रविवार, 6 नवंबर 2011

हर आंख निहारे नारी देह

महिलाओं के बारे में...ऊंची-ऊंची बातें...घर में, परिवार में, सड़क पर दफ्तर में, मंच पर...। मगर, अकेले में नारी के प्रति विपरीत सोच, अर्थात हर आंख निहारती है देह। लैला-मजनूं व हीर-रांझा की प्रेम कहानियां इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह गई हैं। प्रेम की परिभाषा बदल चुकी है। नारी को देवी का दर्जा सिर्फ भाषणों में ही दिया जा रहा है। यदि ऐसा न होता तो हर विज्ञापन में अद्र्धनग्न नारी न दिखती। नेताओं की पार्टी में अद्र्धनग्न युवतियों को नहीं नचाया जाता। बलात्कार की घटना में अप्रत्याशित वृद्धि नहीं होती। टेलीविजन पर चल रहे कार्यक्रम को पिता-पुत्री साथ बैठकर देखने से परहेज नहीं करते। लेकिन यह हो रहा है...। वहीं, सोलह की उम्र में पैर रखते ही छात्र-छात्राओं में दोस्ती के प्रति बेचैनी नहीं बढ़ती। चंद दिनों में ये प्रेमी-प्रेमिका भी न बनते? मगर, यह भी हो रहा है...। क्योंकि प्रेम तो कहीं है ही नहीं, प्रेम तो हवश का रूप ले चुका है। उसे तो चाहिए बस देह सुख। तभी तो, बच्ची बन रही 'बच्ची' की 'मां'...। यह मामला कितना गंभीर है, सामूहिक विचार और निदान के लिए प्रयास की जरूरत है।
इस संबंध में तीस से चालीस की उम्र के पच्चीस लोगों से बात की गई। इसमें एक सज्जन को सीसीटी कैमरे ने लड़कियों को घूरते पकड़ा था। इनकी अपनी कहानी है। ये अपने विचारों में गिरावट मानने को तैयार नहीं, बल्कि सारा दोष नारी पर ही थोप रहे हैं। इनकी मानें तो तड़क-भड़क पोशाक और अंगप्रदर्शन की वजह से युवकों का ध्यान स्वत: ही नारी की ओर खींचता चला जाता है। ऐसे में नेत्र व मन का क्या कसूर? अन्य चौबीस के स्वर भी मिले-जुले थे। कमोबेश सभी ने उक्त स्वर पर हामी भरी। हालांकि सबने इस बात से इंकार किया कि उनकी नजर में 'अश्लीलता' है। इधर, लड़कियों के भी अपने तर्क थे। उनका मानना था कि मुंबई की लड़कियां तो एकदम छोटे कपड़े पहनती हैं। मगर, कोई घूरता नहीं है। क्योंकि, वहां की सोच व मानसिकता ऊंची है। कुछ ऐसे प्रेमी-प्रेमिकाओं से भी बातचीत की गई, जो शादी से पहले ही शारीरिक संबंध बना चुके हैं। ये सभी बीस साल से नीचे के हैं। गोपनीय तरीके से कई लड़कियां ओवर्शन भी करा चुकी हैं। इनका इरादा नौकरी के पश्चात ही शादी की है। अधिकतर की दोस्ती कोचिंग में पढऩे के दौरान हुई। कोलकाता के मनोवैज्ञानिक रामधार कोटरिया इसे पूरी तरह से गलत मानते हैं। उनका मानना है कि ऐसे युवक-युवती जिंदगी की दौड़ में पीछे रह जाते हैं, क्योंकि इनका पूरा ध्यान प्रेमालाप में ही लगा रह जाता है। ये इसके लिए मां-बाप को ही दोषी मानते हैं। वजह जो भी हो, नारी के प्रति सोच बदली है। छोटे-बड़े सभी निजी कार्यालयों में सुंदर और जींस वाली लड़कियां ही चाहिए। पढ़ाई से ज्यादा सुंदरता ही मेरिट का सर्टिफिकेट बन चुका है।

