मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

आस्था से हारी मृत्यु, जीता आतंक

ऐसे दौर में जब बिना स्वार्थ कोई व्यक्ति अपने धर्म के बारे में सोचता तक नहीं। ऐसे दौर में जब स्वार्थ के लिए व्यक्ति धर्म परिवर्तन करने तक में नहीं हिचकता। ऐसे ही दौर में पाकिस्तान के पेशावर में जसपाल सिंह और महाल सिंह ने अपना सिर कलम करवा लिया, मगर धर्म परिवर्तन नहीं किया। माना कि आस्था से हार गई मृत्यु और जीत गया आतंक। यूं तो दोनों की मौत दुनिया के लिए कोई मायने नहीं रखती, क्योंकि आदमी की सोच ही मरती जा रही है। परंतु इनकी कुर्बानी ने निश्चित रूप से गुरु गोविन्द सिंह की याद को तरोताजा कर दिया है। इतिहास गवाह है कि गुरु गोविन्द सिंह ने आस्था एवं कर्तव्य निर्वाहन के लिए शहादत दे दी थी। यहां बताएं कि पाकिस्तान के पश्चिमी सीमांत इलाकों में तालिबानी आतंकियों का ही राज कायम है। तालिबानी आतंकियों ने कई सिखों का अपहरण पिछले दिनों कर लिया था। आतंकी चाहते थे कि ये सिख धर्म परिवर्तन कर उनके बुरे कार्यों में मदद करें। यह अलग बात है कि जांबाज जसपाल व महाल इनके सामने नहीं झुके। तब तालिबानी आतंकियों ने 21 फरवरी को दोनों के सिर काट डाले और पेशावर के एक गुरुद्वारे के पास फेंक दिया। मामला हर तरह से धर्म परिवर्तन का ही था। पर दुनिया के सामने यह बात सामने आई कि फिरौती के लिए सिखों का आतंकियों ने अपहरण किया था और नियत समय पर राशि न देने की वजह से इन्हें मौत के घाट उतार दिया। इस बात को गौण कर दिया गया कि तालिबानी आतंकी धर्म परिवर्तन कराना चाहते थे। मीडिया ने भी आपने दायरे को समेटे इसमें अंदर झांकने की कोशिश नहीं की? वजह साफ थी कि मामला तूल पकड़ता तो लोग सड़कों पर उतर हिंसा का रास्ता अख्तियार करते। लेकिन सच को उसकी पूर्णता में नहीं लिखना न तो उपयोगी होता है और न ही फलित। इस बात को किसे समझाया जाए और कौन रखेगा इसे याद? दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के कई इलाकों पर तालिबानी आतंकियों का कब्जा है। पाकिस्तान इन इलाकों में चाहकर भी किसी को सुरक्षा नहीं दे सकता। या यूं कहें कि पाकिस्तानियों को ही इन इलाकों में सुरक्षा की जरूरत है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। ऐसे में भारत सरकार का यह बयान कि दो सिखों की हत्या मामले में वह पाकिस्तान से बात करेगा, प्रासंगिक नहीं बल्कि हास्यास्पद है। भारत व अमेरिका ने मिलकर इसी तालिबान से वार्ता करने की योजना बनाई थी। यह बात भी सामने आई थी कि दोनों देश अच्छे-बुरे तालिबानियों की खोज करेंगे। एक सच यह भी है कि अमेरिका की नजर में अच्छे तालिबानी वो हैं, जो यह आश्वासन दें कि वे अमेरिका पर हमला नहीं बोलेंगे। अब भारत सरकार बताए कि वह अच्छे तालिबानियों को कैसे परिभाषित करेगी। क्योंकि, इतिहास का सच यह भी है कि 'पर्ल हार्बर' पर आक्रमण नहीं हुआ तो अमेरिका द्वितीय विश्वयुद्ध में सक्रिय नहीं हुआ। वर्तमान का सच यह है कि जबतक न्यूयार्क में 'वर्ल्ड ट्रेड' सेंटर पर हमला नहीं हुआ, तबतक अमेरिका ने नहीं जाना कि आतंकवाद की पीड़ा क्या होती है? इतिहास गवाह रहा है कि भारत आक्रमण के पक्ष में कभी नहीं रहा है। परंतु अब समय आ गया है कि आतंक मुद्दे पर भारत कठोर निर्णय ले। पाकिस्तान में सदियों से सिख रह रहे हैं। इनकी सुरक्षा कैसे हो, इसपर पर भी भारत सरकार को विचार करना चाहिए। यहां बता दें कि इन सिखों की मौत से बिहार के सीतामढ़ी निवासी रामशरण अग्रवाल इतने मर्माहत हुए कि इन्होंने 22 फरवरी को दिनभर का उपवास रखा।

1 टिप्पणी:

  1. "…परंतु अब समय आ गया है कि आतंक मुद्दे पर भारत कठोर निर्णय ले…" यह समय तो कब का आ चुका है, लेकिन इसके लिये रीढ़ की हड्डी होना भी तो जरूरी है…। गाँधीवाद और सेकुलरिज़्म के दो-दो इंजेक्शन लगवाकर नपुंसक हो चुका देश, कठोर तो क्या नरम कदम भी नहीं उठायेगा…

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