैं, ऐसे में यहां की पुलिस पर राजनीति दबाव पडऩा तय माना जा रहा है। भारतीय पुलिस जानना चाहती है कि यूनुस के पास जाली नोट कहां से आए, परंतु यह तभी संभव है, जब भारत सरकार नेपाल सरकार से संपर्क साधे। नेपाल के पुलिस महानिरीक्षक की माने तो भारत से प्रत्यर्पण संधि न होने से यूनुस को भारत के हवाले नहीं किया जा सकता है। यूनुस नेपाल का ही निवासी है। वह न सिर्फ नकली नोट का बड़ा कारोबारी है बल्कि हथियार भी सप्लाई करता रहा है। भारत के मध्यप्रदेश में गए दिनों जाली नोटों के साथ अतीक मोहम्मद व रमेश गुप्ता को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। दोनों नेपाल के ही रहनेवाले हैं। दोनों ने पूछताद में यूनुस का नाम बताया था। तबसे नेपाली पुलिस यूनुस पर नजर रख रही थी। यह भी जानकारी मिली है कि यूनुस करोड़ों के भारतीय जाली नोट इधर से उधर करवाता था। जाली नोट के कारोबार में पाकिस्तान का भी हाथ माना जाता है। इस कारोबार से आतंकी संगठनों को धन मिलता है, जो भारत विरोधी कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जाली नोट का कारोबार इतना बढ़ चुका है कि बैंकों की एटीएम से भी जाली नोट निकलने के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे में भारत सरकार के विदेश विभाग को चेत जाना चाहिए और यूनुस को भारत में पूछताछ के लिए बुलाना चाहिए। केन्द्र सरकार यदि अपनी इच्छाशक्ति को मजबूत करे ले तो नेपाल सरकार कभी उसकी बात नहीं टालेगा। इधर, सूत्र बता रहे हैं कि नेपाल के पुलिस महानिरीक्षक के पास अभी से फोन आने लगे हैं कि यूनुस के केस को कमजोर किया जाए। हालांकि नेपाली पुलिस के लिए यह सबकुछ इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि बात न सिर्फ मीडिया में लीक हो चुकी है बल्कि कई देश भी यूनुस पर नजर रख रहे हैं।