रविवार, 17 जनवरी 2010

एक गुमनाम रेलवे मॉडलर


यह कहानी विदेशों में विख्यात पर अपने ही देश में गुमनाम एक ऐसे रेलवे मॉडलर की है, जो 78 वर्ष की उम्र में भी तीस साल वाले जज्बे के साथ कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर ऐ इंसान की तर्जुमा पर लगातार काम करता जा रहा है। इस मॉडलर की तकनीकी राय को जापान की टेनशोडो कंपनी आभार के साथ स्वीकार कर चुकी है। अपने देश के डीआरएम स्तर के अधिकारी प्रशंसा कर चुके हैैं। पर, आज तक उनके माडल को मान्यता नहीं मिली। मेट्रो चीफ ई. श्रीधरण हाल ही में उनके द्वारा मांगे जाने पर रामेश्वरम स्थित पुल के बारे में तकनीकी जानकारियां उपलब्ध करा चुके हैं। पांच दशक से रेलवे मॉडल बना रहे सीतामढ़ी के कोट बाजार निवासी इस रेलवे माडलर का नाम है देवी प्रसाद अग्रवाल। देवी दर्जनों वर्किंग स्टीम इंजन, डीजल इंजन, इलेक्ट्रिक इंजन का मॉडल बना चुके हैं। आजकल वे आनेवाले अत्याधुनिक रेलवे मॉडल का खाका बनाने का प्रयास कर रहे हैं। चौंकाने वाली बात है कि उन्होंने इंजीनियरिंग या कोई तकनीकी पढाई नहीं की है। मीडिया से कोसों दूर रहने वाले देवी 21वीं सदी में भी स्टीम इंजन को हटाने के खिलाफ हैं। उनका दावा है कि उनका रेल मॉडल भारतीय रेल मॉडल से दो दशक आगे है। वे भावी पीढ़ी को रेलवे का वर्किंग मॉडल बनाना सिखाना चाहते हैं। देवी प्रसाद कहते हैं कि खेल-खेल में 1948 में सबसे पहले उन्होंने एक डमी रेल इंजन बनाया, जिस पर सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल, काशी से उन्हें स्वर्ण जयंती पुरस्कार मिला। स्वर्ण जयंती समिति के सभापति स्व. डॉ. अमरनाथ झा ने उन्हें प्रेरित किया। 1955 में इंग्लैंड की पत्रिका हॉबिज वीकली पढ़कर उन्हें इंसपाइरेशन मिला और उन्होंने रेलवे मॉडल बनाने का प्रयास शुरू किया। 1956 में अमेरिका के सूचना विभाग के पास उन्होंने पत्र लिखकर तीन जानकारियां मांगीं। रेलवे मॉडल के पाट्र्स कहां-कहां बनते हैं, इसे कैसे मंगाएं और भुगतान कैसे करें? यहां की मदद से उनका संपर्क यूनेस्को से हुआ। यूनेस्को की ओर से उन्हें भरपूर मदद मिली। यहां तक कि विदेशी मुद्रा उपलब्ध कराने में भी संस्था ने सक्रिय भूमिका निभाई। इसी क्रम में जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका, जापान व आस्ट्रिया से रेलवे मॉडल का इक्विपमेंट, लिट्रेचर और पाट्र्स मंगवाए, लेकिन वहां के पाट्र्स भारतीय रेल से मेल नहीं खाते थे। यहां की रेल ब्रिटेन के इर्द-गिर्द घूमती थी। इसमें भारत के रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड ऑर्गनाइजेशन ने सहायता की और ब्लू पिं्रट उपलब्ध कराए। इस ब्लू प्रिंट को 45 फीसदी रिड्यूस कर उन्होंने स्टीम इंजन का मॉडल बनाया, जो न सिर्फ पटरियों पर दौड़ा, बल्कि छुक-छुक की आवाज भी निकाली। इसी क्रम में अमेरिका के एसी गिल बर्ट कंपनी के रिटायर्ड इंजीनियर की मदद से उन्होंने डीजल इंजन का पाट्र्स मंगवाया। इसी दौरान अमेरिका की संस्था नेशनल मॉडल रेल रोड एसोसिएशन से डिजिटल कमांड कंट्रोल की चर्चा हुई। इससे प्रभावित होकर इस संस्था ने इन्हें सम्मानित सदस्य बना लिया। 1965 में यूनेस्को के सहयोगी विभाग को युद्धपोत का मॉडल बनाकर भेजा, जिसे प्रदर्शनी में रखा गया। जापान की टेनशोडो कंपनी ने एक मॉडल बनाकर विचार-विमर्श के लिए उनके पास भेजा। उनकी राय से प्रभावित होकर जापान ने आभार जताया था। हाल ही में उन्होंने ई. श्रीधरण को पत्र लिखकर रामेश्वरम पुल से संबंधित तकनीकी जानकारी मांगी थी। श्रीधरण ने अपने हाथों से स्केच बनाकर उनके पास भेजा और आश्वासन दिया कि भविष्य में उनकी हर सहायता करेंगे। देवी प्रसाद बताते हैं कि उनके मॉडल को देखने पूर्व में गोरखपुर के डीपीआरओ, समस्तीपुर के डीआरएम श्री राव सहित कई अफसर आ चुके हैं। उन्हें मॉडल पसंद भी आए, बावजूद किसी ने दोबारा उनकी सुध नहीं ली। देवी प्रसाद का कहना है कि फिर भी वे कभी निराश नहीं हुए और जच्बे के साथ रेलवे मॉडल बना रहे हैं। उन्होंने बताया कि कभी एक रेलवे मॉडल बनाने में तीन हजार खर्च होते थे, अब दस हजार से अधिक लग रहे है''। पैसे कहां से आते है, के जवाब में उन्होंने कहा कि उनके इस कार्य में उनके विदेश में रह रहे परिवार के कुछ सदस्य और मित्र मदद करते हैं। उन्होंने कहा कि सीतामढ़ी में साइंस म्यूजियम बना तो वे अपने सभी रेल मॉडलों को दान में दे देंगे।

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