मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

बॉस को चेहरा नहीं, काम दिखाइए

तुरंत लाभ लेने की होड़ में आजकल कमोवेश सभी दफ्तरों में एक 'ट्रेंड'चल पड़ा है कि नए बॉस को खुश कैसे किया जाए। कैसे उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाई जाए। देखा जाता है कि वर्षों से काम कर रहे कामचोर, देहचोर को भी उस समय पंख लग जाते हैं, जब पुराने बॉस का तबादला और नए का आगमन होता है। पुराने बॉस ने काफी सोच-समझकर ही कुछ लोगों को देहचोर और कामचोर का खिताब दिया था। नए बॉस को सबकुछ समझने में थोड़ा समय तो लग ही जाता है। ऐसे में कामचोर और देहचोर काम से ज्यादा समय उन चीजों को ढूंढने में बिता देते हैं, जिससे नए बॉस प्रसन्न हों। वहीं, चुगलखोर पुराने बॉस की चुगली में जुट जाते हैं। कभी सड़क की धूल फांक रहे लोगों को नौकरी देने वाले पुराने बॉस को भी ये गाली देने से नहीं चूकते। इन्हें लगता है कि ऐसा करने से नए बॉस खुश हो जाएंगे और तरक्की दे देंगे। परंतु, यह इनकी कितनी बड़ी भूल है-यह तो समय ही बताता है। ऐसे लोगों के हथकंडे भी अलग-अलग होते हैं। कोई नए बॉस को भगवान का दर्जा दे डालता है तो कोई विद्वान का। कोई कहता है पुराने बुरे थे-आप अच्छे हैं। कोई कहता है कि पुराने ने जिंदगी बर्बाद कर दी-आपसे आबाद होने की उम्मीद है। कोई बॉस को देखते ही काम तेजी से करने लगता है तो कोई उन्हें देखकर निर्देश देने लगता है। कोई झुककर पांव छुता है तो कोई हाथ जोड़कर उनका चेहरा निहारने में लग जाता है। यह है निजी कार्यालयों की सच्चाई। इस रोग से मीडिया के दफ्तर सबसे ज्यादा बीमार हैं-कहना गलत नहीं होगा। निजी दफ्तरों में सच को सच साबित करना काफी मुश्किल है। क्योंकि, सच पर यदि अडिग हुए तो नौकरी तक चली जाएगी? सवाल यह भी कि यदि सच बॉस को बताया जाए तो क्या वे मानेंगे? जवाब यही होगा कतई नहीं? वजह साफ है-काम करने वाला व्यक्ति यह नहीं कहेगा कि सही में वह कार्यों के प्रति सजग है? कहे भी तो क्यों? उसे यह अभिमान रहता है कि वह मेहनती और अपने कार्य के प्रति ईमानदार है। फिर वह सबूत क्यों दे, परंतु यह कलयुग है। यहां हर चीज का सबूत चाहिए। बॉस को भी सबूत चाहिए। हालांकि कुछ बॉस ऐसे भी होते हैं, जो ज्यादा आगे-पीछे करने वालों को तुरंत भांप लेते हैं और उन्हें दरकिनार कर देते हैं। परंतु इसमें थोड़ा वक्त लग जाता है। तबतक कई कामचोर, देहचोर और चुगलखोर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। हालांकि इनकी कलई भी जल्द ही खुल जाती है और वे कहीं के नहीं रहते हैं। इसलिए संस्थान के प्रति ईमानदार रहें न कि किसी व्यक्ति विशेष के प्रति। काम करने वाला हर बॉस अपने साथियों से यही उम्मीद करता है।

