रविवार, 19 मार्च 2017

सावधान! हाइजैक हो रही आपकी गोपनीयता

सावधान! आपकी गोपनीयता खतरे में है, लेकिन आप चाहकर भी कुछ नहीं कर सकेंगे। मोबाइल का सिम खरीदने, आधार कार्ड बनवाने के लिए गोपनीय जानकारी शेयर करना हर किसी की मजबूरी है। इसी का फायदा कुछ डाटा ब्रोकर्स उठा रहे हैं। भारत में कई ब्रोकर्स विभिन्न माध्यम से गोपनीय डाटा एकत्रित करते हैं, पुन: ये किसी कंपनी के हाथों बेच देते हैं। बदले में मोटी रकम की वसूली करते हैं। कई बीमा कंपनियां, ऑनलाइन कंपनियां इस डाटा का उपयोग कर रही हैं। कभी-कभी आपके फोन पर अकस्मात दिल्ली-मुंबई से फोन आता है कि अमूक कंपनी से बीमा कराएं, इसके ये-ये लाभ हैं। कई बार अनजाने खत भी आते हैं, जिसमें लुभावने स्कीम की चर्चा होती है। आप चौंक जाते हैं कि आपका नाम व नंबर कैसे मिला? जानकर हैरानी होगी कि डाटा ब्रोकिंग का यह 'खेल' वैश्विक स्तर पर 200 अरब डालर का है, हालांकि भारत में यह प्रारंभिक चरण में ही है। मगर, इसकी गति तेज है। केंद्र व राज्य सरकारों की नजर अब तक डाटा ब्रोकरों पर नहीं गई है। उनके व्यवसाय से पुलिस-प्रशासन भी अनजान हैं। कैशलेस व्यवस्था के बाद इंटरनेट यूजर की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। लोग ऑनलाइन खरीदारी कर रहे हैं। टैक्सी बुकिंग व अन्य कामों के लिए भी विभिन्न तरह के एप का उपयोग किया जा रहा है। डाटा ब्रोकर्स इसका भी लाभ उठा रहे हैं। भारत सरकार ने अब तक ऐसे तंत्र विकसित नहीं किए, जो इस काम में संलिप्त लोगों पर लगाम कस सके। साइबर अपराध ने रफ्तार पकड़ ली है, इस तुलना में रोकने की कवायद सिफर है। पुलिस के पास आधुनिक यंत्रों का घोर अभाव है। कुल मिलाकर डाटा ब्रोकर्स से निपटने के लिए सरकार के पास फिलहाल कोई योजना नहीं दिख रही है। सख्ती के नाम छूट और सिर्फ छूट। ऐसे में ब्रोकरों को भय कैसे होगा? ऐसे तत्वों को रोकने के लिए सरकार को सख्त कानून बनाना ही होगा, क्योंकि डाटा से प्राप्त जानकारी के आधार पर हैकर बैंक के पासवर्ड भी हासिल कर सकते हैं। ऐसे में आम आदमी की गाढ़ी कमाई एक झटके में उनके हाथ से निकल सकती है। साइबर अपराध से निपटने के लिए अलग विभाग बनाने की जरूरत है, जो आधुनिक यंत्रों से लैस हो। इसमें पुलिस के तेज तर्रार अधिकारी व आइआइटियन हों। सरकार अब तक साइबर क्राइम व उससे जुड़ी हरकतों को हल्के में ले रही है। यही वजह है कि प्रतिदिन कई लोग इसके शिकार हो रहे हैं। 99 फीसद मामले में पुलिस को कामयाबी नहीं मिलती है। सो, सरकार को चाहिए कि समय रहते न सिर्फ चेते, बल्कि लोगों को जागरूक भी करे।
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बुधवार, 1 मार्च 2017

