सोमवार, 12 सितंबर 2016

इन नेताओं को चाहिए मुद्दा

इन नेताओं को चाहिए मुद्दा, विषय चाहे पॉजिटिव हो या निगेटिव। कहीं कोई बड़ी घटना घट जाए तो बयान देने व आलोचना करने में ये पीछे नहीं हटते। यदि विपक्ष के नेता हैं तो हर गड़बड़ी के लिए सत्‍ता पक्ष जिम्‍मेवार है। सत्‍ता के हैं तो विपक्ष पर आरोप-प्रत्‍यारोप। विपक्ष के नेताओं को लगता है कि सिर्फ विकास की बात से जनता वोट नहीं देगी। इसलिए कुछ अलग करना है, कुछ अलग सोचना है। कई बार तो ये ऐसा बयान दे देते हैं, जिसकी आलोचना जनता ही शुरू कर देती है। ऐसे में सारा दोष मीडियाकर्मी पर मढ़ देते हैं। यदि गोलीबारी में कोई छात्र नेता घायल हो जाता है और संजोग से नेता जी अस्‍पताल पहुंचते हैं तो इनकी नजरें मीडियाकर्मी को ढूंढने लगती हैं, जबतक ये फोटो जर्नलिस्‍ट को देख न लें, इन्‍हें चैन नहीं। क्‍योंकि, बिना खबर कवरेज के लोग जानेंगे कैसे कि नेताजी आए थे। लोग कहेंगे कैसे कि नेताजी संवेदनशील हैं, हर दुख-सुख में लोगों के साथ खड़े हो जाते हैं। तय मानिए यदि मीडिया दो से तीन बार इनके घायल प्रेम के कवरेज को स्‍थान न दे तो ये अस्‍पताल की ओर ये कभी झांकेंगे ही नहीं। यदि घटना-दुर्घटना न हो तो ये बेरोजगार हो जाते हैं। तब ये अखबार में, टेलीविजन पर विरोधी नेताओं के बयान को गंभीरता से पढ़ते हैं, सुनते हैं। मंथन के बाद प्‍लानिंग, फिर शाम तक प्रेस विज्ञप्‍ति जारी कर एलान, यह फैसला सूबे या देश हित में नहीं है। विपक्ष आलोचना करता है। इनकी राह पर इनसे जुड़े अन्‍य नेता भी चल पड़ते हैं। फिर जिला व प्रखंड स्‍तर के नेता पीछे क्‍यों रहें? नेताजी को लगता है कि जनाधार मिलने लगा, मीडिया में कवरेज भी ठीक से होने लगा, फिर क्‍या धरना-प्रदर्शन का निर्णय ले लिया या फिर सूबे बंद का। कम से कम सात दिन इंगेज रहने के लिए ठीक-ठाक विषय तो मिल ही गया। इसी तरह एक के बाद एक विषय का चयन करते-करते साढ़े चार साल बीत जाता है, फिर चुनाव की घोषणा। तदोपरांत वोट की राजनीति, गिनती गिनाने का समय हमने अमूक घायल को अस्‍पताल में जाकर देखा। बेहतर चिकित्‍सा की व्‍यवस्‍था कराई। जनता के लिए धरना-प्रदर्शन किया। नेताजी जरा बताएं कि क्‍या जनता ने आपको कहा था कि आप विकास के बदले धरने पर बैठें? आपको तो बड़ी उम्‍मीद से जनता ने कुर्सी पर बिठाया था, आपको तो योजना बनानी चाहिए थी कि पिछड़ा क्षेत्र विकसित कैसे होगा? इसके लिए लड़ाई लड़नी चाहिए थी। छात्र यदि बेवजह हंगामा कर रहे हैं तो उन्‍हें समझाना चाहिए था। किसी बात पर नाराज भीड़ यदि हंगामा कर रही तो उसे इंसाफ दिलाना चाहिए था। लेकिन यदि आप ऐसा करेंगे तो मुद्दा ही खत्‍म हो जाएगा। मुद्दा खत्‍म हो जाएगा तो आप बेरोजगार हो जाएंगे। 