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

गॉड! अबकी मंदिर जरूर बनवाएंगे

विधानसभा की सुगबुगाहट के साथ ही बिहार के नेताओं को याद आने लगे-मंदिर व मस्जिद। गांव की पगडंडियां भी, जर्जर सड़कें, बिजली, चापाकल व स्कूल भी। याद क्यों न आए, चुनाव सामने जो है। सत्ता में आने को व्याकुल विपक्ष के यहां सरगर्मी कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। सत्ता पक्ष ने पांच साल में क्या-क्या गलती की है, सबकुछ ताबड़तोड़ कम्प्यूटर में फीड किया जा रहा है। कई ऐसे नेता, जो प्रदेश से ज्यादा दिल्ली-बाम्बे में रहना पसंद करते हैं। इनकी गाडिय़ां भी गांवों के जर्जर मंदिर के सामने रुकने लगी हैं। दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम और क्षमायाचना का दौर भी शुरू हो चुका है। भगवान इस बार पास करा (जीता) दें, अबकी अधूरा मंदिर जरूर बनवा देंगे। यह अलग बात है कि वायदे के पक्के, इन्होंने पिछले चुनाव भी यही कहा था। एक नेताजी तो तीन चुनाव में यही वादा कर चुके थे। इस बार जैसे ही वादा किया, एक ग्रामीण तपाक से पूछ बैठा-हुजूर फिर मंदिर नहीं बना। नेताजी बोले क्या करें, विपक्ष टांगे अड़ा देता है? बाद में नेता जी के साथ खड़े व्यक्ति ने कहा, इस बार तो विपक्ष में आप ही हैं? दो दशक से लगातार चुनाव जीत रहे, नेताजी यह भी भूल गए कि उनकी सत्ता जा चुकी है। खैर, बिहार में करीब दो दर्जन विपक्ष के नेता लगातार दौरे पर हैं। इस प्रदेश में फिलहाल जदयू-भाजपा की सरकार है। यहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं और विपक्ष में है राजद, जिसकी कमान वास्तव में लालू प्रसाद के पास है। लोकसभा में महज चार सीटें पाकर अत्यंत कमजोर हो चुके लालू प्रसाद की नजर अब विधानसभा चुनाव है। ये हर हाल में चुनाव जीत अपनी सरकार बनाना चाहते हैं। इसके लिए अपनी पार्टी के सभी विधायकों व कार्यकर्ताओं को तैयार रहने के लिए कहा है। कार्यकर्ताओं के जोश और नीतीश सरकार की खामियों को भंजाकर ये चुनावी नैया पार करने चाहते हैं। दौरे के बहाने कई नेता लोगों की मंशा को टटोलने का काम भी कर रहे हैं। हिन्दू नेता मस्जिद के पास पहुंचकर नमाज अदा करने की भूमिका निभा रहे हैं। मस्जिद की डेंटिंग-पेंटिंग की बातें भी कर रहे हैं, तो कई अबकी जरूर मंदिर बनवाने के अपने वायदे को दुहरा रहे हैं। वहीं नीतीश सरकार के मंत्री-विधायक निश्चिंत मुद्रा में हैं। हालांकि दूरदर्शी नीतीश कुमार अंदर से कम चिन्तित नहीं हैं, फिर भी इन्हें भरोसा है कि जनता इन्हीं के साथ खड़ी है। इधर, जनता नेताओं की पालिसी को समझ रही है। बिहार के एक समाजसेजी का कहना है कि ये नेता हर चुनाव में झूठे वादे करते हैं। इस बार जनता समझदार हो चुकी है, वह ऐसे नेताओं को वोट देने से अवश्य परहेज करेगी।

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

Asha Khemka meets Prime Minister Gordon Brown

The Non-Resident Indian principal of a top UK college has met Prime Minister Gordon Brown at a Downing Street reception to celebrate the highest performing and most quickly improving colleges in England. Asha Khemka OBE, principal and chief executive of West Nottinghamshire College, was one of only ten college principals personally invited to meet the Prime Minister, Business Secretary Lord Mandelson and Further Education Minister Kevin Brennan, out of the 62 colleges represented at the reception. The Mansfield-based college was awarded ‘grade 1: outstanding’ across all inspection categories by Ofsted (Office for Standards in Education) – the government department that inspects and regulates education providers – in July 2008, ranking it one of the best performing colleges in the country. Mrs Khemka, who lives in Burton-on-Trent, Staffordshire, said: “I was honoured to meet the Prime Minister and delighted that he fully recognises the important role that colleges play, both in society and in the country’s economic recovery.” She added: “He was particularly interested to hear about West Nottinghamshire College’s work to get people back into employment and the lead we’re taking to increase the number of apprenticeships.” Mrs Khemka, who was born and raised in Sitamarhi, is the only female college principal in the UK to originate from India. She was married at the age of 15 to19-year-old-medical student Shankar Khemka, of Motihari, and the couple were blessed with three children while living in Patna.In 1978 Mrs Khemka arrived in the UK with her children and her husband, who now works as a senior consultant orthopaedic surgeon at Queen’s Hospital, Burton-on-Trent. She was a full-time housewife for the first 20 years of her married life and returned to her own education as a mature student after raising her children. After completing her studies Mrs Khemka began her career as a part-time college lecturer. Today, she is one of the leading college principals in the UK.Since taking the helm at West Nottinghamshire College in 2006 she has transformed it in size and reputation. It is one of the largest colleges in the UK, with 25,000 students, 1,200 staff and an annual budget of £50 million.