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

आइए, लें एक शपथ कि धरती को बचाएंगे

जन्म देने वाली मां यदि बीमार पड़ जाती हैं, तो हमारी नींद उड़ जाती है। हम उसे ठीक करने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, जबकि इस मां ने दो-चार ही पुत्र-पुत्रियां जने हैं। वहीं, दूसरी 'मां' जिसे दुनिया धरती माता के नाम से जानती है, पुकारती है, इसके तो कई करोड़ 'बेटे' हैं। यह हमें खाना देती है, रहने के लिए जगह देती है। यूं कहें कि दुनिया में जितनी चीजें दिखती हैं, सबकुछ इसी 'मां' की देन है। इसके बावजूद आज हम इस 'मां' के दुश्मन बन गए हैं। हरे-भरे वृक्ष काट रहे हैं। इसके गर्भ में रोज खतरनाक परीक्षण कर रहे हैं। इतना जल बर्बाद किया कि कई हिस्से जलविहीन हो गए हैं। लाख कोशिशों के बाद भी दुनिया भर के वैज्ञानिक 'दूसरी पृथ्वी' को नहीं ढूंढ सकें। 1970 के 22 अप्रैल को पहली बार पृथ्वी दिवस मनाया गया। तत्पश्चात यह सिलसिला साल-दर-साल जारी है। क्या आपने सोचा है कि मौसम में बदलाव क्यों हो रहा है? गर्मियां और गर्म क्यों हो रही हैं? सर्दियां सिमटकर माह भर क्यों रह गई हैं? बेमौसम बारिश, बेमौसम जलसंकट, घटते जीव-जंतु व पक्षी कहीं न कहीं चीख-चीखकर इस बात के संकेत दे रहे हैं कि धरती माता के बचाव के लिए सबको आगे आना चाहिए। वरना हमारे पास पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा। ग्लोबल वार्मिंग यानी जलवायु परिवर्तन आज पृथ्वी के लिए बड़ा संकट बन गया है। पृथ्वी के संबंध में कई तरह की भविष्यवाणियां भी की जा चुकी हैं। मसलन-दुनिया अब नष्ट हो जाएगी, पृथ्वी जलमग्न हो जाएगा वगैरह-वगैरह। विकास की होड़ में विश्व के 70 फीसदी विकसित देशों ने पृथ्वी को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया है, पहुंचा रहे हैं। इसका खामियाजा पूरी दुनिया को उठाना होगा। बता दें कि कई गैसें सूर्य के प्रकाश को धरती पर आने तो देती हैं, लेकिन इसके कुछ भाग को वापस लौटने में बाधक बन जाती है। इसी प्रक्रिया को ग्रीन हाउस प्रभाव कहते हैं। ये गैसें है-कार्बन डाइ-आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आक्साइड। ये गैसें हमारे वायुमण्डल में उपस्थित ओजोन परत को नुकसान पहुंचा रही हैं। वायुमण्डल में धीरे-धीरे छिद्र होता जा रहा है, जो सूर्य से पृथ्वी पर आने वाली अल्ट्रा वायलेट किरणों को रोकने में असफल हो रही है। नतीजतन, पृथ्वी का तापमान बढ़ता ही जा रहा है। तीन सौ सालों में वैश्विक तापमान 0.6 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। आइए, पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल 2011) को हम सब शपथ लें कि अपनी धरती माता को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। मसलन-पौधरोपण को खुद के रूटीन में शामिल करेंगे। इसके लिए औरों को भी प्रेरित करेंगे। पॉलीथिन का इस्तेमाल नहीं करेंगे। कागज का इस्तेमाल कम से कम करेंगे। इससे कई बांस के पेड़ कटने से बच जाएंगे। सूख रहे तालाब, कुएं को फिर से जीवित करेंगे। ब्रश करते वक्त बेसिन का नल धीमे खोलेंगे। सड़े-गले सामान सही जगह पर फेंकेंगे। खाना बनाने के लिए बायो गैस या कुकिंग गैस का ही उपयोग करेंगे। वर्षा का जल संचय की बात को गंभीरता से लेंगे। जरा सोचिए, इस पृथ्वी ने हमें क्या नहीं दिया है। दुनिया में जितनी भौतिक चीजें हैं, सब इसी की तो देन है। इसके बावजूद, हम इसे रोज नुकसान पहुंचा रहे हैं?

