सोमवार, 11 जनवरी 2010

आशा प्रभात : एक अदम्य इच्छाशक्ति का नाम


आशा प्रभात, एक अदम्य इच्छाशक्ति का नाम-जो पुरातत्ववेता बनते-बनते बन गईं कवयित्रि और कथाकार। आज ये किसी परिचय की मुहताज नहीं हैं। इनकी किताबें विदेशों में भी सम्मानीय स्थान पा चुकी हैं। साहित्य की दुनिया में आज इनका नाम भी आदर के साथ लिया जाता है। तभी तो देश के विख्यात शायर बसीर भद्र ने सीतामढ़ी अखिल भारतीय मुशायरे के दौरान कहा था कि वे सीतामढ़ी को दो कारणों से ही जानते हैं-एक जानकी जन्म स्थली के रूप में, दूसरा आशा प्रभात की वजह से। बेपनाह मेहनत और लगन का ही नतीजा है कि आज ये दो-दो भाषाओं (हिन्दी व उर्दू) में किताबें लिखती हैं। इनकी नई किताबें आने का इंतजार भी हजारों पाठक बेसब्री से करते हैं। साहित्य रचना के साथ-साथ ये सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। लायनेस क्लब सीतामढ़ी वेस्ट की वे सक्रिय सदस्या तथा फिलहाल पीआरओ भी हैं। घर-गृहस्थी की व्यस्तता में पढऩे के लिए समय निकाल लेना कोई आसान काम नहीं है। बावजूद ये प्रतिदिन किताबों से उलझने और लेखन के लिए समय निकाल लेती हैं। ये शादी के बाद सीतामढ़ी में बस गईं। हालांकि उनका बचपन पूर्वी चंपारण जिले के एक छोटा-सा संपन्न कस्बा नरकटिया बाजार में बीता। पिता की प्रेरणा से उनके मन में साहित्य का बीज प्रस्फुटित हुआ। प्रश्नों के माध्यम से वे पिता को कुरेदती और उन्हें बहुत कुछ बताने पर आमादा करती। इनके पिता हर माह दर्जनों किताबें खरीदते थे और आशा सातवीं कक्षा में ही चुपके-चुपके सब पढ़ डालती थीं। आशा ने स्कूली काल में ही रवीन्द्र साहित्य, प्रेमचन्द्र, प्रसाद अमृतलाल नागर, अज्ञेय से लेकर अधिकांश बड़े लेखकों की कृ तियों का अध्ययन कर डाला। काव्य में सुभद्रा कुमारी चौहान, माखन लाल चतुर्वेदी, दिनकर, निराला तथा नेपाली की कविताएं आशा को कुछ अधिक ही भाती थीं। किताबों में उलझे देख कई बार इनके पिता भौंचक रह जाते थे, लेकिन आशा की रुचि देख ये मौन हो जाते थे। आशा ने दसवें वसंत में ही अनगिनत कविताओं और गजलों का संग्रह कर लिया। तब आशा के पिता को नहीं पता था कि एक दिन नन्हीं आशा खुद कविताएं, गजलें, कहानियां तथा उपन्यास लिखेंगी। आशा का जुनून और लगन का ही नतीजा है कि उनकी रचनाओं का भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त सभी भाषाओं में अनुवाद कराया गया। इतना ही नहीं विदेशों में भी उनकी कृतियों तथा रचनाओं को लोग चाव से पढते हैं। आशा के लिखे उपन्यास ''धुंध में उगा पेड़'' का कराची (पाकिस्तान) के स्तरीय पत्रिका मंशूर में धारावाहिक प्रकाशन 1995 में हुआ है तथा वह बहुत प्रशंसित हुआ। वर्ष 1996 में प्रकाशित इनका उर्दू, नज्मो-गजलों का संग्रह 'मरमूज'1996 के आईएएस के प्रश्न पत्र में स्थान पा चुका है। वर्ष 1999 में इन्हें एबीआई द्वारा वूमेन आफ दी इयर अवार्ड से नवाजा गया। वर्ष 2000 में एबीआई द्वारा ही प्रोफेशनल वूमेन्स एडवाइजर्स बोर्ड के लिए इन्हें नामित किया है। आशा की प्रकाशित पुस्तकों में 'दर्राचे' काव्य संग्रह (हिन्दी), 'जाने कितने मोड़' उपन्यास (हिन्दी-उर्दू) 'कैसा सच' कहानी संग्रह (हिन्दी) तथा अनुवादित कहानियों का संग्रह सहित कई हैं। वहीं, 'आज के अफसाने' उर्दू में शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। हिन्दी तथा उर्दू दोनों जुबानों में समान अधिकार रखनेवाली आशा प्रभात को बिहार राष्ट्रभाषा परिषद पटना द्वारा ''साहित्य सेवा सम्मान'', बिहार उर्दू अकादमी पटना-खसूसी सम्मान, उपन्यास ''धुंध में उगा पेड़'' के लिए प्रेमचन्द्र सम्मान व दिनकर सम्मान, दरीचे के लिए साहित्य संगम पुरस्कार और ''उर्दू दोस्त सम्मान'' पुरस्कार मिल चुका है। करीब ढाई दशकों से ये आकाशवाणी व दूरदर्शन की लोकप्रिय कवयित्रि के रूप में भी विख्यात हैं। हिन्दी में साहित्य अकादमी की पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य', 'कादम्बिनी' 'गंगनाचल', 'हंस', 'आजकल', 'शायर', 'किताबनुमा' सहित दर्जनों पत्रिकाओं में इनकी कविताएं, गजलें व कहानियां वर्षों से प्रकाशित होती रही हैं और हो रही हैं। बकौल आशा प्रभात-''पढऩा-लिखना कभी का शौक रहा अब मेरी मजबूरी बन चुकी है।''

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