कहानी एक इंजीनियरिंग कॉलेज की

यह कहानी बिहार के एक ऐसे इंजीनियरिंग कॉलेज की है, जहां पढ़ाई कम और विवाद व हंगामा ज्यादा होता है। साल में कम से कम आधा दर्जन बार बड़ा बवाल होना तय है, जिसमें छात्र कक्षा छोड़ सड़क पर उतरते हैं/प्रदर्शन करते हैं। वजह एक नहीं अनेक हैं। क्या होने वाले भावी इंजीनियरों की ऐसी हरकत शोभनीय है? जाहिर है कि इसका उत्तर हर कोई ना में ही देगा। शिक्षक भी ना कहेंगे, अभिभावक व यहां तक कि छात्र भी गलत कहेंगे। फिर ऐसा हो क्यों रहा है? देश के अन्य  इंजीनियरिंग कॉलेजों में तो ऐसा नहीं होता, फिर यहां हंगामा व विवाद क्यों? मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआइटी) में हॉस्टल के अंदर छात्रों के अलग-अलग ग्रुप बने हुए हैं, जहां जाति-धर्म व गरीबी-अमीरी का फर्क साफ नजर आता है। कई सालों से विद्या के मंदिर में यह 'खेल' चल रहा है, लेकिन रोकने-टोकने वाला कोई नहीं। जिस उम्र में बच्चे  इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लेते हैं, उन्हें अच्छे-बुरे की समझ नहीं होती। ये कॉलेज में जो देखते हैं, उसे ही सीखते हैं। इनका आचार-व्यवहार भी वैसा ही हो जाता है। मगर, इन्हें भटकाव से रोकने, सही शिक्षा देने की जिम्मेवारी शिक्षकों की होती है, क्योंकि बच्चों के माता-पिता उनसे दूर हैं, वे नहीं देख रहे कि लाडले क्या कर रहे हैं। वे तो बच्चों को ऊंचाई पर देखना चाहते हैं। यह माना जा सकता है कि कुछ बच्चे भटक जाते हैं, मगर सभी तो ऐसे नहीं हैं। शिक्षकों को चाहिए कि समय-समय पर बच्चों की काउंसिलिंग करें। उनकी गतिविधियों पर नजर रखें, उनकी सही मांगों को मानें। बच्चों की मानसिकता को भी समझें, तदोपरांत उन्हें सही दिशा दें। बच्चों को एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि उनके माता-पिता ने इस उम्मीद से भेजा है कि वे बेहतर करें। ऐसे में उनका भी कर्तव्य है कि वे अभिभावकों के सपनों को साकार करें। छोटी-छोटी बातों पर उलझाव क्यों, विवाद क्यों? बातचीत के जरिए भी हर समस्या का निदान निकाला जा सकता है। एमआइटी में बार-बार विवाद से छात्रों की छवि खराब होती है। शिक्षकों पर भी सवाल उठता है? इलाके के लोग अभिभावकों पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं। विवाद की बात जब खबर बनती है तो दूसरे राज्यों के लोग तरह-तरह की टिप्पणियां करते हैं। यह कहने में भी परहेज नहीं करते कि बिहार में ऐसा ही होता है। हम यह मौका क्यों दें? विवाद की जगह शांति व्यवस्था क्यों नहीं? भेदभाव की जगह एक भाव क्यों नहीं? ऐसा करना कोई मुश्किल नहीं, लेकिन इसके लिए आत्ममंथन की जरूरत है। शिक्षकों को भी, छात्रों को भी...। तभी, नई सुबह आएगी, सुहानी सुबह आएगी...।
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रविवार, 5 फ़रवरी 2017

बिक रही शराब, पी रहे लोग

राज्य सरकार ने गए साल शराब बेचने व पीने पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी। इसके लिए कड़े कानून भी बना दिए, लेकिन सच यही है कि शराब बिक रही है और लोग पी रहे हैं। हां, अब खुलेआम कोई नहीं पीता है, बल्कि घरों में...! पार्टियां भी घरों में ही दी जाती हैं। शराब विक्रेताओं ने अब बिक्री का पैटर्न बदल दिया है। बिक्री के लिए अब 'विशेष कोड' का इस्तेमाल किया जाता है, फिर झोले में रखकर बोतल ग्राहक के घर तक पहुंचाई जाती है। कस्टमर देखकर दाम दोगुने व चौगुने वसूले जाते हैं। रिस्क अधिक होने की बात कहकर दाम अधिक वसूले जा रहे हैं। कानून के भय से खुलेआम पीने का साहस इक्के-दुक्के ही कर रहे हैं। सरकार ने नियम तो कड़े कर दिए, लेकिन यह तंत्र विकसित नहीं किया गया कि घरों में पीने वालों की पहचान कैसे होगी? उनपर कार्रवाई कैसे होगी? जिस मुहल्ले में पांच-छह घर के लोग पीने वाले हैं, वे एक 'जासूस' भी रखते हैं। वह नजर रखता है कि कहीं पुलिस की गाड़ी तो नहीं आ रही है। शराबबंदी रोकने की जिम्मेवारी पुलिस और उत्पाद विभाग की है। पुलिस शराबबंदी के नाम पर रोज चांदी काट रही है। यदि वह 50 कार्टन शराब जब्त करती है तो उत्पाद विभाग को सिर्फ 40 कार्टन ही शराब हाथ लगती है। दस कार्टन कहां गए, किसी को पता नहीं। सवाल कौन करेगा? पावर तो उसी के पास है? दस कार्टन शराब में से कुछ पुलिस वाले गटक जाते हैं और कुछ उन व्यवसायियों के हाथों दोगुने दाम पर बेच देते हैं, जो पुन: चौगुने दाम पर ग्राहकों को सप्लाई करते हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शराबबंदी का निर्णय वास्तव में सराहनीय है, लेकिन कानून के रक्षक ही इसका दुरुपयोग कर रहे हैं। यदि वास्तव में शराबबंदी पर पूरी तरह से रोक लगानी है तो छापामार दस्ते बनाने होंगे, जो समय-समय पर विभिन्न जगहों पर छापेमारी करें। इसी तरह कुछ ऐसे नंबर जारी करने होंगे, जिसपर लोग बेखौफ सूचना दे सकें। दो-तीन वाट्सएप नंबर भी जारी करने चाहिए। इस सूचना पर त्वरित कार्रवाई भी हो और सूचना देने वाले का नाम गोपनीय रखा जाए, तभी लोग आगे आएंगे। हेल्थ के विशेषज्ञ शराबबंदी को राज्य हित में लिया गया फैसला मानते हैं। मगर, यह भी मानते हैं कि लोगों ने डर से शराब छोड़ी है, इच्छा से नहीं। इसलिए सरकार की ओर से नियमित रूप से जागरूकता अभियान चलाना चाहिए, ताकि लोग शराब की बुराई को जान सकें और मन से इसका त्याग करें। कई धनाढय़ लोग अभी भी दूसरे राज्यों व नेपाल में जाकर शराब का सेवन कर रहे हैं। वहीं, गरीब नशा के लिए कप सीरप समेत कई नशे की दवाइयों का उपयोग कर रहे हैं। ये स्वास्थ्य के लिए नुकसान हैं।