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

बेबाक टिप्पणी: पाकिस्तान की 'तालिबानी' सोच

बेबाक टिप्पणी: पाकिस्तान की 'तालिबानी' सोच

सख्ती जरूरी, तभी रुकेगा साइबर क्राइम

साइबर क्राइम में अप्रत्‍याशित वृद्धि हुई है। जिस तेजी से इजाफा हुआ, उस तुलना में सरकारी महकमे गंभीर नहीं हैं। तभी तो, प्रतिदिन कहीं न कहीं साइबर क्राइम की सूचना मिल रही है। किसी का पासवर्ड हैक करने की बात सामने आ रही तो किसी के नाम पर फर्जी आइडी बना दिया जा रहा है। जो लोग इसके शिकार हो रहे हैं, वे व्‍यथित हैं, क्‍योंकि थाने में रपट लिखाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होती। एसएसपी के पास मामला पहुंच रहा है, लेकिन वे भी मौन हैं। यदि साइबर क्राइम रोकने के प्रति सरकार गंभीर नहीं होगी तो आनेवाले दिनों में कई बड़े संकट का सामना करना पड़ सकता है। कई बड़े शहरों में इनदिनों एक ट्रेंड चल पड़ा है कि बिना पूछे किसी को वाट्सएप से जोड़ दिया फिर लगे अश्‍लील मैसेज भेजने। इसमें से कई ऐसे लोगों का पता चला है, जो मानसिक रूप से बीमार हैं। उन्‍हें पता नहीं कि वे कितना बड़ा अपराध कर रहे हैं। वाट्सएप ग्रुप में बिना सहमति किसी को नहीं जोड़ा जा सकता है। मोबाइल कंपनियां तीन-तीन माह के लिए लुभावने ऑफर देती है, इसी का फायदा ये मानसिक रोगी उठाते हैं। गलत आइडी से सिम लेते हैं और फिर जाने-पहचाने अंजान लोगों को अपना शिकार बनाते हैं। साइबर क्राइम करनेवालों का एक ऐसा ग्रुप भी देश में फल-फूल रहा है, जो प्रतिदिन भोले-भाले लोगों को झांसा देकर लाखों रुपये गटक जाते हैं। ये किसी के मोबाइल पर फोन करते हैं और बैंक अधिकारी के रूप में परिचय देते हुए बैंक का डिटेल मांगते हैं। जिस किसी ने भांप लिया कि बैंक क्‍यों मांगेगा, वे तो बच जाते और जिन्‍होंने बता दिया उनके बैंक एकाउंट से रुपये गायब। कई बार ये फोन करके ये भी कहते हैं कि आपके फोन नंबर को लॉट्री लगी है। इनाम की राशि के लिए बैंक डिटेल्स दें, साथ ही दस हजार रुपये नकद चाहिए। यूं तो साइबर क्राइम के लिए विशेष सेल बनाने का दावा किया जाता है कि लेकिन यह कितना कारगर है, यह किसी से छिपा नहीं है। विपरीत मानसिकता के कई आइटी इंजीनियर साइबर क्राइम में शातिरों की मदद कर रहे हैं। सो, हर व्‍यक्‍ति को चेतने की जरूरत है। सोचने की जरूरत है कि कोई यूं ही इनाम क्‍यों देगा? मेल का, फेसबुक का पासवर्ड समय-समय पर बदलने की जरूरत है। साइबर अपराधी से निपटने के लिए पुलिस के पास आधुनिक उपकरणों की कमी है, इसे बढ़ाने की जरूरत है। सरकारी स्‍तर पर ऐसे नंबर जारी होने चाहिए, जिसपर लोग आसानी से अपनी बात रख सकें। साइबर से जुड़े अपराधियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। तभी साइबर क्राइम पर अंकुश लगेगा।