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार मिटाने को हर घर में चाहिए एक अन्ना

अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार का मुद्दा क्या उठाया। छुटवैये नेताओं के पर निकल आए। विपक्ष को बड़ा चुनावी मुद्दा मिल गया। मीडिया को प्रोडक्ट बेचने के लिए मसाला। अफसरों ने भी मिलायी हां में हां। ऐसा लगा कि पूरा देश भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट हो गया है। ऐसे लोगों ने भी आवाजें बुलंद की, जिनपर भ्रष्टाचार के अनगिनत मामले चल रहे थे। गौर करने वाली बात है कि एसी रूम में बैठकर 'सोने की आंख' से देखकर जनता के सामने जो आंकड़े पेश किए गए, वे सच्चाई से कोसों दूर हैं। इस बात को सोचना होगा, समझना होगा? उन्हें भी जो भ्रष्ट हैं, उन्हें भी जो भ्रष्टों को बढ़ावा दे रहे हैं और उन्हें भी जो उन्हें बचा रहे हैं? क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे द्वारा जलाया गया दीया आगे मशाल बनेगी या बुझ जाएगी, यह सवाल सबके मन में है, जवाब भी हरेक के पास है, यह अलग बात है कि सच को झुठलाना चाहते हैं? बेशक ! भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए हर घर में एक अन्ना हजारे को जन्म लेना होगा। क्योंकि भ्रष्टाचार की जद में जाएं तो कुछ पैसों के लिए लिए चाय की दुकान से मल्टीप्लेक्स, चपरासी से अधिकारी तक कहीं न कहीं भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। भ्रष्टाचार से नाता न रखने वालों की संख्या भी काफी है। मगर, ये बढ़ावा देने में कहीं न कहीं जरूर शामिल हैं। क्या सिनेमा देखने के लिए हम ब्लैक टिकट नहीं खरीदते, क्या बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाने के लिए घूस देने के लिए तैयार नहीं रहते। वास्तव में भारत में भ्रष्टाचार हर व्यक्ति के दिल व दिमाग में किसी न किसी रूप में अपना घर बना चुका है, जिसे तोडऩे के लिए लगातार कोशिश करनी होगी। बताते चलें कि यदि वेतन के पैसों से कोई आईएएस भी शहर में एक मकान बनाना चाहे तो बीस साल पैसे जोडऩे होंगे। फिर पांच साल में ही कोई आईएएस करोड़ों का मकान कैसे खरीद लेता है? विधायक बनने के पूर्व पैदल चलने वाले कई नेता, एमएलए बनते ही चार चक्के की गाड़ी पर घूमने लगते? थाने का मामूली दारोगा का बेटा देहरादून कैसे पढ़ता है, जबकि उसके वेतन के बराबर वहां फीस देनी पड़ती है? चिकित्सक पांच साल में ही करोड़पति कैसे बन जाते? मंत्री बनते ही नेताओं के पास एकाएक पैसे कहां से बरसने लगते ? चुनाव में करोड़ों खर्च करने वाले नेता शपथ पत्र में खुद को कंगाल दिखाते, फिर पैसे कहां से आते ? क्या बिना घूस दिए पासपोर्ट बनवाया जा सकता है? क्या बिना रुपये दिए ड्राइविंग लाइसेंस बन जाते हैं? बिना पैसे कितने दिनों में और देकर कितने दिनों में? क्या रेलवे का कोई ऐसा टीटीई होता है, जिसकी आमदनी लाख में नहीं होती? ट्रेन में बर्थ रहते टीटीई कहता है सीट नहीं है? देखा जाए तो ऊपर से नीचे तक के लोग भ्रष्टाचार में इस कदर समा चुके हैं कि इनसे निपटना आसान नहीं है। आपको पता है कि निगरानी के अफसर भी घूस लेते हैं? भ्रष्टाचार की जांच को बने अफसरों की संपत्ति की जांच की जाए, तो इक्के-दुक्के छोड़कर सभी करोड़पति हैं। नीचे वाला क्लर्क मंथन करते वक्त यही सोचता है कि उसके साहेब भी तो घूस ले रहे हैं। सो, थोड़ा लेने में बुराई नहीं। ऐसे में किसके पास की जाए शिकायत, कौन सुनेगा और कुछ करेगा। सिर्फ डर से भ्रष्टाचार का खात्मा असंभव है। इसके लिए आत्मा को टटोलना होगा। क्या लेकर आए थे, क्या लेकर जाएंगे-इसे भाव को जगाना होगा। शपथ लेना होगा कि थोड़े से फायदे के लिए हम घूस नहीं देंगे। अन्ना के सुर में सुर मिलाना होगा-ये अन्ना तुम चिराग लेकर चलो, हम पीछे हैं। बापू तुम भी देखो, हम बदल रहे हैं।